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Monday, October 1, 2018

ईश्वर पुलिस को सद्बुद्धि दे

इस अर्थ-प्रधान युग में मनुष्य को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं। व्यापारी दिन-रात काम करता है। किसान खेतों में पसीना बहाता है। मजदूर दिहाड़ी की तलाश में दर-दर भटकता है। विद्यार्थी भी रोजी-रोटी कमाने लायक बन जाय इसी लक्ष्य का पीछा करते हुए रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है। कुछ नराधम इसी रोटी के लिए छोटे-मोटे अपराध शुरू कर देते हैं और रुपयों की हबस का शिकार होकर अपराध की नयी-नयी राहें तलाशते रहते हैं। धनोपार्जन के लिए शुरू किया गया छोटा भ्रष्टाचार शीघ्र ही एक आदत में बदल जाता है जिसका बड़ा नुकसान वृहत्तर समाज को उठाना पड़ता है।

एक सामान्य नौकरीशुदा व्यक्ति अपना समय व श्रम और अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता अपने नियोक्ता की इच्छाओं के अधीन कर देता है ताकि महीने के अंत में उसे वेतन के रूप में कुछ रुपये मिल सके जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। उसके पास नौकरी से बचे हुए अत्यल्प समय और क्षीण ऊर्जा पर पत्नी व बच्चों से लेकर माता-पिता तक और इष्ट-मित्रों से लेकर तमाम रिश्तेदारों तक की आस लगी होती है। इसी समय में वह अपने लिए भी सुख तलाशता है। जीविका की जद्दोजहद में एक सामान्य नागरिक का सामाजिक जीवन छीजता जा रहा है। अपराधी और भ्रष्टाचारी मिलकर इस साधारण मनुष्य के जीवन को बेहद असुरक्षित और कठिन बनाते जा रहे है।

प्रदेश की राजधानी में नौकरी करने वाले विवेक को देर रात तक काम करना पड़ता था। ऐसी ही एक काली रात आयी जब रात में घर लौटने से पहले उसे अपनी एक सहकर्मी को सुरक्षित उसके घर तक छोड़ते हुए आना था। लेकिन वह घर नहीं आ सका। रास्ते में गश्त पर निकले एक सिरफिरे और उद्दंड सिपाही ने उसे रोका और पता नहीं क्यों उसके सिर में गोली मार दी। एक निहत्था कामकाजी अकारण मारा गया और एक साथ कई जिंदगियां बर्बाद हो गयीं।

प्रश्न उठता है कि पुलिस विभाग ने उस सिपाही को  कैसी ट्रेनिंग दी थी। आखिर शहर के एक समृद्ध इलाके की गश्त करने वाले उस रंगरूट से उच्चाधिकारियों ने क्या अपेक्षा की थी जिसे पूरा करने के लिए उसे एक निरीह नागरिक की हत्या करनी पड़ी? जहाँ असली अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, रोज ब रोज हत्या, लूट, छिनैती व बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहाँ पुलिस प्रशासन प्रभुवर्ग की सेवा में लगा हुआ उनकी और अपनी झोली भरने में व्यस्त है।

बड़ी भयावह स्थिति है। सुबह घर से निकलने वाला परिवार का कमाऊ सदस्य शाम तक सकुशल वापस आ जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। घर की बेटी बाहर निकलकर अपना काम करते हुए अपनी गरिमा बचाकर घर लौट आएगी इसकी कोई गारंटी नहीं। घर में, बैंक में या जेब में रखा पैसा अचानक लूट नहीं लिया जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। देश के सभी नागरिकों के जान-माल की गारंटी देने वाला संविधान और इसी संविधान की शपथ लेकर शासन की बागडोर थामने वाले मंत्री और नौकरशाह इस गारंटी को नष्ट करने में लगे हुए है। न्यायालय भी लाचार हैं। ये अनेक गैर-जरूरी फैसले सुनाने में अपनी मेधा और समय खपा रहे हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सुरक्षा और न्याय पाने के लिए कौन सा दरवाजा खटखटाने जाय?

मुझे तो लगता है कि सबकुछ भगवान भरोसे ही रह गया है। केवल ईश्वर ही है जो आर्त्त की प्रार्थना सुन सकता है। सभी अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अपने-अपने भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, जीसस से प्रार्थना करेंगे कि वे हम अकिंचन प्राणियों के असुरक्षा बोध को कम करने के लिए तथा जीवन के प्रति सकारात्मक विश्वास बनाये रखने के लिए कोई चमत्कार करें। उन पुलिसकर्मियों को ऐसी सद्बुद्धि दें, उनके आचरण में ऐसा परिवर्तन कर दें कि उन्हें देखकर कोई शरीफ आदमी भयाक्रांत न हो, जान बचाकर भागने पर मजबूर न हो। उन्हें ऐसा कर्तव्यबोध करा दे कि कोई अपराधी उनसे दोस्ती गांठने और मेल-जोल बढ़ाकर अपराध की कमाई में हिस्सेदार बनाने की हिम्मत न करे।

ऐसी ही एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन हमारे मुहल्ले में किया गया है। सेक्टर-16 इंदिरानगर, लखनऊ के सांईंराम पार्क में शाम छः बजे सबलोग इकठ्ठा होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। सभी हाथों में मोमबत्तियां लेकर अपनी प्रार्थना के साथ मुंशीपुलिया पुलिस चौकी तक शांतिपूर्ण मार्च करेंगे और जलती हुई मोमबत्तियों को पुलिस चौकी के द्वार पर लगाएंगे ताकि ईश्वर की कृपा से उन पुलिसकर्मियों को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हो सके। ताकि उनके भीतर की मानवता का उदय हो सके। ताकि राक्षसी प्रवृतियों का अस्त हो सके। ताकि भविष्य में फिर कोई विवेक अकारण बीच सड़क पर इनकी गोलियों से न मार दिया जाय।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। अरे, अभी इस समय कौन हो सकता है...! दुपट्टा सम्हालते हुए दरवाजा खोला तो शौहर खड़े थे, आज कुछ अलग मुस्कान लिए हुए। चकित होकर पूछा– क्या हुआ, आज इतनी जल्दी?

शौहर ने उसे हौले से पकड़कर अंदर आने का रास्ता बनाया। वह अचकचा कर पीछे हट गयी। सामने वाली भाभी जी एकटक जो देख रही थी। चट दरवाजा बंद कर अंदर की ओर मुड़ी तो इरफान मियां गुनगुना रहे थे– "आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है"

ऑफिस बैग सोफे पर पटका जा चुका था। उसकी दोनों बाहें फैली हुई शायरा की ओर बढ़ीं और इरफान ने उसे नजदीक खींच के उसकी कमर को दोनों ओर से जकड़ लिया– "जी करता है आज तुम्हारी आंखों में आँखे डाले यूँ ही देखता रहूँ।"

शायरा– माजरा क्या है? आज अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे। तबियत तो ठीक है?

इरफान– नहीं रे पगली, अब मैंने सोच लिया है। जो भी जिंदगी अल्लाह ने बख्शी है उसे प्यार से जीकर ही गुजारना है। सच्चे दिल से कह रहा हूँ।

जी-न्यूज पर शोर-शराबे वाली बहस चल रही थी। एक मौलाना जी चीख रहे थे– आप लोग तो ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे कोर्ट ने तलाक का अख्तियार एकदम से खत्म कर दिया है। असल बात कुछ और ही है...

शायरा ने रिमोट उठाकर टीवी बन्द कर दिया और इरफान के सीने से लग गयी– सच में प्यार करोगे मुझे? ऊपर की जेब मे रखी कलम उसके गाल पर चुभ रही थी। इरफान मौन होकर कुछ सोच रहा था।

शायरा ने जेब से कलम निकालकर किनारे रख दी,  "दो दिलों के बीच में इस पेन का क्या काम? सुना नहीं है, फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए"
"अरे यार, वो मौलाना जी क्या कह रहे थे? टीवी क्यों बन्द कर दिया? जरा रिमोट देना..."

"ओहो, तो ये बात है..!" अपनी कमर से उनका हाथ झटकते हुए मुंह बिचकाकर बोली– "बड़े आये, आज फिर जीने की तमन्ना है ...हुँह! कल तक क्या घास छील रहे थे... अभी काहें मरने का इरादा बना रहे हो? अभी तो सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगी है। बाकी द्वार तो खुल्ले ही पड़े हैं, ...वो भी आजमा लो तो मरिहो"

टीवी पर बहस जारी थी– तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-अहसन, निकाह-ए-हलाला, तलाक-उल-सुन्नत...

शायरा ने चुपचाप सोफे से बैग उठाया, कलम को शर्ट की जेब में वापस रखा और बोली– "कपड़े बदल लो चाय लेकर आती हूँ।"

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 1, 2017

बहू-अधूरी

ससुराल में दो साल बीत गये। कमली की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही थी। पूर्वा के मुकाबले वह कहीं नहीं टिक पा रही थी। दोनों बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर रात में बिस्तर पर उन्हें सुलाते वक़्त लोरी की आवाज़ में भी अम्माजी पूर्वा को ही ढूँढती रहती। बच्चों की देखभाल में कहीं कोई कमी न आ जाए इसके लिए कमली भरसक कुछ भी उठा नहीं रखती। आज अधिक रक्तस्राव के कारण वह कमरदर्द से परेशान कमरे के भीतर पलंग पर लेटी पड़ी थी। उसकी आँखों के दोनों कोनों से झर-झर आँसू बह रहे थे।

अम्मा जी मोबाइल कानों पर लगाये  कमली की माँ से उसकी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ गयी थीं - "जबसे आयी है यह तीसरी बार है... आज चार दिन हो गया, बच्चों को न तो समय से नहलाया-धुलाया और न ही घर के किसी काम में हाथ बँटा रही है... पूछिए ज़रा, अपनी लाडली से कबतक मातम मनाएगी? जाने क्या सिखा-पढ़ा कर भेजा है आपने!"

-"ऐसी स्थिति में मन को दुःख तो होगा ही न समधिन जी! भला कौन स्त्री माँ बनना नहीं चाहती?  बिन बाप की बच्ची थी बेचारी... मैं भी अपनी परिस्थितियों के आगे मजबूर थी... इसमें उसका क्या दोष?" उसकी माँ ने विनती की।

"हाँ तो मैंने कब गिड़गिड़ाया था आपके सामने उसे अपनी बहू बनाने के लिए? ...और मेरे बेटे ने तो पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसे बीवी नहीं अपने बच्चों की माँ चाहिए। ....शील-संकोच तो मायक़े में ही छोड़कर आ गई थी। उसके कंठ ससुराल में आते ही खुल गए... और तो और सिर पर पल्लू आजतक नहीं ठहरता...  दुल्हन हमेशा पर्दे में ही शोभा देती है।" उनकी आवाज़ कमली के कानों में भाले की तरह चुभ रही थी। अम्माजी ने आज फिर उसकी माँ को कोसना शुरू कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। पलंग से धीरे से उठकर दीवाल का सहारा लिए वह बरामदे में आकर खड़ी हो गई।

"अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी जान गए कि बहू पेट से थी। ...हमारी पूर्वा हमें छोड़कर चली गई लेकिन ऊँची आवाज़ तो दूर गुन्नू पैदा हो गया तब तक किसी ने उसकी झिरखिरी तक नहीं देखी। ये महारानी तो किसी की परवाह किए बिना सारा दिन बच्चों के साथ चपड़-चपड़ करती रहती हैं..." अम्मा जी का गुबार बाहर आ रहा था।

- "तो फिर शिकायत किस बात की अम्माँ जी? पूर्वा दी आपके बेटे की दुल्हन बनकर आयी थी और मैं दो बच्चों की माँ, तो पहले बच्चों को संभालू या पल्लू... इतना अंतर तो होगा ना मुझमें और उनमें...?" आज पहली बार अधूरी बहू का कंठ अम्मा जी के सामने खुल गया था।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, May 28, 2016

नयी फ्रॉक

दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में छपी मेरी कहानी 'नई फ्रॉक'

ओसारे में बाँस की खाट पर पड़े-पड़े उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। दो महीने हो गये थे घर में बचिया के ऊपर ‘महरानी जी’ का आसन आये। उसके बालों में महीने भर से कंघी नहीं पड़ी थी। चट-चट करते बालों ने आपस में लट्ट बाँध लिये थे। खाट पर सिर्फ़ दरी बिछी थी और उसके सिरहाने नींम के पत्ते वाली छोटी-छोटी कुछ टहनियां रखी गयी थीं। वहीं बगल में गोंइठा की आग लगातार सुलगती रहती थी। उसका पूरा शरीर लाल पड़ गया था। ऐसे में उसके ऊपर चन्दन और पियरी माटी का लेप लगाने के अलावा और कोई दवा भी नहीं दी जा रही थी। ऐसी मान्यता थी कि दवा देने पर देवी माँ और कुपित हो जायेंगी और बचिया जल्दी ठीक नहीं होगी। उसके शरीर पर पड़े फफोले सूखते, फिर हरे हो जाते। चेचक के साथ उसे बुखार भी रहने लगा था। उसके होठ सूखे सन्तरे की फांक की तरह मुरझा गये थे। कई दिन हो गये थे। वह न कुछ खाती, न पीती। बस टुकुर-टुकुर आने जाने-वालों को बेबस निहारती रहती।

घर में महरानी जी के आसन को अब काफ़ी लम्बा समय हो गया था। ऐसे में ‘बाबू’ की अम्मा की चिंता और बढ़ती जा रही थी। घर में दवा-दारु, लहसुन-प्याज और दाल में तड़का लगाना सब वर्जित था। भुनी हुई कलेजी और बाजार का समोसा-जलेबी बन्द हो जाने से बाबू की जीभ सुन्न होने लगी थी। फीका और उबला खाना बिल्कुल नहीं सुहा रहा था। बाऊजी को भी महीनों से घर का बना भोजन बेस्वाद लगने लगा था। वे अक्सर भोजन का एक निवाला मुंह में डालते ही बेटी सोनल पर चिल्ला पड़ते थे- " एक़रे लगे कवनो ढंग-सहूर नइखे, भोजन बनवले बाड़े कि आपन कपार... ले तेही खो "। कभी-कभी नाराज़ होकर भोजन की थाली उसके आगे ही पटक दिया करते। 

अम्मा को महरानी जी की शक्ति में जो अदम्य आस्था थी उसमें भयतत्व की प्रधानता थी। उन्हें घर के नेम-धरम और पूजा-पाठ में जो विश्वास था वह अशिक्षा और कर्मकांडी परंपराओं का पोसा-पाला हुआ था। लेकिन यह आस्था न हिलने वाली थी और विश्वास न डिगने वाला था। इसके अलावा उनके अंदर एक ग़ज़ब की अभिनय कला भी विद्यमान थी। अपनी अदाकारी से वो गुस्से में लाल-पीले हुए अपने ‘हुकुम’ को चुटकियों में मना लिया करतीं। बड़ी सफाई से वे पानी-पीढ़ा लगाती; बेना डुलाने बैठ जाती और ‘बड़ी माता’ के समय की आचार संहिता समझाते हुए सोनल का बनाया वही खाना उन्हें जिमा देती जो उन्हें थोड़ी देर पहले बेस्वाद लग रहा था।

लेकिन आज तो घर में खाने -पीने का बिल्कुल ही महौल नहीं था। बचिया की हालत देखकर सबको उबकाई आ रही थी। नाक दबाकर ही आना-जाना हो रहा था। बाबू तो घर छोड़कर बाजार का ही चक्कर लगा रहे थे। अलबत्ता महरानी जी के डर से बाहर का कुछ खाने की हिम्मत उन्हें भी नहीं थी। अभी बाबू और उसके पापा के खाने की चिंता गृहस्वामिनी को सता ही रही थी कि ऐन वक्त पर बचिया ने फिर उल्टी कर दी! उफ्फ...

इस बार उसके मुंह से लंबे-लंबे लच्छेदार जाला बाँधे हुए पीले रंग का मैगीनूडल्स जैसा कुछ बाहर निकला। पर बचिया ने तो ऐसा कुछ खाया ही नहीं था। बल्कि खाया तो उसने कुछ भी नहीं था। फिर यह लच्छे कैसे? 

दरअसल वे केंचुए थे जो उसकी आंत में न जाने कितने वर्षों से पल रहे थे। बढ़ते-बढ़ते उनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई थी कि अब उन्हें आँत में रहने लिए जगह नहीं बची थी। शायद इसीलिए उनमें से कुछ अपने लिए किसी और ठिकाने का रास्ता तलाशते उसके मुँह और गले के बीच में ही फँस गये थे। वह अपने एक हाथ से केंचुओं को खींच-खींच कर बाहर की तरफ़ झटक रही थी। वह इतनी कमजोर हो गयी थी खुद से उठकर उल्टी करने के लिये अपना मुंह खाट से बाहर नहीं लटका सकती थी। उसने उठने की कई कोशिशें की थी पर शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था। उल्टी सूखी हुई थी। उसमें कोई तरल पदार्थ नहीं थे, बल्कि सिर्फ केंचुए थे। उन लच्छों का कुछ हिस्सा दरी पर भी गिर गया था। हरदम साथ ही रहने वाली उसकी बहन ‘छोटिया’ ने उसे खाट से उठाने की बहुत कोशिश की, पर वह अकेले उसके मान में नहीं आयी।

बचिया की उल्टी देखकर कहीं बाऊजी को भी खाते समय उबकाई न आ जाय इसलिये अम्मा ने पीढ़ा और पानी का लोटा उठाया और सोनल से 'बाऊजी का भोजन कोठरी में ही ले आ' कहकर भीतर चली गईं। हुकुम के लिए कमरे में पानी-पीढ़ा लगाकर हाथ में बेना लिये वे उनके सामने बैठ गयीं। सोनल ने हाँफ़ती-काँपती बचिया को इशारे से बताया कि अभी जल्दी ही आयेगी और भोजन की थाली हाथ में उठाये झट से ओसारे से कोठरी की तरफ चल पड़ी। जबतक बाऊजी खाना खाते रहे तबतक वह भी वहीँ दोहरावन पूछने के लिये खड़ी रही।

बचिया अपनी कातर नजरों से निरीह अपराध भाव से चारों तरफ निहार रही थी – इस आस में कि शायद कोई उसकी पीठ पर थोड़ी थपकी दे दे और उसकी सांस स्थिर हो जाय। पर अफसोस! सभी व्यस्त थे। 

कुछ देर बाद सोनल जूठी थाली के साथ बाहर निकली। थरिया नल की तरफ टरका कर बचिया के बिछावन की तरफ बढ़ी। एक हाथ से उसे सहारा देकर उठाते हुये छोटिया से दरी खींच लेने को कहा। दोनों ने मिलकर बचिया को पानी से धो-पोछकर साफ किया। उल्टी से खराब हो गयी दरी को धुल कर धूप में सूखने के लिये डाल दिया। बचिया दरी के सूखने तक निखहरे खाट पर लेटी रही। उल्टी हो जाने के बाद उसकी बेचैनी थोड़ी कम हो गई थी। लेकिन मूज की रस्सी से बुनी खाट के ताने-बाने उसके फफोलों को चुभने लगे। फिर भी वह असक्त लेटी रही। आँगन में तार पर टंगी दरी की तरफ टकटकी लगाकर देखती रही। कुछ ही देर में कमजोरी और थकान ने तकलीफ़ पर बढ़त बना ली और वह बेदम होकर ऊँघने लगी।


अगले दिन महरानी जी का आसन उठ गया। उनकी बिदाई की तैयारी हो रही थी। बड़े सबेरे ही बाऊजी स्नान के बाद सफेद मर्दानी लपेटे, काँधे पर जनेऊ पहने छोटिया-छोटिया हाँक लगाये जा रहे थे। उन्हें अपने बालों में कंघी करनी थी और कंघी थी कि मिल ही नहीं रही थी। 

अम्मा तो बिल्कुल भी खाली न थी। उन्होंने बचिया की पसन्द के बहुत से सामान मंगा रखे थे। शीशा-कंघी, तेल-साबुन, नहाने के वास्ते नया बाल्टी-मग्गा, तौलिया, चप्पल, लाल रिबन, मोतियों की माला, काजल, इस्नो-पाउडर, खाने के लिये उसकी पसन्द के फल, मेवे और मिठाइयां, चावल-दाल-आटे का इन्तजाम तो था ही। इतना ही नहीं, उसकी पसन्द के कपड़े भी मंगा रखी थीं। खासतौर पर नीले रंग की एक फ्रॉक जो बचिया को बहुत दिनों से पहनने का मन था। अम्मा का मन बचिया के लिए आज बड़ा भावुक हो रहा था। उसकी ज़रूरत और पसंद का कहीं कोई सामान छूट न जाय इसके लिए वह याद कर-करके एक-एक चीज मँगवा रही थी। अब वह सयानी जो हो गई थी। 

दूर खड़ी ‘छोटिया’ सारा तमाशा आँखे फैलाये देख रही थी। बचिया के लिए इतना सारा सामान देखकर वह उलझन में पड़ गयी थी। सोच रही थी- अम्मा आज ब‍उरा ग‍इलि बा का!  

छोटिया का मन आज घर के किसी भी काम में नहीं लग रहा था। वह आज अपनी अम्मा की कही कोई बात भी नहीं सुन रही थी। आज पहली बार उसके मन में बचिया के प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हआ था जो उसके चेहरे पर भी साफ-साफ झलक रहा था। भला क्यों न होती डाह? उसे भी अपने लिये नयी फ्रॉक और चप्पल चाहिये थी। वह अम्मा से कई बार बोल चुकी थी- "एक ठो फराक हमहूँ के मँगवा देतू त घटि ज‍इतू! हमरा के त हरदम दीदी लोग के छोड़ने-छाड़न पहिरे के मीलेला।"  इतनी मिन्नतों के बाद भी अम्मा ने उसके लिये कुछ नहीं मँगवाया था। उधर जिस कंचे को खेलने के लिये बचिया अक्सर पिट जाया करती थी आज वही कंचे भी उसके लिए अम्मा ने ख़ुद ही मँगवा लिए थे!

अपने साथ अम्मा का सौतेला व्यवहार देखकर छोटिया आख़िर कबतक  चुप रहती! उसका मन आज पक चुका था। उसने ठान लिया कि अब वह किसी की कोई बात नहीं सुनने वाली और ना ही किसी का कहा कुछ करने वाली है। अपनी बात मनवाने के लिये घर का सारा काम छोड़कर वह ठनगन करने लगी। अम्मा को उसकी इतनी बेरुख़ी बिल्क़ुल भी नहीं भा रही थी। वो भी इस मौक़े पर जब महरानी जी की पूजा पर घर में आस-पड़ोस की ढेरो महिलाएँ भी मौजूद थीं। वह उसके ऊपर दाँत पीसतीं, आँखें दिखातीं और उन महिलाओं से छुप-छुपाकर किसी बात पर उसकी पीठ पर एकाध चटाका भी लगा देतीं।

आज ओसारा और आँगन से लेकर घर का कोना-कोना गोबर से लीपा गया था। मानों घर की पूरी गंदगी आज साफ हो गई हो। सारी अल्लाय मिट गयी हो। बाँस की पुरानी खाट एक कोने में खड़ी कर दी गयी थी। चिलचिलाती धूप में आँगन के बीचो-बीच एक नई चारपाई बिछी हुई थी जिसपर नया गद्दा और चमचमाती चादर भी डाली गयी थी। अम्मा एक-एक कर सारा सामान उसके आस-पास सजा रही थीं। 

मौक़ा पाकर छोटिया ने उन सामानों में से वो नीला फ़्रॉक निकाल कर कहीं और छुपा दिया था। जब घर के सभी लोग आँगन में हो रही पूजा-पाठ में व्यस्त हो गये थे तो छोटिया ने उस फ़्रॉक को पहन लिया और ओसारे में पड़ोस की आयी महिलाओं के बीच दुबक कर बैठ गई। सहसा अम्मा की नज़र छोटिया पर पड़ गयी। उसके शरीर पर नया वाला फ्रॉक देखकर वो तमतमा उठीं। बाघिन की तरह उस पर झपट पड़ी-  "रे अभागिन...जल्दी निकालु इ फराक...  नाहीं त ओकर आतमा एहरे भटकी आ तोके चैन से ज़ीये नाइ दी"। यह कहते हुए उसके गाल पर तड़ातड़ तमाचा जड़ने लगीं।

छोटिया भी चोट खाकर चीत्कार कर उठी - अब हमहूँ नाइ जीअब... मुआ दे हमहूँ के... ए जियले से निम्मन बा अम्मा कि हमहूँ मरि ज‍इतीं... तब तऽ ते हमरो ख़ातिर नाया फराक मंगवते न...?

 (रचना त्रिपाठी)

Wednesday, May 13, 2015

आस्तीन में मुंहनोचवा

सन् 2002-03 की बात है, जब हम लोग नेपाल से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिला मुख्यालय की सरकारी कालोनी में रहते थे। उस समय पूरा शहर 'मुंहनोचवा' की मार से आजिज था।

आये-दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता था, आज यहाँ देखा गया तो कल वहाँ। कोई कहता कि पंजो वाला बड़ा जंतु है, नाखूनों से वार करता है। तो कोई उसे बड़ी टांगों और लंबी पूछ वाला कीड़ा बताता था। अखबार का एक पूरा पेज मुंहनोचवा से प्रताड़ित लोगों की तस्वीरों से भरा रहता था। इस विचित्र हमलावर का प्रहार अक्सर शरीर के खुले हिस्से में होता था। जैसे- हाथ, पैर और गर्दन का ऊपरी हिस्सा... घाव देखकर ऐसा लगता था मानों कोई  किसी साजिश के तहत रात में लोगों के ऊपर तेज़ाब फ़ेंक कर भाग जाता हो। ऐसा अखबारों में पढ़ा था। मुंहनोचवा की खोज का सिलसिला भी महीनों अख़बारों में जारी रहा। पर ठीक से किसी को मालूम नहीं चला कि वह देखने में कैसा था...?

उस दिन सुबह से शाम हो गई थी पर हमारी पड़ोसन मिसेज शर्मा नीचे नहीं उतरीं। दिन में करीब एक से दो बार बड़े करीने से पतली प्लेट्स में साड़ी पहने... कभी अपने दाहिने हाथ की तर्जनी में घर के दरवाजे की चाभी की रिंग डाले, उसे गोल गोल घुमाते हुए तो कभी ऊन-सलाई के साथ अपनी बुनाई का काम लिए वे नीचे सड़क पर निकल पड़ती थी। अक्सर सिर ऊपर उठाकर मेरी बालकनी की तरफ देखतीं और मुझे भी आवाज लगातीं- " जुनजुन की मम्मी नीचे आइये, चौकड़ी जमाते हैं।"

मेरी भी आदत सी बन गई थी - साहब लोगों के ऑफिस या कहीं बाहर जाने के बाद मुहल्ले की सभी गृहिणियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाते हुये ठहाके मारने की। मिसेज शर्मा के हाथों स्वेटर की बुनाई की चर्चा तो पूरी कालोनी में थी। अक्सर कोई न कोई स्वेटर की डिजाइन सीखने के बहाने हमारी चौकड़ी में साथ देने पहुंच ही आता था। फिर तो दो-तीन घण्टे कैसे बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता।

उस दिन उनके घर का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन वे दिख नहीं रहीँ थीं। मुझसे भी रहा नहीं गया। मैं जायजा लेने अंदर चल पड़ी। भाभीजी...! आवाज लगाते उनके ड्राइंग रूम से होकर भीतर वाले कमरे  की तरफ बढ़ी।

"आप भी यहीं आ जाइये" किचेन की तरफ से आवाज आई। देखा तो पकौड़ियाँ बनाने के लिए प्याज काट रही थीं। मैंने पूछा- "कोई आने वाला है?"
"नहीं तो!"
"फिर इतनी सारी तैयारी किसके लिए?"
"आज चुन्नी के पापा ऑफिस से घर जल्दी आ गये थे। चाय के साथ पकौड़ियाँ भी बनाने को बोले हैं।"
"ओय-होय... तो ये बात है... तभी मैं कहूँ आज आप इतनी व्यस्त क्यूँ है जो नीचे नहीं उतरीं?"
" ऐसी कोई बात नहीं... सुबह से मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी"
"ओहो, इसीलिए भाई साहब घर जल्दी आ गये होंगे...? पर यह भी क्या खूब रही! जब तबियत ठीक नहीं थी तो आपको आराम करना चाहिए था और आप हैं की पकौड़ियों में लगीं हैं...? इससे तो अच्छा था कि वो ऑफिस में ही रहते"

मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह भावुक होकर अप्रत्याशित आवेश में आ गई। मेरी तरफ पलटकर बड़ी तेजी से बोली- " उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है...?" बुदबुदाते हुये... उनकी आवाज फिर कुछ ऐसी आई- "मरती रहो पर करती रहो"

मेरी नजर  उनके चेहरे पर टिक गयी थी। जो गोरा-चिट्टा, चमकदार और गुलाबी नाजुक चेहरा देखकर बहुतों को रश्क हो जाता था उसकी हालत देखकर  मैं चौक पड़ी।
"अरे, ये क्या! आज फिर वही काला धब्बा...हो न हो भाभी जी, आपके घर में भी मुंहनोचवा है!"
अब मुंहनोचवा को लेकर मेरी उत्सुकता और चिंता बढ़ गई थी। मैं पूरी तरह विश्वास कर चुकी थी कि यह प्राणी काल्पनिक नहीं है। उनका बिगड़ा चेहरा देखकर मैंने मन में सोचा शायद इसीलिए लोगों ने उसका नाम मुंहनोचवा रख दिया हो।

मैं उनसे ठिठोली करने पर उतर आई- "अब पता चला इस मुएं मुंहनोचवा का राज... इसका टारगेट भी ख़ूबसूरत चेहरे ही हैं।" लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अनमनी सी थी। सच में दुःखी लग रही थीं।

तत्काल हमने भाव बदला और उन्हें अलर्ट किया- "देखिये, आप सावधान हो जाइए! रोज रात में मच्छरदानी लगाकर सोया करिये। मैं कुछ दिनों से देख रही हूँ कि आपके चेहरे का एक दाग अभी ठीक नहीं होता तबतक दूसरा धब्बा फिर उग आता है। हो न हो यह मुंहनोचवा का ही प्रकोप है! और सुनिये, अगर आपको कहीं दिख जाय तो मुझे भी बताइयेगा। मैं भी उसे देखना चाहती हूँ। फिर हम दोनों अखबार वालों को जीते-जागते सबूत के साथ उस मुंहनोचवा के बारे में बताएँगे। सच में भाभी, फिर बड़ा मजा आएगा!"

हमेशा की तरह उनके चेहरे की चमक और बिंदास ठहाके वाली हंसी आज गायब थी। अचानक मेरे सामने एक अदद मुस्कान बनाये रखने की उनकी कोशिश भी नाकामयाब हो रही थी।
मेरे प्रश्नवाचक चेहरे की ओर आँख उठाकर उन्होंने देखा तो भीतर दबाया हुआ दर्द जुबान पर आ ही गया।
पीड़ा से भरी मुस्कान को सहेजकर धीरे से बोली-  "...और मुंहनोचवा जब मच्छरदानी के भीतर ही मौजूद हो तब क्या करेंगे...?"
इतना सुनकर कुछ देर तक मैं सन्न रह गई...! सोच नहीं पा रही थी की क्या बोलूँ। उनकी पीड़ा पर मुझे अबतक मजाक सूझ रहा था। अब ग्लानि ने घेर लिया।
मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा-
"यह तो बलात्कार है...?"
"नहीं-नहीं, यही उनका प्यार है...!" उनके चेहरे की वितृष्णा साफ़ झलक रही थी।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2015

बुरा होना अच्छा है

आपको नहीं लगता कि एक स्त्री को पूर्ण बनाने में जितना जरूरी उन प्राकृतिक गुणों जैसे- ममता; प्यार; धैर्य, सहनशीलता, त्याग और साहस का होना है, उतना ही जरुरी उन्हें खुद को सुरक्षित रखने के लिये अपने अंदर कुछ सांसारिक गुणों का भी समावेश करना है...? थोड़ी नफरत, थोड़ा क्रोध, थोड़ी लालच, थोड़ी चालाकी, कुछ क्रूरता और ढेर सारी ताकत! यह सब उन्हें इसी जमाने से सीखना होगा !!!

याद करिये, जब प्यार करने और अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करने के जुर्म में पंचायत के ग्यारह सदस्यों ने बारी-बारी से उसकी आबरू लूटी थी तो कहाँ थी उसकी ये अनमोल निधियां जो कथित रूप से एक बेहतर संसार की रचना करती हैं। ये जो सद्गुण एक अच्छी स्त्री में रचे-बसे हैं... इनमें से कोई भी तो उसका साथ देकर उसकी रक्षा के लिये सामने नहीं आये। उसका धैर्य; उसकी लज्जा; उसकी शाहनशक्ति; उसका प्रेम; उसकी ममता और वह करुणा भी; जो इस समाज के ढांचे को मजबूत बनाये रखने के लिये कथित तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्या प्रकृति प्रदत्त जन्मजात उसके ये सभी गुण इस समाजिक बर्बरता के आगे निरुत्तर नहीं हैं…?

जब यहाँ स्त्रियों को उनके पति की मृत्यु के पश्चात् उनकी चिता के साथ ही सती बनाने के लिए जबरदस्ती जलाया गया तब क्या वहां उसका यह ईश्वरीय गुण "साहस" उसकी सुरक्षा में ढाल बनकर खड़ा हुआ... काश उस समय उनके अंदर हिम्मत के अलावा हथियार उठाने की शक्ति भी होती तो उस समय यह प्रथा जन्म ही न लेने पायी होती।

16 दिसंबर की रात जब निर्भया उन दरिंदो द्वारा नोची जा रही तो क्या कर रही थी उसकी 'सहनशक्ति'... जो उसे टूटकर बिखर जाने से रोक न सकी? अगर इस सहनशक्ति के साथ उसके पास आर्थिक क्षमता भी होती तो उतनी रात में उसके पास खुद की गाड़ी; अपना ड्राइवर और अपनी सुरक्षा के लिये बॉडीगार्ड भी होता तब क्या उसके सामने यह नौबत आती...अगर आई भी होती तो क्या वे दरिंदे वहीं के वहीं ढेर न हो गये होते...?

जब कानपुर की ज्योति अपने पति की साजिश के तहत चाकुओं से गोद-गोद कर छलनी की जा रही थी उस समय भी तो उसका "धैर्य" जवाब दे गया... आपको नहीं लगता कि उसने भी समय रहते पहले ही थोड़ा अधीर होना सीखा होता तो उस दिन अपने पति के छलावे में नहीं आयी होती... और उसके जीवन की रौशनी भी आज हमारे बीच ही कहीं दीप्तिमान होती...!

और तो और, हमारी न जाने कितनी बहू-बेटियां माँ बनने के बाद भी जब दहेज के लोभ में जलायी जा रही थीं उस समय यह "ममता" और "त्याग" की निधियाँ किस कोने में दुबकी पड़ी हुईं थीं… जो उनको जलता देख थोड़ी भी पिघल न सकीं... अपनी सुरक्षा के लिये अगर इन्हें थोड़ी नफरत; थोड़ा क्रोध और थोड़ी लालच भी सीखनी पड़े तो क्या बुरा है...?

लखनऊ के निकट मोहनलाल गंज में जब एक महिला के साथ दुष्कर्म कर हत्या के बाद उसका लहू-लुहान नंगा बदन पूरी मीडिया में घण्टों तमाशा बनाया गया तब क्या  इस प्रकृति की "लज्जा" भी तार-तार न हुई...? ऐसे में अगर स्त्री थोड़ी बेहयाई ही सीख ले तो कम से कम इस "लज्जा" के लुटने के भय से कुछ पल मुक्त होकर जी तो सकेंगी...!

जहां कई दशकों से एक माँ की कोंख में इस दुनियां से बेखबर एक लड़की को ख़त्म करने की साजिश रची जाती रही हो और न जाने कितने तरह के औंजारों से उसके मोम से नाजुक बदन पर लगातार प्रहार किये गए हों उस समय क्या उसे "करुणा" की भीख भी मिलती है...? ऐसे में हम स्त्रियों को क्या सिर्फ भगवान् के भरोसे ही बैठे रहना काफी है...? उन्हें थोड़ा सा ज्ञान और गुण इस दुनिया और समाज से सीखकर अपनी सुरक्षा खुद से कर सकने के लिये अपना हथियार भी पहले से तैयार नहीं रखना चाहिये...?

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, March 4, 2015

बलात्कार की चर्चा से मनोरंजन की मानसिकता

तिहाड़ जेल में बन्द एक दोषसिद्ध बलात्कारी का साक्षात्कार आजकल चर्चा में है। भूत-प्रेत, टोना-टोटका और स्टिंग ऑपरेशन के बाद मीडिया को अब यही दिखाना बाकी रह गया था। समाज के बारे में और खास तौर पर लड़कियों के रहन-सहन और ओढ़ने पहनने के बारे में इस अमानुष का प्रवचन सुनना ही अब नारी जाति के लिए बचा रह गया था। यह अधम प्रयास वे चैनेल कर रहे हैं जिनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी प्रतिष्ठा है। जिन विद्वानों और विदुषियों को लड़कियों के साथ बलात्कार होने का कारण उनके द्वारा छोटे वस्त्र पहनना, देर रात में अपने किसी पुरुष मित्र के साथ बाहर निकलना, फिल्में देखना आदि ही समझ में आ रहा है उन्हें यह बताना पड़ेगा कि फिर क्या हर उस नयी शादी-शुदा लड़की के साथ बलात्कार नहीं हो जाना चाहिये जो अपने पति के साथ हनीमून पर जाती है.. किसी अनजान होटल में ठहरती है... अपने नये नवेले पति के साथ देर रात तक बाहर रहती है या रात में फिल्म देखकर लौटती है..? ये लोग उदाहरण दे सकते हैं कि कहीं कहीं इस तरह के केस में भी बलात्कार होते सुना गया है। तो क्या यह मान लिया जाय कि हम अपने समाज को स्त्रियों के जीने लायक नहीं बना सकते।

जीव-जंतु, पेड़-पौधे, आकाश-पाताल, नदी-पहाड़ आदि सभी चीजों का निर्माण तो ईश्वर ने किया है और उसी ने इंसान के रूप में एक बच्चे (लड़का-लड़की) को जन्म दिया है- किसी साधू या अपराधी को नहीं। लेकिन आधुनिकता और उपभोक्तावाद के जंगल में तब्दील हो चुके हमारे समाज ने ऐसे नरपिशाचों को पैदा कर दिया है जिन्होंने इन्हें बनाने वाले को भी बदनाम करके रख दिया है। बलात्कारियों का अपना कोई नाम पता नहीं होता या उनके चेहरे पर नहीं लिखा होता की फला व्यक्ति बलात्कारी है जिसे देखते ही हर लड़की सावधान हो जाये और अपना काम-धाम छोड़कर किसी सुरक्षित बन्द कमरे में खुद को कैद कर ले अथवा कोई चादर ओढ़कर या बुरका पहनकर चोरी-चोरी छिपते-छिपाते बाहर निकले। लेकिन, क्या बुरका पहनने वाली स्त्रियों के साथ कभी बलात्कार नहीं हुआ है.. या किसी छह महीने की बच्ची से लेकर अधेड़ महिला के साथ इस तरह का दुष्कृत्य नहीं हुआ है?
अगर मिडिया को किसी केस का पोस्टमार्टम करना ही है तो जरा इस मानसिकता का पोस्टमार्टम करके बतायें कि लड़कियों के लिए छोटे कपड़ें बनते ही क्यों है..? और अगर ऐसे कपड़ो का प्रोडक्शन हो रहा है तो उनके पहनने पर आपत्ति क्यों..? यदि छोटे कपड़े बलात्कार को आमंत्रण देते हैं तो इसका उत्पादन करने और बेचने वाली फर्मों पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए? फिर यह भेद-भाव ही क्यों कि ऐसे कपड़े किस तरह की लड़की पहने या किस तरह की न पहने..? देर रात में सिनेमा हॉल में फिल्में चलती ही क्यों हैं..अगर देर रात में फिल्में चलती भी हैं तो लड़कियों के लिये प्रतिबंधित क्यों नहीं कर दिया जाता है...। यदि नहीं तो फिल्म देखकर लौटने वाली लड़की के साथ बलात्कार होने पर सिनेमाहाल के मालिक के खिलाफ़ एफ़.आई.आर क्यों नहीं? या फिर देर रात का सिनेमा मर्द ही क्यों देखे..? देर रात फ़िल्म देखकर घर लौटने पर ऐसी विकृति मानसिकता वाला पुरुष अपने घर में ही अपनी वीबी या बेटी-बहू के साथ बलात्कार नहीं कर सकता क्या..?

एक बलात्कारी जैसे जघन्य अपराधी का साक्षात्कार क्या इतना जरूरी है जो उसकी डॉक्यूमेंट्री बनाकर पब्लिक नें प्रसारित की जाय..? क्या मिलने वाला है उससे? सिवाय उस निर्भया और उस जैसी तमाम पीड़ित स्त्रियों और उनके रिश्तेदारों के अपमान और मानसिक उत्पीड़न के। ऐसी वाहियात बातों की चर्चा का प्रयास करना भी सामाजिक अपराध को एक खास तरह की मान्यता  देता है और मानसिक रुग्णता के शिकार लोगों के मनोरंजन का साधन बनता है। सरकार को इसपर अविलंब पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, January 26, 2015

अद्भुत ज्ञानी सन्त

हाल ही में हमारे देश के कुछ संतों को यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए हमें दस-दस बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हों ने इस ज्ञान को अपने प्रवचन में मिलाकर भक्तों के हवाले कर दिया। यह सुनकर पहले तो मैं हतप्रभ रह गयी कि कैसे संभव होगा इस सदुपदेश का अनुपालन करना। अब तो बहुत देर हो गयी, लेकिन यह देखकर मन को समझा लिया कि ज्यादातर लोग हमारी तरह ही मजबूर होंगे। लेकिन यह धरती वीरों से खाली भी नहीं है।

एक परिवार जिसे मैं वर्षों से देखती-सुनती आ रही हूँ, लगता है उसने हमारे देश के वर्तमान संतो की बातों पर अमल करने की ठान ली है। उस घर के मुखिया को अपने परिवार का पेट भरने को दो वक्त की रोटी के लिए हाड़- तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। घर के उस एकमात्र कमाऊ सदस्य ने एक दिन एक्सिडेंट के दौरान अपना शारीरिक स्वास्थ्य भी गवां दिया। लेकिन इस महावीर ने सात बच्चों को पैदा करने के बाद डॉक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में आठवें का भी नम्बर लगा लिया है। ऐसे में खेद है कि अब वो इन सन्तों की इच्छा के आंकड़े को पूरा करने में दो की संख्या से और पीछे रह गया है।

जो असाधारण मनुष्य अपनी आठ सन्तानें भेंट स्वरूप इस राष्ट्र को प्रदान कर चुका है अगर उसे इस बीच कुछ हो जाता है तो वह इस राष्ट्र की एकता और अखण्डता बनाये रखने के लिए दो रत्नों को और पैदा करने से चूक जाएगा। मेरी चिंता का विषय यही है। ऐसे में उन सन्तों की ही तरह इस देश की खातिर आपका भी कुछ फर्ज बनता है! उन सन्तों से आप यह निवेदन करें कि किसी भी हाल में उस इंसान को जिन्दा रखने के लिए अगर कोई जड़ी-बूटी हो तो उसे पिलाकर उसकी प्राण रक्षा  करें;  नहीं तो जो अभी पैदा नहीं हो सके उन दोनों रत्नों के अभाव में इस देश का क्या होगा। संतो के कहे अनुसार उनकी इस देश को बहुत जरुरत है।

जो इस देश की मिट्टी पर खड़े हो चुके हैं उन सातों औलादों की चिंता आप छोड़ ही दे। वे बड़े 'होनहार' हैं। कम उम्र में ही वे पड़ोसियों के घर में हाथ साफ करके अपनी व्यवस्था बखूबी कर लेते हैं। आंठवा भी गर्भ में पड़े-पड़े ही माँ की हाड़-मांस में बची-खुची आयरन-कैल्शियम और विटामिन्स को चूस कर जिन्दा बाहर आने के लिए इस चक्रव्यूह को पार  कर ही जाएगा। ...और उस औरत का क्या? गजब की ताकत बख्शी है ईश्वर ने उसको। आठवाँ बच्चा पेट में है और पहली बेटी ससुराल जाकर माँ बन चुकी है फिर भी उसके शरीर ने जवाब नहीं दिया है। अपाहिज हो चुके पति की दुर्दशा से भी कोई शिकन नहीं है चेहरे पर। गाँव भर के लोग दीदे फाड़े देखते है उस उर्वर 'शरीर' को। गजब की है जिजीविषा। कुछ न कुछ पा ही जाती है अपने और बच्चों के पेट के वास्ते।

तो हे सन्त जन, आप इन बच्चों की चिंता ना ही करें। जिस भगवान ने इनके शरीर में मुंह दिया है वही इनके मुंह में भोजन भी दे देगा। आखिर आप लोग भी तो इस देश का दिया तरमाल उड़ा ही रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा का प्रमाण आपका यह अद्‍भुत बयान दे ही रहा है। ये बच्चे भी ऐसा ही दिव्य ज्ञान अर्जित कर लेंगे। आप तो बस इन बच्चों की संख्या में बढ़ोत्तरी में कहीं कोई व्यवधान ना खड़ा हो जाय उसका उपाय जरूर कर लें। आखिर 'पड़ोसी' के घर में हाथ साफ करने का इनका अनुभव भी तो हमारे देश के लिए बहुत कारगर साबित होना है। आपके मतानुसार यही आंकड़े ही तो देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाले हैं

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 14, 2015

पीके जैसी फिल्मों से सीखती पीढ़ी

आज सुबह-सुबह मेरी बचपन की सहेली का फोन आया। वह एक तरफ थोड़ी परेशान सी लग रही थी तो दूसरी तरफ अपनी बात बताते हुए हँसती भी जा रही थी। मैंने बोला- "अजीब हो यार, या तो पहले मुझे पूरी बात बताओ या पहले खूब हंस लो।" वह चुप हो गयी और अपने को संयत करके बताने लगी। उसकी बातों में शर्मिंदगी भी थी और झुंझलाहट भी; फिर भी बीच-बीच में हँसती जा रही थी। बच्चों ने हरकत ही ऐसी की थी कि उसपर न तो क्रोध किया जा सकता है, न उसे स्वीकार किया जा सकता है और न तो सराहा ही जा सकता है। बता रही थी कि उसका दस साल का बेटा अपने पिता से पीके फ़िल्म में “डांसिंग कार” के बारे में बात कर रहा था। बेटे ने कहा-

pk-parody

" वो डांसिग कार नहीं थी पापा।"

पापा ने पूछा- फिर क्या था..?

"उसमें सेक्स हो रहा था"

वो क्या होता है..?

"इसी से तो पापुलेशन बढ़ता है"

तुम्हें कैसे पता चला.?

"फ़िल्म से ही, आपने देखा नहीं उसमें स्ट्राबेरी फ्लेवर कामसूत्र  कंडोम का सीन था...!"

वो क्या होता है..?

"अरे मेरे बुद्धू पापा! वो पापुलेशन कंट्रोल ले लिए सेक्स के दौरान पहना जाता है"

पापा की थूक तो गले में सटक गई। बेटे का डिस्क्रिप्शन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसने फिर बताया-

" पापा मुझे तो लगा कार में बच्चा पैदा हो रहा हो रहा है"

वो कैसे पता चला..?

“आपने सुना नहीं उसमें इह.. इह..की आवाज आ रही थी। ”

अब उसे हम दस साल का बच्चा कहें या दस साल का जवान बेटा! हद होती है। हास्य और मनोरंजन के नाम पर ऐसे फूहड़ दृश्य परोसे जा रहे हैं जो हमारे सामान्य जन जीवन का हिस्सा भी नहीं हैं। हो सकता है फिल्म के कर्ता-धर्ता लोग ऐसे वातावरण में रहने के आदी हों लेकिन भारतीय समाज के आम आदमी के लिए तो इस फिल्म ने लगातार मर्यादा की सीमा पार की है। व्यावसायिक सिनेमा बनाने वालों की अधिक से अधिक पैसा कमाने की चाह और उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में उलझा हुआ जनमानस मिलकर जो काकटेल बना रहे हैं उससे मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसे असहज दृश्य उत्पन्न होते ही रहेंगे। हम एक भयानक पैराडाइम-शिफ़्ट देख रहे हैं।

फिल्मों में आजकल जिस तरह के दृश्य दिखाये जा रहें हैं उसपर हमारे बच्चों का बालमन समय से पहले वयस्क हो रहा है। इन फिल्मों से करोड़ों की कमाई करने वाले डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और एक्टर ने फ़िल्म बनाते समय देश के नौनिहालों के बारे में रत्ती भर भी विचार नहीं किया होगा; और सेंसर बोर्ड ने तो अपनी आँख पर सिर्फ धर्म से जुड़ी समस्याओं का ही चश्मा चढ़ा रखा होगा; जिसने इन बेहूदे दृश्यों को नजरअंदाज कर फ़िल्म दिखाने की इजाजत दे डाली होगी। इन फिल्मी कलाकारों का क्या इन्हें तो सिर्फ अपने नाम, पैसा और शोहरत से मतलब है। हमारे बच्चों के भविष्य से तो जैसे कोई ताल्लुक़ ही न हो। सत्यमेव जयते के माध्यम से लोकप्रिय प्रवचन देने वाले आमिर खान से इसकी उम्मीद नहीं थी।

एक तरफ आमिर खान की फ़िल्म थ्री इडियट्स ने मासूम बच्चों के सामने नार्मल डिलेवरी की प्रक्रिया  का सीधा प्रसारण कर डाला तो दूसरी तरफ अब फ़िल्म पीके में बार-बार डांसिंग कार का दृश्य दिखाकर हमारे बच्चों को सेक्स के बारे में और जानने की उत्कंठा बढ़ा दी। ज़रा सोचिए, ऐसे दृश्यों से उनके दिमाग में कितने रहस्य अपनी छाप छोड़ गए होंगे...? अब ये बालमन आगे क्या करेगा.. उनका जिज्ञासु मन किस प्रकार शांत होगा..?

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, December 4, 2014

इज्जत बचाने की सहनशक्ति...?

आज सुबह बच्चों को स्कूल-बस तक छोड़ने के लिए बिल्डिंग के नीचे आकर बाहर सड़क पर निकली तो देखा एक भाईसाहब सामने की दुकान से आँख मलते हुए बाहर निकले और सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग की चारदीवारी की ओर बढ़े। उन्होंने आव देखा न ताव, मेरे सामने ही दीवार पर मूत्र विसर्जन की तैयारी करने लगे। पहले तो मैं थोड़े असमंजस में पड़ गयी, फिर मैंने सोचा कि इन्हें एक बार आवाज देकर जगा ही दूँ। शायद इनकी तमीज की नींद खुल जाय। हमने टोका - भाई साहब क्या कर रहे हैं आप..? वे अपना एक हाथ उठाकर अफसोस नुमा चेहरा बनाकर मेरी बात मान गये और उल्टे पांव वापस चले गये। तब तक उसी दुकान से दूसरे महाशय जो बहुत दबाव में दिखे उसी मुद्रा में कूदते हुए चले आ रहे थे। मुझे वहाँ खड़ा देखकर अचानक उनके कदम रुक गये और वे अपने एक हाथ से सिर का बाल सहलाते हुए वहीं खड़े हो गये।

दोनों शरीफ़ प्राणी करीब दस मिनट तक मेरे वहाँ से चले जाने का इंतजार करते रहे। मैं भी उनकी इस परेशानी को समझ रही थी मगर क्या करती; स्कूल-बस आज देर कर रही थी। सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी का तकाजा था कि जबतक बच्चे बस के भीतर न चले जाँय तबतक वहीं प्रतीक्षा करती रहूँ। इस प्रतीक्षा अवधि में मेरा मन सामने प्रकट हुए इस मुद्दे पर सोचता रहा। यह प्राकृतिक कार्य तो वे वहीं रोज करते हैं। उनके इस कृत्य से हम बिल्डिंग वाले परेशान भी रहते हैं। इनकी लघुशंका का समाधान करते-करते प्रायः बन्द रहने वाला हमारी बिल्डिंग का पिछला गेट तो खराब हो ही चुका है अब चार दीवारी की बारी है। हमने मजबूर होकर उस गेट को भी खोलने बन्द करने का सिलसिला शुरू कराया,  दो-तीन बार तो वहां चूना भी डलवाया ताकि गंदगी कट जाय और कहीं इनके आँख में थोड़ा सा भी पानी बचा हो तो स्वच्छता पर घिरे इनकी फूहड़ता के बादल छँट जाय।

खैर जो भी हो, उनकी आँखों में अपने लिये इतना लिहाज़ देखकर मैं खुश थी। तब मैने उन्हें वहां कभी भी पेशाब करने से मना किया। उन्हें ये बात रास नहीं आयी और बड़ी ही बेशर्मी से हमसे ही पूछ बैठे- तो आपही बता दें कि हम इसके लिये कहाँ जाएँ? मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी। हक्का- बक्का खड़ी थोड़ी देर तक अपने दायें-बायें झांककर मानो उनके लिए विकल्प तलाशती रही; लेकिन कुछ नजर नहीं आया। अब उस आदमी की बड़ी-बड़ी लाल आँखें और काला-कलूटा चेहरा देखकर मुझे थोड़ा डर भी लगने लगा। मगर इस डर को मैंने दूर झटक दिया और उन्हें अपनी दुकान वाली बिल्डिंग में ट्वाएलेट बनवाने की सलाह दे डाली।

उन्होंने यह कहते हुये साफ मना कर दिया कि हमारी बिल्डिंग में शौचालय के लिये जगह नहीं है। हम नहीं बनवा सकते। मतलब उनके पास बस यही एक विकल्प था। साफ था कि इनके अंदर सामाजिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। फिर मै अधिकारों की बात पर उतर आयी और उनसे साफ-साफ कह दिया कि आपको हमारी बिल्डिंग की दीवार और गेट को गंदा करने का कोई अधिकार नहीं है। क्या आप अपने दरवाजे पर; दुकान के सामने या दुकान के अंदर पेशाब कर सकते हैं..? यदि ऐसा कर सकते हैं तो बिल्कुल करें मैं मना नहीं करुंगी। यह आपकी समस्या है; पर सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग पर मत करें। इस बात पर उनकी बोलती बंद हो गई। शायद सोच रहें होंगे कि शराफत का जमाना नहीं है थोड़ी सी तबज्जो दी तो सिर पर चढ़ गयी।

बिल्डिंग के अंदर कुछ शुभचिंतक टाइप महिलाएं मुझे इस तरह से मर्दों के साथ टोका-टाकी करने से मना करती हैं। उनका कहना भी सही है कि कौन जाने ये मर्द किस बात पर इगो पाल लें, घात लगाये बैठे रहें और कहीं मौका मिलने पर मेरे साथ कुछ उँच-नीच कर बैठें। फिर तो समाज में मेरी क्या ‘इज्जत’ रह जायेगी? लेकिन ये बात मेरी समझ में नहीं आती है कि कितनी नाजुक और भंगुर होती है स्त्रियों की इज्जत जो एक बार चली गई तो फिर लौट कर नहीं आती; यह भी कि कैसे-कैसे जघन्य अपराध सह लेने के बाद भी बनी रहती है और जरा सी बात हवा में फैल जाय तो चकनाचूर हो जाती है।

इज्जत के नाम पर एक अवांछित प्रेम-संबंध के लिए एक लड़की की हत्या करने में जब एक स्त्री भी शामिल हो जाती है तो उसकी इज्जत नहीं जाती, घर के भीतर तमाम तरह के शोषण और बलात्कार का शिकार होते हुए भी उफ़्फ़ तक न करने पर इज्जत बनी रहती है लेकिन अगर शिकायत की आवाज बाहर निकल गयी तो इज्जत मटियामेट हो जाती है। किसी धोखेबाज भेंड़िए की वासना का शिकार हुई मासूम बेटी का गर्भपात किसी महिला डॉक्टर को मोटी रकम देकर चुपके से करा देने पर इज्जत बची रह जाती है लेकिन उस अपराधी के खिलाफ आवाज उठाते ही इज्जत तार-तार हो जाती है। राह चलते हुए आगे-पीछे से सीटी मारते लफंगो और उनकी अश्लील टिप्पणियों के बीच सिर झुँकाए अपमान का घूँट पीते हुए घर लौट आने पर इज्जत बची रहती है लेकिन पलट कर मुँहतोड़ जवाब देते ही इज्जत में बट्टा लग जाता है।

उफ्फ..इन महिलाओं को  कैसे उबारा जाय इस इज्जत जाने की ‘फोबिया’ से जो उन्हें अपने लिए ही कुछ अच्छा करने से रोकता है और चैन से सोने भी नहीं देता।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, November 19, 2014

लैंगिक समानता की कठिन राह

एक पुरुष किसी स्त्री के साथ जब  प्रेम में होता है तो वह उसके साथ “संभोग” करता है और जब नफरत करता है तो उसका “बलात्कार” करता है..ऐसा क्यों? नफरत की स्थिति में भी वह एक स्त्री को देह से इतर क्यों नहीं सोच पाता? अगर समाज का बदलता स्वरूप आज भी वही है जो सदियों पहले था तो यह स्पष्ट है कि पुरुष की सोच आज भी प्रधान है। अगर कुछ बदला है तो वो स्त्रियों का मुखर होना। आज के दौर में स्त्रियां अपने शोषण/ बलात्कार के बाद चुप बैठकर सुबकती नहीं, बल्कि चिल्लाती हैं।

इस बदलते परिवेश में अधिकांश पुरुष आज भी स्त्री को पितृसत्ता की जागीर ही समझते हैं। उसे अपनी इज्जत का डर ना हो तो मौका मिलने पर आज भी वह अपने इर्द-गिर्द एक नहीं हजार स्त्रियों को नंगा ही देखना पसंद करे। मगर जब एक स्त्री स्वेच्छा से अपनी पसंद के वस्त्र पहनती; अपने पसंद के लड़के/पुरुष के साथ घूमने जाती; एकांत में अपने प्रेमी के साथ समय बिताना चाहती है तो इसी समाज के पुरुष वर्ग को आपत्ति होने लगती है। इसमें उन्हें अपनी संस्कृति का ह्रास दिखाई देने लगता है। ऐसे लोग एक स्त्री को लांछित करते हुए यह भी कहने से नहीं चूकते कि “जब लड़की/स्त्री एकांत में एक (अपने किसी प्रेमी)  के साथ प्रेमालाप कर सकती या सो सकती है तो चार और के साथ उसे सोने में क्यों आपत्ति है? ऐसे में उसके साथ बलात्कार होना तो स्वभाविक है” क्योंकि ‘‘मर्द तो मर्द होता है।’’ इस समाज की यह सोच आज भी बताती है कि- पुरुष ही प्रधान है!

बहुत दिनों से ऐसे कईं सवाल मेरे जेहन में खटकते हैं जिसका जवाब ढूंढने की कोशिश करती हूँ तो यही मिलता है- पुरुष की अपनी ‘सोच’ और उसका अपना ‘सुख’ ही आज भी सर्वोपरी है। भले से इसके लिए उसे एक नहीं सैकड़ों स्त्रियों की देह से होकर गुजरना पड़े।

किसी के साथ आपसी रंजिश हो तो इस समाज का एक पुरुष वर्ग ‘माँ-बहन’ की गालियां देने से नहीं चूकता; और जब दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली भी करता है तब भी माँ-बहन ही करता फिरता है। पुरुषों को इसकी स्वतंत्रता किसने दी.. क्या हमारी संस्कृति में कहीं भी यह लिखा है.. किसी ने कहीं पढा़ है तो जरा बताए.. ?  या फिर कानून इन्हें गाली देने  के इजाजत देता है…?

ऐसा लोग कहते हैं कि- “शारीरिक सबंध बनाने के बाद एक स्त्री के लिए पुरुष का प्रेम और प्रगाढ़ हो जाता है।” तो किसी  स्त्री के साथ बलात्कार करने के बाद एक पुरुष के अंदर प्रेम क्यों नहीं उपजता..? बलात्कार के बाद वह एक स्त्री को मार-काट देने अथवा हत्या कर देने जैसा जघन्य अपराध क्यों कर बैठता है..? जानवर भी एक पल के लिए इस तरह का दुष्कृत्य करने से पहले ठिठक जाए।

घर से दफ्तर तक महिलाओं की स्थिति में पहले से सुधार आया है। लड़कियों की शिक्षा में बराबरी का अधिकार; नौकरी में भी लड़कियों को उतना ही अधिकार दिया गया है जितना कि लड़कों को दिया गया। इन दिशाओं में बदलाव निस्संदेह आया है। लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण है - लगातार बढ़ते उपभोक्तावाद में घर-परिवार की आर्थिक जरूरतों का बढ़ता जाना । जबतक स्त्री/ पुरुष दोनों शिक्षित नहीं होंगे; रोजगारशुदा नहीं होगे तबतक एक परिवार के लिए सामान्य जीवन जीना भी मुश्किल होगा। इस बदलाव में हमें लैंगिक समानता की उत्कंठा कम और मजबूरी ज्यादा झलकती है। यदि ऐसा नहीं है तो उसे स्वेच्छा से कपड़े पहनने; प्रेम करने; अपनी मर्जी से शादी करने; अपने किसी पुरुष से मित्रवत बात करने के सवाल पर यह समाज क्यों बौखला उठता है; जो कथित रूप से बदल रहा है?

(रचना त्रिपाठी)

 

Thursday, May 22, 2014

समाज में असुरक्षित स्त्री

अपार्टमेन्ट में रात को करीब बारह बजे एक पुरुष दूसरी महिला के साथ अपने फ्लैट में घुसता है… अंदर से चीखने चिल्लाने; घर के दरवाजों की धड़-धड़ और बर्तन पटकने की आवाज आती है… कुछ देर बाद खिड़की में लगे पल्ले का शीशा टूटकर ग्राउंड फ्लोर पर गिर जाता है… आधे घंटे तक घर के अंदर शोर-शराबे के बाद अचानक सन्नाटा छा जाता है… घर का मेन दरवाजा अंदर से बंद हो जाता है… रात को एक बजे उस घर की महिला और उसका दस साल का बेटा बिल्डिंग के सामने बने पार्क में टहलते हुए नजर आते हैं… दोनो मां-बेटे देर रात तक सड़क से पार्क और फिर पार्क से सड़क पर बेचैनी की हालत में दिखाई देते है…। बिल्डिंग के लगभग सभी सदस्यों की नजर उसके फ्लैट पर रहती है…सबकी नजर इस तलाश में रहती है की वह महिला अपनी तकलीफ बताए तो  उसकी कुछ मदद की जाय… लेकिन किसी को उससे पूछने की हिम्मत नहीं होती… क्योंकि वह सबको देखकर बनावटी मुस्कान से यह जताने का प्रयास करती कि उनके साथ सबकुछ ठीक है… और वे मां-बेटे टहलते हुए स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं..।

उसकी इस बेबसी को देखकर मेरा मन उद्विग्न हो उठा। एक बार को मन में आया कि उसकी मदद के लिए आगे बढ़ूँ; शायद उसको हमारी बात से मनोबल मिले और वह अपने पति के खिलाफ आवाज उठा पाए। लेकिन पता चला कि वह किसी के पूछने पर बुरा मान जाती है और अपने परिवार के मामले में किसी दूसरे की दखलअंदाजी बिल्कुल भी पसंद नहीं करती। लेकिन इस बात पर विश्वास कैसे किया जाय…? उसके घर में तो पहले से ही दूसरी स्त्री की दखलअंदाजी हो चुकी है जिसकी वजह से  आज इतनी रात को वह अपने घर के अंदर होने के बजाय सड़क पर है। लेकिन इस बात को उसे कौन समझाए… यह उसका सिद्धान्त नहीं हो सकता… जरूर उसकी मजबूरी रही होगी…।

समाज में अपना और अपने  परिवार की इज्जत बनाए रखने के लिए वह अपने अंदर कितना दर्द लेकर जी रही है। उसके चेहरे से स्पष्ट हो रहा था कि वह अपनी हालत पर लाचार है; लेकिन उसकी इस लाचारी के बारे में लोग न जानने पाए इस प्रयास में वह अपने-आप को ही धोखा दे रही थी। यह कैसी मजबूरी है उस स्त्री कि जो उसे समाज के सामने अपने साथ हो रहे अन्याय को स्वीकार करने में भी असहज बना देती है...?

नारी को सशक्त बनाने के लिए अबतक जितनी भी योजनाएं लायी गयी हैं और कानून बनाये गये हैं उनका उपयोग करने में अभी भी हमारे समाज की अनेक स्त्रियां इसे लज्जा की बात समझती हैं। कदाचित् उनका मानना है कि अपने पति की ‘उपेक्षा’ अगर दुनिया के सामने स्वीकार कर लेंगी तो उस समाज में उन्हें सम्मान की नजर से नहीं देखा जाएगा। इस वजह से वह अपने पति के द्वारा हो रहे सभी जुल्मों को सहने के लिए तैयार रहती हैं ताकि घर की बात घर में ही रहे, बाहर न जाए; जिससे उनका और उनके परिवार का सम्मान समाज में बना रहे।

उसका यह व्यवहार हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। अगर वह अपने पति के खिलाफ कोई कदम उठाना चाहे तो उसका अंजाम क्या-क्या हो सकता है? जिसकी अपनी सम्पत्ति सिर्फ एक चारदीवारी हो, जिसकी चौकीदारी में अबतक का उसका सारा समय व्यतीत हुआ हो, जहां से बाहर निकलने में उसे पग-पग पर अपने पति के सहारे की जरूरत पड़ती रही हो; वह स्त्री आज अचानक कहां से इतनी हिम्मत जुटा पाएगी? इसमें बड़े मनोबल के साथ आर्थिक मजबूती की भी आवश्यकता होगी। ऐसे में एक स्त्री को जिसका अपना कोई आर्थिक श्रोत न हो कानूनी तौर पर कितना मजबूत बनाया जा सकता है..? फिर उसके सामने एक और सवाल खड़ा होगा – इज्जत की रोटी का।

ऐसे में यदि  स्त्री आर्थिक रूप से इतना सशक्त बने और देश का कानून उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे तो शायद आज उसके सामने इस तरह का कोई संकट न पैदा हो। एक पुरुष होने के नाते एक पिता या भाई पुरुष की मानसिकता से और अच्छी तरह से परिचित होते हैं। इसलिए घर की लड़की को शैक्षिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना उनकी जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि उनका कर्तब्य भी बनता है।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 21, 2014

अज्ञानता का कहर

मेरी एक क्लोज फ्रेंड का सुबह-सुबह फोन आया- “हेलो, मैने  बहुत जरूरी काम के लिए तुम्हें फोन किया है।”

“कहो! क्या बात है?’’

‘‘मेरे एक बड़े ही घनिष्ट अपनी लड़की के लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं। तुम्हारी नजर में कोई अच्छे घर-खानदान का लड़का हो तो मुझे बताना। बहुत परेशान हैं बेचारे!’’

मैने पूछा- “कैसा लड़का चाहिए, सरकारी नौकरी या प्राइबेट.. लड़की क्या करती है और उसका क्वालिफिकेशन क्या है..? यह पता चल जाय तो उसके अनुरूप लड़का ढ़ूढ़ने में आसानी होगी।’’

उसने कहा- ‘‘बहुत बुरा हुआ उसके साथ; वह तलाक-शुदा है। शादी के सिर्फ चार महीने बाद ही उसका तलाक हो गया।’’

‘‘अरे! ऐसा क्यों हुआ?’’

हिचकते हुए उसने कहा-‘‘उसका पति उसके ऊपर थूक दिया करता था।’’

‘‘लड़के की पसंद से यह शादी नहीं हुई थी क्या?’’

‘‘लड़का-लड़की दोनों को यह रिश्ता मंजूर था।’’

“तब ऐसा क्यों करता था..?”

फिर उसने मुझे पूरी बात बतायी- ससुराल जाने के बाद वह पहले महीने में ही गर्भवती हो गई। वहाँ उसका पीरियड नहीं हुआ। उसके पति को ऐसा संदेह हो गया कि शायद होने वाले बच्चे का पिता वह नहीं कोई और है। वह अपनी पत्नी से घृणा करने लगा। इतनी कि वह बात-बात पर उसके ऊपर थूक दिया करता था। पहले तो निर्दोष लड़की ने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन जब मामाला बर्दाश्त के बाहर हो गया तो उसने तलाक लेने का निर्णय ले लिया। उसके बाद उसने अपना एबॉर्शन भी करा लिया। तबसे लेकर आजतक वह मायके में ही है।”

“क्या करती है..?”

“गवरन्मेंट टीचर है!” मैने कहा-“अच्छा!  इसीलिए वह अपने जीवन का इतना बड़ा फैसला स्वयं ले सकी! नहीं तो, जाने कितनी जिल्लत सहनी पड़ती उसको अपनी ससुराल में। शायद इसलिए कहते है कि लड़कियों का स्वावलम्बी होना बहुत जरूरी है! ऐसी जाने कितनी लड़कियां ससुराल में आज भी उपेक्षा की शिकार होती होंगी, जिसमें उनका कोई कसूर नहीं हैं। आज के जमाने में भी लड़को के अंदर कितनी अज्ञानता है.. क्या लड़कियों को ससुराल भेजने से पहले नान-प्रिगनेंसी का मेडिकल सर्टीफिकेट भी देना पड़ेगा..? हद हो गई!”

अज्ञानता का कहरयह अपनेआप में कोई इकलौता केस नहीं है। इसके पहले भी कई लड़कियों के साथ ऐसा हो चुका है। इस तरह के केस में तो कई लड़कियों को जहर देकर मार दिया गया है, तो कहीं लोक-लाज के भय से गर्भपात कराया जा चुका है। कुछ स्त्रियां तो आज भी अपनी आँखों में  अपमान का दर्द लिए जी रहीं हैं। वह खुद भी यह नहीं जानती कि आखिर, इसमें उनका गुनाह क्या है..?

हमारे समाज के कुछ हिस्सो में आज भी यह एक बहुत बड़ा दोष है जिसका दुष्परिणाम लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है। इस तरह की घटना सिर्फ कम पढ़े- लिखे वर्गों में ही नहीं है बल्कि अच्छे पढ़े-लिखे लोगों में भी इस तरह की अज्ञानता देखने को मिल रही हैं।

(रचना त्रिपाठी)   

Tuesday, November 26, 2013

समाज का अपराध

 

कुछ अपराध ऐसे होते है जिसका कूसूरवार सिर्फ उस घटना को अंजाम देने वाला ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार और कभी-कभी तो हमारा समाज भी होता है जो परोक्ष रूप से उस अपराध को करने के लिए मजबूर करता है। कितनी विडम्बना है कि एक स्त्री जो नौ महीने अपने गर्भ में पालने के बाद बेटी को जन्म देती है; उसकी हर छोटी-बड़ी खुशियों का खयाल रखती है; उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए डाँटती-समझाती है और जिसमें अपना अक्स देखती है उसी के साथ ऐसा निष्ठुर घात कर बैठती है जिसपर यकीन करना कठिन हो जाता है। किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते ही बेटी से ऐसी कौन सी गलती हो गयी जो एक माँ के लिए भी अक्षम्य थी और जिसकी सजा मौत बन गयी? मेरा मन नहीं मान रहा कि इस तरह के अपराध में एक माँ का हाथ हो सकता है। लेकिन कानून ने फिलहाल उसे अपराधी ठहरा दिया है। ऐसे में कानून की नजर में अगर ऐसे अपराध की सजा मौत है तो भी कम है...। इसने तो माँ की छवि ही कलंकित कर दी। अब आगे से कोई माँ के रिश्ते को वह ऊँचा स्थान कैसे दे पाएगा जिसके आंचल में अपनी संतान के लिए सागर से भी गहरा प्यार और आसमान से भी ऊँचा वात्सल्य होता है।

social stigma

आरुषी की हत्या के मामले में कानून तो अपना कार्य कर गया; लेकिन एक माँ की ममता इतनी क्रूर कैसे हो गयी? इसके पीछे क्या सामाजिक दबाव एवं झूठी प्रतिष्ठा के लिए मन की बेचैनी है? एक माँ को अपने बच्चे से ज्यादा प्रिय समाज में अपनी इज्जत कैसे हो गयी? क्या परिवार और समाज की गरिमा बेटियों की इज्जत से जुड़ी होती है। इस माँ से मै पूछना चाहती हूँ - क्या आरुषी की जगह उसका बेटा होता और एक नौकरानी के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए पकड़ा जाता तो उसकी भी सजा माँ की नजर में यही होती जो उसने अपनी बेटी को दी? अगर एक ही भूल बेटियां करती हैं तो बहुत बड़ी भूल बन जाती है और बेटे करें तो मामूली बात कह के रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश हो जाती है। शायद तब दाँव पर बेटा लगा होता है जो बेटी से अधिक कीमती है।

बेटी और सामाजिक इज्जत का आपस में क्या ऐसा संबंध है? अगर है तो मत जनो बेटी को... गर्भ में मार डालने का अपराध भी शायद इसी की एक कड़ी है। “समाज को क्या मुंह दिखाएंगे” इस चिन्ता के दबाव में अपना हाथ रक्तरंजित कर लेने से मुँह काला नहीं होता क्या? आज सभी लोग उन्हें थू-थू कर रहे हैं लेकिन इसी समाज का भय क्या उस दुष्कृत्य के लिए उत्प्रेरक नहीं रहा होगा? इस सारे घटनाक्रम में हमारे समाज का दोहरा मापदण्ड है जो इस तरह के कुकृत्य करने पर लोगों को मजबूर करते हैं। मुझे लगता है कि आरुषी हत्याकांण्ड में यह समाज भी उतना ही दोषी है जितना उसके माता-पिता।

(रचना)