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Monday, October 1, 2018

ईश्वर पुलिस को सद्बुद्धि दे

इस अर्थ-प्रधान युग में मनुष्य को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं। व्यापारी दिन-रात काम करता है। किसान खेतों में पसीना बहाता है। मजदूर दिहाड़ी की तलाश में दर-दर भटकता है। विद्यार्थी भी रोजी-रोटी कमाने लायक बन जाय इसी लक्ष्य का पीछा करते हुए रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है। कुछ नराधम इसी रोटी के लिए छोटे-मोटे अपराध शुरू कर देते हैं और रुपयों की हबस का शिकार होकर अपराध की नयी-नयी राहें तलाशते रहते हैं। धनोपार्जन के लिए शुरू किया गया छोटा भ्रष्टाचार शीघ्र ही एक आदत में बदल जाता है जिसका बड़ा नुकसान वृहत्तर समाज को उठाना पड़ता है।

एक सामान्य नौकरीशुदा व्यक्ति अपना समय व श्रम और अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता अपने नियोक्ता की इच्छाओं के अधीन कर देता है ताकि महीने के अंत में उसे वेतन के रूप में कुछ रुपये मिल सके जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। उसके पास नौकरी से बचे हुए अत्यल्प समय और क्षीण ऊर्जा पर पत्नी व बच्चों से लेकर माता-पिता तक और इष्ट-मित्रों से लेकर तमाम रिश्तेदारों तक की आस लगी होती है। इसी समय में वह अपने लिए भी सुख तलाशता है। जीविका की जद्दोजहद में एक सामान्य नागरिक का सामाजिक जीवन छीजता जा रहा है। अपराधी और भ्रष्टाचारी मिलकर इस साधारण मनुष्य के जीवन को बेहद असुरक्षित और कठिन बनाते जा रहे है।

प्रदेश की राजधानी में नौकरी करने वाले विवेक को देर रात तक काम करना पड़ता था। ऐसी ही एक काली रात आयी जब रात में घर लौटने से पहले उसे अपनी एक सहकर्मी को सुरक्षित उसके घर तक छोड़ते हुए आना था। लेकिन वह घर नहीं आ सका। रास्ते में गश्त पर निकले एक सिरफिरे और उद्दंड सिपाही ने उसे रोका और पता नहीं क्यों उसके सिर में गोली मार दी। एक निहत्था कामकाजी अकारण मारा गया और एक साथ कई जिंदगियां बर्बाद हो गयीं।

प्रश्न उठता है कि पुलिस विभाग ने उस सिपाही को  कैसी ट्रेनिंग दी थी। आखिर शहर के एक समृद्ध इलाके की गश्त करने वाले उस रंगरूट से उच्चाधिकारियों ने क्या अपेक्षा की थी जिसे पूरा करने के लिए उसे एक निरीह नागरिक की हत्या करनी पड़ी? जहाँ असली अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, रोज ब रोज हत्या, लूट, छिनैती व बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहाँ पुलिस प्रशासन प्रभुवर्ग की सेवा में लगा हुआ उनकी और अपनी झोली भरने में व्यस्त है।

बड़ी भयावह स्थिति है। सुबह घर से निकलने वाला परिवार का कमाऊ सदस्य शाम तक सकुशल वापस आ जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। घर की बेटी बाहर निकलकर अपना काम करते हुए अपनी गरिमा बचाकर घर लौट आएगी इसकी कोई गारंटी नहीं। घर में, बैंक में या जेब में रखा पैसा अचानक लूट नहीं लिया जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। देश के सभी नागरिकों के जान-माल की गारंटी देने वाला संविधान और इसी संविधान की शपथ लेकर शासन की बागडोर थामने वाले मंत्री और नौकरशाह इस गारंटी को नष्ट करने में लगे हुए है। न्यायालय भी लाचार हैं। ये अनेक गैर-जरूरी फैसले सुनाने में अपनी मेधा और समय खपा रहे हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सुरक्षा और न्याय पाने के लिए कौन सा दरवाजा खटखटाने जाय?

मुझे तो लगता है कि सबकुछ भगवान भरोसे ही रह गया है। केवल ईश्वर ही है जो आर्त्त की प्रार्थना सुन सकता है। सभी अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अपने-अपने भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, जीसस से प्रार्थना करेंगे कि वे हम अकिंचन प्राणियों के असुरक्षा बोध को कम करने के लिए तथा जीवन के प्रति सकारात्मक विश्वास बनाये रखने के लिए कोई चमत्कार करें। उन पुलिसकर्मियों को ऐसी सद्बुद्धि दें, उनके आचरण में ऐसा परिवर्तन कर दें कि उन्हें देखकर कोई शरीफ आदमी भयाक्रांत न हो, जान बचाकर भागने पर मजबूर न हो। उन्हें ऐसा कर्तव्यबोध करा दे कि कोई अपराधी उनसे दोस्ती गांठने और मेल-जोल बढ़ाकर अपराध की कमाई में हिस्सेदार बनाने की हिम्मत न करे।

ऐसी ही एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन हमारे मुहल्ले में किया गया है। सेक्टर-16 इंदिरानगर, लखनऊ के सांईंराम पार्क में शाम छः बजे सबलोग इकठ्ठा होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। सभी हाथों में मोमबत्तियां लेकर अपनी प्रार्थना के साथ मुंशीपुलिया पुलिस चौकी तक शांतिपूर्ण मार्च करेंगे और जलती हुई मोमबत्तियों को पुलिस चौकी के द्वार पर लगाएंगे ताकि ईश्वर की कृपा से उन पुलिसकर्मियों को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हो सके। ताकि उनके भीतर की मानवता का उदय हो सके। ताकि राक्षसी प्रवृतियों का अस्त हो सके। ताकि भविष्य में फिर कोई विवेक अकारण बीच सड़क पर इनकी गोलियों से न मार दिया जाय।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, September 27, 2018

लचीला रे...

प्रोमोशन में आरक्षण संबंधित 2006 का फैसला बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ते हुए भारतीय संविधान की जय बोल दी। इससे हमें इस देश की न्याय व्यवस्था और अपनी सासू माँ की पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुपालन के लिए लागू अनुशासन कुछ एक जैसा प्रतीत होता है।

घर में पूजा-पाठ, तीज-त्यौहार और मांगलिक कार्यों के विधि-विधान को लेकर वो बहुत कठोर हैं। लेकिन यदि ऐसे कार्यक्रम में परिस्थिति वश किसी पद्धति को पूरा करने में कोई बाधा आ जाती है तो वे उसका दूसरा विकल्प जरूर खोज लेती हैं। इससे स्थापित नीति का उलंघन भी नहीं होता और उनका इकबाल भी कायम रहता है।

कर्मकांड कराने वाले पुरोहित तो इस लचीलेपन के फन में इतने माहिर होते हैं कि भारतीय संविधान भी शर्मा जाय। इष्ट देवता के लिए यजमान जो वस्त्र नहीं ला सके तो देवता को वस्त्र के रूप में रक्षा-सूत्र पहना देते हैं।

पूजन सामग्री भी गरीब यजमान के लिए कुछ तो अमीर के लिए कुछ और हो जाती है। भोले शंकर को खुश करने के लिए घृत, शहद, दही, शर्करा और दूध से अभिषेक करते हुए घण्टों मंत्रोच्चार किया जाता है तो गरीब का एक लोटा जल भी उसके भक्तिभाव को प्रकट कर देता है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, July 29, 2018

खुद की सोचो

शांता, देखती हूँ, तुम दिनोदिन सूखती जा रही हो? ये बात सही है कि बच्चों का ख्याल तुम नहीं रखोगी तो कौन रखेगा! पर जरा सोचो, खाली पेट काम करते-करते बीमार पड़ गई तो क्या होगा? अभी जो तुम्हारे भीतर ऊर्जा संचित है वही तो दिन पर दिन खर्च हो रही है। लेकिन इसकी प्रतिपूर्ति कैसे होगी?

सुबह छः बजे घर से निकल लेती हो दोपहर के दो बजे तक सिर्फ चाय पी-पीकर अपना पेट लेसती रहती हो। ऐसे कबतक चलेगा?  ये रोज-रोज चाय के साथ की बिस्किट और ब्रेड घर लेकर चली जाती हो। कभी-कभार खुद भी तो खा लिया करो। तुम्हारी देह में जायेगा तो भी तुम्हारे बच्चों के काम आएगा...  तुम्हे कुछ देर और काम करने की शक्ति मिलेगी।

और उसका क्या? ... जबतक तुम्हारी हड्डी में दम है तभी तक तेरी राह ताकेगा... नहीं तो, ले आयेगा घर में दूसरी ब्याह कर।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, June 10, 2018

खुशफ़हम जिंदगी

उन्नीस साल बाद अपने ससुराल से जिस उपाधि की मुझे प्रतीक्षा थी आख़िरकार वह मिल गयी। यह जानकर कि 'मैं बिल्कुल अपनी सास जैसी हो गयी हूँ' एक ऐतिहासिक सफलता मेरे हाथ लगी है।
दिल बाग-बाग हो गया, खुशी के मारे आँखें छलक आईं। ये बात अलग है कि लोग मेरे रुआँसे चेहरे से मेरी भीतरी खुशी को आँक नहीं पाये और हैरान होकर मुझे चुप कराने लगे। सच कहूँ, तो उन्हें क्या पता! यह मेरी वर्षों की लगन और कड़ी मेहनत की कमाई है।

एक राज की बात और बता दूँ, शायद सासू-माँ सुनती तो उन्हें नागवार गुजरता इसलिए मेरे मिस्टर ने मेरे कानों में चुपके से बताया कि– "वैसे तो तुम अपनी सास से कई गुना आगे हो पर मैं इस बात का खुलासा नहीं कर सकता, अम्मा सुनेगी तो बुरा मान जाएगी।" बात सही भी है, अबतक उनसे आगे निकल जाने की बात घर में किसी ने भी सोचा न होगा। उनके जीते-जी फिर मैं भला कैसे इसे जाहिर कर सकती हूँ! इसलिए यह बात सिर्फ मेरे और इनके बीच छिपी हुई है।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, March 19, 2018

आत्ममुग्धो भव...!

कुछ लोग अपने काम और नाम की बातों को प्रस्तुत करने में इतने माहिर होते हैं कि उन्हें कभी भरोसा ही नहीं होता कि उनसे बेहतर कोई दूसरा भी यह काम कर सकता है। इस मामले में कुछ महान आत्माएं इतनी स्वावलंबी होती हैं कि दूसरों को करने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ना चाहतीं। अपनी प्रशंसा के लिए दूसरों का मुँह ताकना उन्हें नहीं भाता। अपने काम को ठीक से करने का शऊर हो न हो, आत्मविश्वास भले ही डगमगाता रहे लेकिन सबके सामने अपने करतब का बखान करने के लिए उनमें आत्मनिर्भरता कूट-कूट कर भरी रहती है। सामने वाले का क्या भरोसा? क्या पता कोई चूक कर दे, कुछ गुणों पर जोर देने में कंजूसी कर दे। जब उन महान गुणों के प्रथम पारखी वे स्वयं हैं तो उनसे बेहतर उनका गुणगान कोई और कैसे कर सकता है? इसे आप स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता की आदर्श स्थिति भी कह सकते हैं। अब किसी भी आदर्श को हासिल करना कोई मजाक नहीं है। इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। अपने लिए चुन-चुनकर नायाब शब्दों को संजोए रखना और मौके बे मौके झोंकते रहना पड़ता है। यह सबके वश की बात थोड़ी न है।
आत्ममुग्धता की इस पराकाष्ठा को हासिल करने में सफल होने वाले कुछ ही काबिल लोग हैं। जी तो करता है इनके बीच एक प्रतियोगिता करा दी जाय और इसके विजेता को राष्ट्रीय पुरस्कार भेंट किया जाय। अलबत्ता इस प्रतियोगिता से देश के कुछ सर्वोच्च नेताओं को दूर रखना पड़ेगा नहीं तो रिजल्ट पहले ही आउट हो जाएगा। अपने आपको तालियों की गड़गड़ाहट और विक्ट्री साइन का सबसे बड़ा हकदार बताने की कला में कम लोग ही निष्णात होते हैं। कहीं ये कलाकार विलुप्त न हो जाय इसलिए इनके संरक्षण और संवर्द्धन की कोशिश की जानी चाहिए। हम जैसे साधारण लोग जो इनके आगे मूक बने रहते हैं, इनके बिना क्या कर पायेंगे? कहीं इनके बिना हमारा जीवन सूनेपन का शिकार न हो जाय। इसलिए ऐसी दक्ष प्रजाति को बढ़ावा देते रहने की बड़ी जरूरत है।

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, February 13, 2018

अवबोधन

बसन्त ऋतु में प्रीति को अपना नया-नवेला साजन मिला था। उसके चारों ओर एक खुशबू की बयार सी बह रही थी। लेकिन जल्दी ही उसको अपने छोटे भाई की शादी के लिए अपने प्रीतम का घर छोड़ मायके आना पड़ा था। उधर उसके प्रीतम को भी अपनी बाकी कि ट्रेनिंग पूरी करने अकादमी जाना पड़ा। अब कोई छुट्टी नहीं मिलने वाली थी।

प्रथम मिलन के बाद इतनी जल्दी अलग हो जाने पर वे पति-पत्नी से अधिक प्रेमी-युगल की तरह एक दूसरे को मिस कर रहे थे। एक के बाद एक 'हग-डे' और 'रोज़ डे' जैसे सुनहरे दिन हाथ मलते निकल गये। उनकी प्यास व्हाट्सएप और फेसबुक से मिटने वाली नहीं थी। प्रीति के गाँव से मोबाइल का टॉवर भी दूर था। प्रीतम का मन अपनी हिरोइन के बिना बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। उसकी बेचैनी तब और बढ़ गयी जब ट्रेनिंग के आखिरी दिन उसके सामने 'वेलेंटाइन डे' आकर खड़ा हो गया। दिन तो जैसे-तैसे बीता लेकिन शाम... ये तो जैसे मारे ही डाल रही थी। प्रीतम ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और सुर्ख लाल गुलाबों का बड़ा सा बुके लेकर पचास मील दूर ससुराल की ओर चल पड़ा। 

शादी में आये सभी मेहमान अभी वापस गये नहीं थे। मायके की इस चहल-पहल में भी प्रीति गुमसुम सी ही थी। घर के बच्चे दिनभर चहकने के बाद अब सोने की तैयारी कर रहे थे। घर की औरतें सबसे अंत में खाना खाने के बाद अब सोने से पहले की हँसी-ठिठोली में लग गयी थीं। प्रीति अपनी बुआ, मौसी, दीदी, भाभी, दादी, आदि कई पीढ़ियों की औरतों और चचेरे-फुफेरे-मौसेरे भाइयों व बहनों के बीच बैठकर भी वहाँ नहीं थी। वह अपने हाथों की मेंहदी निहारे जा रही थी। तभी घर के बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा। उसकी कर्कश ध्वनि से बच्चे कुनमुना कर उठे और करवट बदलकर सो गये। औरतों की सभा विसर्जित हो गयी, लेकिन इतनी रात को दरवाजा खोलने के लिए किसी पुरुष को आगे जाना था जो सभी प्रायः सो चुके थे। 

प्रीति के पापा बिस्तर से उठ बैठे। सोचने लगे - अब इतनी रात को कौन धमक पड़ा? मम्मी को चिंता हुई कि बेचारी बड़ी बहू तो अभी-अभी किचेन के काम से फुरसत पाकर सोने चली है। उसे फिर परेशान होना पड़ेगा। बड़े भाई की गहरी नींद में खलल पड़ा। लेकिन उठना तो उसे ही था। उसने आँखे मली, दूसरी ओर निढाल पड़ी पत्नी की ओर देखा और बिस्तर के नीचे फर्श पर पड़ी चप्पल को टटोलकर पैर में डालने लगा। उसकी उनींदी आँखों में न कोई कौतूहल था और न ही मन में कोई विचार। लेकिन प्रीति के नथुने फड़क उठे। असली गुलाब की महक उसे दरवाजे की ओर झाँकने को प्रेरित करने लगी। लेकिन वह आश्वस्त हो लेना चाहती थी। भैया इतनी देर क्यों कर रहे हैं...! वह उद्विग्न हो उठी। उससे रहा नहीं गया। वह बाहर जाने वाले गलियारे की ओर बढ़ी तबतक उसके भाई ने दरवाजा खोल दिया था। सामने उसका प्रीतम हाथों में गुलाबों से सजी डलिया लेकर खड़ा था। वह मुग्ध होकर उससे लिपट पड़ी। 

प्रीति का बड़ा भाई कुछ दूर अवाक् खड़ा अपनी बहन की ख़ुशी पर खुश हो रहा था। पापा भी तबतक अपना चश्मा पोंछकर आँखों पर लगाते हुए ड्योढ़ी पर आकर खड़े हो चुके थे। बेटी और जमाई के बीच फूलों की खुशबू बिखरने का यह मंजर देखकर यकबयक उनकी आँखों में चमक आ गयी। उनके लॉन में भी खूब रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे जिसे इस दिन भी किसी ने हाथ नहीं लगाया था। उन्हें सहसा किसी का ध्यान आया। उन्होंने लॉन में लगी गुलाब की झाड़ियों में से एक सुर्ख लाल गुलाब तोड़ा और अपने बड़े बेटे के हाथ में पकड़ाते हुए बोले- 'आज वेलेंटाइन डे है... इसे बहू को दे आओ, उसे भी अच्छा लगेगा... घर के कामों के आगे उसे अपनी सुध ही नहीं रहती।' 

(रचना त्रिपाठी)

Monday, July 24, 2017

चक दे छोरियों

आज मैं लड़कियों को विश्व स्तर पर क्रिकेट खेलते हुए  देखकर अभिभूत हूँ। ऐसा लग रहा है मानो मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है। इन्हें देखकर स्कूल का अपना दिन याद आ गया जब लड़कियों के लिए खेलकूद प्रायः वर्जित क्षेत्र हुआ करता था।

अस्सी के दशक की बात है। बचपन से ही मुझे भाइयों के साथ क्रिकेट खेलने की छूट मिली हुई थी। बल्कि भाग-दौड़ वाले सभी खेल खेलने की आदत सी पड़ गई थी। जब मैं स्कूल में जाती थी तो वहाँ हम लड़कियों को गेम के नाम पर उछलने वाली रस्सी और रिंग-बॉल खेलने को मिलती थी। यह मुझे शारीरिक व्यायाम से ज्यादा कुछ नहीं लगता था। स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर से मैं अक्सर क्रिकेट अथवा बैडमिंटन की डिमांड किया करती थी। इसके लिए कई बार अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों को लेकर अक्सर स्पोर्ट्स ऑफिस के सामने धरने पर बैठ जाया करती थी। कुछ देर तक स्पोर्ट्स टीचर जो वहाँ पी टी मास्टर कहलाते थे, उनसे मेरी क्रिकेट पर बहस हो जाया करती थी। उनका कहना था - ''लड़कियां क्रिकेट नहीं खेलती है, आजतक कभी किसी लड़की को क्रिकेट खेलते देखा है?'' मुझे उनका यह वक्तव्य और भी उद्वेलित कर देता था। चूंकि मैंने भी अपने अलावा वहाँ किसी और लड़की को क्रिकेट खेलते नहीं देखा था इसलिए मुझे उनके इस सवाल का सही जवाब नहीं सूझता। फिर मन में पीटी मास्टर साहब को कोसते और बुदबुदाते हुए झक मार कर अपने क्लास की ओर चल पड़ती थी।

हमारे मन को चुभने वाली बात यही तक नहीं थी। उसी वक्त वे डांटते हुए यह कहकर हमें भगा दिया करते थे कि ''तुम सब जाओ, गृहविज्ञान पढ़ो।'' जिस पीरियड में लड़के फुटबॉल और क्रिकेट खेला करते थे वही हम लड़कियों के लिए गृहविज्ञान पढ़ने का पीरियड हुआ करता था। उस वक्त हम सबका ध्यान अपने विषय पर कम और स्कूल प्रांगण में ज्यादा रहा करता था।

काश मेरी मुलाकात उस पी टी मास्टर साहब से होती, तो मैं उनको साक्ष्य के साथ बताती कि लड़कियां भी कितना उम्दा क्रिकेट खेलती हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 22, 2017

सावन के महीने में शिवकृपा

कॉलेज़ में परीक्षा हो जाने के बाद की छुट्टियाँ थी। मैं अपनी बुआ के घर आयी हुई थी। सावन का महीना था और पहला सोमवार भी। रिमझिम बारिश हो रही थी। सुबह-सुबह लड़कियों का एक झुंड अपने हाथों में धतूरे का फूल, फल, भांग, बेलपत्र और लोटे का जल लिए घर में घुसा और मुझे ढूंढने लगा। सुबह के सात बज रहे थे और मैं सो रही थी। उन दिनों पढ़ाई से छुट्टी लेकर सिर्फ खाना-पीना, सोना और खूब मौज-मस्ती का रूटीन था। इतने दिनों में अड़ोस-पड़ोस की लड़कियों के साथ मैं भी थोड़ा घुल-मिल गई थी। उस झुण्ड की आवाज मेरे कानों में आ रही थी लेकिन मैं उससे बचने के लिए अपने कानों को तकिये से दबाकर सोने की मुद्रा बनाये पड़ी हुई थी। लेकिन मुझे सोने नहीं दिया गया। 

बुआ ने झकझोरकर मुझे जबरदस्ती जगा दिया और बोली - ''जल्दी नहा-धो के तैयार हो लो, शिव मंदिर जाना है... सारी लड़कियां तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।" 

आंगन में चहल-पहल और उन सखियों के हंसी-विनोद की बातें मेरे कमरे तक भी आ रही थी- ''देखा जाय इसबार शिव जी किस-किस पर प्रसन्न होते हैं''

अवधड़ दानी शिव की महिमा तो मैंने ख़ूब सुन रखी थी लेकिन मुझे अभी उनकी मंगल कृपा पाने की कोई जल्दी नहीं थी। लेकिन उसदिन मैं जबरदस्ती शिवालय भेज दी गई थी। बड़े अनमने होकर पहली बार ही मैंने उन्हें जल चढ़ाया था। पर इतनी जल्दी उनकी कृपा हमपे बरस जाएगी ये नहीं सोचा था। वर्षों से अपने वर के इंतजार में बैठी अनेक लड़कियों को इग्नोर मार के महादेवजी मुझपर इतने प्रसन्न हो गये कि अभी साल भी नहीं बीता कि मेरी शादी पक्की हो गई।

मुझे इतनी 'खुशियां' एक साथ मिल जाएंगी मैंने कभी सोचा न था। कहाँ दो-चार कपड़ो में कॉलेज का आना-जाना था.. और अब बिन मांगे बहुत कुछ मिल रहा था। अटैची भर-भर के रंग-बिरंगी साड़ियां, गहने, सुंदर-सुंदर चप्पलें, ब्यूटी किट और साथ में चार पहिये वाली गाड़ी भी। मैंने तो सोचा था पढ़-लिख कर कोई अच्छी सी जॉब मिल जाय तो एक-एक कर अपने सारे शौक पूरी करूंगी। लेकिन यहाँ तो 'बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न चून' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सुना था कि भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। इसे साक्षात् देखने और महसूस करने का मौका मेरे हाथ लग गया था।

एक सेट कौन पूछता है, पूरे डबल-ट्रिपल सेट सामान बक्से में कस-कस कर मिले। इस मामले में मायका और ससुराल दोनों मेरे ऊपर मेहरबान थे। अब इतनी सारी 'खुशियां' एक साथ बरस गयीं कि कैसे सम्हालू, कहाँ उठाऊँ, कहाँ धरूँ और कहाँ सरियाऊँ इसी उधेड़बुन में आज तक लगी हूँ। घर में जूते-चप्पल, कपड़े लत्ते, अब मेरे अकेले के ही नहीं हैं। पति व बच्चों के उससे चार-गुने हो गए हैं। आलमारियां छोटी पड़ रही हैं। इनसब चीजों को सम्हालने से अभी तक फुर्सत नहीं मिल पायी कि दुबारा शिवजी को जल चढ़ाने जाऊँ।

जल्दी-जल्दी अब सबकुछ समेट लेना चाहती हूँ ताकि अगली बार जल चढ़ाने से पहले थोड़ा 'स्पेस' रहे। कहीं शिवजी हमपे दुबारा प्रसन्न हो गए तो आगे क्या होगा!

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, September 22, 2015

अतिक्रमण पुलिसिया

आज मैंने अपनी आँखों से एक ऐसे अतिक्रमण का वाकया देखा जो किसी फुटपाथ पर जीविका कमाने वाले ठेले-खोमचे अथवा टाइपराइटर वाले ने नहीं किया। बल्कि उसी वर्दी वाले एक 'लोकसेवक' ने किया जिस वर्दी को पहनकर अभी हाल ही में एक दरोगा जी अतिक्रमण हटाने के अति उत्साह में टाइपिस्ट के साथ दुर्व्यवहार करने के जुर्म में निलंबित हुए हैं।

यह लोमहर्षक घटना मेरी आँखों के सामने हुई। बल्कि मैं खुद ही इस पुलिस वाले की ज्यादती का शिकार होने से बाल-बाल ही बची। मैं अपनी सहेली से मिलने स्कूटी से जा रही थी तभी 100 न. हेल्पलाइन की पीसीआर गाड़ी बगल से गुजरी। इसमें ड्राइविंग सीट पर एक खाकी वर्दी वाला सवार था जो घोषित रूप से जनता का मददगार था। उसने भरी ट्रैफिक में अपनी गाड़ी को पूरी स्पीड में मेरी गतिशील स्कूटी के ठीक सामने लाकर अचानक घुमाने की कोशिश की। मैंने झट से ब्रेक लगाकर अपनी स्कूटी को जैसे-तैसे बचा लिया। लेकिन अगले ही क्षण उसने बिना हार्न बजाये भीड़ को चीरते हुये यू-टर्न लेने की कोशिश की और अपने सामने  से गुजर रहे एक बाइक सवार को ठोक दिया। बाइक सवार गिर पड़े।

पीछे से आ रही एक दूसरी बाइक भी गिरते-गिरते चिचिया कर संभल गई। चूँकि बाइक वाले नयी उम्र के लड़के थे इसलिये मुझे लगा कि कुछ नोंक-झोंक होगी और मामला गंभीर हो जाएगा। बाइक वाले युवक ने अपनी बाइक को तेजी से उठाते हुये बहुत गुस्से में पीछे पलट कर देखा भी। लेकिन पुलिस की गाड़ी पाकर उसके चेहरे का पारा जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा था उससे दोगुनी रफ़्तार से नीचे गिर गया। पुलिसवाले को मैंने एक बार ऊँची आवाज में बताने की कोशिश भी की- ''आप सड़क और नियम के साथ जबरदस्ती कर रहे हो।" लेकिन वहाँ मेरी बात वह बन गयी जिसे नक्कारखाने में तूती की आवाज कहते हैं।

मुझे ऐसा लगा वो महाशय अपनी गाड़ी का हूटर बजाते और बाइक वालों को घूरते अपनी सीट पर बैठे ट्रैफिक नियम के साथ छेड़छाड़ का आनन्द उठा रहे थे। सड़क और उसके नियमों के साथ पुलिस द्वारा किया गया ऐसा बर्ताव क्या किसी अतिक्रमण से कम है? यह देखकर मैं तो सन्न रह गई कि इतना खतरनाक स्टंट करने और बाइक गिरा देने के बाद भी उस पुलिस वाले के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी और सहम कर अपराध बोध से ग्रस्त होना उन लड़कों के हिस्से में आया।

मुझे लगा था कि लड़को में अभी नया खून हैं; जरूर अपना हिसाब वर्दी वाले रंगबाज से चुकता कर ही लेंगे पर मैं गलत थी। मैंने देखा बाइक पर सवार नौजवान लोगों का गरम खून ऐसा ठंडा हुआ कि मानो उसे नार्मल करने के लिए सिंकाई करनी पड़ेगी। वे अपनी बाइक जल्दी से साइड में लगाकर काठ बन गये नजर आ रहे थे।

ऐसी दुर्घटना अगर किसी आम नागरिक की गाड़ी से हुई होती तो मामला इतना आसान न होता और यही पुलिस उसे अपने कायदे से निपटा भी रही होती। अतिक्रमण का मैंने कभी समर्थन नहीं किया। पर ऐसे अतिक्रमण का क्या किया जाना चाहिये जिसका संबंध दूसरों के जान-माल की हानि से हो, और नुकसान पहुँचाने वाले स्वयं कानून के रखवाले हो।

अभी बीते दो दिन पहले की बात है एक दरोगा साहब को अखिलेश सरकार ने इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि उन्होंने फुटपाथ पर बैठे किसी गरीब की टाइपराइटर अपने पैरों से मार-मार कर तोड़ दिया। अतिक्रमण के जुर्म में अगर दरोगा जी ने उसे वहाँ से हटाने के लिए साम-दाम दण्ड-भेद का फार्मूला अपनाया तो उन्हें कौन रोक सकता था? उन्हें तो ऐसे ही बहुत से अधिकार मिले हैं जो वे बिना किसी के इजाजत के खुद प्रयोग कर सकते हैं। यह तो भला हो खबरिया चैनेलों और सोशल मीडिया का जो सरकार के ऊपरी माले तक खबर पहुँच गयी और मुख्यमंत्री जी ने संवेदनशीलता का परिचय देकर उस आदमी की मज़बूरी, गरीबी और लाचारी पर तरस खाते हुये आनन-फानन में उसका टाइपराइटर नया कर दिया।

सुना है उसके उत्पीड़न की क्षतिपूर्ति के लिए एक लाख की आर्थिक सहायता भी दी गयी है। यह कदम आम जनमानस के लिये जरूर राहत भरा होगा।  पर मेरे लिये यह टोकेनबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है। फुटपाथ छेंककर बैठे दूसरे लोग सोच रहे होंगे की काश दरोगा की लात उनके ऊपर भी पड़ गयी होती तो मुख्यमंत्री की राहत आ जाती। सीएम साहब ने दरोगा जी को निलंबित कर उस गरीब को नये टाइपराइटर से उपकृत कर जनता के दिलों में अपनी जगह तो बना ली! पर बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि अतिक्रमण और विशेष तौर पर पुलिसिया अतिक्रमण से निजात पाने के लिये क्या यह सरकार कोई पुख्ता प्रबन्ध कर पाने में सक्षम भी है? क्या इसकी इच्छाशक्ति भी दिखायी देती है?

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 2, 2015

बाबू बनल रहें

दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में 'बाबू बनल रहें'

सात बहनों के बीच उनके इकलौते भाई थे-बाबू। बहुत देवता-पित्तर को पूजा चढ़ाने और देवकुर लीपने के बाद कोंख में आये थे बाबू। पंडी जी ने तो जन्म मुहूर्त के अनुसार दूसरा नाम रखा था लेकिन पूरा परिवार प्यार से उन्हें ‘बाबू’ ही कहता था। सभी बहनें उनसे अत्यधिक प्यार करती थीं। राखी के पर्व पर उनकी पूरी कलाई रंग-बिरंगी राखियों से भरी रहती थी। चार-पांच साल की उम्र में ही वो अपने दो-तीन भांजो के मामा बन चुके थे। उनकी बहनों द्वारा बाबू की देख-भाल और सेवा-सुश्रुषा देखकर मुझे कुढ़न होती थी। ‘बाबू’ की पसन्द-नापसंद का ख्याल रखना उनकी बहनों की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया था। 'छोटिया' और 'बचिया' उम्र में बाबू से कुछ ही बड़ी थीं। छोटी करीब तीन साल और बचिया सिर्फ डेढ़ साल बड़ी रही होगी। वे दोनों चौबीस घण्टे परछाई की तरह बाबू के पीछे लगी रहतीं। सबसे बड़ी तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। दो बहनें घर के चूल्हा-चौका झाड़ू पोछा बर्तन आदि कामों में लगी रहती थी।
माता जी का बच्चे पैदा कर लेने के बाद एकसूत्री कार्यक्रम अपने पति के पास बैठकर ठकुरसुहाती गाना था। वे 'मालिक' की सेवा-टहल के लिये अपनी लड़कियों का नाम लेकर हमेशा हांकते-पुकारते रहने में ही थक जाती थीं। संवेदना विहीन, भावशून्य, निष्क्रिय चेहरा उनकी पहचान थी। उनके लिए शीत वसंत में कोई फर्क नहीं था। मैंने उन्हें कभी हँसते हुये नहीं देखा। न कभी आँखे ही नम हुई। सुना था कभी-कभार बाबू की हरकतें उन्हें मुस्कराने पर मजबूर कर देती थीं।
बाबू को छोड़कर बाकी बेटियाँ अपने पिता को बाऊजी पुकारती थी; लेकिन बाबू उन्हें पापा कहा करते थे।

पापा कहीं बाहर से लौटते तो छोटिया और बचिया बाबू की पूरी दिनचर्या उनसे हंस-खिलखिला कर बताना शुरू कर देतीं - बाबू ने क्या खाया; क्या पिया; क्या पढ़े; आज कहाँ-कहाँ घूमने गए; उनके पैरों में चप्पल किसने पहनाया; उनकी किन-किन बच्चों से लड़ाई हुई; किस-किसको इन दोनों ने बाबू के लिए मारा; किसके-किसके घर शिकायतें लेकर गयीं; और आज बाबू को दिन में क्या-क्या खाने का मन हुआ...? कभी समोसे-पकौड़ियां तो कभी जलेबियां ! यह सब सुनकर अधेड़ उम्र के पापा की आखों में चमक आ जाती।

चूँकि उनका घर बीच बाजार में ही  पड़ता था इसलिए बाबू की फरमाइश सुनते ही उनके खाने के लिए गर्मागरम समोसे, पकौड़ियाँ और जलेबी तुरन्त आ जाया करती थी।
बाबू के लिए पापा की आसक्ति देखते ही बनती थी। एक दिन गोधूलि बेला में बाबू ने कहा- "पापा, जब मैं सीढ़ी से चढ़कर छत पर आ रहा था तो मैंने अपने पैर के नीचे सांप देखा।” उस दिन उनके पापा की थूक गले में ही अटक गई। बदहवास से हो गये। पहले तो बाबू का पैर उलट-पुलट कर चारो तरफ  बारीकी से देखा कि कहीं साँप ने काटा तो नहीं है...! बाबू ने बताया भी था कि सांप ने काटा नहीं है, फिर भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था।
फिर पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। कड़कती आवाज में फट पड़े- “छोटिया... बचिया... आव इहाँ”। जैसे ही फरमान जारी हुआ दोनों जिन्न की तरह वहां तत्काल प्रकट हो गई लेकिन बाप का रौद्र रूप देखकर दोनो सहम गयीं। चेहरे का भाव बता रहा था कि जरूर बाबू के प्रति कोई चूक हो गयी है। संयोग से बाबू के पैर में चप्पल नहीं थी। बाऊजी ने उन दोनों की कड़ाई से क्लास लेनी शुरू की..."कहाँ थी तुम दोनों? बाबू के पैर में चप्पल नहीं है... सीढ़ी पर साँप था... कहीं काट लेता तो? जी भर डांट लेने के बाद बोले- जल्दी जाओ नीचे से 'हरिहर मरिचा' लेकर आओ...। मैं भी उनके पास खड़ी थी। यह सुनते ही झट से बोल पड़ी- पर चप्पल तो इन दोनों के पैर में भी नहीं है और नीचे जाने का रास्ता भी वही है। साँप ने इनको काट लिया तो? लेकिन उस समय मेरी कौन सुनता? सही बात तो ये है कि उन दोनों को मैंने पहले भी कभी चप्पल पहने हुए नहीं देखा था।

बाबू के लिए उनकी चिन्ता और बाबूजी के आदेश का प्रभाव ऐसा था कि वे उल्टे पाँव तेजी से नीचे की ओर सीढ़ियों पर दौड़ पड़ीं। कुछ उतनी ही तेजी से जितनी बाबू के लिए बाजार से कागज के ठोंगे में समोसे और पकौड़ियाँ लाने के लिए दौड़ती थीं। इस दौड़ में कभी-कभी तो उन्हें ठोकर खाकर जमींन पर मुँह के बल गिरते भी देखा था मैंने। कभी-कभी कागज के दोने में लाये जाते बाबू के मन पसन्द समोसे जलेबियाँ या पकौड़ियाँ इन बच्चियों को ठोकर लगने के कारण जमीन पर गिर जाते और उनपर धूल की परत चढ़ जाती। ऐसे में उनके पापा बाबू को वह खिलाने से सख्त मना कर देते थे। फिर डांट-फटकार लगाकर दुबारा उन्हें पैसे देकर सावधानी से लाने की हिदायत देते।तब यह डाँट उन लड़कियों को बुरी नहीं लगती क्यों कि उसके बाद उनकी जिह्‍वा को भी कुछ स्वाद मिल जाता। बाबू का सामान लाने के लिये कभी-कभी दोनों बहनें आपस में ही भिड़ जाया करती। यहाँ तक कि गिरी हुई पकौड़ियाँ कूड़े तक फेंकने के लिए भी उनके बीच मार-पीट हो जाती।

पंडित जी को किसी ने बता दिया कि रोहू का मूड़ा, अंडे की जर्दी और बकरे की कलेजी से शरीर में ताकत आती है और दिमाग बढ़ता है।फिर तो यह बाबू के लिए रोज का उठौना हो गया।

बाबू के बाबा अपने गाँव-जवार के नामी ज्योतिषी और कर्मकांडी पंडित थे।उनके घर की रसोई में बिसइना लाना वर्जित था। लेकिन बाबू के लिए इंतजाम हो गया। बाजार से एक आदमी कलेजी के चार-पाँच टुकड़े रोज घर दे जाया करता था। उसे घर की रसोई से दूर आँगन में भुना जाता था। यह काम छोटिया किया करती थी। कलेजी को खूब साफ धुलकर; नमक लगाकर छोटी स्टोव की आंच पर भुनती। यह बहुत कौशल का काम था। उसकी नन्हीं सी उँगलियाँ यह काम करते-करते बहुत अभ्यस्त हो गई थीं। फिर भी उसमें से एक-आध कलेजी कभी जल भी जाया करती थी।

बचिया वहीं खंभे से चिपककर खड़ी-खड़ी बाबू को भुनी हुई कलेजी खाते देख निहाल होती रहती। उसे अपलक निहारने के अलावा क्या करती भला! अच्छी भुनी हुई कलेजियां बाबू खा जाते और जली हुई छोड़ देते। यह बची हुई कलेजी इन दोनो बहनों के लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होती। किसी-किसी दिन बचिया कलेजी को खुद ही पकाने के लिये छोटी से लड़ जाया करती।

एक दिन आँगन में बहुत पानी बरस रहा था। ओसारे में खाट पर बाबूजी बैठे हुए थे। पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, बाबू को कलेजी खिलाने में अबेर हो रही थी इसलिए वे छोटिया से बोले- "यहीं स्टोव जला कर कलेजी भून दे।" छोटिया खाट के पास ही कलेजी भूनने के काम पर लग गई। वह बहुत सावधानी बरत रही थी फिर भी एक टुकड़ा कलेजी भभकते स्टोव की आंच पर लगकर काली हो गयी थी। बाबू ने उसे नहीं खाया। दूर से यह देखकर खुश हुई बचिया दौड़कर आयी लेकिन उससे पहले ही छोटी ने पूरा टुकड़ा अपने मुँह में डाल लिया। बचिया को उसकी यह अनदेखी देखी न गई और चिल्लाकर बाऊजी से बोल पड़ी-" बाऊजी, छोटिया जानिके करेजिआ जरा देहलस हे कि बाबू छोड़ि दीहें आ ऊ खाए के पा जाई!"
बाबूजी के गुस्से का पारा चढ़ गया। अपनी आँखे लाल किये चूल्हे के पास जलावन के लिए रखी आम की लकड़ी के ढेर से एक च‍इला उठाकर पिल पड़े। डर से थरथर काँपती छोटिया चिग्घाड़ मारकर बाबूजी के पैरों से लिपट गयी-   "बाबूजी... अबकी माफ क दीं... अब कब्बो नाही जराइब!"