Monday, October 4, 2021

गीत (बलम बन बदरा)

भरी-भरी नैना क़जरा बही जाए

बलम बन बदरा उड़ी-उड़ी आए

मोरे पिया की बाँकी उमरिया

भई री सौतन बैरन नोकरिया

दूर विदेसवा जबरन ले जाए


बलम बन बदरा उड़ी-उड़ी आए…


उड़ती जहज़िया सुनले अरज़िया

बिरह की मारी अपनी गरजिया

कासे कहूँ मैं तू ही समझाएँ 


बलम बन बदरा उड़ी-उड़ी आए…

फोनवो  लागे दुस्मन तोरी देसवा

छः मास बीती  कोई संदेसवा 

अबकी जो आए संग मोहे ले जाए


बलम बन बदरा उड़ी-उड़ी आए…


(रचना)

Friday, October 1, 2021

दहिजरा कोरोना भाग-3 (कथा में क्षेपक)






कई सालों से जयनरायन बाबा की साध थी, भागवत कथा सुनने की। लेकिन पहले बेटियों की शादी, और फिर अपने टूटे कुल्हे के लम्बे इलाज में इतना टूट गए थे कि इसका बेवँत ही नहीं जुटा पा रहे थे। वैसे भी इनके पास पुरखों की थोड़ी सी जमीन के अलावा कोई दूसरा आर्थिक स्रोत नहीं था। ऐसे में जब उनके घरवालों ने उन्हें भागवत सुनवाने के लिए साइत दिखाकर दीन-बार तय कर दिया तो बाबा की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने इस धार्मिक अनुष्ठान में किस-किस को नहीं बुलाया। जो भाई-भतीजेनाती-पोते गाँव छोड़कर दूर-दूर शहरों में जा बसे थे उन्हें भी मोबाइल से नेवत डाले। पूरी पटिदारी तो बाबा के घर आयोजित इस बहुप्रतीक्षित भागवत से वैसे ही उत्साहित थी। लेकिन तभी कोरोना का क्षेपक कूद पड़ा।

 

इस क्षेपक को पुरोहित जी ने पट्टीदारों और परिवार वालों के साथ सिर जोड़कर परे धकेल दिया। यह मान लिया गया कि इस धर्म के कार्य से इस कोरोना का आतप भी मिट जाएगासभी स्वस्थनिरोग और दीर्घायु हो जाएंगे। इस कथा का इतना बड़ा महात्म्य है कि इससे पूरे जग का कल्याण होगा। इसी मनोकामना से बाबा के घर भागवत ठन गई। पूरा गांव श्रद्धा से भर उठा। गाँव के छोटे-बड़े से ले के जवान-बूढ़सब मरद-मेहरारू बाबा के घर हो रही भागवत और भजन-कीर्तन में डटे रहे। प्रत्येक दिन के कथा विश्राम के बाद वहाँ भक्तिरस में डूबे लोग जब अपने-अपने घर के लिए प्रस्थान करते तो उनकी छाती तन के इस कदर चौड़ी हो जाती मानो कोरोना को गाँव के सिवान से बाहर लखेद आये हों। उनकी बातों में कुछ उसी प्रकार का गर्व छलकता जैसे हमारे सैनिक चीनियों को सीमा-पार खदेड़ कर महसूस करते है। धर्म की जय होअधर्म का नाश होप्राणियों में सद्भावना होविश्व का कल्याण होहर हर महादेव- नित्य-प्रति इस जयकारे के साथ पूरा गांव अहो-भाग्य कह के धन्य-धन्य हो जाता। बाबा के घर यह अद्भुत आनंद दुर्लभ था। न भूतो न भविष्यति! 

 

जैसा कि होता हैहर जगह एकाध विघ्नसंतोषी होते ही हैं। यहाँ भी कुछ 'विधर्मीकुछ न कुछ उल्टा-पुल्टा बोल के सबके मुंह में जाबी (फेस-मास्क) लगाने का ज्ञान बांट रहे थे। वे जैसे ही किसी बूढ़-ठेल मनई को देखते तो कोरोना का राग छेड़कर उनकी आस्था डगमगाने की जुगत भिड़ाते। बोलते - "सरकार ने कोरोना के खतरे से लॉकडाउन कर दिया था। थोड़ी छूट भले ही मिल गई है लेकिन ई कातिल कोरोना जस का तस फैल रहा है। तो बताइएबाबा को यह भागवत नेवधने की क्या पड़ी थी?" लेकिन किसी ने कान नहीं धरा। वे अपनी 'कुचालमें नाकाम ही रहे। 

 

पूरे नौ दिन चली भागवत कथा में गाँव वालों ने दिखा दिया कि पूजा-पाठ और भगवत-भजन में कितनी शक्ति होती है। सब कुछ बड़े ढंग से निपट गया। समापन के दिन बड़े प्रेम से हवन-आरती और प्रसाद-वितरण हुआ। बाबा ने सभी रिश्तेदारों से लेकर पटिदारों और गाँव के दूसरे लोगों को भोजन की दावत भी दी थी। उस रात वहाँ खूब अहमक-दहमक भोज-भात हुआ। पूरा गाँव भगवान के साथ जयनरायन बाबा का नाम भी लेता रहा। इससे उन्हें परम सुख की प्राप्ति हुई।

 

लेकिन दहिजरा कोरोना का खेल तो अभी बाकी ही था!

 

होत बिहाने गाँव में हल्ला मचा कि भिक्खन के लइका डबलुआ का रिपोर्ट पॉजिटिव आया है। जिसने सुना वही सन्न रह गया। भगवत कथा में अनुष्ठान के संकल्प से लेकर समापन तक उसने अहम भूमिका निभाई थी। उसने पटिदारों की पंगत में बैठकर भोजन भी किया था और बड़े प्रेम से सबको प्रसाद का दोना भी थमाया था। 

 

पूरा गाँव सनपात गया था। सब लोग नौ दिन की चर्या का मानसिक वीडियो उल्टा घुमाकर यह देखने लगे कि डबलुआ कब-कब और कितना उनसे सटा था। उसके नाक सुड़कनेखंखारने और खांसने का वर्णन सबकी जुबान पर आ गया। "मैंने तो उसे टोका था लेकिन दुष्ट ने एक न सुनी।" ऐसा दावा प्रायः सभी करने लगे। जो लोग दूर शहर से नहीं आ सके थे उन्हें भी इस खबर ने दहला दिया। उनके भीतर अपने लिए तो जान बची लाखों पाए का भाव था लेकिन गाँव में फोन मिलाकर अपने परिजनों की कुशलता जाँचने लगे। 

 

गाँव की बुढ़िया काकी जिनके मुंह से नौ दिन भगवान के नाम के अलावा कुछ नहीं निकला था वो आज दुआर पर बैठकर डबलुआ की सात पुस्तों को तार रही थीं। "मुँहझंउसाअभगवालवणा के पूतकुलबोरनासबके नासि दिहलस।"

 

भिक्खन बाबा को भी गरियाने और सरापने वालों ने इतना सुनाया कि उनके कान का कीरा झर गया। पता चला कि उन्होंने खुद ही जब डबलुआ को लाठी लेकर खोजना शुरू किया तो सारे गाँव ने उनके साथ उसे खरहा की तरह उंखियाड़ी से लेकर झंखियाड़ी तक झार डाला। अच्छा हुआ वह किसी के हाथ नहीं आया।  

 

धीरे-धीरे गाँव के लोग भिक्खन के दुवार पर इकठ्ठा होने लगे। बारी-बारी से आने वाले सभी लोग उनसे सफाई माँगते। कब टेस्ट हुआक्यों टेस्ट हुआजब बीमारी थी तो कुरंटीन क्यों नहीं रक्खेकिस जनम का बदला लिए होगाँव भर से क्या दुसमनी थीलवंडे को कहाँ गाड़ दिए होअब गांव भर को कौन बचाएगाजयनरायन बाबा को जो पाप लगेगा इसका जिम्मेवार कौन होगाआदि-आदि। भिक्खन को तो काठ मार गया था।

 

तभी किसी ने चिल्लाकर बताया - डबलुआ कोठा पर लुकाइल बा। चुप्पे से झाँकत रहल हs। पता चला कि वह चुपके से घर की छत पर जाकर छिप गया था और उसने सीढ़ी का दरवाजा बाहर से बंद कर लिया था। सभी लोग उसे ललकारने लगे। वह दुबका रहा। तब कुछ बड़े-बुजुर्ग मनुहार करने लगे। अब डबलू ने डरते-डरते रेलिंग से ऊपर सिर निकाला और चिल्लाकर बोला - हमरा कोरोना नइखे। हम त पासपोर्ट बनवावे खातिर जाँच करौले रहनी। इयार लोग से मजाक में निगेटिव के पॉज़िटिव बता देहनी। उहे लोग उड़ा देहल हs

 

                                               (रचना त्रिपाठी)

 

Saturday, January 2, 2021

आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम गुज़रा ज़माना बचपन का—

नए साल का पहला दिन। शीत लहर की वजह से पड़ती कड़ाके की ठंड। घर के पीछे वाले अहाते (खिरकी) में सुबह से एक बड़े से हंडे में खौलता पानी जो कई खेप में चूल्हे पर चढ़ता और उतरता रहता था। और मम्मी का वो होम-मेड, विटामिन डी व सी से भरपूर कई तरह के मिनरल्स युक्त लूफ़ा!

आप इसे एक हर्बल बाथ स्क्रब के रूप में समझ सकते हैं- जिसका निर्माण ककुम्बर प्रजाति की एक हरी सब्ज़ी से होता था। जिसको आप तिरोई के नाम से जानते हैं। हमारे यहाँ इसे घेवड़ा और नेनुआ भी कहा जाता है। सुनते थे कि यदि इसका हरीसब्ज़ी के रूप में सेवन करें तो बड़ा ही फ़ायदेमंद होता है। वह बाथ स्क्रब इसी नेनुआ को जेठ-बैसाख की गर्मी में सुखा-तपाकर तैयार किया जाता था। जब वह पूरी तरह से सूख कर कड़ा जालीदार खुज्जा बन जाता तो उसमें से बीज निकालकर पुनः अगले मौसम के लिए सँभाल कर रख लिया जाता था। बचपन में हमें तो कभी नेनुआ की सब्ज़ी पसंद आयी और ही इससे बना मम्मी का वो होम-मेड हर्बल बाथ स्क्रब।

मम्मी पता नहीं कैसे यह भाँप लेती थी कि जाड़े में उनके छोटे-छोटे स्मार्ट बच्चे बंद बाथरूम में अपने हाथों से अक्सर फ़्रेंच स्नान कर के भाग लिया करते हैं। इसलिए नये वर्ष के पहले दिन और खिंचड़ी (मकर-संक्रांति) के दिन उनके बच्चे इस तरह का कोई अंग्रेज़ी स्नान करें यह उन्हें बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं था। इसलिए उस दिन वह इसका पहले से सारा प्रबंध करके रखती थीं। बारी-बारी से हम सबको उस हर्बल बाथ-स्क्रब में साबुन का घोल मिलाकर गर्म पानी से ऐसे रगड़ के नहलाती थीं जैसे लकड़ी के चूल्हे पर जली हुई कड़ाही की पेंदी से चिपका हुआ लेवा किसी मज़बूत ऊबसन से रगड़ कर छुड़ाया जाता है। इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता तो बची-खुची जगह अपनी हथेलियों से वह तबतक रगड़ती थीं जबतक कि हमारी चमड़ी उनकी दोनों हथेलियों से चटचटा के चिंगारी निकाल दें।

इस तरह हम बाथरूम में घुसते तो थे ठंड से दांत किटकिटाते हुए लेकिन जब मम्मीके हाथों स्नान के बाद पूरे शरीर में नारियल के तेल का लेप लगवाकर बाहरनिकलते थे तो हमारे चेहरे से वैसी ही दीप्ति प्रज्ज्वलित होती थी जैसे उस चूल्हे चढ़े लेवा लगे हंडे के नीचे लपलपाती लपटें।

(रचना त्रिपाठी)



Thursday, August 27, 2020

दहिजरा कोरोना : भाग-2 (बारी में गारी)





(फोन पर सुनी लाइव कमेंट्री)
आज गांव के बगइचा में तमासा लगा है। इसके आगे बम्बइया सिनेमा और नौटंकी फेल है। थाने से हल्का वाले सिपाही भी पहुँच गए हैं। सोसल डिस्टेंसिंग गई तेल लेने। गाँव के लोग सरकारी फरमान को प्रशासन के मुँह पर फेंक कर उस तमासे का मजा लेने पहुँच गए हैं। घुरहुआ अपने मेहरारू के साथ जो कर रहा है उससे वहाँ बिना टिकट के ख़ूब बढ़िया डरामा देखने को मिल रहा है। उसकी बात सुनकर गाँव के लवंडे लहालोट हो रहे हैं। बड़े बुजुर्ग ठकुआ के देख रहे हैं और कुछ औरतें हैं जो अँचरा से मुँह तोपकर अपनी खीस निपोर रही हैं। कभी-कभी उसके दिल की पीड़ा सुनकर लोगों का कलेजा उमड़ पड़ रहा है। लंगड़ महतो तो कपार थाम के रोने भी लगे। उनकी अपनी मेहरारू की सूरत आंख में उतर आई जो इनका पैर तोड़ने के बाद इनके गुस्से का ऐसा शिकार हुई कि अब बिछौना पर ही सगरो करम कर रही है। इनकी एक ही लाठी में बेचारी का करिआँव छटक गया था। तबसे मर्द-मेहरारू का झगड़ा देखकर इनकी आँखे बढ़िया जाती हैं।

घुरहुआ जो बउराया है तो गलत नहीं है। बतिया तो सब सहिये बोल रहा है। वो सरकार के ऊपर इस बात से बहुते फिरन्ट है कि लॉकडाउन के बेरा नेता-परेता से लेकर सरकारी अफसर तक और पुलिस से लेकर सफाई कर्मचारी सभही उपदेस पर उपदेस झोंक रहे थे - "घर में रहिए, सुरच्छीत रहिए, नहीं तो कोरोना गरेस देगा।" सिपाही को देखकर उसकी आवाज और भी तेज हो गयी, "घण्टा रहिए घर में... इधर कुक्कुर-बिलार की तरह एक-दूसरे में लभेड़कर सब मजूरन को दिल्ली-बम्बई से ठेलकर उसके घरे गाँव में भेज दिया और कह रहा है कि दूर-दूर रहिए। हम इहाँ हंकासे-पियासे आये तो  ई हरामजादी हमें ज्ञान दे रही है कि मोदी कहें हैं दूरी बना के रहो। आज दस दिन से बगइचा में अकेले पड़े हैं। नेटुआ-नगारी बना के रख दी है।अरे हमको कुछ होना होता तो अबतक हो हवा गया होता!" 

यही बात वो अपनी मेहरी को कई दिन से समझा रहा था। आज पानी नाक के ऊपर हो गया तो आज उसने सब रीस निकाल के धर दिया। झोंटा पकड़ के घिरिया दिया और बड़ा बेदर्दी से मार रहा था। घुरहुआ-बहु का घिघियाना सुनकर लोग बगइचा में जुट गए। जब पुलिस आयी तो उल्टा उनसे इसी का ओरहन भी दे रहा है। कह रहा है – "कुत्ता बना के रख दी है हमको। दो-चार मिनट अगोर के ठाड़ तक नहीं रहती है। केरा के पत्ता पर रसोई फेंक के भाग जाती है।" इसपर बिग्गन का लौंडा  खेदना खिक्क से हँसकर भीड़ में लुका गया।

घुरहुआ अपनी रौ में कह रहा था, "एक दिन पानी पीने के लिए लोटा मांगे तो कहीं से खाली फेविकोल के डिब्बा काट के दूरे से धर दी, जैसे हम कोई पैखाना पोतकर बैठे हों। ...तभी से हम इसके ऊपर खून घोंट रहे थे, लेकिन तब्बो चुप रहे, कुछ न किए। हमरे साथ के बाकी लोग का कुँवरटीन का टैम बीत गया। वो अपने घर लोग-लइका के पास पहुंच गये और हम है कि इहाँ बइसाख-जेठ के दुपहरिया में अकेले पाक रहे हैं। इतना लंबा सफर पैदल चल के आए। इहाँ आये तो इकर नौटंकी चालू हो गयी।"

बात अब समझ में आई। हुआ ये था कि गाँव के   बाग में अकेले उसका मन नहीं लग रहा था। उसने शायद किसी दिन उससे बोला कि दोपहर में माई-बाबूजी को खिला-पिला के मेरे पास आ जाना लेकिन वो बहटिया दी, नहीं गई। तबसे वो गुस्से से भरा हुआ घात लगाकर लबदी सोहरा रहा था। यही गुन रहा था कि वो कहीं अकेले में भेंटा जाय तो बदला ले सके; और हुआ भी यही।

आज दुपहरिया में जब भूजा-भरी लेकर आई तो वह टूट ही पड़ा। बेचारी भाग ही नहीं पाई। मार के उसका भूभुन फोड़ दिया है। मुँहे राहे खून फेक रही है। ई मामा लोग लाठी-बंदूक लेके वहीं खड़े थे। घुरहुवा के आगे उनकी बुद्धि भिला गई थी। करें तो क्या करें? छउक-छउक के उन्हें ललकार रहा था - "आओ हमको पकड़ो और थाने ले चलो, नहीं तो अभी तो खाली इसका मुँह फोरे हैं, छोड़ के गए तो इसका गटइए दबा देंगे। भले से हमको जेल हो जाय बाकिर जिंनगी में अब कभी इसका मुँह नहीं देखेंगे। ए तरे जियले से तो निम्मन है कि हम मर ही जाएं। ए साहब, लगाओ हमको हतकड़ी और इहाँ से ले चलो।"

घुरहुआ गाँव भर के सामने पुलिस के आगे फेकर-फेकर के रो रहा है। पुलिस वाले भी उसको हाथ नहीं लगा रहे। अब घुरहुआ-बहु बड़ी सांसत में पड़ गई है। लामे-लामे रहे तो घुरहुआ मारे और उसके नियरे जाय तो कोरोना। बेचारी करे त का करे?

करिआँव=कमर, फिरन्ट=नाराज, लबदी=लाठी
डंडा, सोहराना= सहलाना, ओरहन=शिकायत, भुभून=जबड़ा, लामे- लामे=दूर-दूर, नियरे=नजदीक

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, August 23, 2020

दहिजरा कोरोना-1 (कोठरी में संडास)




बड़की माई के घर में भितरे-भीतर रोज कुछ न कुछ खटर-पटर लगा हुआ है। वर्षों से बूढ़ा-बूढ़ी का जीवन गाँव में अपनी छोटकी पतोह के साथ बड़े मजे में कट रहा था। कोरोना के बहुत पहिले से उनके बड़का बेटा अपने मेहरारू-लइका लेके बहरवांसू हो गए थे। लइकन-फ़इकन के संगे साल में एक से दू बार दू-चार दिन के लिए इहाँ आते रहते। अहमक-दहमक तीज-त्यौहार मनाकर मीठा-मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू करके परदेस लउट लेते। एक वो दिन था जब बड़की माई इन्हें देखकर फूले न समाती थीं और एक आज का दिन है, बाहर से सब कोई हंसता-खेलता दिखता है फिर पता नहीं क्यों ये फूल के कुप्पा हुए बैठी हैं? जिस बड़कू के इंतजार में वो अपने पलक-पावड़े बिछाए उनकी राह तकती रहती थीं, आज सभी इकट्ठे हैं तब्बो मूड बिगड़ा हुआ है। अब अंदर की बात कौन जाने! शायद घर में बच्चों के उत्पात से बहुते परेशान हैं। लेकिन सुना है उनके दूनों बहुरिया लोग में अब खूब तोर-मोर होने लगी है।

बच्चे जब भी मुंह खोलते हैं, कुछ न कुछ ऐसा कर देते हैं कि दूनों पतोह आपस में बक्क-झक्क कर के अपने-अपने कोठरी में कोहना के बइठि जाती हैं। इनके साथ ही रसोई का कुंडा भी अकड़ जाता है। पहले तो वह छोटकी बहुरिया के इशारे पर चलता था लेकिन आजकल वो भी इन दुन्नो जनी के मूड के हिसाब से खुलता और बन्द होता है।

लइका-फइका तो ओहू पर मस्त हैं। जिस दिन दुन्नो कोहनाती हैं उस दिन दरवाजे पर मर्दाना लोग गोइठे की आग पर भउरी और आलू का चोखा लगा लेते हैं और बच्चों की मौज हो जाती है। बड़की बहुरिया शुरू-शुरू में जब आयीं तो दूनों जनी आपस में मिलकर अपनी-अपनी पाक-कला का ख़ूब प्रदर्शन करती थीं। उनके रसोई में बनते पकवान की खुशबू खेत-खलिहान तक जाती रही। महीनों हो गया है कोरोना का कहर हटने का नाम नहीं ले रहा है। इनका उत्साह अब धीरे-धीरे ठंडा हो गया है। अक्सर दूनों जनी का मूड अब गरम रहने लगा है...  चूल्हे की आग ठंडी पड़ने लगी है... और रसोई में कुकर की सिटी शांत रहने लगी है। शायद अब जी ऊब गया है उनका। वो भी क्या करें बेचारी! यहाँ घर का तिल से ताड़ तक सबकुछ अपने हाथ से ही उन्हें करना पड़ता है। चौका-बर्तन के लिए इसके पहिले एक लौड़िन आती रही।बूढ़ा-बूढ़ी ने उसे भी मना कर दिया कि ''कोरोना गरेस देगा मत आना।''

बड़की बहुरिया तो बम्बई से लौटी थीं। वहाँ रसोई घर से लेकर स्नानघर सब एक्कै कोठरी में सना हुआ था। जियादा उठने-बइठने की आदत तो रही नहीं और गाँव में घर के पिछवाड़े तक उठके जाना उनके लिए पहाड़ हो गया है। कुंटल भर के देह का सारा भार उनके ओहि ठेहुने पर पड़ता है। अउर तो अउर, इहाँ के देसी संडास... में निपटना भी एक सांसत है। अब ऊ करें त का करें! मजबूरन उनके कोठरी में ही एक गुसलखाना बनवाना पड़ा है। 

अब जहां दो-चार बर्तन एक्के साथ रही उहाँ खटर-पटर तो लगी ही रहेगी। और ये तो आपहूँ सुने हैं कि कोरोना की यही ख़ूबी रही कि उसने सबको बराबर माना। अब उनके इहाँ भी दूनों जनी में बराबरी का होड़ लग गया है। भितरे-भीतर उनके घर भी अब दूसर 'पूआ' पकने लगा है। तभी भरी दोपहरी में बड़की माई अंगना छोड़ के बाहर के ओसारे में कपार पर हाथ धरे बुढऊ के साथ बैठी हैं। सत्तर पार कर गईं लेकिन इसके पहिले दिन के अजोरे में किसी ने उनकी झिरखिरी नहीं देखी थी। 

उनकी छोटकी बहुरिया आजकल कोप भवन में चली गई हैं। छोटका बबुआ और उनके बाल-गोपाल मनुहार में लगे हैं। बड़की माईं बुढऊ से कह रही थीं कि लॉकडाउन में काम धंधा बन्द हैं और सबका खर्चा-पानी आसमान पर है। "जेकर जिनगी एहि खेत-खलिहान में बीत गइल, अब का... त उनहूँ के अपने कोठरी में अलगे संडास चाहीं!" 

(रचना त्रिपाठी)







Friday, July 24, 2020

कम-अक्ल औरतें भी न...

व्यर्थ जल रही 
बिजली 
और पंखों का  
स्विच 
बार-बार 
ऑफ कर देती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

घिसा हुआ साबुन
टूथ पेस्ट की
पिचकी हुई ट्यूब
डब्बे की तली से 
लिपटा घी
सब न जाने  
कैसे सोख लेती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

गैस चूल्हे पर
चढ़ी
दो-दो तीन-तीन
रोटियां
एक साथ
झटपट सेंक लेती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

आंधी-पानी की 
गड़गड़ाहट 
की आहट 
मौसम के करवट
बदलते ही 
कैसे भांप लेती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

छत पर टँगे 
कपड़े
धान गेंहू की 
पथार
अचार की गगरी
और साथ में 
घर के 
बड़े-बुर्जगों की
फटकार
सब एक साथ
समेट लेती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

देश-दुनिया की 
ख़बर से बेख़बर
सुबह की चाय 
अख़बार के साथ 
नहीं पीती
फिर भी
सबके चेहरे 
जाने कैसे पढ़ लेती हैं!

कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

गोबर-मिट्टी से
दिन-भर 
लीप-पोत कर,
यहाँ-वहाँ पड़े
आरामतलबी के 
शिकार 
घरेलू वस्तुओं को
करीने से
सजा के
कच्चे मकानों में
पक्का घर
जाने कैसे बना लेती हैं!

सचमुच -
कम-अक्ल औरतें भी न
हद करती हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, June 5, 2020

पीढ़ियाँ

हर साल की तरह इस बार भी होली की छुट्टी में पंडित केशरी नाथ दूबे के घर में चहल-पहल बढ़ गयी थी। गाँव के लोग उन्हें केसरी बाबा के नाम से जानते ते थे और घर वालों के लिए वे बड़का दादा थे। यूँ तो उनके भरे-पूरे परिवार के सदस्य नौकरी-चाकरी के चक्कर में देश के अलग-अलग शहरों व महानगरों में सपरिवार रहा करते थे लेकिन होली और दशहरा के मौके पर उन सबकी कोशिश होती थी कि गाँव आकर बाबा के साथ ही त्यौहार मनाया जाय।

इस बार की होली कॅरोना की आफत से ठीक पहले आयी थी। छुट्टी बीत ही रही थी कि खबरें आने लगीं कि इस वायरस ने चीन से आकर देश के बड़े शहरों में पैर फैलाने शुरू कर दिए हैं। अखबार-टीवी के साथ-साथ सोशल मीडिया भी दुनिया भर में कॅरोना के कहर के समाचारों से अटी पड़ी थी। परिवार के सदस्यों ने तय किया कि लॉक डाउन के दौरान सबसे सुरक्षित अपना गाँव ही है इसलिए सबलोग यहीं रुके रहें। शहरों के बाजार, स्कूल, कॉलेज, मॉल, और कार्यालय सब बन्द होने वाले थे इसलिए वहाँ जाने का कोई फायदा भी नहीं था।

इसप्रकार लॉकडाउन में शहर छोड़कर चार पीढ़ियां एक ही छत के नीचे रहने लगी। वर्ष भर वीराने में बुजुर्गों के हवाले पड़ा मकान गुलजार हो गया था। बच्चों की शहरी परवरिश गाँव में उपलब्ध संसाधनों से मेल नहीं खा रही थी। चौबीसों घंटे बिजली, सैकड़ो टीवी चैनल और वाई-फाई की सुविधा नदारद थी। मोबाइल का नेटवर्क छत पर मिलता था और अखबार दोपहर के बाद पहुँचता था। आती-जाती बिजली से बेपरवाह अधिकांश लोगों का बिस्तर रात में छत पर लगता। शहर के रेडीमेड फ़ास्ट-फूड का स्थान गाँव की रसोई में लकड़ी के चूल्हे पर सिंकी रोटियों, देसी घी से तर पराठों, अपने खेत में उगी हरी सब्जियों, और दालों ने ले लिया था। दरवाजे पर बंधी गाय और भैंस को दुहकर जब फेन सहित दूध की बाल्टी घर में आती तो बच्चे सम्मोहित होकर देखते। उपले की आग पर नदिया में लाल होने तक औंटाए दूध में दादी जब जामन डालकर दही तैयार करती तो उसका स्वाद बेजोड़ होता। सुबह-सुबह उस दही से मक्खन निकलता; फिर घी और मठ्ठा भी तैयार होता। स्पेशल डिश के रूप में दाल-पूड़ी, मालपुआ, गुझिया, पिठ्ठा, आदि पारंपरिक पकवान बनने लगे। खान-पान की इस विस्तृत और श्रमसाध्य प्रक्रिया में दादी, ताई, चाची, मम्मी, आदि सभी औरतें दिनभर लगी रहतीं। घरेलू काम करने वाली महरिन की तो कॅरोना ने छुट्टी ही करा दी थी।

 अपने-अपने बच्चों की पसंद का ख्याल रखने वाली माताओं में उनके खेलने-खाने की किच-किच को लेकर टकराहट होती रहती। लेकिन पुराने गारे-मिट्टी से बनी ईंट की दीवारें काफी मजबूत थी। इससे भीतर की आवाज बाहर नहीं जाती। केसरी बाबा के छोटे बेटे जगदीश जो अब नोएडा में एक कम्पनी के सीनियर मैनेजर थे वे घर के बच्चों को इस गाँव में बीते अपने बचपन के बारे में बताते। उन यादों से जुड़ी चीजें दिखाते। यह भी बताते कि यहाँ जो समृद्धि वे देख रहे हैं वह बड़का दादा के अथक परिश्रम और बेजोड़ अनुशासन के नतीजे में आयी है। बच्चे बड़े कौतूहल और आश्चर्य से बाबा और उनके बेटों के अभाव, धैर्य, दृढ़ता, त्याग, भाईचारा, सेवाभाव और पारिवारिक मर्यादा से ओतप्रोत कहानियां सुनते।

 केसरी बाबा की दिनचर्या लगभग सौ की उम्र में भी इतनी सुव्यवस्थित थी कि उनके सोने, जागने, नित्यकर्म करने, घूमने-टहलने, खाने-पीने और दुआर पर बैठकी करने को देखकर घड़ी मिलायी जा सकती थी। इसमें कभी कोई बदलाव नहीं आया था। अभी इतनी उम्र हो गई लेकिन उनकी आंखों पर चश्मा नहीं चढ़ा। सुंदरकांड का पाठ तो लगभग रोज ही कर लेते थे। आवाज इतनी बुलन्द कि टोले भर में किसी को भी हाँक लगाकर बुला लेते थे। अपने पोते-पड़पोतों के लिए वे इस चमत्कारिक दुनिया में सबसे बड़े जादूगर थे। बच्चे नब्बे डिग्री पर झुकी उनकी देह देखकर मुँह दबाकर हँसते थे। इसपर जब वे तनकर सीधे खड़े हो जाते तो सब समझ जाते कि अब उन्हें जोरदार डाँट पड़ने वाली है।

जब केसरी बाबा की पहलवानी की तूती बोलती थी तब उनका शारीरिक सौष्ठव देखते ही बनता था। उन्होंने बहुत से दंगल जीते थे लेकिन कभी किसी अखबार में कोई ख़बर नहीं छपी। तब गांव तक अखबार आता भी न था। लेकिन अब लॉकडाउन में इनकी चार पीढ़ियों वाला संयुक्त परिवार जब एक छत के नीचे आया तो इसके सदस्यों ने फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पर तस्वीरों की झड़ी लगा दी। एक से एक स्टेटस पोस्ट होने लगे। दूर-दूर से रिश्तेदारों के फोन आने लगे। लोग इनको बधाइयां देते नहीं थक रहे थे। भरे-पूरे परिवार को एक साथ देखकर बड़का दादा मन ही मन मुस्कुराते रहते।

गाँव के जो लोग केसरी बाबा के दुआर पर आते उन सबसे वे हाल-चाल पूछते, पैर छुवाते और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते। बाहर से गाँव लौटकर आने वाले मजदूरों से भी बेधड़क मिलते। जबतक घरवाले बड़का दादा को मना करने की हिम्मत जुटा पाते तबतक पता चला कि वे कोरोना की चपेट में आ ही गए। सौभाग्य से क्वारंटाइन के बाद उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आ गई। डॉक्टरों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। संक्रमण की वजह से उन्हें पूरे 14 दिन आइसोलेशन में रखना बेहद कष्टप्रद रहा। लेकिन केसरी बाबा कहते कि उनकी देह असली घी, दूध और दही से पोसी गयी है इसलिए यह सर्दी जुकाम वाला कॅरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

केसरी बाबा का एक सेवक था-किशोरी। उनसे करीब पचास वर्ष छोटा। वह गांव के प्राथमिक पाठशाला में क्वरंटाइन किए गए श्रमिकों के लिए लाई-चना-गुड़ इत्यादि ले जाया करता था। उन प्रवासी मजदूरों से उसे सहानुभूति थी क्योंकि वह भी पहले बाहर कमाने जाया करता था। लेकिन जबसे केसरी बाबा ने उसे बीड़ी, तम्बाकू, गांजा और देसी शराब की लत से मुक्त कराने की ठान ली और उसके टीबी का इलाज कराने लगे थे तबसे वह उन्हीं के पास रहने लगा था। डॉक्टर ने उसके पूरी तरह ठीक हो जाने की उम्मीद जता दी थी तभी उसे कॅरोना ने डंस लिया। वह गाँव के स्कूल में क्वारंटाइन किए गए गरीबों के संपर्क में आ गया था। केसरी बाबा के बेटों ने उसे शहर के बड़े अस्पताल भिजवाया था जहाँ वह वेंटिलेटर पर अंतिम साँसें गिन रहा था। उसके लिए बाबा के मन में बहुत दुख था। वे कहीं न कहीं खुद को उसकी हालत का जिम्मेदार मानने लगे थे। वे रोज एक माला महामृत्युंजय मंत्र किशोरी के स्वास्थ्य के लिए जपने लगे।

इधर कॅरोना से कुश्ती में सफलता के बाद केसरी बाबा की विजय पताका चारो ओर फहर रही थी तभी शहर से किशोरी के मौत की सूचना आयी। मीडिया वाले ओ.वी. वैन से उनके दरवाजे पर धमक पड़े। टीवी पर न्यूज एंकर लाइव ऑनलाइन थी। स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज फ़्लैश हो रही थी - सौ साल के बुजुर्ग ने कॅरोना को दी मात। जवान नौकर ने दम तोड़ा।

केसरी बाबा कुर्सी पर बैठे सोचमग्न थे। मुंह पर मास्क लगाए गांव पहुंचे संवाददाता ने अपने माइक को एक लम्बे से डंडे में बांध रखा था। उसने एंकर के निर्देश पर दूर से ही केसरी बाबा के मुंह के पास माइक लगाकर उनसे लाइव इन्टरव्यू शुरू किया-

"दादा, अब आपकी तबीयत कैसी है...?

"तबियत अच्छी है लेकिन मन खराब हो गया है। किसोरिया साथ छोड़ गया।"

"सौ पार कर गए कि नहीं, दादा...?"

"ठीक ठीक नहीं मालूम...अभी कुछ बरस बाकी होगा।"

"इस उम्र में खाने का अब जीभ पर पहले जैसा स्वाद आता है क्या...?"

"जीभ का स्वाद? यही तो बीमारी है आजकल की। यदि हम कभी जीभ की सुने होते तो इस उमर में हमारे मुँह के पास तुम ई लग्गी लगाए खड़े न रहते...”

"दादा, अपने खान-पान के बारे में कुछ और बताइए..."

"हमने तो चना, गुड़, किसमिस, बादाम, घर का दूध और दही-घी-मलाई खाया है। गर्मागर्म चावल, दाल, रोटी और अपने खेत की हरी साग-सब्जियों को छोड़कर कुछ जाना ही नहीं। आजकल के ये बच्चे पता नहीं क्या-क्या अकट-बकट खाते-पीते हैं- कोल्ड-ड्रिंक, मैगी, बरगर, पिज्जा और न जाने क्या-क्या? सब कई-कई दिन का सड़ा आटा और मैदा होता है, केमिकल मिलाकर बस जीभ का स्वाद बनाते हैं। पेट और शरीर तो बीमार होगा ही। इनका पढ़ना-लिखना सब बेकार है। अब तो सुनते हैं कि प्राइमरी कक्षा में ही पौष्टिक आहार, फल-मूल का फायदा बता दिया जाता है। लेकिन क्या फायदा ऐसी पढ़ाई- लिखाई का? जब शुद्ध खाने और मेहनत करने का ढंग न सीख पाए।"

"आपका पालन-पोषण कैसे हुआ?"

"हमारी माई पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन हमारे ऊपर बहुत कड़ा अनुशासन रखती थी। अभाव में रहते हुए भी शुद्ध और ताजा भोजन ही देती थी। खूब व्यायाम और कठिन परिश्रम करने का और जीवन में अनुशासन का सारा पाठ उसने ही पढ़ाया था। रात में समय से सोना, भोर में उठ जाना और सूर्योदय के समय नहा-धोकर तैयार हो जाना हमारी आदत बन गयी। हमारी मजाल नहीं थी कि माई हमें कुछ खाने को परोस दे और हम ना-नुकुर करें। आजकल तो देख रहा हूँ कि बच्चे खाने में एक से एक नखरे कर रहे हैं। इनके माता-पिता भी कम नहीं हैं। अनाब-शनाब चीजों पर पैसा फेंक रहे हैं।

सबकुछ टीवी पर लाइव चल रहा था।

"एक हमारा समय था। हमारे जमाने में बिस्कुट, ब्रेड और पावरोटी बेकरी से लाकर खाने को तब मिलता था जब हम बीमार हो जाते थे।"

 यह बात सुनकर उन्हें घेरे खड़े बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

(रचना त्रिपाठी)