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Saturday, July 1, 2017

बहू-अधूरी

ससुराल में दो साल बीत गये। कमली की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही थी। पूर्वा के मुकाबले वह कहीं नहीं टिक पा रही थी। दोनों बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर रात में बिस्तर पर उन्हें सुलाते वक़्त लोरी की आवाज़ में भी अम्माजी पूर्वा को ही ढूँढती रहती। बच्चों की देखभाल में कहीं कोई कमी न आ जाए इसके लिए कमली भरसक कुछ भी उठा नहीं रखती। आज अधिक रक्तस्राव के कारण वह कमरदर्द से परेशान कमरे के भीतर पलंग पर लेटी पड़ी थी। उसकी आँखों के दोनों कोनों से झर-झर आँसू बह रहे थे।

अम्मा जी मोबाइल कानों पर लगाये  कमली की माँ से उसकी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ गयी थीं - "जबसे आयी है यह तीसरी बार है... आज चार दिन हो गया, बच्चों को न तो समय से नहलाया-धुलाया और न ही घर के किसी काम में हाथ बँटा रही है... पूछिए ज़रा, अपनी लाडली से कबतक मातम मनाएगी? जाने क्या सिखा-पढ़ा कर भेजा है आपने!"

-"ऐसी स्थिति में मन को दुःख तो होगा ही न समधिन जी! भला कौन स्त्री माँ बनना नहीं चाहती?  बिन बाप की बच्ची थी बेचारी... मैं भी अपनी परिस्थितियों के आगे मजबूर थी... इसमें उसका क्या दोष?" उसकी माँ ने विनती की।

"हाँ तो मैंने कब गिड़गिड़ाया था आपके सामने उसे अपनी बहू बनाने के लिए? ...और मेरे बेटे ने तो पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसे बीवी नहीं अपने बच्चों की माँ चाहिए। ....शील-संकोच तो मायक़े में ही छोड़कर आ गई थी। उसके कंठ ससुराल में आते ही खुल गए... और तो और सिर पर पल्लू आजतक नहीं ठहरता...  दुल्हन हमेशा पर्दे में ही शोभा देती है।" उनकी आवाज़ कमली के कानों में भाले की तरह चुभ रही थी। अम्माजी ने आज फिर उसकी माँ को कोसना शुरू कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। पलंग से धीरे से उठकर दीवाल का सहारा लिए वह बरामदे में आकर खड़ी हो गई।

"अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी जान गए कि बहू पेट से थी। ...हमारी पूर्वा हमें छोड़कर चली गई लेकिन ऊँची आवाज़ तो दूर गुन्नू पैदा हो गया तब तक किसी ने उसकी झिरखिरी तक नहीं देखी। ये महारानी तो किसी की परवाह किए बिना सारा दिन बच्चों के साथ चपड़-चपड़ करती रहती हैं..." अम्मा जी का गुबार बाहर आ रहा था।

- "तो फिर शिकायत किस बात की अम्माँ जी? पूर्वा दी आपके बेटे की दुल्हन बनकर आयी थी और मैं दो बच्चों की माँ, तो पहले बच्चों को संभालू या पल्लू... इतना अंतर तो होगा ना मुझमें और उनमें...?" आज पहली बार अधूरी बहू का कंठ अम्मा जी के सामने खुल गया था।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 2, 2015

बाबू बनल रहें

दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में 'बाबू बनल रहें'

सात बहनों के बीच उनके इकलौते भाई थे-बाबू। बहुत देवता-पित्तर को पूजा चढ़ाने और देवकुर लीपने के बाद कोंख में आये थे बाबू। पंडी जी ने तो जन्म मुहूर्त के अनुसार दूसरा नाम रखा था लेकिन पूरा परिवार प्यार से उन्हें ‘बाबू’ ही कहता था। सभी बहनें उनसे अत्यधिक प्यार करती थीं। राखी के पर्व पर उनकी पूरी कलाई रंग-बिरंगी राखियों से भरी रहती थी। चार-पांच साल की उम्र में ही वो अपने दो-तीन भांजो के मामा बन चुके थे। उनकी बहनों द्वारा बाबू की देख-भाल और सेवा-सुश्रुषा देखकर मुझे कुढ़न होती थी। ‘बाबू’ की पसन्द-नापसंद का ख्याल रखना उनकी बहनों की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया था। 'छोटिया' और 'बचिया' उम्र में बाबू से कुछ ही बड़ी थीं। छोटी करीब तीन साल और बचिया सिर्फ डेढ़ साल बड़ी रही होगी। वे दोनों चौबीस घण्टे परछाई की तरह बाबू के पीछे लगी रहतीं। सबसे बड़ी तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। दो बहनें घर के चूल्हा-चौका झाड़ू पोछा बर्तन आदि कामों में लगी रहती थी।
माता जी का बच्चे पैदा कर लेने के बाद एकसूत्री कार्यक्रम अपने पति के पास बैठकर ठकुरसुहाती गाना था। वे 'मालिक' की सेवा-टहल के लिये अपनी लड़कियों का नाम लेकर हमेशा हांकते-पुकारते रहने में ही थक जाती थीं। संवेदना विहीन, भावशून्य, निष्क्रिय चेहरा उनकी पहचान थी। उनके लिए शीत वसंत में कोई फर्क नहीं था। मैंने उन्हें कभी हँसते हुये नहीं देखा। न कभी आँखे ही नम हुई। सुना था कभी-कभार बाबू की हरकतें उन्हें मुस्कराने पर मजबूर कर देती थीं।
बाबू को छोड़कर बाकी बेटियाँ अपने पिता को बाऊजी पुकारती थी; लेकिन बाबू उन्हें पापा कहा करते थे।

पापा कहीं बाहर से लौटते तो छोटिया और बचिया बाबू की पूरी दिनचर्या उनसे हंस-खिलखिला कर बताना शुरू कर देतीं - बाबू ने क्या खाया; क्या पिया; क्या पढ़े; आज कहाँ-कहाँ घूमने गए; उनके पैरों में चप्पल किसने पहनाया; उनकी किन-किन बच्चों से लड़ाई हुई; किस-किसको इन दोनों ने बाबू के लिए मारा; किसके-किसके घर शिकायतें लेकर गयीं; और आज बाबू को दिन में क्या-क्या खाने का मन हुआ...? कभी समोसे-पकौड़ियां तो कभी जलेबियां ! यह सब सुनकर अधेड़ उम्र के पापा की आखों में चमक आ जाती।

चूँकि उनका घर बीच बाजार में ही  पड़ता था इसलिए बाबू की फरमाइश सुनते ही उनके खाने के लिए गर्मागरम समोसे, पकौड़ियाँ और जलेबी तुरन्त आ जाया करती थी।
बाबू के लिए पापा की आसक्ति देखते ही बनती थी। एक दिन गोधूलि बेला में बाबू ने कहा- "पापा, जब मैं सीढ़ी से चढ़कर छत पर आ रहा था तो मैंने अपने पैर के नीचे सांप देखा।” उस दिन उनके पापा की थूक गले में ही अटक गई। बदहवास से हो गये। पहले तो बाबू का पैर उलट-पुलट कर चारो तरफ  बारीकी से देखा कि कहीं साँप ने काटा तो नहीं है...! बाबू ने बताया भी था कि सांप ने काटा नहीं है, फिर भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था।
फिर पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। कड़कती आवाज में फट पड़े- “छोटिया... बचिया... आव इहाँ”। जैसे ही फरमान जारी हुआ दोनों जिन्न की तरह वहां तत्काल प्रकट हो गई लेकिन बाप का रौद्र रूप देखकर दोनो सहम गयीं। चेहरे का भाव बता रहा था कि जरूर बाबू के प्रति कोई चूक हो गयी है। संयोग से बाबू के पैर में चप्पल नहीं थी। बाऊजी ने उन दोनों की कड़ाई से क्लास लेनी शुरू की..."कहाँ थी तुम दोनों? बाबू के पैर में चप्पल नहीं है... सीढ़ी पर साँप था... कहीं काट लेता तो? जी भर डांट लेने के बाद बोले- जल्दी जाओ नीचे से 'हरिहर मरिचा' लेकर आओ...। मैं भी उनके पास खड़ी थी। यह सुनते ही झट से बोल पड़ी- पर चप्पल तो इन दोनों के पैर में भी नहीं है और नीचे जाने का रास्ता भी वही है। साँप ने इनको काट लिया तो? लेकिन उस समय मेरी कौन सुनता? सही बात तो ये है कि उन दोनों को मैंने पहले भी कभी चप्पल पहने हुए नहीं देखा था।

बाबू के लिए उनकी चिन्ता और बाबूजी के आदेश का प्रभाव ऐसा था कि वे उल्टे पाँव तेजी से नीचे की ओर सीढ़ियों पर दौड़ पड़ीं। कुछ उतनी ही तेजी से जितनी बाबू के लिए बाजार से कागज के ठोंगे में समोसे और पकौड़ियाँ लाने के लिए दौड़ती थीं। इस दौड़ में कभी-कभी तो उन्हें ठोकर खाकर जमींन पर मुँह के बल गिरते भी देखा था मैंने। कभी-कभी कागज के दोने में लाये जाते बाबू के मन पसन्द समोसे जलेबियाँ या पकौड़ियाँ इन बच्चियों को ठोकर लगने के कारण जमीन पर गिर जाते और उनपर धूल की परत चढ़ जाती। ऐसे में उनके पापा बाबू को वह खिलाने से सख्त मना कर देते थे। फिर डांट-फटकार लगाकर दुबारा उन्हें पैसे देकर सावधानी से लाने की हिदायत देते।तब यह डाँट उन लड़कियों को बुरी नहीं लगती क्यों कि उसके बाद उनकी जिह्‍वा को भी कुछ स्वाद मिल जाता। बाबू का सामान लाने के लिये कभी-कभी दोनों बहनें आपस में ही भिड़ जाया करती। यहाँ तक कि गिरी हुई पकौड़ियाँ कूड़े तक फेंकने के लिए भी उनके बीच मार-पीट हो जाती।

पंडित जी को किसी ने बता दिया कि रोहू का मूड़ा, अंडे की जर्दी और बकरे की कलेजी से शरीर में ताकत आती है और दिमाग बढ़ता है।फिर तो यह बाबू के लिए रोज का उठौना हो गया।

बाबू के बाबा अपने गाँव-जवार के नामी ज्योतिषी और कर्मकांडी पंडित थे।उनके घर की रसोई में बिसइना लाना वर्जित था। लेकिन बाबू के लिए इंतजाम हो गया। बाजार से एक आदमी कलेजी के चार-पाँच टुकड़े रोज घर दे जाया करता था। उसे घर की रसोई से दूर आँगन में भुना जाता था। यह काम छोटिया किया करती थी। कलेजी को खूब साफ धुलकर; नमक लगाकर छोटी स्टोव की आंच पर भुनती। यह बहुत कौशल का काम था। उसकी नन्हीं सी उँगलियाँ यह काम करते-करते बहुत अभ्यस्त हो गई थीं। फिर भी उसमें से एक-आध कलेजी कभी जल भी जाया करती थी।

बचिया वहीं खंभे से चिपककर खड़ी-खड़ी बाबू को भुनी हुई कलेजी खाते देख निहाल होती रहती। उसे अपलक निहारने के अलावा क्या करती भला! अच्छी भुनी हुई कलेजियां बाबू खा जाते और जली हुई छोड़ देते। यह बची हुई कलेजी इन दोनो बहनों के लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होती। किसी-किसी दिन बचिया कलेजी को खुद ही पकाने के लिये छोटी से लड़ जाया करती।

एक दिन आँगन में बहुत पानी बरस रहा था। ओसारे में खाट पर बाबूजी बैठे हुए थे। पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, बाबू को कलेजी खिलाने में अबेर हो रही थी इसलिए वे छोटिया से बोले- "यहीं स्टोव जला कर कलेजी भून दे।" छोटिया खाट के पास ही कलेजी भूनने के काम पर लग गई। वह बहुत सावधानी बरत रही थी फिर भी एक टुकड़ा कलेजी भभकते स्टोव की आंच पर लगकर काली हो गयी थी। बाबू ने उसे नहीं खाया। दूर से यह देखकर खुश हुई बचिया दौड़कर आयी लेकिन उससे पहले ही छोटी ने पूरा टुकड़ा अपने मुँह में डाल लिया। बचिया को उसकी यह अनदेखी देखी न गई और चिल्लाकर बाऊजी से बोल पड़ी-" बाऊजी, छोटिया जानिके करेजिआ जरा देहलस हे कि बाबू छोड़ि दीहें आ ऊ खाए के पा जाई!"
बाबूजी के गुस्से का पारा चढ़ गया। अपनी आँखे लाल किये चूल्हे के पास जलावन के लिए रखी आम की लकड़ी के ढेर से एक च‍इला उठाकर पिल पड़े। डर से थरथर काँपती छोटिया चिग्घाड़ मारकर बाबूजी के पैरों से लिपट गयी-   "बाबूजी... अबकी माफ क दीं... अब कब्बो नाही जराइब!"

Saturday, March 21, 2015

नकलची समाज के हाशिए पर लड़कियाँ-

ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के बारे में उनके अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक की यह सोच कि ज्यादा पढ़ा-लिखा कर इनसे भला कौन सी नौकरी करानी है, इनको और बेचारगी की तरफ ढकेलती है। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ने वाली बच्चियों के प्रति उनके घर, गाँव, समाज ही नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स का भी यही नजरिया देखकर निराशा होती है। उनकी नजर में पढ़ाई का उद्देश्य कमाई करना और कमाई के मायने सिर्फ 'अर्थ' यानी रूपया-पैसा कमाने से ही है जो सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। लड़कियों के हिस्से में तो सिर्फ घर में रहकर चूल्हा-चौका सम्हालना और बच्चे पैदा करके उन्हें पालना ही होता है।

यही वजह है कि परीक्षा के दौरान गुरुजनों की दृष्टि उन बच्चियों के ऊपर और उदार हो जाती है। आज-कल बिहार और यूपी में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल महायज्ञ जोरों पर है। वैसे तो इस बार फ्री फॉर आल का नज़ारा है लेकिन लड़कियों को विशेष सुविधा एक परम्परा बन चुकी है। परीक्षा-केंद्र पर गुरुजन उन्हें नकल करने-कराने की सामग्री सहित हर तरह की सुविधाओं की पूरी छूट मुहैया करा डालते हैं। इस नकल से प्राप्त डिग्री और उससे प्राप्त कन्या विद्याधन का लाभ उनके आगे की पढ़ाई में मिले या न मिले, इससे न तो उन बच्चियों के अभिभावक का कोई सरोकार होता और न ही उस स्कूल के टीचर्स का। वहाँ से उनको शिक्षा-दीक्षा में अपने अधिकारों और हितों के प्रति जाहिली और अनभिज्ञता के सिवा कुछ भी नहीं मिला होता।

ऐसे में उन बच्चियों को अगर नक़ल न कराया जाय तो बोर्ड परीक्षा में सफल बिद्यार्थियों का प्रतिशत बिगड़ने से 'स्कूल की इज्जत' मटिया-मेट होने का भय रहता है। बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए उसके प्रबंधकों को नक़ल की सुविधा उपलब्ध कराने के सभी उपाय कराने पड़ते हैं। वहाँ स्कूल की इज्जत का विकट सवाल खड़ा हो जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं जिनको अपने स्कूल का मुँह भी परीक्षा के दौरान पहली बार दिखाया जाता है। स्कूल की चारदीवारी का कोना-कोना उनसे इस कदर अपरिचित होता है कि वे अकेले अपने क्लास-रूम तक जाने में असमर्थ रहती हैं। उनकी शकल-सूरत भी दया की पात्र दिखाई देती है। पर दस-पन्द्रह दिन की जद्दोजहद से मिली मार्कशीट के आधार पर सरकारी कृपा वाली कन्या विद्याधन योजना उनके जीवन में थोड़ा सा 'अर्थ' तो जरूर प्रदान करती है। ऐसा तात्कालिक लाभ उनके परिवार वालों को उनकी वैवाहिक योजनाओं को सफल बनाने में जरूर मदद करता है। परन्तु इस तरह की शिक्षा-दीक्षा से यह जरुरी नहीं है कि वैवाहिक योजानाओं की सफलता की तरह उनकी भावी जिंदगी को भी कोई सम्मानजनक अर्थ मिल सके।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, February 26, 2015

अपनी जमीन की बात ही कुछ और है...!

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार को और शक्तिसंपन्न बनाने के लिए एक विधेयक संसद में आ गया है। इसके विरोध में आंदोलन भी शुरू हो गया है। यह ठीक है कि विकास के लिए उद्योग लगाने जरूरी हैं जो मजदूरों और कामगारों को रोजगार देंगे। लेकिन मुझे डर है कि जब किसानों के पास अपनी जमीन नहीं रहेगी तो ये प्राइवेट फैक्ट्रियां उन्हें घर बिठाकर पगार नहीं देगी। अगर रोजगार देगी तो उनकी छुट्टियों पर वेतन भी काटेंगी। उनके बीमार पड़ जाने पर उन्हें घर बिठाकर मुफ्त की चिकित्सा मुहैया नहीं करायेगी। इस तरह अगर किसानों की अपने जमीन पर अगर उनका अपना अधिकार नहीं रहा तो वे उद्यमियों के गुलाम बन कर रह जायेंगे। मेरा यह डर काल्पनिक नहीं है, बल्कि अपनी आँखों से देखा हुआ कड़वा यथार्थ है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले का मुख्य शहर है पडरौना। इस शहर में वर्षो पुरानी एक चीनी मिल हुआ करती थी जो पन्द्रह-बीस साल से बंद पड़ी है। इस फैक्ट्री के बन्द होने से छोटे किसानों और मजदूरों से लेकर बड़े-बड़े जमींदारों की आर्थिक स्थिति डगमगा गयी है। वहाँ के किसानों की जमीन पर आज भी गन्ने की पैदावार होती है और उस गन्ने की कीमत भी मिलती है। वे दूर के शहर तक ढुलाई का दोगुना खर्च उठाकर दूसरी चीनी मिल पर अपना गन्ना ले जाते हैं और देर-सवेर उसकी कीमत पा ही जाते है। वे अपने घर बाल- बच्चों के पास रहते हुए मेहनत की रोटियां जरूर खाते हैं पर वे रोज रात को चैन की नींद सोते हैं। उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर उठानी पड़ती है मगर वे इस बात से निश्चिन्त है कि उनकी जमीन उनके पास है जिसपर उनका अपना अधिकार है।

लेकिन जरा उन मजदूरों से पूछिये जिनके पास अपनी जमीनें नही हैं; जो उसी  फैक्ट्री में काम करते थे; जिनके परिवार का पेट उस फैक्ट्री में ही मेहनत-मजदूरी करने की बदौलत भरता था, वे आज किस दशा में होंगे...? जबतक फैक्ट्री चली उसमें काम करने वाले मजदूर बहुत मजे में रहे पर फैक्ट्री बन्द होने के कुछ दिनों बाद ही उनके घर में खाने के लाले पड़ने लगे। बहुतों की तो खटिया खड़ी हो गई। आज भी उनमें से कुछ फैक्ट्री को दुबारा चलवाने के लिये नेताओं का घेराव करते हैं, चक्का जाम करवाते हैं और भूख हड़ताल करते हैं। उस समय से अबतक फैक्ट्री चलवा देने के दावे के साथ कई सरकारें आयीं और चली गयीं; पर उस बन्द पड़ी चीनी मिल के अलग-अलग हिस्सों में जंग लगती गयी और कारखाना बन्द का बन्द ही पड़ा रहा। जो मजदूर इसकी देख-रेख और मरम्मत में लगे रहते थे आज वही इसके कल-पुर्जों को चोरी-चोरी कबाड़ में बेचना शुरू कर दिये हैं ताकि वे अपने परिवार के पेट की आग एक वक्त को ही सही, बुझा सके। पर वे कबतक ऐसा कर सकेंगे..?

इस जिले से एक से बढ़कर एक दिग्गज नेताओं का ताल्लुक भी रहा। जिसमें से एक जाना-माना नाम आर पी एन सिंह का भी है जो यहीं से सांसद रहे हैं और पिछली यूपीए सरकार में गृह, भूतल-परिवहन और पेट्रोलियम विभाग में राज्य-मंत्री भी रह चुके हैं। वे सोनिया और राहुल गांधी के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। पडरौना चीनी मिल की चारदिवारी से लगे हुए इनके राजमहल से ही इनकी राजनीति दिन-दूनी, रात-चौगुनी चमकती रही है। उधर गन्ना-किसान और मिल-मजदूर आंदोलित होते रहे हैं- कभी अपने खेतो में खड़े गन्ने को आग लगा कर तो कभी शहर चक्का जाम कर। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। बेचारे मजदूर जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी वे दूसरे शहर की ओर पलायन कर गये। कुछ ने अपनी बीबी-बच्चों को बेसहारा छोड़कर सन्यास धारण कर लिया तो कुछ ने बेरोजगारी से आहत होकर आत्महत्या कर ली। काश, आज उनके पास भी जमीन होती तो शायद वे ऐसा करने पर मजबूर नहीं होते।

(रचना त्रिपाठी) 

 

Monday, January 26, 2015

अद्भुत ज्ञानी सन्त

हाल ही में हमारे देश के कुछ संतों को यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए हमें दस-दस बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हों ने इस ज्ञान को अपने प्रवचन में मिलाकर भक्तों के हवाले कर दिया। यह सुनकर पहले तो मैं हतप्रभ रह गयी कि कैसे संभव होगा इस सदुपदेश का अनुपालन करना। अब तो बहुत देर हो गयी, लेकिन यह देखकर मन को समझा लिया कि ज्यादातर लोग हमारी तरह ही मजबूर होंगे। लेकिन यह धरती वीरों से खाली भी नहीं है।

एक परिवार जिसे मैं वर्षों से देखती-सुनती आ रही हूँ, लगता है उसने हमारे देश के वर्तमान संतो की बातों पर अमल करने की ठान ली है। उस घर के मुखिया को अपने परिवार का पेट भरने को दो वक्त की रोटी के लिए हाड़- तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। घर के उस एकमात्र कमाऊ सदस्य ने एक दिन एक्सिडेंट के दौरान अपना शारीरिक स्वास्थ्य भी गवां दिया। लेकिन इस महावीर ने सात बच्चों को पैदा करने के बाद डॉक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में आठवें का भी नम्बर लगा लिया है। ऐसे में खेद है कि अब वो इन सन्तों की इच्छा के आंकड़े को पूरा करने में दो की संख्या से और पीछे रह गया है।

जो असाधारण मनुष्य अपनी आठ सन्तानें भेंट स्वरूप इस राष्ट्र को प्रदान कर चुका है अगर उसे इस बीच कुछ हो जाता है तो वह इस राष्ट्र की एकता और अखण्डता बनाये रखने के लिए दो रत्नों को और पैदा करने से चूक जाएगा। मेरी चिंता का विषय यही है। ऐसे में उन सन्तों की ही तरह इस देश की खातिर आपका भी कुछ फर्ज बनता है! उन सन्तों से आप यह निवेदन करें कि किसी भी हाल में उस इंसान को जिन्दा रखने के लिए अगर कोई जड़ी-बूटी हो तो उसे पिलाकर उसकी प्राण रक्षा  करें;  नहीं तो जो अभी पैदा नहीं हो सके उन दोनों रत्नों के अभाव में इस देश का क्या होगा। संतो के कहे अनुसार उनकी इस देश को बहुत जरुरत है।

जो इस देश की मिट्टी पर खड़े हो चुके हैं उन सातों औलादों की चिंता आप छोड़ ही दे। वे बड़े 'होनहार' हैं। कम उम्र में ही वे पड़ोसियों के घर में हाथ साफ करके अपनी व्यवस्था बखूबी कर लेते हैं। आंठवा भी गर्भ में पड़े-पड़े ही माँ की हाड़-मांस में बची-खुची आयरन-कैल्शियम और विटामिन्स को चूस कर जिन्दा बाहर आने के लिए इस चक्रव्यूह को पार  कर ही जाएगा। ...और उस औरत का क्या? गजब की ताकत बख्शी है ईश्वर ने उसको। आठवाँ बच्चा पेट में है और पहली बेटी ससुराल जाकर माँ बन चुकी है फिर भी उसके शरीर ने जवाब नहीं दिया है। अपाहिज हो चुके पति की दुर्दशा से भी कोई शिकन नहीं है चेहरे पर। गाँव भर के लोग दीदे फाड़े देखते है उस उर्वर 'शरीर' को। गजब की है जिजीविषा। कुछ न कुछ पा ही जाती है अपने और बच्चों के पेट के वास्ते।

तो हे सन्त जन, आप इन बच्चों की चिंता ना ही करें। जिस भगवान ने इनके शरीर में मुंह दिया है वही इनके मुंह में भोजन भी दे देगा। आखिर आप लोग भी तो इस देश का दिया तरमाल उड़ा ही रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा का प्रमाण आपका यह अद्‍भुत बयान दे ही रहा है। ये बच्चे भी ऐसा ही दिव्य ज्ञान अर्जित कर लेंगे। आप तो बस इन बच्चों की संख्या में बढ़ोत्तरी में कहीं कोई व्यवधान ना खड़ा हो जाय उसका उपाय जरूर कर लें। आखिर 'पड़ोसी' के घर में हाथ साफ करने का इनका अनुभव भी तो हमारे देश के लिए बहुत कारगर साबित होना है। आपके मतानुसार यही आंकड़े ही तो देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाले हैं

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 7, 2015

लोकल बनाम नेशनल देवी...

हमारे गाँव में किसी भी यज्ञ-प्रयोजन के सकुशल सम्पन्न हो जाने के बाद घर के सामने वाले बाग में स्थापित काली माँ के मंदिर में ‘कड़ाही चढ़ाने’ की परम्परा है। जहाँ पूजा-पाठ के बाद कच्ची मिट्टी के चूल्हे या मिट्टी के तेल से जलने वाले स्टोव पर गरमा-गर्म हलवा और पूड़ी - चाहे वह शुद्ध देशी घी का हो या कच्ची घानी सरसो के तेल में बना हो - उसे मंदिर परिसर में ताजा बनाकर ही देवी माँ का भोग लगाया जाता है।

यथा शक्ति तथा भक्ति की परिपाटी में देवी माँ को बस साफ-सुथरा “अपनी आँखों के सामने” बना प्रसाद ग्रहण करना पसन्द है। यहाँ घर से बनाकर लाने या बाजार से खरीदकर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा नहीं है। उस मन्दिर के सामने कोई ऐसी दुकान नहीं है जिसपर रेडीमेड प्रसाद मिलता हो। गाँव-गाँव में स्थापित कोट माई, बरम बाबा, काली माई, डीह बाबा, इत्यादि नामों से प्रचलित देवी-देवताओं के असंख्य स्थानों पर यही होता है। नहा धोकर जाइए, अपनी श्रद्धा के अनुसार शीश नवाइए, कपूर-अगरबत्ती जलाइए या कड़ाही चढ़ाइए। कोई दक्षिणा नहीं देना पड़ता, न दानपात्र रखा होता है और न यहाँ किसी की पंडागीरी चलती है।

महालक्षमी मंदिर

महालक्षमी मंदिर

इस पूजा-विधि में प्रसाद बनाते वक्त साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। चाहे वह बर्तन की शुद्धता और सफाई हो या उस प्रसाद को बनाने वाले के लिए स्नान करके साफ धुले कपड़े पहनने की आनिवार्यता हो या फिर उस स्थान की लिपाई-पुताई करके स्वच्छ रखने की जहाँ चूल्हा जलाया जाता है। बिना स्नान किये और धुला-धुलाया वस्त्र पहने कड़ाही चढ़ाने पर निषेध है। ऐसा माना जाता है कि इस विधि में थोड़ी सी भी चूक देवी माँ को मंजूर नहीं है। वह शीघ्र ही कुपित हो जाती हैं और लापरवाही बरतने वाले के ऊपर ही सवार (प्रकट) हो जाती हैं। इस भय से लोग साफ-सुथरा प्रसाद बनाने में विशेष सावधानी बरतते हैं। बिहार की प्रसिद्ध छठ पूजा में तो शुद्धता की जबरदस्त संहिता का पालन होता है।

बच्चों को उस प्रसाद से थोड़ा दूर ही रखा जाता है कि कहीं वे उसे देवी माँ को अर्पित करने से पहले जूठा ना कर दें। जूठा मतलब देवी माँ को हलवा पूरी चढ़ाने (भोग लगाने) से पहले बच्चों द्वारा चख लिया जाना जूठा हुआ मान लिया जाता है। वैसे ही जैसे गाँव में सासू जी के भोजन करने से पहले अगर बहू ने खा लिया तो उस भोजन को सखरी यानी जूठा मान लिया जाता है। आज भी गाँव के देवी-देवता के वहां इसी विधि से प्रसाद बनाकर चढ़ाया जाता है। जिसे बहुत मन हुआ उसने प्रसाद के साथ एक-दो सिक्के चढ़ा दिए नहीं तो वे फूल-अक्षत, धार-कपूर आदि चढ़ा देने से ही प्रसन्न हो जाती हैं।

इसके विपरीत बड़े सिद्ध स्थलों पर जहाँ दूर-दूर से भक्तगण दर्शन के लिए आते हैं वहाँ इसी देवी माँ के दर्शन के लिए पंडा जी लोग तो रेडीमेड महंगे प्रसाद और कीमती चढ़ावे लेकर आने वाले भक्तों पर ही इनकी कृपा बरसने देते हैं। यानी वहां देवी माँ की उतनी नहीं चलती जितना कि उनके पहरू बने पण्डा महराज की चलती है। भले से वह प्रसाद बासी ही क्यों ना हो। व्यावसायिक स्तर पर वह कहाँ और कैसे बना इससे उनका कोई सरोकार नहीं होता। उसकी शुद्धता के बारे में भक्तगण भी शायद ही सोचते हों। मंदिरों के बाहर सजी प्रसाद की प्रायः सभी दुकानें भक्त गणों के जूते चप्पल रखवाने की सुविधा भी देती हैं, यानि देश भर के जूते चप्पल उस प्रसाद के बगल में ही रखे जाते हैं। मंदिर प्रबन्धन द्वारा जूता-चप्पल रखवाने की जो व्यवस्था की जाती है उसका प्रयोग करने के बजाय भक्तगण प्रसाद की दुकान में ही उसे रखना श्रेयस्कर समझते हैं।

मंदिर के भीतर भक्त महोदय पूर्ण स्नान करके आये है या नहीं यह कम महत्वपूर्ण है लेकिन उनके हाथ का चढ़ावा कितना दमदार है उसी से उनकी गरिमा का आकलन पंडा जी करते हैं। बड़े-बड़े मन्दिरों के आस-पास की दुकानों में मॉल की तरह सजा हुआ प्रसाद भी शायद ब्रांडेड हो जिसपर देवी माँ आँखमूंद कर विश्वास कर लेती हों। तभी तो भक्तगण को उनके कुपित हो जाने का कोई भय नहीं होता। मुझे तो यही माजरा समझ में आता है। नहीं तो फिर हमारे गाँव की देवी माँ शायद कम पढ़ी-लिखी पुराने खयालों की दकियानूस टाइप हों उन सासू माँ जैसी जिनका गुस्सा उनकी नाक पर ही होता है।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, November 28, 2014

ज्योतिष पर बहस के साइड-इफेक्ट्स

आजकल मैं बड़ी दुविधा में हूँ। जबसे स्मृति ईरानी ने एक ज्योतिषी से अपना हाथ दिखा लिया है, बल्कि जबसे उनके द्वारा ज्योतिषी से हाथ दिखाने का प्रचार इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ने कर दिया है तबसे तमाम प्रगतिशील और वैज्ञानिक टाइप लोग इसपर तमाम लानत-मलानत करने पर उतर आये हैं। रोज-ब-रोज देश की छवि मटियामेट हो जाने से चिन्तित लोगों को देखकर मेरा मन भी धुकधुका रहा है। इस बहस में कहाँ रखूँ अपने आप को? हमने जन्तु विज्ञान में परास्नातक किया है। मतलब हाईस्कूल, इंटर, बी.एस-सी. और एम.एस.सी. सबकुछ `साइंस-साइड' से। लेकिन मेरी सभी परीक्षाओं का फार्म भरवाने से पहले अपने खानदानी पंडितजी जो ज्योतिष के प्रकांड विद्वान माने जाते हैं उनसे पापा ने शुभ-मुहूर्त जरूर दिखवाया है। यह बात भी सत्य है कि हम बिना फेल हुए हर साल अच्छे नंबर से पास भी होते रहे हैं। ऐसे में क्या आप एक विज्ञान के विद्यार्थी से यह उम्मीद करते हैं कि वह इतना अंधविश्वासी होगा…?

जन्म से लेकर आजतक हमारा कोई महत्वपूर्ण कार्य पंडितजी की राय या अनुपस्थिति में नहीं हुआ है। हम तो यही देखते आये हैं कि घर में कोई शुभ-कार्य करना है, यहाँ तक कि कहीं दूर की यात्रा पर भी जाना है तो बिना पंडितजी से शुभमुहूर्त दिखाये नहीं जाते है। शिक्षा- दीक्षा रही हो या विवाह का योग; दूल्हे की दिशा-दशा का अनुमान लगाना हो या शारीरिक सौष्ठव जानना हो; वह नौकरी-शुदाहोगा, बेरोजगार होगा या किसी व्यावसायिक या उद्योगपति घराने से संबन्धित होगा; यह सब ज्योतिषी जी से ही पूछा जाता था। मेरा दाम्पत्य-सुख निम्न, मध्यम या उत्तम कोटि का होगा; इन सब बातों की जानकारी के लिए हम ज्योतिष का ही सहारा लेते रहे।

विवाह हुआ नहीं कि घरवाले संतान-योग की जानकारी के लिए और होने वाली संतान सर्वगुण-संपन्न और योग्य ही हो इसके लिए ‘पंडीजी’ के बताये अनुसार अनुष्ठान, स्नान–दान, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन आदि हम बिना विज्ञान-गणित लगाये निरंन्तर करते रहे हैं। सच पूछिये तो हमें अपना वर्तमान और भूत-भविष्य जानने की उत्कंठा आजतक रहती है। मैं यह सब करते-धरते बेटी से बहू भी बन गई लेकिन अपना भी कोई चान्स राजनिति में है कि नहीं यह जानने की ललक आज भी है। घर पर आने-जाने वाला कोई व्यक्ति जो यह बता दे कि उसे ज्योतिष की कुछ भी जानकारी है तो उसे पानी पिलाने से पहले अपनी हथेली दिखाने बैठ जाती हूँ। कई बार तो अपनी इस हरकत के लिए डाँट भी खा चुकी हूँ। मगर क्या करूँ मन के आगे मजबूर हूँ। यह मन बहुत महत्वाकांक्षी होता है जो उसे कभी- कभी अंधविश्वासी होने पर भी मजबूर कर देता है। इस अंधविश्वास में कालांतर सुख हो ना हो मगर तात्कालिक आनंद बहुत होता है। कभी मौका मिले तो आजमाकर देखिए।

हमारे ज्योतिषी के कहे अनुसार तो अबतक की प्रायः सभी भविष्यवाणी सही साबित हुई है। ज्योतिषशास्त्र द्वारा जो चाँद और सूरज की चाल की गणना करके ग्रहण आदि का समय बताया जाता है वह भी बिल्कुल सटीक बैठता है। जब हमने कंप्यूटर का नाम भी नहीं सुना था तब भी ग्रहण लगने पर कब नहाना है और कब दान-पुन्न करना है यह पंचांग देखकर पापा बता देते थे; और हम लोग मनाही के बावजूद छत पर जाकर राहु-केतु के मुंह में समाते और निकलते चाँद मामा और सूरज देवता को देख भी लेते थे। सदियों से चली आ रही हमारी परम्पराएं भी तो जन्म से लेकर शादी-ब्याह और मृत्युपर्यन्त कर्मकांड तक बिना पंचांग देखे पूरी नहीं होती है। इसके बिना मन को संतोष और हृदय को आश्वस्ति कहाँ मिलती है?

अब हम तो आजतक यही जानते है कि पंडितजी ने बताया है कि विवाह से पूर्व “हल्दी” का लेप लगाने की रस्म है, तो  है। हमें हर हाल में यह रस्म अदा करनी है। नहीं किया तो अशुभ हो जायेगा। इस प्रक्रिया में कितना विज्ञान है, कितना ज्योतिष है और कितनी चिकित्सा यह कभी नहीं सोचा। उस समय हम तो शुभ-अशुभ मानते हैं। विज्ञान तो यही कहता है कि किसी तरह की बीमारी या साइड इफेक्ट से बचने के लिए हल्दी का प्रयोग अनिवार्य है। क्योंकि हल्दी बेस्ट एन्टीसेप्टिक होता है। विज्ञान को समझने में हमें थोड़ी देर लगेगी लेकिन पंडितजी की बात हम तत्काल समझ जाते हैं। इसका कारण यह है कि  हमारे तो छठी के दूध में ही ज्योतिष शास्त्र मिला हुआ है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, October 1, 2014

भारत में सफाई- बड़ी मुश्किल है भाई

आज कल जिस तरह सफाई अभियान का जोश सरकार से लेकर सरकारी महकमें तक दिख रहा है। ऐसा लग रहा है कि सच में गांधी जी का सपना साकार होने जा रहा है। शरीर, मन और मस्तिष्क तीनों के विकास के लिए देश से कूड़ा- कचरा और गंदगी का उन्मूलन होना बहुत जरूरी है। जब तक इस देश का प्रत्येक नागरिक शरीर से स्वस्थ, मन से मजबूत और दिमाग से दुरुस्त नहीं होगा तब तक इस अभियान का उद्देश्य पूरा नहीं हो पायेगा। यह जिम्मेदारी सिर्फ ‘मोदी’ की नहीं है।

हमारे यहां एक कहावत कही जाती है- “कौन अभागा जे के राम न भावें” मतलब ये कि शायद ही कोई ऐसा हो जिसे ईश्वर को पाने की चाह न हो। ठीक वैसे ही साफ-सफाई को लेकर प्रत्येक नागरिक के मन में यही चाह होती है कि हमारा घर और आस-पास का वातावरण हमेशा स्वच्छ बना रहे। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए हमारी चाहत ही काफी नहीं है बल्कि सबका दायित्व भी है कि वे इसके लिए पूरे मनोयोग से यह संकल्प लें कि अपने घर के साथ- साथ अपने आस-पड़ोस, गली मुहल्ला, चौराहा, नदी-नाले से लेकर गंगा की सफाई तक का ध्यान रखना है। लेकिन यह कार्य भी उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को पाना।

जिस प्रकार ईश्वर को पाने की चाह में हम अपनी भक्ति के साथ अपनी पूरी शक्ति भी लगा डालते है ठीक उसी प्रकार अगर एक मजबूत, स्वच्छ और सुंदर भारत के निर्माण के लिए इस देश के प्रत्येक नागरिक को अपना श्रम, साधन और शक्ति का योगदान करना होगा। लेकिन यह भारत है। यहां मामला थोड़ा उल्टा पड़ जाता है।

सबको सिर्फ अपने की पड़ी रहती है। लोग अपना घर तो साफ-सुथरा रखना चाहते हैं। लेकिन अपने घर की गंदगी निकालकर पड़ोस में फेंक कर पड़ोसी धर्म निभाने का स्वांग भी रचते हैं। हद तो तब हो जाती है जब अपने घर से मुंह में पान की पीक दबाये बाहर निकलते ही पड़ोसी की दीवाल पर थूक मारते हैं। घर से निकलते ही जहां-तहां खड़े होकर पैंट की जिप खोलकर ‘पेशाब’ कर निकल लेते हैं। बिना इसकी परवाह किए कि मेरे सामने से गुजरने वाले हर एक व्यक्ति खासतौर पर स्त्रियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

ये वही लोग हैं जो अपने घर में अपनी मां-बेटी और बड़े बुजुर्गों के सामने सभ्यता की चादर ताने सभ्य होने का दिखावा करते हैं; जिन्हें सिर्फ अपने घर को साफ रखने की चिंता सताती है। अगर प्रत्येक व्यक्ति यही सोच रखने लगे तो सोचिए देश की हालत क्या होगी..? जिसका अंजाम इन्हें भी भुगतना पड़ेगा; और भुगतना पड़ता भी है। लेकिन फिर भी कोई बदलाव नहीं आता। मुझे आशंका है कि मोदी के माह अभियान के बाद भी हमें यह न कहना पड़े कि- वही ढाक के तीन पात।

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, July 15, 2014

उत्पीड़न का विरोध जरूरी है

एक साधारण परिवार में पैदा हुई, पली-बढ़ी, मात्र स्नातक की डिग्री प्राप्त तारा के अंदर अपने परिवार के विरुद्ध इतना बड़ा फैसला लेने की हिम्मत कहां से आयी...? पूरे गांव में चर्चा का विषय ही यही था–“तारा आज कितने बजे सो कर उठी; कहां गई; क्या खाया, क्या किया? ” उसकी माँ के ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। शादी को एक साल हो गए है। वह ससुराल में कुल आठ-दस दिन रहने के बाद अपने भाई को बुलाकर उसके साथ मायके वापस लौट आयी थी। उसके घरवालों से लेकर सगे संबंधियों को भी उसका इस तरह बिना शुभ मुहूर्त के ससुराल से लौट आना बहुत ही बेतुका और चिंताजनक लगने लगा था। गाँव वाले तरह-तरह की बाते करने लगे थे।

उसकी माँ तो उस दिन से लेकर आजतक उसे बिना नागा, कोसा करती - “चोटही! जाने कौन-कौन से दिन दिखाएगी मुझे! किस राजवाड़े के घर जाती, जहां तुझे सात बजे तक सोने को मिलता, ससुराल और नईहर में यही तो अंतर है !”

वह अपनी माँ को टन्न से जवाब देती- “तो तू ही चली जा मेरी जगह, लगी रहना नौकरानी की तरह सुबह चार बजे से लेकर रात को बारह बजे तक।

“जीवन भर यहीं पड़ेगी रहेगी, हमारी छाती पर मूंग दलने के लिए हरामजादी !!! जो जानती कि मुझे यह दिन दिखाएगी, तो पैदा होते ही गला घोंट देती।”

“तो अब से घोंट दे…! नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी! और कान खोलकर सुन लें जबतक “छोटकी” रहेगी तबतक तो किसी कीमत पर नहीं जाउँगी!”

छोटकी - उसके पति की छोटी बहन जो उसे सुबह जगाने से लेकर उठना, बैठना, चलना, घूंघट करना आदि तमाम बातों के लिए पल-पल टोकती और सिखाती रहती थी।

तारा को अपनी छोटी ननद के द्वारा अपने ऊपर किये जा रहे अनुशासन बिल्कुल पसंद नहीं थे। उसकी ननद सुबह चार बजे ही दरवाजा खटखटाकर उसे जगा देती और खुद तनकर सो जाती। तारा का कहना था कि-“ मेरी आदत नहीं है कि देर रात तक जगूं भी और सुबह जल्दी उठ जाऊँ। ...मुझपर इस तरह की हु्कूमत नहीं चलेगी उसकी। छोटी है छोटी की तरह रहे।”

उसके श्वसुर इस बीच कई बार आए और उसे बहुत समझाने की कोशिश की- “लौट चलो!” यहां तक कि उसे तलाक की धमकी भी मिली । लेकिन उसने किसी की एक न सुनी और अपनी जिद्द पर अड़ी रही। आज अपनी शर्तों पर ससुराल जाने के लिए तैयार हो गई। उसने अपने श्वसुर से कह दिया- “आप अपनी छोटी बेटी को यह समझाएं कि वह हमें सुबह जगने का आदेश न दिया करें..या पहले उनकी शादी करके उन्हें ससुराल भेज दें, उसके बाद मुझे बुलाए।” अंततः उन्होंने उसकी शर्त मंजूर कर ली और बोले- “ बेटी की शादी इतनी जल्दी तो नहीं कर पाउँगा; लेकिन तुम्हें जैसे अच्छा लगे वैसे रहना। मै छुटकी को समझाउँगा कि वह तुमपर शासन न चलाया करे।”

उस लड़की का आत्मविश्वास देखकर मै बहुत खुश हूं और आश्चर्यचकित भी। परिवर्तन के इस दौर को देखकर गाँव वालों को भी खुश होना चाहिए; लेकिन वे तो उल्टा उसे ‘कोसे’ जा रहे हैं- “बड़ी नकचढ़ी है ! आखिर अपनी वाली ही करके मानी।”

(रचना त्रिपाठी)                             

Saturday, July 12, 2014

गरीबों के अच्छे दिन

इस बार के बजट में सरकार द्वारा गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखाये गये रहमों-करम को देखकर यह कहा जा सकता है कि गरीब मजदूर, ठेले-खोमचे वाले, रिक्शा चालक, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के भी अच्छे दिन आ गए हैं। इन्हें टैक्स-वैक्स से तो कोई वास्ता है नहीं। वरना यह बीमारी इन गरीबों के लिए लाइलाज ही साबित होती। इसके बावजूद कुछ लोगों का कहना है- ‘बेचारे इनके तो अच्छे दिन अभी गच्चे में हैं !’ ये क्या जाने अर्थ व्यवस्था का विकास…? इन्हें तो पता है बस वही ‘माटी –कानों और रोटी-पानी !’

गरीबी तो खुद ही एक बीमारी है लेकिन सरकार ने सोचा कि इस बीमारी का एक बड़ा कारण है नशा ! जैसा कि कई बार सर्वेक्षणों में भी देखा गया है- गुटका, खैनी, तंबाकू इत्यादि का सेवन गरीब तबके के लोग ज्यादा करते हैं। कारण जो भी हो, मुझे तो लगता है ये वर्ग अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह से न कर पाने की वजह से इन नशीले पदार्थों का सेवन मजबूरी में करते हैं। अज्ञानता वश कहें या अपना ग़म गलत करने के लिए। यह भी सुना है कि इन पदार्थों का सेवन करने के बाद भूख कम हो जाती है। लेकिन इससे ये भयंकर बीमारी की चपेट में भी आ जाते हैं। अच्छा हुआ जो ये नशीले पदार्थ महंगे हो गए। पेट के वास्ते कुछ तो संयम इन्हें भी बरतना ही पड़ेगा। भले ही नशे की महंगाई की वजह से मजबूरी वश ही सही!

इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने जो कदम उठाएं हैं उसे अच्छा ही कहेंगे। ऐसे लोग जूते-चप्पल पहने ना पहने क्या फर्क पड़ता है इन पर। मगर अपने ‘पेट’ को कहां रखे बेचारे! जहां जाते है वहीं गले पड़ा रहता है। अगर पेट में कुछ नहीं गया तो इनका और इनके बच्चों का क्या होगा…? फिर तो ये कुपोषण के शिकार हो जाएंगे, ऐसे में इस सरकार का इनकी स्वास्थ्य की ‘चिंता’ करना बहुत बड़ी बात है। इस पर भी अगर लोग कहें कि इन बेचारों के अच्छे दिन तो अभी पिच्छे ही हैं तो यह सरकार के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी…

गरीब वर्ग जो दो वक्त की रोटी-प्याज का जुगाड़ न कर पाए तो उसे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में मिलने वाली ‘मल्टी-विटामिन्स’ की गोलियाँ किस दिन काम आएंगी? आखिर इसी दिन के लिए तो ये सुविधाएं उपलब्ध करायी गई हैं। जितना दिन मेहनत-मजदूरी करके मिले, रोटी-प्याज खाएं… न मिले तो सरकार द्वारा उपलब्ध मल्टी-विटामिन्स का सेवन करें…भूख से पेट में मरोड़ होने लगे, सिर चकराने लगे या गला सूखने जैसा कुछ लक्षण दिखने लगे तो सरकारी अस्पताल में उपलब्ध मुफ्त के बिस्तर पर लेट जाएँ और “बोतल” चढ़वाएं। बोतल यानि  “ग्लूकोज़ ड्रिप”। इससे भी बात न बने तो तेल और माचिस भी तो सस्ते हो गये…! “ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी”

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, April 13, 2014

पीढ़ी- भेद समझना होगा…!

गाँव के बड़कवा शुक्ला जी की सोच हमेशा उनके अपने ही इर्द- गिर्द घूमती रहती। अपने बनाए हुए सिद्धान्तों को किसी भी सिद्धान्त से ऊपर मानते। वह अपने जीवन में बहुत ही अनुशासित रहे। एक स्कूल में बच्चों को हिन्दी पढ़ाते थे। बचपन से लेकर एक बड़े संयुक्त परिवार का मुखिया होने तक उनका जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा। उन्हें शायद कोई अभिभावक नहीं मिला था और उन्हें बहुतों का अभिभावक बनना पड़ा था। इसलिए राह चलते मार्गदर्शन देते रहने की आदत पड़ गयी थी। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते उनमें एक संकोचहीन बेबाकीपन आ गया था। जो बात उन्हें पसंद नहीं आती उसका विरोध तो नहीं कर पाते लेकिन उसपर टीका-टिप्पणी किए बिना भी नहीं रह पाते। उन्हें समाज के सभी लोगों से मिलना-जुलना और भाँति-भाँति की बातें करना पसन्द था। रिटायरमेंट के बाद शुक्ला जी जहां भी जाते अपनी जान-पहचान के लोगों से जरूर मिलना चाहते।

शुक्ला जी के गाँव में उनके एक पड़ोसी थे ज्ञानप्रकाश। उनकी बेटी वृन्दा की शादी बनारस में हुई थी। जब भी शुक्ला जी बनारस अपने रिश्तेदारों के यहां जाने को होते तो वह भतीजे ज्ञानप्रकाश से पूछना नहीं भूलते थे कि ‘अपनी बेटी के पास कोई संदेश भेजना हो तो बता दो मैं बनारस जा रहा हूँ; बहुत दिन हो गया उसे देखे; इसी बहाने उससे मिल भी लूंगा और उसका हाल-चाल भी ले लूंगा।’ लेकिन ज्ञानप्रकाश इधर-उधर की बातों में शुक्ला जी को उलझा कर अपनी बेटी का पता देने से कन्नी काट लेता।

generation gap1ज्ञानप्रकाश शुक्ला जी का बहुत सम्मान करता था। आस-पास के गांव के लोग भी शुक्लाजी के परिवार की बहू-बेटियों के संस्कार से बहुत प्रभावित रहते। जबसे ज्ञानप्रकाश की बेटी की शादी हुई तबसे शुक्ला जी दसियों बार बनारस आये-गये होंगे। हर बार वे ज्ञानप्रकाश के पास जाते और वृन्दा का पता मांगते लेकिन हर बार उन्हें निराश होना पड़ता। धीरे-धीरे उन्हें इस बात का अंदाजा लग गया कि ज्ञानप्रकाश जानबूझकर वृन्दा का पता नहीं देता है।

एक दिन शुक्लाजी ने ज्ञानप्रकाश से पूछ ही लिया- ‘बहुत दिनों से मैं तुमसे वृन्दा का पता मांग रहा हूँ लेकिन तुम किसी न किसी बहाने उसका पता देने से इनकार कर देते हो। आखिर क्या बात है?’ ज्ञानप्रकाश ने कहा- ‘चच्चा, बुरा न मानें तो एक बात कहूं..मेरा दामाद बहुत शौकीन है..वृन्दा अपने ससुराल में बहू नहीं, बेटी की तरह रहती है .. कभी सलवार-सूट पहनती है तो कभी जिंस-टॉप.. उसके घर वाले भी उसकी पसंद का बहुत ख्याल रखते हैं..उसके ऊपर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं है। आपको उसका यह रूप देखकर शायद अच्छा न लगे.. और आप टीका-टिप्पणी करना शुरु कर दें, इसलिए मैं आपको उसके घर का पता नहीं देता।’ शुक्लाजी टका सा मुंह लेकर वहां से चले आये.. उन्होंने इस बात की चर्चा अपने घर वालों से भी की। लेकिन उनकी बातों से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि उनको भी अब अपनी सोच बदलने की जरूरत है..

शुक्ला जी का एक भरा-पूरा परिवार है उनके नाती-पोते भी अब शादी करने योग्य हो गये हैं। उनकी यह सोच जो बहुत ही पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं की जंजीरों से जकड़ी हुई है। जहां अभी भी स्त्रियों को घूँघट में रहना और इशारों में ही बात करना उचित माना जाता है वहां इस जेनरेशन गैप के साथ शुक्ला जी का कैसे निर्वाह होगा? क्या ऐसे बुजुर्ग अपनी आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा के शिकार नहीं होंगे? घर का बुजुर्ग होने के कारण किसी ने उन्हें टोका नहीं, पड़ोसी ज्ञानप्रकाश भी इनसे कन्नी काटता रहा; लेकिन जब पीछे ही पड़ गये तो सच्चाई का सामना हो गया। यह नौबत तो उनके घर में भी आ सकती है। शुक्ला जी को अपने इस व्यवहार पर चिंतित होना चाहिए न कि गौरवान्वित। समय के साथ उनको अपनी सोच में परिवर्तन लाने की जरूरत है।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, March 27, 2014

नक्‍कारों की नेतागीरी का करियर

सोच रही हूँ नेता बन जाऊँ। घर परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के बड़ा हो जाने के बाद थोड़ी कम ही हो जाएगी। उसके बाद कोई ऐसा काम करना ठीक रहेगा जिसमें हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा हो जाय। इस हिसाब से राजनीति से अच्छा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। उम्र के हिसाब से भी दूसरी नौकरियों या धन्धों के बजाय चालीस पार करने के बाद राजनीति का करियर ही सबसे लाभदायक हो सकता है। आज-कल नेता बनना बाकी नौकरियों से बहुत आसान है।

मेरी निगाह में एक जबर्दस्त मुद्दा भी है - हमारे समाज में चारो ओर फैली बाल-मजदूरी का। यह जानते सभी हैं कि ‘बच्चों से काम कराना जुर्म होता है’; लेकिन इस जुर्म का लाभ उठाने के लिए सभी तैयार होते हैं। मैं अपनी राजनीति के लिए यही मुद्दा उठाउंगी। सड़क, गली-चौराहे पर जहां देखो वहां चार साल से लेकर चौदह साल तक के बच्चे कूड़े की ढेर से जूते, चप्पल, प्लास्टिक बटोरने का काम करते हैं। खाते-पीते घरों में भी गरीब घरों के बच्चे-बच्चियाँ छोटी-मोटी सेवा के लिए लगा दिये जाते हैं; जब कि इनके लिए सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था के साथ- साथ पका-पकाया गरम भोजन (हाट कुक्ड फूड) देने की योजनाएं भी चला रखी हैं। सरकार द्वारा मुफ़्त में दी गयी यूनीफ़ॉर्म पहने हुए कुछ बच्चों को भी मैंने कूड़ा उटकेरते देखा है। सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में जिन बच्चों का नामांकन भारी-भरकम अभियान चलाकर कराया जाता है ताकि “एक भी बच्चा छूटने न पाये”, उन बच्चों को इन स्कूलों में जो शिक्षा मिल रही है उसे देखकर ही मेरे मन में यह विश्वास पनप रहा है कि इनको सुनहरे सपने दिखाकर एक सॉलिड वोट-बैंक जरूर बना लूंगी और अपनी नेतागीरी चमका लूँगी।

मुफ़्त का भोजन, मुफ़्त का कपड़ा और कॉपी-किताबें व बैग, और भोजन के बाद मुफ़्त की छुट्टी; पढ़ाई के नाम पर यह पक्का आश्वासन की कक्षा पाँच और आठ तक कोई माई का लाल फेल कर ही नहीं सकता। अनपढ़ और नकारा बने रहने के लिए और क्या चाहिए?इन स्कूलों में गुरूजी लोग की बात न की जाय तो ही अच्छा। अव्वल तो स्कूलों में जरूरत के मुताबिक इनकी संख्या है ही नहीं; दूसरे,जो लोग तैनात हैं भी वे दूसरी तमाम चिन्ताओं में घुले जाते हैं। बच्चों की ओर ताकने की भी फुरसत उन्हें नहीं है। शिक्षामित्र अपनी मजदूरी के हिसाब से जितना पढ़ाना चाहिए उतना पढ़ाते हैं जो ऊँट के मुंह में जीरा के समान ही है।

इस प्रकार सरकार द्वारा अरबो रूपये खर्च करके जो अनपढ़ और मुफ़्तखोरी की आदत पाल चुके नक्कारों की फौज तैयार की जा रही है उनके आगे के जीवन में भी सरकारी कृपा की (मैं भीख क्यों कहूँ?) व्यवस्था जारी रखने का मिशन चलाने का काम तो करना ही पड़ेगा। मनमोहन सिंह की सरकार ने जाते-जाते इस टाइप की कुछ नीतियाँ घोषित कर दी हैं और कांग्रेस के मैनीफेस्टो में भी इस थीम पर काम किया गया है। अब इन बच्चों को न तो घर के काम सीखने की जरूरत है और न ही किसी और कौशल की। अगर ऐसे बच्चे सरकार की इस योजना का लाभ नहीं उठा पाएंगे तो युवा होकर करेंगे क्या..और किसके काम आएंगे? नेताओं का वोट बैंक बनने के अलांवा?

हमें विश्वास है कि थोड़ी मेहनत कर देने पर ये हमें बड़का नेता तो बना ही सकते हैं। उसके बाद हम इन्हें ‘अनपढ़ बेरोजगारी भत्ता’ या ‘बिना काम वेतन’ वाला रोजगार दिलाएंगे, जैसे मनरेगा में। सफाई कर्मचारियों की संविदा पर नियुक्ति दिलाएंगे। नगर निगमों में निकलने वाले जितने कूड़े है उनकी छँटाई और सफाई का जिम्मा इन्हें ही सौपेंगे। यानि ऐसे काम जो करने नहीं पड़ते। इनकी कार्य कुशलता तो इन्हीं सब कार्यों में है। नेता और एक बार मंत्री बन जाने के बाद तो सबकुछ मैनेज ही हो जाएगा। हम चाहे बाल-मजदूर रखे या वृद्ध सेवक, क्या फर्क पड़ता है?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 8, 2014

बेटी के लिए भी सोहर गायें...।

आज महिला दिवस पूरा देश मना रहा है। इस दिन का जश्न मनाने के लिए महिला सशक्तिकरण पर कार्य करने वाली संस्थाएं, सभी प्रकार के राजनैतिक दल, सोशल मीडिया एवं सामान्य पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष सब उत्साहित दिख रहे हैं। मैं सोच रही हूँ कि महिला दिवस मनाने के लिए किसी जुलूस, सार्वजनिक स्थल या मंच की क्या जरूरत है..? सिर्फ एक दिन महिला दिवस मना लेने से महिला का सम्मान नहीं बढ़ जाता। जरूरत है तो समाज में नारी सम्मान, नारी शिक्षा, नारी स्वास्थ्य के साथ-साथ नारी के राजनैतिक सशक्तिकरण की जो सिर्फ कानून बन जाने से नहीं मिल सकता।

आज महिला दिवस पर भी अगर किसी व्यक्ति के घर में बेटी पैदा होगी तो ‘सोहर’ नहीं गाया जाएगा। सोहर गाना एक ऐसी प्रथा है जिसमें सिर्फ लड़का पैदा होने के उपलक्ष्य में घर की महिलाओं द्वारा यह खुशी का गीत गाया जाता है। अभी तो महिला अपने ही घर में स्वतंत्र या सशक्त नहीं है कि बेटी पैदा होने पर ‘सोहर’ गा सकें या किसी अन्य प्रकार का ‘जश्न’ मना सके; अपनी ही प्रतिरूप को अपने आंचल में रखकर घर के अन्य सदस्यों के सामने अपनी खुशी का इजहार कर सके। ऐसा नहीं है कि एक परिवार में महिलाओं की संख्या पुरुषों की अपेक्षा कम होती है। जब तक एक स्त्री के द्वारा दूसरी स्त्री की उपेक्षा होती रहेगी तब तक किसी भी प्रकार से महिला को सशक्त नहीं बनाया जा सकता तथा महिला दिवस या महिला सशक्तिकरण जैसे कानून सिर्फ अखबार के पन्नों की शोभा बढ़ाते रहेंगे जिसके लाभ से महिलाएं हमेशा ही वंचित रहेंगी।

एक गर्भवती महिला को जब प्रसव के दौरान किसी महिला डॉक्टर के पास ले जाया जाता है तो बेटा होने पर डॉक्टर जितनी गर्मजोशी से उस महिला के घर वालों को बधाई देती है उतनी गर्मजोशी एक बेटी के होने पर नहीं दिखाती। वहां की नर्स और दाइयों का भी बेटा होने की बक्शीस ज्यादा होती है। महिलाओं में स्वयं ही लिंगभेद को लेकर असमानताएं है। हर स्त्री को चाहिए कि वह अपने घर में इस पर्व को जरूर मनाये; बेटी के होने पर भी सोहर गाये; पूड़ी- पकवान बनाए। अगर एक स्त्री अपने ही घर में उपेक्षित हो या दूसरे स्त्री की उपेक्षा करे तो समाज से उसे उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बेटे का जन्म हो या बेटी का अपनी पुरानी रुढिवादी परम्पराओं को घर की स्त्रियों को खुद तोड़ कर बाहर निकलना होगा। अपने वजूद को समझना होगा। अपने कार्यों के महत्व को समझना होगा। तभी वह सशक्त बन पाएंगी।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, February 21, 2014

मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू

एक लड़का जब विवाह करने योग्य हो जाता है तो वह अपने होने वाली पत्नी में उन सभी गुणों के होने की चाह रखता है जिससे वह दुनिया के सामने उसे बड़ी शान से दिखा सके। आखिर क्या है वह गुण? वैवाहिक विज्ञापनों में इसकी बानगी दिखती है। जैसे कि लड़की गोरी, सुन्दर और सुशील हो; गृहकार्य दक्ष हो; लम्बाई किसी विश्व सुन्दरी अथवा ब्रह्माण्ड सुन्दरी के समतुल्य हो; फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हो। कामकाजी हो तो अति उत्तम ताकि उसके आने पर घर की अर्थव्यस्था में कोई कमजोरी न आए बल्कि उसकी मजबूती में लगातार वृद्धि होती रहे। भले से भले लोग भी इतना तो चाहते ही हैं कि लड़की के घर वाले दहेज भले ही न दें लेकिन विवाह के दौरान हुए खर्चों का बोझ लड़के वालों के कंधों पर न पड़े।

अब जरूरी तो नहीं कि इतना सारा मीनू एक ही लड़की पूरा कर पाये। अब जो कमी रह जाती है उसे दहेज से एड्जेस्ट करने का विकल्प चुना जाता है। सोचती हूँ कि ये लड़के क्या करेंगे इतने सारे गुणों से परिपूर्ण लड़की। अगर कोई मिल भी जाती है तो क्या वह उस लड़की की नुमाइश लगाएंगे या किसी “आदर्श पत्नी प्रतियोगिता” का अवार्ड हासिल करने के लिए परेड कराएंगे। वे ऐसी उम्मीद क्यों रखते है?

आज की युवा पीढ़ी कितनी भ्रमित है । एक ग्रामीण कहावत है कि लालची आदमी को चाहिए- “मीठो भर, कठवतियो भर।” मतलब, कोई व्यंजन जो स्वादिष्ट भी हो और ज्यादा। परिवर्तन के इस दौर में हमारे समाज में कितना कुछ बदल गया है; रहन-सहन,खान-पान,वेश-भूषा आदि कहाँ से कहाँ चले गये। लेकिन अगर नहीं बदली तो स्त्री के प्रति पुरुष की सामन्ती मानसिकता।

आजकल गांव में एक रोचक नजारा देखने को मिलता है। अनेक बेरोजगार युवक जो खुद तो इस लायक नहीं हुए कि उन्हें नौकरी मिल सके, लेकिन प्राथमिक शिक्षा और आंगनवाणी विभागों में मिले अवसर का लाभ उठाकर अपनी पत्नियों को नौकरी दिलाने के लिए रात दिन एक कर देते हैं। जब बीबी को नौकरी मिल जाती है तो उसकी कमाई पर अपने वो सारे शौक पूरा करते हैं जिससे वे अब तक वंचित रहे हैं। मोटर साइकिल पर अपनी सहधर्मिणी को एक हाथ का घुंघट कराकर पीछे सीट पर बैठा लेते है, और बड़े शान से निकल पड़ते है उन्हें उनके कार्य-स्थल पर छोड़ने के लिए; और उनके काम से छूटने से ठीक पहले वहाँ मौजूद रहते हैं पुन: उसे बाइक के पीछे बैठाकर घर लाने के लिए। इतना ‘कार्य’ करने के उपरान्त वह ‘थककर’ दरवाजे पर बैठ जाते है और पत्नी को आदेश देते है कि मेरे लिए चाय नाश्ता का इंतजाम करो। पत्नी फिर अपनी दूसरी ड्यूटी में लग जाती हैं। इस तरह वह अपने दफ़्तर के साथ-साथ अपने दूसरे दायित्यों की पूर्ति भी करती हैं। यानि इन मर्दों के लिए अभी भी वही हाल है- मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू...।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 29, 2014

कमाऊ बीबी - बवाले जान

लखनऊ से दिल्ली की यात्रा के दौरान स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस में मेरे ठीक पीछे वाली सीट पर बैठा युवक अपनी मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था। ए.सी. चेयरकार  में अपेक्षाकृत शांति थी और उसकी आवाज थोड़ी ऊँची जो बरबस ध्यान खींच लेने भर को काफी थी। उसकी बात से यह अनुमान लगा कि दूसरी ओर भी कोई पुरुष ही था । बात-चीत के दौरान उसने एक ऐसा वाक्य प्रयोग किया कि मेरी सोच वहीं जाकर अटक गयी। एक अपरिचित द्वारा मोबाइल पर किसी और से की जा रही बात पर कोई हस्तक्षेप तो किया नहीं जा सकता था; लेकिन मेरे मन में बार-बार यह वाक्य कौंधता रहा। उसने कहा था- “मेहरारुन के कमाइल बड़ा घातक बा।” इस वाक्य को सुनकर मेरे कान खड़े हो गये और दिमाग ने अपना काम करना शुरु कर दिया।

इस बात का अर्थ मुझे खूब अच्छी तरह से पता था। इसका मतलब होता है कि स्त्रियों का नौकरी करना बहुत नुकसानदेह है। मै लगातार इस बात पर मंथन करने लगी कि स्त्रियों का नौकरी करना आखिर घातक कैसे हुआ? पुरुष जब नौकरी करता है, कमाकर घर में पैसे लाता है तो कोई बात नहीं; लेकिन यदि औरत ने कमाना शुरू कर दिया तो कुछ गड़बड़ हो गयी। उस युवक की इस सोचपर मुझे तरस आती है और खींझ भी। आखिर इस बात की व्याख्या कैसे की जाय?

मुझे लगता है कि यह बात उस सोच का परिणाम हो सकती है जिसके अनुसार घर का कमाऊ व्यक्ति ही असली शक्ति का केन्द्र होता है। परिवार के लगभग सारे निर्णय या तो उसके द्वारा लिये जाते हैं या उसकी सहमति के बाद ही लागू हो पाते हैं। सामान्यतः घर का मुखिया भी वही होता है जिसके हाथ में अर्थोपार्जन का श्रोत है। एक पुरुष-प्रधान समाज में इस आर्थिक शक्ति पर पहला हक पुरुष का होता है, इसीलिए घर से बाहर निकलकर नौकरी या व्यापार करने का अवसर पहले लड़के को मिलता रहा है। घर की स्त्री बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करने, रसोई संभालने और साफ-सफाई के काम में लगती रही है और घर के मालिक की इच्छाओं की पूर्ति कर लेने में ही अपने जीवन का श्रेय-प्रेय मान लेती रही है। उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही न हो।

आजादी के साठ से अधिक साल बीत जाने के बाद अब इस स्थिति में परिवर्तन आ गया है। स्त्री ने समाज में अपनी भूमिका लगभग सभी क्षेत्रों में बढ़ायी है। अब वह नौकरी करके अर्थोपार्जन भी करने लगी है। जाहिर है कि नारी सशक्तिकरण के इस दौर की आँच ऐसे कूढ़मगज पुरुषों को लगने लगी है जो पुरानी सामन्ती व्यवस्था से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। उन्हें स्त्री का नौकरी करना इसलिए घातक लगता है कि अब उन्हें उसके ऊपर रौब गाँठने और चेरी बनाकर रखने का अख्तियार नहीं रहा।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 8, 2014

औरत हो औरत की तरह रहो...!

औरत हो औरत की तरह रहो”, यह जुमला प्राय: सभी औरतों को कभी न कभी सुनने को जरूर मिला होगा। इसी वाक्य से खासकर मध्यमवर्गीय स्त्रियों को नवाजा जाता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में महिलाओं की स्थिति बहुत ही कठिन और बेबस होती है। क्या मतलब है ‘औरत की तरह’ होने का? मुझे लगता है इसका आशय है कि औरत की पहचान मूक-बधिर बने रहना है जो बिना किसी विरोध के अच्छे-बुरे हर तरह के कार्यों को मौन स्वीकृति प्रदान करती रहे। बस तभी उसके अंदर एक स्त्री होने के गुण परिलक्षित होते हैं वरना उसके स्त्रीत्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता है।

ऐसी महिलाओं को किसी भी परिस्थिति में मुंह बंद करके रहने की सीख दी जाती है। औरत हो औरत की तरह रहो - यह इस समाज द्वारा बनाए गए मध्यमवर्गीय स्त्रियों के लिए सिद्धान्त का एक पाठ है। ऐसे परिवार की स्त्रियों को उसके पति, पुत्र, भाई और यहाँ तक कि परिवार की दूसरी स्त्रियाँ- माँ, बहन, बुआ, मौसी; और कभी-कभी उसके पड़ोसी और वहां के नजदीकी समाज द्वारा भी छोटी-छोटी बातों पर उसे अल्पज्ञ समझ कर बिना किसी सुनवाई के यह पाठ पढ़ाया जाता है। अपने परिवार में ही उसके विचारों की कोई मान्यता नहीं दी जाती।

इस बेबसी को कैसे व्यक्त किया जाय यह मै स्वयं बताते हुए असहज महसूस करती हूँ। क्योंकि मुझे भी एक बार मेरे पड़ोसी द्वारा इस सूक्ति से नवाजा जा चुका है। जिस सोसाइटी में अभी मै रह रही हूं, एक मीटिंग के दौरान मेरे द्वारा कुछ प्रश्न कर देने पर इस सोसाइटी के मुखिया ने मुझे भी यही नसीहत दी थी। जिस पल को मै आज-तक नही भुला पायी हूँ।

यह भी झुठलाया नहीं जा सकता कि कुछ महिलाएं इसे उपहार स्वरूप स्वीकार भी कर लेती है। मुझे उनकी इस स्वीकृति में बहुत बेबसी नजर आती है, क्योंकि वह अपने दिल और दिमाग से तो कुछ और सोचती हैं, लेकिन उनकी जुबान कुछ और बोलती है। शायद उन्हें बार-बार इस बात का डर सताता है कि कहीं उसे स्त्री से परे कुछ और न समझ लिया जाय। वह अपने ऊपर हुए अत्याचारों को भी इसलिए सहती रहती हैं कि कहीं यह समाज उन्हें स्त्री न होने का प्रमाणपत्र ना पकड़ा दे।

मैंने देखा है कि इस तरह की बेबसी गाँव की मजदूर औरत में या समाज के निचले तबके से संबंधित किसी परिवार की स्त्रियों में नहीं मिलती। वहाँ की औरतें मर्दों के कन्धे से कन्धा मिलाकर सारे काम भी करती हैं अपनी बातों को बड़ी ही निडरता से कहीं भी बिना झिझक रख भी देती हैं। अगर उनकी सुनवाई नहीं की जाती तो इसी समाज द्वारा बनाए गए सभी फार्मूले (साम, दाम, दंड, भेद) भी आजमा डालती हैं। समाज के उच्च वर्ग की स्त्रियों को भी अपनी बात रखने और कदाचित्‌ अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित करने का अवसर है। लेकिन ‘औरत की तरह’ रहने की बेचारगी सिर्फ मध्यमवर्गीय महिलाओं में ही पायी जाती है; ऐसा क्यो?

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, October 16, 2013

गरीबों के अनाज पर डाका..

खाद्य सुरक्षा कानून पर महामहिम के दस्तखत की स्याही अभी सूखी भी नहीं होगी कि इसके माध्यम से मिलने वाले सस्ते अनाज की कालाबाजारी की खबरें न्यूज चैनेलों में सुर्खियाँ बटोरने लगीं हैं। आजतक न्यूज चैनल ने सरकार की सवा लाख करोड़ की सबसे बड़ी योजना के काले सच का खुलासा किया है। देश की राजधानी से ही शुरू हो गया खाद्य सुरक्षा के अनाज की कालाबाजारी का गोरखधंधा। गरीबों का पेट भरने की दलील देने वाली सरकार इस कालेधंधे की सच्चाई से अछूती तो नहीं होगी। इस घोटाले में नौकरशाह और राजनेता दोनों ही संलिप्त नजर आ रहे हैं।

लगता है कि सरकार को गरीबों की भूख की फिक्र कम, अपने चुनाव में होने वाले खर्चे की चिंता ज्यादा सता रही है। शायद इस योजना के तहत सरकार की एक अलग योजना पूरी करने की साजिश रही है, तभी तो सरकार ने चुनाव होने के शीघ्र पहले ही इस योजना को लागू किया ताकि इनके खजाने में कहीं कोई कमी आए बगैर चुनाव लड़ा जा सके। नहीं तो इतने सालों तक गरीबों के भूखे पेट की ओर से यह सरकार क्या आँख पर पट्टी बांधे बैठी रहती? सरकार के मंत्री से लेकर अधिकारी तक सभी इस योजना में हो रही कालाबाजारी में संलिप्त लगते हैं। गरीबों को दो रुपये में मिलने वाला गेहूं निजी आटा चक्कियों पर बारह रूपये मे बेचा जा रहा है। थाने से लेकर फूड इंस्पेक्टर का बंधा हुआ है कमीशन।

खाद्यसुरक्षा योजनाओं से लाभ लेने वाले पात्र लोगों के पास तो राशन कार्ड भी नहीं है; और ना ही इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी किसी पात्र गरीब का राशन कार्ड समय से बना पा रहे हैं। मेरे घर में बर्तन माँजने वाली जो अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए प्रतिदिन लगभग दस घरों में काम करती है, बताती है- “मै सालों से दौड़ रही हूँ, मेरा न तो कोई कार्ड बना और ना ही कभी कम दाम में मुझे अनाज ही मिला।” इस योजना की सच्चाई यह भी है कि गरीबों के अनाज पर डाका डालने के लिए फर्जी राशन कार्ड भी बनाए जा रहे हैं। लगता है कि यह मूक-बधिर सरकार अपने स्वार्थ के आगे अब अंधी भी हो गयी है। लोक-लुभावन योजनाओं की आड़ में गरीबों के पेट पर लात मारती सरकार संवेदना विहीन एक काठ का पुतला नज़र आती है।

(रचना)

Thursday, October 10, 2013

राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही...

 

राजनीति का मंच सार्वजनिक होता है... आखिर यह लोकतंत्र जो है. देश के हर नागरिक को राजनीति के क्षेत्र में भाग्य आजमाने का अधिकार है। सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी पर काबिल लोग आ सकें इसके लिए यह व्यवस्था की गयी होगी; लेकिन इस मंच पर जो आते हैं उनका बायोडेटा देखने पर हाल कुछ और नजर आता है। यहाँ आने के लिए जो काबिलियत चाहिए वह कुछ दूसरी तरह की है। पढ़ा-लिखा हो या नहीं इससे क्या मतलब है देश को..? चोर, लुटेरे, व्यभिचारी, सूदखोर, ब्लैकमेलर, हत्यारोपी, रंगदार, भांड़, नचनिया, गवनियां सब राजनीति के मजे चखना चाहते है... आखिर मालामाल जो है। इन्होंने तमाम गलत रास्तों से पहले पूँजी इकठ्ठा कर ली और फिर कूद पड़े।

पूछिए इनसे - राजनीति में आने के लिए कालाधन क्यों उगाते हो भाई? बोलेंगे- खाएंगे तभी तो खिलाएंगे.. इतनी सहूलियत और कहाँ मिलेगी इन्हें..? एक बार बस गद्दी हाथ लग जाय तो देखो कमाल इनका.. न तो कमर मटकाने की जरूरत पड़ेगी और न ही अपने फिटनेस के लिए किसी जिम में जाकर जी तोड़ मेहनत कर पसीने बहाने की.. इस देश की राजनीति में क्या जरूरत है किसी सोसल वर्कर की..? कहीं समाज जागरुक हो गया तो इनकी माला कौन जपेगा..?

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ऐसी स्थिति में पेशेवर सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए कोई गुंजाइश बचती है क्या? समाज के लिए कार्य करना अपना समय बर्बाद करने के बराबर है.. यूँ कहे तो राख में घी डालने के बराबर..। समाज इन्हें देता ही क्या है..? अमुक जी नाच-गाना कर के या दूसरे तरीकों से करोड़ों कमाकर रखे है- इसी दिन रात के लिए कि बैठाकर मुफ्त की रोटियाँ खिलाएंगे.. गाँव में वीडियो चलाकर तिवारी जी का नाच-गाना दिखाएंगे और उसके बाद कुछ खिला-पिलाकर सुबह वोट बटोर के ले जायेंगे.. फिर क्या! मंच पर कोई दूसरे बाबा का अवतार होगा..और फिर शुरू होगा ‘‘ओठवा में लगवले बाड़ी, कनवा में पहिने बाली चाल चलेली मतवाली, बगल वाली जान मारेली”। कितने रोजगार जैसे शिक्षक की भर्तियाँ इत्यादि सफेद पोशाक वाले सालों से सिकहर पर टांगे बैठे हैं कि कही कोई और बिल्ली झपट्टा न मार ले इनके वोट के खजाने को..।

..फिर क्या बगल वाली हो या अपना पड़ोसी, जान मारे या मरवाये.. हम तो भई! जैसे हैं वैसे रहेंगे.. देश मुंआ मुह पिटाये, आखिर यही तो होता रहा है आज तक यहाँ की राजनीति में.. ये कौन सी इस परम्परा से अलग हट कर कुछ नया करने को सोचने वाले हैं.. बड़का-बड़का राजनितिज्ञ तो जेल की हवा खा रहे हैं.. करमजला कानून ने भी एक लफड़ा लगा दिया है.. इनको आराम फरमाने का.. दूसरा कोई करे भी तो क्या..? ऐसा कोई माई का लाल पैसे वाला जन्मा ही नही कि चुनाव में अपना लगाकर जीत जाये.. क्योंकि यह भी जानते है आम जनता की हालत इतनी खस्ती है कि दो दिन भी भरपेट भोजन, दारू नाच-गाना में इनको मस्त कर दिए तो ३६३ दिन की चिंता तो इन्हें भूल जायेगी.. आखिर भूखमरी की शिकार जनता को दो-चार दिन खिला-खिला कर अघवाएंगे नही तो अपने फिर पाँच साल कैसे अघाएंगे..?

(रचना)

Saturday, July 20, 2013

हॉट कुक्ड फूड : पैरासाइट बनाने की नर्सरी

बिहार के छपरा जिले में बच्चों को दिये जाने वाले मिड डे मील खाने के कारण हुए हादसे से नसीहत लेते हुए राज्य सरकार कुछ नये तरीके पर हाथ आजमाने कि कोशिश करने में जुट गयी है। जिसे `हॉट कुक्ड फूड’ के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। जिसमें ब्रान्डेड सामग्री के इस्तेमाल का निर्देश दिया गया है। मंत्रीजी का आदेश है कि मध्याह्न भोजन को बच्चों में वितरित करने से पहले संबन्धित आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री और रसोइयों को पहले चखना पड़ेगा। कितना उत्तम विचार है.. मन्त्रीजी से लेकर संबंधित विभागीय अधिकारी सभी विकास के रास्ते पर अग्रसर हो रहें है। ग्रामीण क्षेत्रों मे शैक्षिक गुणवत्ता में कितना सुधार है इसका तो उन्हें खूब अच्छी तरह से पता है। अब चले हैं भोजन की गुणवत्ता में सुधार करने..।

सोचने वाली बात है ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ २०० से अधिक बच्चों का भोजन एक साथ बनना है वहा सब्जियाँ भी उसी मात्रा में कटती है, अब एक हैंड पम्प के सहारे वह सब्जियां कितनी बार धुली जाती होंगी आप अन्दाजा लगा सकते है। यही नही यहाँ सब्जियाँ कटवाने से लेकर नल चलाने तक का कार्य भी स्कूली बच्चों से ही लिया जाता है। क्या मंत्रीजी या संबंधित अधिकारी इस स्कूल द्वारा दी जाने वाली शिक्षा और भोजन को अपने बच्चों के लिए इस्तेमाल कर सकते है?

ग्रामीण परिवेश में पले-बढे होने के नाते मै वहाँ के लोंगो कि मानसिकता से भली-भाँति परिचित हूँ। यहाँ का गरीब वर्ग जो अपनी रोजी-रोटी चलाने में असमर्थ है उनको सरकार ने अपने बच्चों के पेट पालने का  अच्छा मौका दे रखा है। इसे मौका कहें या सहारा.. पचहत्तर प्रतिशत ऐसे माँ-बाप हैं जो बच्चे पैदा करने के बाद उनका चलने का इंतजार करते है जिससे वह बच्चे को स्कूल का रास्ता दिखा सके। इससे इन्हें क्या हासिल होता है? गहराई से देखें तो सिर्फ़ एक वक्त की रोटी या  कहें तो एक बैसाखी। ग्रामीण क्षेत्र में देखे तो शैक्षिक गुणवत्ता का कोई पैमाना मंत्रीजी ने बनाया ही नहीं है।

गुरूजनों को देखा गया है इन रसोइयों से अपने लिये अलग से चाय-पकौड़िया बनवाकर खाते हुए। इनकी व्यवस्था अलग से होती है जिसके लिए साफ-सुथरे वर्तन और शायद वही ब्रान्डेड तेल और मसाले का इस्तेमाल होता है। मेरे कहने का मतलब है कि यह सारा विभाग जानता है कि ब्रान्डेड किसे पचेगा और किसे लोकल।

तरस आती है ऐसे माँ-बाप और ऐसे बच्चों पर जिनकी गरीबी का राज्य सरकार भी मजाक बना रही है। कटोरा लेकर एक पंक्ति में बैठते और भोजन का इंतजार करते बच्चों में ये कैसी आदत डाल रही है हमारी सरकार? मुफ़्त के भोजन वाली पढ़ाई समाप्त होने के बाद इन बच्चों की आँखों में स्वावलम्बी बनने की तमन्ना दूर-दूर तक नही दिखायी देती है। प्राय: यही देखा गया है कि हर वक्त इनकी लरियायी आँखें किसी को ढूँढती रहती हैं कोई आये और उन्हें कुछ दान ही सही दो पैसे दे जाये। शायद ऐसे ही बच्चों के लिए मनरेगा ने रास्ता साफ कर रखा है।

दूसरी तरफ उन पच्चीस प्रतिशत लोगों की बात भी करना चाहती हूँ जो मेहनत मजदूरी करके अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में न भेजकर, प्राइवेट स्कूलों में जहाँ २०० से लेकर ५०० रूपये फीस भी दे रहे हैं। इन दोनों संस्थाओं के बच्चों को देखकर उनकी शैक्षिक योग्यता का पता लगाया जा सकता है।

बिहार सरकार ने तो एक गरीब के एक बच्चे की कीमत दो लाख रूपये लगा डाली है। इनकी गरीबी का मजाक बना के रख दिया है।

(रचना)

Saturday, December 11, 2010

राम दुहाई राम दुहाई राम दुहाई भाई जी

आज अचानक कैलाश गौतमजी की एक कविता हाथ लग गयी। इसे पढ़कर मैं हैरत में पड़ गयी। मुझे नहीं मालूम कि इसे किस संदर्भ में उन्होंने लिखा था लेकिन मुझे विश्वास है कि आज भी आपको अपने आस-पास ऐसे चरित्र मिल सकते हैं। लीजिए आप लोगों के लिए प्रस्तुत है ये मंचीय कविता :


राम दुहाई राम दुहाई राम दुहाई भाई जी
आपके मुँह पर आपकी कितनी करूँ बड़ाई भाई जी।

गिरगिट को भी आपने पीछे छोड़ा रंग बदलने में
कोई सानी नहीं है मुँह पर कालिख लेकर चलने में
ठाकुर के घर में न रही ऐसी ठकुराई भाई जी।

गुड़िया बनकर बुढ़िया निकली खैर नहीं है बप्पारे
सोने की पायल के लायक पैर नही है बप्पारे
घर में केवल आग लगाने दुलहिन आई भाई जी।

नाक कटाकर बड़ी बहू अब नथ गढ़वाने बैठी हैं
कितने भर सोने का होगा वजन बताने बैठी हैं
रह-रहकर झनकातीं चूड़ी भरी कलाई भाई जी।

क्या कोई सुख-दुख बाँटेगा जैसा आपने बाँटा है  
सबके मन में चोर बसा है सबके मन में काँटा है
आपसे बढ़कर कौन दूसरा हातिमताई भाई जी।

कितना बड़ा पेड़ था कल तक अब है बेट कुल्हाड़ी का
बिका कसाई बाड़े जाकर फाटक ठाकुरवाड़ी का
हम सब भेंड़ बकरियों में हैं आप कसाई भाई जी।