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Tuesday, September 22, 2015

अतिक्रमण पुलिसिया

आज मैंने अपनी आँखों से एक ऐसे अतिक्रमण का वाकया देखा जो किसी फुटपाथ पर जीविका कमाने वाले ठेले-खोमचे अथवा टाइपराइटर वाले ने नहीं किया। बल्कि उसी वर्दी वाले एक 'लोकसेवक' ने किया जिस वर्दी को पहनकर अभी हाल ही में एक दरोगा जी अतिक्रमण हटाने के अति उत्साह में टाइपिस्ट के साथ दुर्व्यवहार करने के जुर्म में निलंबित हुए हैं।

यह लोमहर्षक घटना मेरी आँखों के सामने हुई। बल्कि मैं खुद ही इस पुलिस वाले की ज्यादती का शिकार होने से बाल-बाल ही बची। मैं अपनी सहेली से मिलने स्कूटी से जा रही थी तभी 100 न. हेल्पलाइन की पीसीआर गाड़ी बगल से गुजरी। इसमें ड्राइविंग सीट पर एक खाकी वर्दी वाला सवार था जो घोषित रूप से जनता का मददगार था। उसने भरी ट्रैफिक में अपनी गाड़ी को पूरी स्पीड में मेरी गतिशील स्कूटी के ठीक सामने लाकर अचानक घुमाने की कोशिश की। मैंने झट से ब्रेक लगाकर अपनी स्कूटी को जैसे-तैसे बचा लिया। लेकिन अगले ही क्षण उसने बिना हार्न बजाये भीड़ को चीरते हुये यू-टर्न लेने की कोशिश की और अपने सामने  से गुजर रहे एक बाइक सवार को ठोक दिया। बाइक सवार गिर पड़े।

पीछे से आ रही एक दूसरी बाइक भी गिरते-गिरते चिचिया कर संभल गई। चूँकि बाइक वाले नयी उम्र के लड़के थे इसलिये मुझे लगा कि कुछ नोंक-झोंक होगी और मामला गंभीर हो जाएगा। बाइक वाले युवक ने अपनी बाइक को तेजी से उठाते हुये बहुत गुस्से में पीछे पलट कर देखा भी। लेकिन पुलिस की गाड़ी पाकर उसके चेहरे का पारा जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा था उससे दोगुनी रफ़्तार से नीचे गिर गया। पुलिसवाले को मैंने एक बार ऊँची आवाज में बताने की कोशिश भी की- ''आप सड़क और नियम के साथ जबरदस्ती कर रहे हो।" लेकिन वहाँ मेरी बात वह बन गयी जिसे नक्कारखाने में तूती की आवाज कहते हैं।

मुझे ऐसा लगा वो महाशय अपनी गाड़ी का हूटर बजाते और बाइक वालों को घूरते अपनी सीट पर बैठे ट्रैफिक नियम के साथ छेड़छाड़ का आनन्द उठा रहे थे। सड़क और उसके नियमों के साथ पुलिस द्वारा किया गया ऐसा बर्ताव क्या किसी अतिक्रमण से कम है? यह देखकर मैं तो सन्न रह गई कि इतना खतरनाक स्टंट करने और बाइक गिरा देने के बाद भी उस पुलिस वाले के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी और सहम कर अपराध बोध से ग्रस्त होना उन लड़कों के हिस्से में आया।

मुझे लगा था कि लड़को में अभी नया खून हैं; जरूर अपना हिसाब वर्दी वाले रंगबाज से चुकता कर ही लेंगे पर मैं गलत थी। मैंने देखा बाइक पर सवार नौजवान लोगों का गरम खून ऐसा ठंडा हुआ कि मानो उसे नार्मल करने के लिए सिंकाई करनी पड़ेगी। वे अपनी बाइक जल्दी से साइड में लगाकर काठ बन गये नजर आ रहे थे।

ऐसी दुर्घटना अगर किसी आम नागरिक की गाड़ी से हुई होती तो मामला इतना आसान न होता और यही पुलिस उसे अपने कायदे से निपटा भी रही होती। अतिक्रमण का मैंने कभी समर्थन नहीं किया। पर ऐसे अतिक्रमण का क्या किया जाना चाहिये जिसका संबंध दूसरों के जान-माल की हानि से हो, और नुकसान पहुँचाने वाले स्वयं कानून के रखवाले हो।

अभी बीते दो दिन पहले की बात है एक दरोगा साहब को अखिलेश सरकार ने इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि उन्होंने फुटपाथ पर बैठे किसी गरीब की टाइपराइटर अपने पैरों से मार-मार कर तोड़ दिया। अतिक्रमण के जुर्म में अगर दरोगा जी ने उसे वहाँ से हटाने के लिए साम-दाम दण्ड-भेद का फार्मूला अपनाया तो उन्हें कौन रोक सकता था? उन्हें तो ऐसे ही बहुत से अधिकार मिले हैं जो वे बिना किसी के इजाजत के खुद प्रयोग कर सकते हैं। यह तो भला हो खबरिया चैनेलों और सोशल मीडिया का जो सरकार के ऊपरी माले तक खबर पहुँच गयी और मुख्यमंत्री जी ने संवेदनशीलता का परिचय देकर उस आदमी की मज़बूरी, गरीबी और लाचारी पर तरस खाते हुये आनन-फानन में उसका टाइपराइटर नया कर दिया।

सुना है उसके उत्पीड़न की क्षतिपूर्ति के लिए एक लाख की आर्थिक सहायता भी दी गयी है। यह कदम आम जनमानस के लिये जरूर राहत भरा होगा।  पर मेरे लिये यह टोकेनबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है। फुटपाथ छेंककर बैठे दूसरे लोग सोच रहे होंगे की काश दरोगा की लात उनके ऊपर भी पड़ गयी होती तो मुख्यमंत्री की राहत आ जाती। सीएम साहब ने दरोगा जी को निलंबित कर उस गरीब को नये टाइपराइटर से उपकृत कर जनता के दिलों में अपनी जगह तो बना ली! पर बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि अतिक्रमण और विशेष तौर पर पुलिसिया अतिक्रमण से निजात पाने के लिये क्या यह सरकार कोई पुख्ता प्रबन्ध कर पाने में सक्षम भी है? क्या इसकी इच्छाशक्ति भी दिखायी देती है?

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, July 30, 2015

वो लाल स्कार्फ

मेरा वो लाल स्कार्फ! कहाँ होगा...? जो मुझे आज  बिल्कुल भी याद नहीं है। कैसा था वो... कहाँ से लाऊँ उसे...? दिमाग के कपबोर्ड को खंगालते हुए अपने स्मृति-पटल पर उसकी कोई छवि नहीं बना पा रही हूँ। वही तो मेरी पहचान थी। काश मुझे वो मिल जाता तो मैं फिर से उसे ही पहनती। हो सकता है उसको पहनने के बाद मैं आज भी उतनी ही प्यारी लगने लगूँ जितनी कि कॉलेज के दिनों में अपने सीनियर्स को लगती थी।

मुझे कैसे पता होता कि मैं उसको पहनने के बाद कैसी लगती थी? आज से पहले किसी ने मेरे मुँह पर ये बात तो कही नहीं कि मैं लाल स्कार्फ में बहुत प्यारी लगती थी।

मेरी एक सीनियर जो इंटरमीडिएट में मेरे से एक क्लास आगे थी, आज उनका फोन आया। उन्होंने अपना परिचय देते हुये कहा- रचना! मैं रेनू... रेनू पांडे...तुम्हें कुछ याद आया...हम दोनों उदित (कॉलेज) में पढ़ते थे। मैं ख़ुशी से चौक कर बोल पड़ी- ओओओओ... रेनू दीईईईईई... कैसी हैं आप... कहाँ हैं आजकल... मेरी याद कैसे याद आई आपको...? मुझे तो सिर्फ आपकी ब्लू-सूट में दो चोटी वाली, चेहरे की एक हल्की परछाई सी याद है। चूँकि आप पढ़ने में बहुत अच्छी थीं, तो नाम कभी नहीं भूला। क्या आपको मेरा चेहरा याद है?

उनकी वो मधुर आवाज अभी तक मेरे कानों में गूँज रही है-
" अरे! मुझे तो अभी तक नहीं भुला वो  'लाल स्कार्फ' वाला गुलाबी चेहरा जिसमें तुम बहुत प्यारी लगती थी।"

ओहोहो... मेरा मन तो ऐसे झूमा कि बस पूछिये मत! सुना तो मैंने बिल्कुल स्पष्ट था। पर मुझे अपने ही कानों पर भरोसा न हुआ। और मैं उनसे गोल-मोल बातें घुमाते हुये फिर से पूछ बैठी- "क्या कहा... लाल स्कार्फ! कहीं मैं उसमें बेवकूफ तो नहीं लगती थी?"

"नहीं यार! तुम हम लोगों को बहुत प्यारी लगती थी। पहले तुमसे कभी ये बात कही नहीं। पर जब तुम लाल स्कार्फ लगाकर आती थी, तो तुम्हें बार-बार देखने का मन होता था। सच में।"

जी, तो मुझे कहना ये था कि अब वे बीते हुये दिन तो वापस आ नहीं सकते। पर रेनू दी! काश आपने मुझे ये बात पहले बता दी होती, तो मैं अपना 'वो' लाल स्कार्फ अपने साथ लेकर आयी होती! 

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 21, 2015

नकलची समाज के हाशिए पर लड़कियाँ-

ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के बारे में उनके अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक की यह सोच कि ज्यादा पढ़ा-लिखा कर इनसे भला कौन सी नौकरी करानी है, इनको और बेचारगी की तरफ ढकेलती है। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ने वाली बच्चियों के प्रति उनके घर, गाँव, समाज ही नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स का भी यही नजरिया देखकर निराशा होती है। उनकी नजर में पढ़ाई का उद्देश्य कमाई करना और कमाई के मायने सिर्फ 'अर्थ' यानी रूपया-पैसा कमाने से ही है जो सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। लड़कियों के हिस्से में तो सिर्फ घर में रहकर चूल्हा-चौका सम्हालना और बच्चे पैदा करके उन्हें पालना ही होता है।

यही वजह है कि परीक्षा के दौरान गुरुजनों की दृष्टि उन बच्चियों के ऊपर और उदार हो जाती है। आज-कल बिहार और यूपी में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल महायज्ञ जोरों पर है। वैसे तो इस बार फ्री फॉर आल का नज़ारा है लेकिन लड़कियों को विशेष सुविधा एक परम्परा बन चुकी है। परीक्षा-केंद्र पर गुरुजन उन्हें नकल करने-कराने की सामग्री सहित हर तरह की सुविधाओं की पूरी छूट मुहैया करा डालते हैं। इस नकल से प्राप्त डिग्री और उससे प्राप्त कन्या विद्याधन का लाभ उनके आगे की पढ़ाई में मिले या न मिले, इससे न तो उन बच्चियों के अभिभावक का कोई सरोकार होता और न ही उस स्कूल के टीचर्स का। वहाँ से उनको शिक्षा-दीक्षा में अपने अधिकारों और हितों के प्रति जाहिली और अनभिज्ञता के सिवा कुछ भी नहीं मिला होता।

ऐसे में उन बच्चियों को अगर नक़ल न कराया जाय तो बोर्ड परीक्षा में सफल बिद्यार्थियों का प्रतिशत बिगड़ने से 'स्कूल की इज्जत' मटिया-मेट होने का भय रहता है। बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए उसके प्रबंधकों को नक़ल की सुविधा उपलब्ध कराने के सभी उपाय कराने पड़ते हैं। वहाँ स्कूल की इज्जत का विकट सवाल खड़ा हो जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं जिनको अपने स्कूल का मुँह भी परीक्षा के दौरान पहली बार दिखाया जाता है। स्कूल की चारदीवारी का कोना-कोना उनसे इस कदर अपरिचित होता है कि वे अकेले अपने क्लास-रूम तक जाने में असमर्थ रहती हैं। उनकी शकल-सूरत भी दया की पात्र दिखाई देती है। पर दस-पन्द्रह दिन की जद्दोजहद से मिली मार्कशीट के आधार पर सरकारी कृपा वाली कन्या विद्याधन योजना उनके जीवन में थोड़ा सा 'अर्थ' तो जरूर प्रदान करती है। ऐसा तात्कालिक लाभ उनके परिवार वालों को उनकी वैवाहिक योजनाओं को सफल बनाने में जरूर मदद करता है। परन्तु इस तरह की शिक्षा-दीक्षा से यह जरुरी नहीं है कि वैवाहिक योजानाओं की सफलता की तरह उनकी भावी जिंदगी को भी कोई सम्मानजनक अर्थ मिल सके।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, March 6, 2015

होली के रंग में तंग

अपनी तो 'होली' भी होली पर किसी ने न तो जबरदस्ती मुझे रंग डाला और न ही चेहरे पर लगे रंग वाली एक भी तस्वीर खींची... इस बार मेरे हमजोली जो नहीं थे। फिर ऐसे में भला मेरी फ़ोटो कौन खींचता! वैसे भी इस बार मैंने बहुत रंग नहीं खेला| यह अच्छा ही हुआ वर्ना बिना रंग वाली होली की तस्वीर में बेइज्जती हो जाती। मेरे पड़ोसियों ने मेरे चेहरे पर बड़ी इज्जत के साथ थोड़ा-थोड़ा गुलाल लगाया।अपने-अपने कैमरे से मेरी तस्वीर भी खींची पर वे उसे अपने घर ले गये।

मन हुआ की बच्चों से कह दूं कि-जरा मुँह में लगे गुलाल के संग एक मेरी भी फ़ोटो खींच दो... लेकिन वे अपने रंग में इस कदर सराबोर थे कि पूछिये मत... मैंने भी सोचा छोड़ो जाने दो... उस समय उनसे फ़ोटो खिंचवाना उनके रंग में भंग डालने जैसा था। इस प्रकार इस होली की मेरी एक भी तस्वीर नहीं है जो मैं भी व्हाट्सएप और फेसबुक पर लगाऊँ।

इससे पहले कि आप लोग इन्हें लानत भेजे मैं अस्पष्ट कर दूं कि गाँव में इनकी भाभियों की शिकायत थी कि -"कई सालों से देवर के संग होली नहीं खेली, बिना देवर के होली का रंग फीका हो जाता है" और इनका भी कहना था कि भाभियों के रंग लगे हाथों से पुआ खाने-खिलाने का तो मजा ही कुछ और है ! सो मैंने इन्हें जाने दिया।

फिलहाल अपना तो कोई सगा छोटा देवर भी नहीं है जिसके साथ होली खेलती। बच्चों की यहाँ पर अपनी अलग कम्पनी है, जिसे वे होली में छोड़कर कहीं और जाना पसन्द नहीं करते हैं। उनको रंग खेलते देखकर मुझे भी बहुत आनन्द आता है।

इस बार व्हाट्सएप पर दोस्तों, मम्मी-पापा और भाइयों की होली में रंग लगे फ़ोटो के साथ लाइव कमेंट्री भी चल रही थी। उसे देखकर बचपन में भाइयों और दोस्तों के साथ की होली याद आ गयी। आज यकायक ऐसा लगा कि फिर से अगर संभव होता तो मैं भी अपनी "घर वापसी" करा लेती।

(रचना त्रिपाठी)

 

Wednesday, January 14, 2015

पीके जैसी फिल्मों से सीखती पीढ़ी

आज सुबह-सुबह मेरी बचपन की सहेली का फोन आया। वह एक तरफ थोड़ी परेशान सी लग रही थी तो दूसरी तरफ अपनी बात बताते हुए हँसती भी जा रही थी। मैंने बोला- "अजीब हो यार, या तो पहले मुझे पूरी बात बताओ या पहले खूब हंस लो।" वह चुप हो गयी और अपने को संयत करके बताने लगी। उसकी बातों में शर्मिंदगी भी थी और झुंझलाहट भी; फिर भी बीच-बीच में हँसती जा रही थी। बच्चों ने हरकत ही ऐसी की थी कि उसपर न तो क्रोध किया जा सकता है, न उसे स्वीकार किया जा सकता है और न तो सराहा ही जा सकता है। बता रही थी कि उसका दस साल का बेटा अपने पिता से पीके फ़िल्म में “डांसिंग कार” के बारे में बात कर रहा था। बेटे ने कहा-

pk-parody

" वो डांसिग कार नहीं थी पापा।"

पापा ने पूछा- फिर क्या था..?

"उसमें सेक्स हो रहा था"

वो क्या होता है..?

"इसी से तो पापुलेशन बढ़ता है"

तुम्हें कैसे पता चला.?

"फ़िल्म से ही, आपने देखा नहीं उसमें स्ट्राबेरी फ्लेवर कामसूत्र  कंडोम का सीन था...!"

वो क्या होता है..?

"अरे मेरे बुद्धू पापा! वो पापुलेशन कंट्रोल ले लिए सेक्स के दौरान पहना जाता है"

पापा की थूक तो गले में सटक गई। बेटे का डिस्क्रिप्शन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसने फिर बताया-

" पापा मुझे तो लगा कार में बच्चा पैदा हो रहा हो रहा है"

वो कैसे पता चला..?

“आपने सुना नहीं उसमें इह.. इह..की आवाज आ रही थी। ”

अब उसे हम दस साल का बच्चा कहें या दस साल का जवान बेटा! हद होती है। हास्य और मनोरंजन के नाम पर ऐसे फूहड़ दृश्य परोसे जा रहे हैं जो हमारे सामान्य जन जीवन का हिस्सा भी नहीं हैं। हो सकता है फिल्म के कर्ता-धर्ता लोग ऐसे वातावरण में रहने के आदी हों लेकिन भारतीय समाज के आम आदमी के लिए तो इस फिल्म ने लगातार मर्यादा की सीमा पार की है। व्यावसायिक सिनेमा बनाने वालों की अधिक से अधिक पैसा कमाने की चाह और उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में उलझा हुआ जनमानस मिलकर जो काकटेल बना रहे हैं उससे मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसे असहज दृश्य उत्पन्न होते ही रहेंगे। हम एक भयानक पैराडाइम-शिफ़्ट देख रहे हैं।

फिल्मों में आजकल जिस तरह के दृश्य दिखाये जा रहें हैं उसपर हमारे बच्चों का बालमन समय से पहले वयस्क हो रहा है। इन फिल्मों से करोड़ों की कमाई करने वाले डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और एक्टर ने फ़िल्म बनाते समय देश के नौनिहालों के बारे में रत्ती भर भी विचार नहीं किया होगा; और सेंसर बोर्ड ने तो अपनी आँख पर सिर्फ धर्म से जुड़ी समस्याओं का ही चश्मा चढ़ा रखा होगा; जिसने इन बेहूदे दृश्यों को नजरअंदाज कर फ़िल्म दिखाने की इजाजत दे डाली होगी। इन फिल्मी कलाकारों का क्या इन्हें तो सिर्फ अपने नाम, पैसा और शोहरत से मतलब है। हमारे बच्चों के भविष्य से तो जैसे कोई ताल्लुक़ ही न हो। सत्यमेव जयते के माध्यम से लोकप्रिय प्रवचन देने वाले आमिर खान से इसकी उम्मीद नहीं थी।

एक तरफ आमिर खान की फ़िल्म थ्री इडियट्स ने मासूम बच्चों के सामने नार्मल डिलेवरी की प्रक्रिया  का सीधा प्रसारण कर डाला तो दूसरी तरफ अब फ़िल्म पीके में बार-बार डांसिंग कार का दृश्य दिखाकर हमारे बच्चों को सेक्स के बारे में और जानने की उत्कंठा बढ़ा दी। ज़रा सोचिए, ऐसे दृश्यों से उनके दिमाग में कितने रहस्य अपनी छाप छोड़ गए होंगे...? अब ये बालमन आगे क्या करेगा.. उनका जिज्ञासु मन किस प्रकार शांत होगा..?

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 7, 2015

लोकल बनाम नेशनल देवी...

हमारे गाँव में किसी भी यज्ञ-प्रयोजन के सकुशल सम्पन्न हो जाने के बाद घर के सामने वाले बाग में स्थापित काली माँ के मंदिर में ‘कड़ाही चढ़ाने’ की परम्परा है। जहाँ पूजा-पाठ के बाद कच्ची मिट्टी के चूल्हे या मिट्टी के तेल से जलने वाले स्टोव पर गरमा-गर्म हलवा और पूड़ी - चाहे वह शुद्ध देशी घी का हो या कच्ची घानी सरसो के तेल में बना हो - उसे मंदिर परिसर में ताजा बनाकर ही देवी माँ का भोग लगाया जाता है।

यथा शक्ति तथा भक्ति की परिपाटी में देवी माँ को बस साफ-सुथरा “अपनी आँखों के सामने” बना प्रसाद ग्रहण करना पसन्द है। यहाँ घर से बनाकर लाने या बाजार से खरीदकर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा नहीं है। उस मन्दिर के सामने कोई ऐसी दुकान नहीं है जिसपर रेडीमेड प्रसाद मिलता हो। गाँव-गाँव में स्थापित कोट माई, बरम बाबा, काली माई, डीह बाबा, इत्यादि नामों से प्रचलित देवी-देवताओं के असंख्य स्थानों पर यही होता है। नहा धोकर जाइए, अपनी श्रद्धा के अनुसार शीश नवाइए, कपूर-अगरबत्ती जलाइए या कड़ाही चढ़ाइए। कोई दक्षिणा नहीं देना पड़ता, न दानपात्र रखा होता है और न यहाँ किसी की पंडागीरी चलती है।

महालक्षमी मंदिर

महालक्षमी मंदिर

इस पूजा-विधि में प्रसाद बनाते वक्त साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। चाहे वह बर्तन की शुद्धता और सफाई हो या उस प्रसाद को बनाने वाले के लिए स्नान करके साफ धुले कपड़े पहनने की आनिवार्यता हो या फिर उस स्थान की लिपाई-पुताई करके स्वच्छ रखने की जहाँ चूल्हा जलाया जाता है। बिना स्नान किये और धुला-धुलाया वस्त्र पहने कड़ाही चढ़ाने पर निषेध है। ऐसा माना जाता है कि इस विधि में थोड़ी सी भी चूक देवी माँ को मंजूर नहीं है। वह शीघ्र ही कुपित हो जाती हैं और लापरवाही बरतने वाले के ऊपर ही सवार (प्रकट) हो जाती हैं। इस भय से लोग साफ-सुथरा प्रसाद बनाने में विशेष सावधानी बरतते हैं। बिहार की प्रसिद्ध छठ पूजा में तो शुद्धता की जबरदस्त संहिता का पालन होता है।

बच्चों को उस प्रसाद से थोड़ा दूर ही रखा जाता है कि कहीं वे उसे देवी माँ को अर्पित करने से पहले जूठा ना कर दें। जूठा मतलब देवी माँ को हलवा पूरी चढ़ाने (भोग लगाने) से पहले बच्चों द्वारा चख लिया जाना जूठा हुआ मान लिया जाता है। वैसे ही जैसे गाँव में सासू जी के भोजन करने से पहले अगर बहू ने खा लिया तो उस भोजन को सखरी यानी जूठा मान लिया जाता है। आज भी गाँव के देवी-देवता के वहां इसी विधि से प्रसाद बनाकर चढ़ाया जाता है। जिसे बहुत मन हुआ उसने प्रसाद के साथ एक-दो सिक्के चढ़ा दिए नहीं तो वे फूल-अक्षत, धार-कपूर आदि चढ़ा देने से ही प्रसन्न हो जाती हैं।

इसके विपरीत बड़े सिद्ध स्थलों पर जहाँ दूर-दूर से भक्तगण दर्शन के लिए आते हैं वहाँ इसी देवी माँ के दर्शन के लिए पंडा जी लोग तो रेडीमेड महंगे प्रसाद और कीमती चढ़ावे लेकर आने वाले भक्तों पर ही इनकी कृपा बरसने देते हैं। यानी वहां देवी माँ की उतनी नहीं चलती जितना कि उनके पहरू बने पण्डा महराज की चलती है। भले से वह प्रसाद बासी ही क्यों ना हो। व्यावसायिक स्तर पर वह कहाँ और कैसे बना इससे उनका कोई सरोकार नहीं होता। उसकी शुद्धता के बारे में भक्तगण भी शायद ही सोचते हों। मंदिरों के बाहर सजी प्रसाद की प्रायः सभी दुकानें भक्त गणों के जूते चप्पल रखवाने की सुविधा भी देती हैं, यानि देश भर के जूते चप्पल उस प्रसाद के बगल में ही रखे जाते हैं। मंदिर प्रबन्धन द्वारा जूता-चप्पल रखवाने की जो व्यवस्था की जाती है उसका प्रयोग करने के बजाय भक्तगण प्रसाद की दुकान में ही उसे रखना श्रेयस्कर समझते हैं।

मंदिर के भीतर भक्त महोदय पूर्ण स्नान करके आये है या नहीं यह कम महत्वपूर्ण है लेकिन उनके हाथ का चढ़ावा कितना दमदार है उसी से उनकी गरिमा का आकलन पंडा जी करते हैं। बड़े-बड़े मन्दिरों के आस-पास की दुकानों में मॉल की तरह सजा हुआ प्रसाद भी शायद ब्रांडेड हो जिसपर देवी माँ आँखमूंद कर विश्वास कर लेती हों। तभी तो भक्तगण को उनके कुपित हो जाने का कोई भय नहीं होता। मुझे तो यही माजरा समझ में आता है। नहीं तो फिर हमारे गाँव की देवी माँ शायद कम पढ़ी-लिखी पुराने खयालों की दकियानूस टाइप हों उन सासू माँ जैसी जिनका गुस्सा उनकी नाक पर ही होता है।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, December 4, 2014

इज्जत बचाने की सहनशक्ति...?

आज सुबह बच्चों को स्कूल-बस तक छोड़ने के लिए बिल्डिंग के नीचे आकर बाहर सड़क पर निकली तो देखा एक भाईसाहब सामने की दुकान से आँख मलते हुए बाहर निकले और सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग की चारदीवारी की ओर बढ़े। उन्होंने आव देखा न ताव, मेरे सामने ही दीवार पर मूत्र विसर्जन की तैयारी करने लगे। पहले तो मैं थोड़े असमंजस में पड़ गयी, फिर मैंने सोचा कि इन्हें एक बार आवाज देकर जगा ही दूँ। शायद इनकी तमीज की नींद खुल जाय। हमने टोका - भाई साहब क्या कर रहे हैं आप..? वे अपना एक हाथ उठाकर अफसोस नुमा चेहरा बनाकर मेरी बात मान गये और उल्टे पांव वापस चले गये। तब तक उसी दुकान से दूसरे महाशय जो बहुत दबाव में दिखे उसी मुद्रा में कूदते हुए चले आ रहे थे। मुझे वहाँ खड़ा देखकर अचानक उनके कदम रुक गये और वे अपने एक हाथ से सिर का बाल सहलाते हुए वहीं खड़े हो गये।

दोनों शरीफ़ प्राणी करीब दस मिनट तक मेरे वहाँ से चले जाने का इंतजार करते रहे। मैं भी उनकी इस परेशानी को समझ रही थी मगर क्या करती; स्कूल-बस आज देर कर रही थी। सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी का तकाजा था कि जबतक बच्चे बस के भीतर न चले जाँय तबतक वहीं प्रतीक्षा करती रहूँ। इस प्रतीक्षा अवधि में मेरा मन सामने प्रकट हुए इस मुद्दे पर सोचता रहा। यह प्राकृतिक कार्य तो वे वहीं रोज करते हैं। उनके इस कृत्य से हम बिल्डिंग वाले परेशान भी रहते हैं। इनकी लघुशंका का समाधान करते-करते प्रायः बन्द रहने वाला हमारी बिल्डिंग का पिछला गेट तो खराब हो ही चुका है अब चार दीवारी की बारी है। हमने मजबूर होकर उस गेट को भी खोलने बन्द करने का सिलसिला शुरू कराया,  दो-तीन बार तो वहां चूना भी डलवाया ताकि गंदगी कट जाय और कहीं इनके आँख में थोड़ा सा भी पानी बचा हो तो स्वच्छता पर घिरे इनकी फूहड़ता के बादल छँट जाय।

खैर जो भी हो, उनकी आँखों में अपने लिये इतना लिहाज़ देखकर मैं खुश थी। तब मैने उन्हें वहां कभी भी पेशाब करने से मना किया। उन्हें ये बात रास नहीं आयी और बड़ी ही बेशर्मी से हमसे ही पूछ बैठे- तो आपही बता दें कि हम इसके लिये कहाँ जाएँ? मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी। हक्का- बक्का खड़ी थोड़ी देर तक अपने दायें-बायें झांककर मानो उनके लिए विकल्प तलाशती रही; लेकिन कुछ नजर नहीं आया। अब उस आदमी की बड़ी-बड़ी लाल आँखें और काला-कलूटा चेहरा देखकर मुझे थोड़ा डर भी लगने लगा। मगर इस डर को मैंने दूर झटक दिया और उन्हें अपनी दुकान वाली बिल्डिंग में ट्वाएलेट बनवाने की सलाह दे डाली।

उन्होंने यह कहते हुये साफ मना कर दिया कि हमारी बिल्डिंग में शौचालय के लिये जगह नहीं है। हम नहीं बनवा सकते। मतलब उनके पास बस यही एक विकल्प था। साफ था कि इनके अंदर सामाजिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। फिर मै अधिकारों की बात पर उतर आयी और उनसे साफ-साफ कह दिया कि आपको हमारी बिल्डिंग की दीवार और गेट को गंदा करने का कोई अधिकार नहीं है। क्या आप अपने दरवाजे पर; दुकान के सामने या दुकान के अंदर पेशाब कर सकते हैं..? यदि ऐसा कर सकते हैं तो बिल्कुल करें मैं मना नहीं करुंगी। यह आपकी समस्या है; पर सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग पर मत करें। इस बात पर उनकी बोलती बंद हो गई। शायद सोच रहें होंगे कि शराफत का जमाना नहीं है थोड़ी सी तबज्जो दी तो सिर पर चढ़ गयी।

बिल्डिंग के अंदर कुछ शुभचिंतक टाइप महिलाएं मुझे इस तरह से मर्दों के साथ टोका-टाकी करने से मना करती हैं। उनका कहना भी सही है कि कौन जाने ये मर्द किस बात पर इगो पाल लें, घात लगाये बैठे रहें और कहीं मौका मिलने पर मेरे साथ कुछ उँच-नीच कर बैठें। फिर तो समाज में मेरी क्या ‘इज्जत’ रह जायेगी? लेकिन ये बात मेरी समझ में नहीं आती है कि कितनी नाजुक और भंगुर होती है स्त्रियों की इज्जत जो एक बार चली गई तो फिर लौट कर नहीं आती; यह भी कि कैसे-कैसे जघन्य अपराध सह लेने के बाद भी बनी रहती है और जरा सी बात हवा में फैल जाय तो चकनाचूर हो जाती है।

इज्जत के नाम पर एक अवांछित प्रेम-संबंध के लिए एक लड़की की हत्या करने में जब एक स्त्री भी शामिल हो जाती है तो उसकी इज्जत नहीं जाती, घर के भीतर तमाम तरह के शोषण और बलात्कार का शिकार होते हुए भी उफ़्फ़ तक न करने पर इज्जत बनी रहती है लेकिन अगर शिकायत की आवाज बाहर निकल गयी तो इज्जत मटियामेट हो जाती है। किसी धोखेबाज भेंड़िए की वासना का शिकार हुई मासूम बेटी का गर्भपात किसी महिला डॉक्टर को मोटी रकम देकर चुपके से करा देने पर इज्जत बची रह जाती है लेकिन उस अपराधी के खिलाफ आवाज उठाते ही इज्जत तार-तार हो जाती है। राह चलते हुए आगे-पीछे से सीटी मारते लफंगो और उनकी अश्लील टिप्पणियों के बीच सिर झुँकाए अपमान का घूँट पीते हुए घर लौट आने पर इज्जत बची रहती है लेकिन पलट कर मुँहतोड़ जवाब देते ही इज्जत में बट्टा लग जाता है।

उफ्फ..इन महिलाओं को  कैसे उबारा जाय इस इज्जत जाने की ‘फोबिया’ से जो उन्हें अपने लिए ही कुछ अच्छा करने से रोकता है और चैन से सोने भी नहीं देता।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 17, 2014

मर्दानी से खुशफहमी न पालें

मर्दानी फिल्म में रानी मुखर्जी ने औरत होते हुए भी जब बड़े-बड़े मुस्टंडो को मार-मार के बेहाल कर दिया, उनके हाथ-पैर तोड़कर जमीन पर लिटा दिया तो हॉल में तालियाँ बजाने वालों की कमी नहीं थी। खुश तो हम भी हुए; लेकिन बस थोड़ी देर के लिए। बाहर निकले तो जमीनी सच्‍चाई के बारे में सोचने लगे जो बिल्कुल अलग है।

जब मैं कक्षा ग्यारह में पढ़ती थी, अपने-आप को पी.टी. ऊषा से कम नहीं समझती थी। कहने का मतलब मैं धाविका थी। स्कूल की एथलेटिक्स चैम्पियन; जिससे मुझे यह गलतफहमी हमेशा बनी रहती थी कि मैं अपने भाइयों से बहुत ज्यादा ताकतवर हूँ। बात–बात पर अपने भाइयों को चैलेंज दिया करती थी- मुझसे तेज दौड़कर दिखाओ..चलो मुझसे पंजा लड़ाओ। तब वे शायद मुझे खुश करने के लिए कह दिया करते थे - “तुम मुझसे ज्यादा तेज दौड़ती हो और ताकतवर भी हो, हमें हरा दोगी।” यह कहकर वे मुझसे रेस करने से पहले ही हार मान जाया करते थे। मैं इस मुगालते में लम्बे समय तक अकड़ी रहती थी। मुझसे मात्र डेढ़ साल का छोटा था मेरा भाई जिससे मेरे अक्सर दो-दो हाथ हो जाया करते थे।

एक दिन की बात है। उससे मेरी खूब जमकर लड़ाई हुई। मैं लगातार उसे अपने दोनो हाथों से मुक्‍के जड़ी जा रही थी। घर में पापा की सख़्त हिदायत थी कि कोई भी छोटा (भाई/ बहन) अपने से बड़े के ऊपर हाथ नहीं उठाएगा। पापा के इस निर्देश की मुझे याद दिलाते हुए वह कह रहा था पापा ने ऐसा कहा है इसलिए मैं तुम्हारे ऊपर हाथ नहीं उठा रहा हूँ; वरना...। मैं फिर भी नहीं रुकी तो उसने आखिरी चेतावनी दी, “दीदी, मै जब तुम्हें मारुंगा तो नानी याद आ जाएंगी।” मैं बहुत आश्वस्त थी कि वह मेरे ऊपर हाथ नहीं उठाएगा और अगर उठाता भी है तो मैं उसपर भारी पड़ूंगी। लेकिन मैं गलत थी। जब मेरी मार भाई के बर्दाश्त से बाहर हो गई तो उसने मेरा दाहिना हाथ कलाई से पकड़ लिया, ऐंठकर मेरी पीठ के पीछे कर दिया और धम्म से दे मारा एक ‘जोरदार मुक्का’ मेरे पीठ पर।लड़ाईबस, फिर क्या था... एक ही मुक्‍के में मेरे अंदर की सांस अंदर और बाहर की सांस बाहर ही अटक गई। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और मुझे ‘दिन में ही तारे नजर आने’ का वास्तविक अर्थ पता चल गया। मेरी हालत देखकर वह अपराधबोध से भर उठा। घबराकर वह मेरी पीठ सहलाने लगा और सफाई देते हुए बोला- “कितनी बार तुमसे कहा था कि मुझसे मत लड़ा करो.. देखो मुझे भी तुमने बहुत मारा है.. मैं तुम्हें मारता नहीं.. मुझे बहुत चोट लग रही थी.. और तुम हो कि मान ही नहीं रही थी... तो मैं क्या करता...”

मेरे बड़े भईया कुछ दूरी पर बैठे इस महाभारत का आनंद ले रहे थे। हमारी लड़ाई कब खेल-खेल से मार-पीट में बदल जाय इसका कोई ठिकाना नहीं था। ऐसे में मम्मी की भूमिका सिर्फ इतनी होती कि जब हममें वाद- विवाद होता तो वे हमको कहती- “जब तुम दोनों लड़ते-लड़ते हाथ-पैर तोड़-फोड़ लेना तब मुझे बुला लेना। आकर मैं दोनो की मलहम-पट्टी कर दूंगी। जरूरत पड़ी तो डॉक्टर के यहां भी ले जाउँगी। क्योंकि यहां तो मामला बराबरी का है। दोनो में से कोई मेरी सुनने वाला नहीं है।”

इस चोट के बाद मन ही मन मैने कसम खायी कि आज के बाद मैं अपने भाइयों के ऊपर हाथ नहीं छोड़ूंगी। गाल चाहे जितना बजा लूँ।

आज भी सोचती हूँ कि मैने उससे कम रोटियां नहीं खायी थी; और ना ही मम्मी ने मुझसे छुपाकर उसे ज्यादा दूध-दही खिलाया-पिलाया था। लेकिन मैं उससे बड़ी होते हुए भी जीत नहीं पायी। उसका एक मुक्‍का मेरे सौ मुक्‍कों पर भारी पड़ा; क्योंकि मैं उसके जैसी ताकतवर नहीं थी। यहाँ मेरी माँ ने कोई नाइंसाफी नहीं की थी। मुझे बनाने वाले ने ही मुझसे पक्षपात किया था। मैं जब भी उसके पास जाउँगी तो उससे इस बात की शिकायत जरूर करुँगी। यह बात भी सत्य है कि अगर ईश्वर ने लड़कों जैसी शारीरिक ताकत लड़कियों को भी दी होती तो इस देश का मंजर कुछ और होता। फिल्मों में एक ताकतवर स्त्री का अभिनय करना हकीकत से बिल्कुल अलग है। अगर सच में वैसा होता तो हर एक माँ अपनी बेटी को खूब खिला-पिला कर ‘‘मर्दानी” जरूर बनाती।

उस दिन को हम आजतक नहीं भुला पाए। इतने सालों बाद भी हम भाई-बहन जब मिलते हैं तो वह मुझे अपने उस एक मुक्‍के की याद जरूर दिलाता है। मैं उसे यह कहकर टाल दिया करती हूँ कि वह ऊधार है मेरे ऊपर, घबड़ाओ नहीं मौका मिलते ही चुका दुंगी। अब तो इसपर खूब ठहाके लगते हैं।मर्दानी

(रचना त्रिपाठी)

Friday, February 7, 2014

नेटजनित असाध्य रोग

आजकल एक ऐसी बीमारी का प्रादुर्भाव हो गया है जो 13 साल के नवयुवक से लेकर 73 साल के बुजुर्गो में पायी जा रही है। इस बीमारी का प्रकोप फेसबुक के माध्यम से हुआ है जिसका हाल ही में नामकरण किया गया है  ‘लाइकेरिया’। इसका संबंध बनस्पति विज्ञान से संबंधित किसी पेड़-पौधे से नहीं है। इसे अंग्रेजी के ‘लाइक’ शब्द से लिया गया है। फेसबुक पर इस रोग की तीव्रता नापने का ‘लाइकोमीटर’ तो बना है, लेकिन इसका कोई इलाज नहीं ढूँढा जा सका है। डाक्टरों के मुताविक यह बीमारी छूआ-छूत से नहीं वरन्‌ मात्र देखा-देखी से उत्पन्न हो जाती है। पहले यह बीमारी मुख्य रूप से शहरों के उन कंप्यूटरधारक मनुष्यों के बीच फैली जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन होता था। तब इसे मधुमेह और रक्तचाप की तरह अमीरों की बीमारी कहा जा सकता था; लेकिन इस बीमारी के किटाणुओं ने मोबाइल फोन्स के जरिये अपना प्रसार तेजी से करना शुरू किया जिसमें एंड्रायड की भूमिका तगड़े उत्प्रेरक की हो गयी।

अब इस बीमारी ने शहरों के साथ-साथ गांवों में भी पैर पसार लिया है। यह महामारी बहुत तेजी से फैल रही है। इसकी चपेट में न सिर्फ़ विद्यार्थी और कामकाजी नौजवान आ रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में मध्यम वर्गीय गृहिणियाँ भी इसका शिकार हो रही हैं। इसकी रोक-थाम करने में सरकार भी फेल होती नजर आ रही है। बल्कि सरकार का ध्यान इस ओर गया ही नहीं है जो जाने-अनजाने इसके प्रसार में सहयोग प्रदान कर रही है। लोगों में इस बीमारी के प्रति जो आकर्षण है वह किसी नशे से कम नहीं है। इसे पकड़ लेने के लिए सबके बीच एक होड़ मची हुई है।

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते ही जिस बीमारी के पकड़ने का डर पहले हुआ करता था उसे नाम दिया गया - लवेरिया। इस बीमारी की चपेट में किशोर-किशोरी कब आ जाते हैं उन्हें खुद भी पता नहीं चल पाता। जब पता चलता है तो बहुत देर हो गयी रहती है। इस उम्र के बच्चों के सभी अभिभावको को यह चिंता सताती है कि कहीं उनका बच्चा लव-वब के चक्कर में न पड़ जाय। यह अकेली एक ऐसी बीमारी है जिस पर पूरे समाज का पहरा लगा रहता है; लेकिन फिर भी यह सेंध मार कर अपना असर छोड़ ही जाती है। लाख पहरे के बावजूद लवेरिया जैसी महामारी से कच्ची उम्र में पार-पाना मुश्किल ही रहता है। लेकिन अब लाइकेरिया नामक नयी बीमारी इस रोग को पीछे छोड़ती जा रही है। अब बच्चों को एक जगह अटकने का कोई स्कोप ही नहीं रहा। उनके मित्रों की संख्या अब एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों में होती है जो लगातार बढ़ती रहती है। बीच-बीच में कुछ लोग अमित्र भी कर दिये जाते हैं। इस तरह देखा जाय तो प्रेम-व्यवहार की दुनिया में बहुत तेजी से परिवर्तन आ गया है। यह लाइकेरिया का सकारात्मक पहलू माना जा सकता है।

हम पर ईश्वर की बड़ी कृपा रही कि हम भी इस बीमारी की चपेट में बहुत बार आते-आते बच गये। इस रोग की एकाध चिनगारी उठी भी तो अफसोस! उसे पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाया। इस दौर से गुजरने के बावजूद मुझे लाइकेरिया से ग्रसित नहीं होना पड़ा। लेकिन इसका कारण है एक दूसरी बीमारी जो है तो टुच्ची सी लेकिन मुझे लाइकेरिया से बचाये रखती है; और फिलहाल हल्के नशे की तरह आनन्द भी दे रही है। यह बीमारी कुछ साल पहले मेरे पतिदेव को लगी थी, उन्हीं से मुझे मिल गयी। इसका नाम है- ‘ब्लॉगेरिया’। एक जमाने में इसका जोर भी बहुत बढ़ गया था लेकिन इस मुए फेसबुक वाली लाइकेरिया ने इसे धकिया कर किनारे कर दिया है। अब मैं भी ब्लॉगेरिया से आए-दिन तौबा करती रहती हूं लेकिन यह छोड़ने का नाम ही नहीं लेती। जब देखो तब यह हमें ऊल-जुलुल लिखने को मजबूर करती रहती है।

सरकार ने मलेरिया और फाइलेरिया जैसे रोगों पर नियंत्रण के लिए तमाम अभियान चला रखे हैं और इसके सकारात्मक परिणाम भी आये हैं। इनका आक्रमण अब पढ़े-लिखे मध्यम वर्गीय युवाओं पर प्रायः मंद पड़ गया है। लेकिन इन नये रोगों की गिरफ़्त में आ गये लोगों पर कुढ़ रहे डाक्टर हाथ पर हाथ रखे मरीजो का इंतजार करते हैं कि वह कंप्यूटर और मोबाइल की फेसबुक से उठे तो कुछ बात बने।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, October 28, 2013

नक्कारों की फौज भर्ती को तैयार…

प्रदेश सरकार की मेहरबानियों पर पलता-बढ़ता हमारा समाज और इस समाज के युवा वर्ग की हालत देखकर मन उद्विग्न है। यह प्रचार हो रहा है कि उनकी पढ़ाई के लिए कितने खर्चे अपने सिर पर ढो रही है उत्तर प्रदेश की सरकार। इन बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक बनी रहे इसके लिए इन्हें कितने तोहफे बांट चुकी है। लेकिन सच्चाई यह है कि नकल की खुली छूट देकर बोर्ड परीक्षाओं में सामान्यतः सत्तर प्रतिशत से ऊपर अंक देने के बाद एक-एक घर में चार-चार लैपटॉप और टैबलेट बाँटना कहीं से जायज नहीं कहा जा सकता। राजनीति के तोहफे इसी प्रकार लुटाये जाते है हमारे देश के बेरोजगार युवाओं पर। सरकार अब उन्हें आसान नौकरी का भी तोहफा देने की तैयारी कर चुकी है।

उत्तर-प्रदेश में ग्राम पंचायत अधिकारियों की भर्ती होने जा रही है। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा के अंको के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जायेगी और रिक्तियों के दस-बीस गुना अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए काल कर लिया जायेगा। जिले के सरकारी अधिकारी इनका इंटरव्यू लेंगे और उसमें प्राप्त अंकों के आधार पर नियुक्ति कर दी जाएगी। यानि कोई लिखित प्रतियोगी परीक्षा नहीं करायी जाएगी। एक अभ्यर्थी चाहे जितने जिलों से आवेदन कर सकेगा और अपना भाग्य आजमा सकेगा। इस भर्ती प्रक्रिया में बेरोजगार युवाओं से अधिक तैयारी और दौड़-धूप उनके अभिभावक कर रहे हैं। जिसकी जितनी ऊँची पहुँच और जितनी भारी जेब है वह उतना अधिक आश्वस्त है।

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के सबसे निचले स्तर की इकाई ग्राम पंचायत के सचिव की कुर्सी की शोभा बढ़ाने वाले इन ग्राम पंचायत अधिकारियों की सरकारी योजनाओं को ग्राम स्तर पर लागू करने में बहुत अहम भूमिका होती है। इसलिए इस पद के लिए एक से बढ़कर एक बोली लगायी जा रही है। सुना है एक कैन्डीडेट पर करीब बारह लाख रूपए तक की बोली लग चुकी है। देखना रोचक होगा कि तृतीय श्रेणी के इस पद के लिए बारह लाख देने वाले ‘बेरोजगार’ की हैसियत क्या होगी? जो बेरोजगार बारह लाख नहीं दे पायेगा वह अपने आप को जीवन भर कोसता रहेगा। अब इस बारह लाख के लिए उन्हें या उनके घर वालों को जाने कौन-कौन से कार्य करने पड़ेंगे- चोरी, डकैती लूट, हत्या और आत्महत्या जैसे अनेक प्रयासों के वे भागीदारी बनेंगे।

ऐसे युवाओं को शुरू से ही भ्रष्टाचार और निकम्मेपन की राह पर भटकाने के अलावा हमें उनके हित की कोई बात नही दिख रही। इन शर्तों पर भी यदि भर्ती प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है तो इन ग्राम पंचायत अधिकारियों के हाथों हमारा गांव और समाज किस तरह का विकास कार्य कर पाएगा?

प्रदेश सरकार ऐसे में बेरोजगारों को रोजगार देने जा रही है, या गोंवों के विकास के लिए एक प्रतिबद्ध कर्मचारी? बारह लाख देने के बाद वह बेरोजगार कैसे विकास का कार्य करेगा? इस पर जरा एक बार हम सबको विचार करना चाहिए और इस भर्ती प्रक्रिया की जड़ों को तलाशना चाहिए। जो सरकार अपने प्रशासनिक तंत्र में योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के निष्पक्ष चयन को प्राथमिकता देने के बजाय नकलची और जुगाड़ू लड़कों की नकारा फौज भर्ती करने पर उतारू हो उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है?

ऐसा कहा गया है कि मेहनत के फल मीठे होते हैं। लेकिन यह कैसा फल है? जिसमें हमें न तो मेहनत नजर आ रही है और ना ही ईमानदारी नाम की कोई चीज। यह सरकार तो बेरोजगार युवाओं के साथ खिलवाड़ करती नजर आ रही है। एक उच्च शिक्षा प्राप्त युवा मुख्यमंत्री के हाथों में चलती सरकार से क्या यही उम्मीद थी? उन्हें अपने प्रदेश के युवाओं के साथ इस तरह का भद्दा मजाक नहीं करना चाहिए। यह सस्ती लोकप्रियता का हथकंडा प्रदेश और इसके युवाओं को ले डूबेगा। तो क्या वह गद्दी बची रहेगी जिसे बनाये रखने के लिए यह आत्मघाती राह चुनी जा रही है।

क्या किसी न्यायालय की दृष्टि इस बड़ी धांधली की साजिश पर पड़ने का समय नहीं आ गया जो समय रहते इसको रोकने के लिए प्रभावी कदम उठा सके? नौकरशाही क्या इतनी कमजोर और डरपोक हो गयी है जो साफ-साफ दिख रही अंधेरगर्दी को आगे बढ़ाने में बिल्कुल संकोच नहीं कर रही है? एक एक साफ-सुथरी प्रतियोगी परीक्षा कराकर योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों का चयन करने में हमारा तंत्र क्या बिल्कुल अक्षम हो चुका है? पिछले चार-पाँच सालों में टी.ई.टी., बी.टी.सी., टी.जी.टी., और शिक्षकों की नियुक्ति सम्बंधी तमाम प्रकरणों को देखने से तो यही महसूस हो रहा है।

(रचना)

Thursday, October 10, 2013

राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही...

 

राजनीति का मंच सार्वजनिक होता है... आखिर यह लोकतंत्र जो है. देश के हर नागरिक को राजनीति के क्षेत्र में भाग्य आजमाने का अधिकार है। सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी पर काबिल लोग आ सकें इसके लिए यह व्यवस्था की गयी होगी; लेकिन इस मंच पर जो आते हैं उनका बायोडेटा देखने पर हाल कुछ और नजर आता है। यहाँ आने के लिए जो काबिलियत चाहिए वह कुछ दूसरी तरह की है। पढ़ा-लिखा हो या नहीं इससे क्या मतलब है देश को..? चोर, लुटेरे, व्यभिचारी, सूदखोर, ब्लैकमेलर, हत्यारोपी, रंगदार, भांड़, नचनिया, गवनियां सब राजनीति के मजे चखना चाहते है... आखिर मालामाल जो है। इन्होंने तमाम गलत रास्तों से पहले पूँजी इकठ्ठा कर ली और फिर कूद पड़े।

पूछिए इनसे - राजनीति में आने के लिए कालाधन क्यों उगाते हो भाई? बोलेंगे- खाएंगे तभी तो खिलाएंगे.. इतनी सहूलियत और कहाँ मिलेगी इन्हें..? एक बार बस गद्दी हाथ लग जाय तो देखो कमाल इनका.. न तो कमर मटकाने की जरूरत पड़ेगी और न ही अपने फिटनेस के लिए किसी जिम में जाकर जी तोड़ मेहनत कर पसीने बहाने की.. इस देश की राजनीति में क्या जरूरत है किसी सोसल वर्कर की..? कहीं समाज जागरुक हो गया तो इनकी माला कौन जपेगा..?

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ऐसी स्थिति में पेशेवर सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए कोई गुंजाइश बचती है क्या? समाज के लिए कार्य करना अपना समय बर्बाद करने के बराबर है.. यूँ कहे तो राख में घी डालने के बराबर..। समाज इन्हें देता ही क्या है..? अमुक जी नाच-गाना कर के या दूसरे तरीकों से करोड़ों कमाकर रखे है- इसी दिन रात के लिए कि बैठाकर मुफ्त की रोटियाँ खिलाएंगे.. गाँव में वीडियो चलाकर तिवारी जी का नाच-गाना दिखाएंगे और उसके बाद कुछ खिला-पिलाकर सुबह वोट बटोर के ले जायेंगे.. फिर क्या! मंच पर कोई दूसरे बाबा का अवतार होगा..और फिर शुरू होगा ‘‘ओठवा में लगवले बाड़ी, कनवा में पहिने बाली चाल चलेली मतवाली, बगल वाली जान मारेली”। कितने रोजगार जैसे शिक्षक की भर्तियाँ इत्यादि सफेद पोशाक वाले सालों से सिकहर पर टांगे बैठे हैं कि कही कोई और बिल्ली झपट्टा न मार ले इनके वोट के खजाने को..।

..फिर क्या बगल वाली हो या अपना पड़ोसी, जान मारे या मरवाये.. हम तो भई! जैसे हैं वैसे रहेंगे.. देश मुंआ मुह पिटाये, आखिर यही तो होता रहा है आज तक यहाँ की राजनीति में.. ये कौन सी इस परम्परा से अलग हट कर कुछ नया करने को सोचने वाले हैं.. बड़का-बड़का राजनितिज्ञ तो जेल की हवा खा रहे हैं.. करमजला कानून ने भी एक लफड़ा लगा दिया है.. इनको आराम फरमाने का.. दूसरा कोई करे भी तो क्या..? ऐसा कोई माई का लाल पैसे वाला जन्मा ही नही कि चुनाव में अपना लगाकर जीत जाये.. क्योंकि यह भी जानते है आम जनता की हालत इतनी खस्ती है कि दो दिन भी भरपेट भोजन, दारू नाच-गाना में इनको मस्त कर दिए तो ३६३ दिन की चिंता तो इन्हें भूल जायेगी.. आखिर भूखमरी की शिकार जनता को दो-चार दिन खिला-खिला कर अघवाएंगे नही तो अपने फिर पाँच साल कैसे अघाएंगे..?

(रचना)

Sunday, December 20, 2009

जिस दिन एक गृहिणी के कार्यों को महत्व मिलने लगेगा उसी दिन नारीवादी आन्दोलन समाप्त हो जायेगा…।

मेरा भी अजीब दिमाग है छोटी-छोटी बातों को पकाने के लिए बैठ जाती हूं। कई दिनों से इस उधेड़-बुन में लगी हूं कि क्या पति-पत्नी एक साथ रह कर स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को समाज में व्यक्त नही कर सकते? क्या उनके विचार अलग-अलग होने का मतलब उनके आपस में अच्छे सम्बन्ध का नही होना बताता है? जरूरत के हिसाब से किसको कहाँ होना चाहिए, किसे कौन सी जिम्मेदारी निभानी है, इसका निर्णय मिल बैठकर कर लिया जाता है और पति-पत्नी में कोई विवाद नहीं पैदा होता, तो क्या यह खराब बात मानी जाएगी? दूसरों को यह तय करने की जरूरत ही क्यों पड़ती है कि घर की महिला और पुरुष में कौन अधिक स्वतंत्र है। क्या नारी की स्वतंत्रता तभी मानी जायेगी जब वह बात-बात पर पति का विरोध करती रहे?

मै पूछती हूँ कि पूरी तरह स्वतंत्र रहने का इतना ही शौक है तो नर-नारी वैवाहिक सूत्र में बंधते ही क्यों हैं?

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शादी करना किसी की भी मजबूरी नही होती। न ही शादी कर लेने से किसी कि स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होती है। शादी का मतलब ही यही होता है कि इस समाज को एक स्वस्थ माहौल देना। एक सामाजिक अनुशासन और सुव्यवस्था के लिए यह बहुत जरूरी है। मुझे तो लगता है कि शादी के बाद हमारी स्वतंत्रता बढ़ जाती है। व्यक्ति मानसिक रूप से और भी मजबूत हो जाता है। एक नारी को प्रकृति ने जो जिम्मेदारियाँ दी हैं उनका निर्वाह शादी के बगैर कैसे हो सकता है? शादी और परिवार के अनुभव से उसके निर्णय लेने की क्षमता और बढ़ जाती है। उसको गलत और सही का भान अच्छी तरह हो जाता है।

इलाहाबाद में हुए ब्लॉगर सम्मेल्लन में नामवर सिंह जी का यह वक्तव्य मुझे बहुत अच्छा लगा था कि ब्लॉगरी में  हम कुछ भी लिखने पढ़ने को स्वतंत्र है लेकिन इसके साथ एक जिम्मेद्दारी भी है कि हम क्या लिख रहे हैं। हमें स्वतंत्र होना चाहिए मगर स्वछन्द नही होना चाहिए कि जो मन में आया लिख दिया। ब्लॉगरी भी एक जिम्मेद्दारी है। इसी प्रकार हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से किसी भी क्षेत्र में भाग नहीं सकते।

क्या आप जानते है कि हर एक व्यक्ति को चाहे नर हो या नारी ईश्वर ने कितनी बड़ी जिम्मेद्दारी सौपी है? प्रत्येक नर-नारी का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस देश और समाज को एक सच्चा इंसान दे। अगर हम यह प्रण कर ले कि हमें स्वयं के रूप में और अपने बच्चों के रूप में इस समाज को एक अच्छा और सच्चा नागरिक प्रदान करना है तो इससे बड़ी जिम्मेद्दारी और क्या होगी?

इसलिए मै कहूंगी कि एक स्त्री जो घर के अंदर रहती है जिसे हम गृहिणी कहते है वह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही है। उसके जिम्मे समाज ही नही बल्कि पूरे देश की नींव ही टिकी है अगर वही मजबूत नही होगी तो देश का क्या होगा? घर के कुशल संचालन और बच्चों की उचित परवरिश का काम समाज और राष्ट्र के निर्माण की पहली शर्त है।

इसलिए आप सबसे मेरा  विनम्र निवेदन है कि आप एक स्त्री के कार्यों के महत्व को समझे और उसका सम्मान करें। जिस दिन एक गृहिणी के कार्यों को महत्व मिलने लगेगा हमें लगता है कि उसी दिन नारीवादी आन्दोलन समाप्त हो जायेगा। 

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 20, 2009

चम्पा आई रे...!

maid-servant आज मैं बहुत खुश हूँ। मालूम है क्यों?

इसलिए नहीं कि किचेन में व्यस्त हूँ बल्कि इसलिए कि आज मेरी चम्पा आ रही है। अब आप पूछेंगे चम्पा कौन है?

अरे!.. वही जिसके रहने से मेरी आँखों में खुशियां हमेशा बरकरार रहती है। जिसके चले जाने से मुझे ब्लॉग देखे कई सप्ताह बीत गये हैं। आजकल मुझे अपने बीतते समय का पता ही नहीं चल रहा है। मेरे लिए दिन और रात दोनों एक ही समान हो गये है। कब आराम करना है और कब काम करना है, यह निश्चित ही नहीं हो पा रहा है। मुझे अब पता चला है कि मेरे घर में खुशियों के पीछे चम्पा की भूमिका कितनी है?

एक दिन भी अगर मुझे घर में अकेले रहना पड़ जाता है तो घर मुझे काटने को दौड़ता है। असल में मेरी ससुराल एक संयुक्त परिवार में है। अपने पति और बेटी-बेटे के अलावा घर में कुल तीन जोड़ी सास-ससुर, दो जोड़ी जेठ-जेठानी एक देवरानी, पाँच देवर (चार कुँआरे), व छ: भतीजे हैं। तीन ननदें भी हैं और इनसे छः भान्जे-भान्जियाँ। इन सबके बीच रह कर जो मजा मुझे आता है उसका वर्णन कठिन है। शायद आप आसानी से इसका अंदाजा भी नही लगा सकते। अब तो श्रीमानजी की सरकारी नौकरी के कारण मुझे अपने भरे पूरे घर को छोड़कर बाहर रहना पड़ता है। यह सारी चहल-पहल घर से दूर रह कर मैं बहुत मिस करती हूँ, लेकिन इस बात कि खुशी है कि मेरे पास घर के लोगों का बराबर आना-जाना लगा रहता है। घर से दूर होने के बावजूद उन लोगों का प्यार बना रहता है।

आजकल संगम नगरी में होने की वजह से सास-ससुर के अलावा गाँव में रहने वाले दूसरे लोगों की सेवा के अवसर भी मिलते रहते है। इलाहाबाद तीर्थ-स्थल तो है ही, साथ ही शिक्षा के लिए भी यह पूर्वी उत्तर प्रदेश का सर्वोत्तम शहर माना जाता है। इस शहर में कंपटीशन की तैयारी करने वाले हमारे अपने नाते-रिश्तेदार भी बहुत है इसलिए मुझे जब भी किसी चीज की जरूरत होती मै इन्हें बुला लिया करती हूँ। यह तो रही ससुराल वालों की उपस्थिति, लेकिन मायके का सुख भी यदा-कदा मिलता रहता है। पापा, मम्मी, छोटा भाई, भैया, दोनो भाभियाँ और भतीजे यहाँ-वहाँ मिलते ही रहते हैं। कुल मिलाकर अपनों के सानिध्य का सुख मिलता ही रहता है। लेकिन पिछले पन्द्रह दिनों से इस सुख में खलल पड़ गया है। इसकी वजह वही चम्पा है जो पहाड़ पर अपने गाँव चली गयी है। मैं इस समय सारा ध्यान किचेन की साफ-सफाई और पाक-कला में लगा रही हूँ।

जब मेरी चम्पा रहती है तो मुझे कुछ अलग तरह की खुशी होती है। तन को सुख और मन को शांति मिलती है, दिल को करार आता है। अपने बच्चे प्यारे लगने लगते है। पति महोदय पर भी कुछ ज्यादा प्यार आता है। घर की खुशियों में चार-चाँद लग जाता है। सब कुछ कूल-कूल लगता है। लेकिन जब वो नहीं है तो मेरी दुनिया ही सिमट गयी है...।

बहुत दिनों से ये कह रहे हैं चलो तुम्हें  पिक्चर दिखा लाऊँ। सिविल लाइन्स चलकर सॉफ़्टी कॉर्नर की आइसक्रीम खिला लाऊँ। अब तो ‘कमीने’ भी लग गयी है और ‘लव आजकल”  भी। बच्चों को कृष्ण जन्माष्टमी की झाँकी भी दिखानी थी, लेकिन यह सब कुछ नहीं हो सका, क्योंकि मैं किचेन में काफी व्यस्त हूँ।

आज मेरा भी मन हो रहा है बिग बाजार, मैक्डॉवेल्स और सिनेप्लेक्स जाने का, पिक्चर देखने और मौज-मस्ती से इश्क लड़ाने का...! मालूम है क्यों ? क्योंकि मेरी चम्पा आ रही है। अरे वही चम्पा जिसे हमने किचेन सम्हालने के लिए काम पर लगा रखा है। हमारी मेड-कम-कूक। बस इससे ज्यादा और कुछ नहीं। केवल सुबह-शाम एक-दो घण्टे के लिए आती है, लेकिन वो है बड़े काम की। जब तक उसने ‘ब्रेक’ नहीं लिया था तबतक मुझे इसका अन्दाजा भी नहीं था।

कोई भी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा, सबका अपना एक अलग महत्व होता है। घर में बच्चा हो या बड़ा, सबका एक अपना व्यक्तित्व होता है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ खास बात जरूर होती है। कौन इंसान   किसके लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।

आज मुझे भी इस बात एहसास हुआ कि चम्पा जो चंद पैसों  के लिए हमारे घर में काम करती है उसका होना भी हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, July 10, 2009

चींटी की खटिया खड़ी, टिड्डा करता मौज... कहानी में ट्विस्ट है...!

हिन्दी भारत समूह से आने वाला एक सन्देश मिला। प्रेषक थे श्री भगवान दास त्यागी जी। इस अंग्रेजी सन्देश में The Ant and the Grasshopper नामक कहानी को आधार बनाकर भारतीय राजनैतिक समाज की एक विडम्बना को दर्शाया गया है। मुझे यह आख्यान अच्छा और सच्चा लगा। मैने यहाँ इसका भावानुवाद करने की कोशिश की है। आदरणीय त्यागी जी से क्षमा याचना के साथ मैने इसमें कुछ नयी बातें जोड़ भी दी हैं।

कथा – १

चींटी और टिड्डा एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता।

जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहकर पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह। वह खुले आकाश के नीचे ठ्ण्ड से ठिठुरता रहा और अन्ततः मर गया।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल मीठा होता है

कथा – २

एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता। जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहते हुये पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह।

ठण्ड से काँपते टिड्डे ने एक प्रेस कान्फ़रेन्स बुलाई। मास मीडिया के समक्ष इस बात की जाँच कराने की माँग उठा दिया कि आखिर चींटी को क्यों गर्म घर में रहने और पर्याप्त भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है जब कि उसके जैसे दूसरे जीव ठण्ड से ठिठुर रहे हैं और भूखों मर रहे हैं।

आपतक, ऐण्टीटीवी, एबीसी, सीएमएन, हण्डिया टीवी,  और दूसरे तमाम चैनल ठ्ण्ड से काँपते ठिठुरते टिड्डे की तस्वीरें दिखाने लगते हैं। वही बगल के फ्रेम में आरामदेह और प्रचुर भोजन से लदी मेज के साथ चींटी का वीडियो प्रसारित हो रहा है। दुनिया इस विरोधाभास को देखकर आहत है। बेचारा गरीब टिड्डा इतने कष्ट में जीने को मजबूर है? उफ़्फ़्‌ ये कैसी विडम्बना है? उसके प्रति संवेदना की लहर दौड़ जाती है।

चींटी और टिड्डा (२) चींटी के घर के सामने अन्धमति राय एक जोरदार प्रदर्शन आयोजित करती हैं।

बाधा डालेकर अन्य बहुत से टिड्डों को इकठ्ठा करके उनके साथ अनशन पर बैठ जाती हैं। उनकी माँग है कि जाड़े के मौसम में सभी टिड्डों का गर्म जलवायु के स्थान पर पुनर्वास करवाया जाय।

मायाजटी बयान देती हैं कि यह गरीब अल्पसंख्यकों व दलित टिड्डों के साथ घोर अन्याय है। मनुवादी चींटियों द्वारा किए गये अन्याय के विरुद्ध टिड्डासमाज को एकजुट रहने का नारा देती हैं।

एम-नास्टी(aim-nasty) इण्टरनेशनल, संयुक्तराष्ट्र संघ(UN- unnecessary nuiscence) , यूनीसेफ़, वर्डबैंक (bird bank) और दूसरी मानवाधिकारवादी संस्थाओं द्वारा भारत सरकार के विरुद्ध बयान जारी किए जाते हैं। एक अन्तर्राष्ट्रीय शिष्टमण्डल भारत की यात्रा पर आता है। विपक्षी सांसदों ने संसद की कार्यवाही से वाकआउट कर दिया है। वामपन्थी दलों ने मामले की न्यायिक जाँच की माँग करते हुये ‘बंगाल बन्द’ और ‘केरल बन्द’ का अह्वाहन किया। केरल में सीपीएम की सरकार ने कानून बनाकर चीटियों को गर्मी में कड़ी मेहनत करने पर पाबन्दी लगा दी जिससे चींटियों और टिड्डों में ‘गरीबी की समानता’ (equality of poverty)  लायी जा सके।

‘आलू पर स्वाद जादो’ सभी रेलगाडियों में टिड्डों के लिए निःशुल्क कोच जोड़े जाने की मांग करते है। ‘कम था एलर्जी’ दबाव के आगे झुकते हुए संसद में इस फैसले की घोषणा करती हैं कि सभी गाड़ियों में एक स्पेशल टिड्डा कोच जोड़ने के साथ ही विशेष गाड़ी भी चलायी जाएगी जिसका नाम “टिड्डा रथ”  होगा।

अन्ततः सरकार द्वारा एक न्यायिक जाँच समिति गठित की जाती है जो आनन-फानन में ‘टिड्डा विरोधी आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटागा)’ का एक प्रारूप तैयार करती है जो संसद द्वारा ध्वनिमत से पारित होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षरोपरान्त कानून बनकर जाड़ा प्रारम्भ होने से पूर्व ही लागू कर दिया जाता है।

राष्ट्र के शिक्षा मन्त्री ‘कपि से अव्वल’ ने शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में विशेष टिड्डा आरक्षण की घोषणा कर दी है।

पोटागा के प्राविधानों का उल्लंघन करने के आरोप में चींटी गिरफ़्तार कर ली गयी है। उसपर लगे आरोप सिद्ध हो जाने के फलस्वरुप अर्थदण्ड लगा दिया गया है। अपने अपकृत्य के लिए जुर्माना अदा न कर पाने पर चींटी का घर सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता है तथा उसे गरीब बेसहारा टिड्डों को आबंटित कर दिया जाता है। इस गृह वितरण समारोह के सीधे प्रसारण के लिए देश और विदेश के न्यूज चैनल जमा होते हैं।

अन्धमति राय इसे न्याय की जीत बताती हैं। आलू पर स्वाद जादो इसे समाजवाद की जीत बताते हैं। सीपीएम सरकार इसे ‘गिरे हुओं के क्रान्तिकारी उदभव’ की संज्ञा देती है।

उस क्रान्तिकारी टिड्डे को संयुक्त राष्ट्र महासभा को सम्बोधित करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया उसका सीधा प्रसारण करता है। नाटो देशों के राष्ट्राध्यक्ष धनदोहन सिंह की पीठ थपथपाते हैं:

बहुत वर्षों बाद-

चींटी ने अमेरिका प्रवास करके वहाँ सिलिकॉन घाटी में अरबों डालर की कम्पनी स्थापित कर ली है। दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल होने लगी है। जब कि भारत में सैकड़ों टिड्डे आरक्षण के बावजूद भूख से आज भी मर रहे हैं।

कड़ी मेहनत करने वाली असंख्य चींटियों के देश छोड़कर बाहर चले जाने तथा मूढ़, आलसी व अकर्मण्य  टिड्डों को सरकारी खर्च पर पालने-पोसने के परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था प्रतिगामी होती गयी है जिससे विकसित देशों का पिछलग्गू भारत आज भी एक विकासशील देश बना हुआ है।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल अपने देश में नीचा देखना होता है।

(निवेदन: यदि यहाँ किसी कॉपी राइट का उल्लंघन निहित हो तो कृपया सूचित करें। इसे सहर्ष हटा लिया जाएगा।)

रचना त्रिपाठी

Monday, June 22, 2009

घर में लगा कम्प्यूटर... क्या नीचे क्या ऊपर?

टूटी-फूटी शुरू करने के बाद एक सज्जन ने मेरे मेल पर सन्देश भेंजा कि उनको कम्प्यूटर के बारे में सरल भाषा में जानकारियाँ चाहिए जो उनके स्कूल में बच्चों के काम आ सके। कम्प्यूटर का ज्ञान देने के लिए उनको मुझसे बेहतर शायद और कोई नही दिखा। ऐसा उनकी पारखी नज़र के धोखे के कारण ही हुआ हो तो भी मुझे बहुत खुशी हुई यह जानकर कि किसी ने तो मुझे पहचाना।

मैने चटसे जवाब भेंज दिया, “भाई साहब, सबसे पहले तो आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आपने मुझे इस लायक समझा।”

अपने वादे के मुताबिक मैं कम्प्यूटर के बारे में अपने महान ज्ञान को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। जिस लायक समझा जाय उस रूप में प्रयोग की छूट है।एक ही रुटीन

कम्प्यूटर से हमें ढेर सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं, जो हमें देश-दुनिया के बारे में बताता है। इससे हमें अनेक प्रकार के रंग-बिरंगें ब्लॉग पढ़ने को मिलते है।

कम्प्यूटर से हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के लाभ मिलते हैं :-

१. जब हमारे घर में कम्प्यूटर होता है तो हमें बाहर घूमने जाने का मन नही होता जिससे पतिदेव तो प्रसन्न रहते हैं मगर बच्चे नाखुश।

२. घर में कम्प्यूटर के आ जाने से पतिदेव हर वक्त प्रसन्न दिखते हैं। भले ही आफिस से आने के बाद उन्हें चाय नाश्ते के लिये ना पूछो उन्हें कोई गिला नही होता। हाँ, अगर उन्हें अचानक याद आ भी गया कि मुझे आज चाय नही मिली है, तो उन्हें समझाया जा सकता है- यह कहकर कि “अरे!..अभी-अभी तो चाय पिलाये थे, भूल गये क्या?” इसपर वे इस बात को सहर्ष स्वीकार लेते हैं।

३. घर में कम्प्यूटर की वजह से टीवी का एक भी सीरियल डिस्टर्ब नहीं होता है। पतिदेव कम्प्यूटर पर और बीबी टीवी के पास, बच्चे भी मौज कर रहे होते हैं।

४. पतिदेव को कभी अपनी पत्नी से यह शिकायत का मौका नही मिलता कि “तुम मुझे समय नही देती हो।”

५. अगर पड़ोसी से बात करते समय बच्चे डिस्टर्ब कर रहे हों, तो उ्न्हें भी कम्प्यूटर पर बिठा दो। फिर देखो, है ना सबकी मस्ती!

कम्प्यूटर से थोड़े नुकसान भी उठाने पड़ते हैं:

१.पतिदेव के कम्प्यूटर पर देर तक बैठने से पेट का आकार गणेश जी का अनुसरण करता हुआ अन्ततः शिवजी के नन्दी बैल की बराबरी पर जाकर रुकता है।

२.कंप्यूटर पर देर तक बैठने से और भी तरह-तरह की शारीरिक बिमारियाँ दावत देने लगती है जिससे कम्प्यूटर पर बैठना भी दूभर हो जाता है।

३.यदि यहाँ एक बार ब्लॉगरी का चस्का लग गया तो इतनी व्यस्तता हो जाती है कि पीछे से एक बार की कही बात सुनायी ही नहीं देती है।…हाँ, अगर सुनायी दे भी गयी तो अचानक इतना जोर से जवाब मिलता है कि अगर कोई कमजोर दिल की गृहणी हो तो सीधा राम-नाम सत्य…।

४.अब बच्चों का क्या कहें? जब हम लोग छोटे थे तो कोई मेहमान आने वाला होता था, सबसे पहले तैयार होकर उसके आने का बेसब्री से इंतजार करते और बड़े उत्साह से स्वागत करते थे। लेकिन आज कल के बच्चे, इस कंम्प्यूटर के चक्कर में मेहमान कब आये और कब गये इनको पता ही नही चलता। अगर कोई बच्चों से मिलने की इच्छा जताता है तो इन्हें बड़े आग्रह के साथ बुलाना पड़ता है। तब भी इनका चेहरा ऐसे लटक जाता है जैसे मेहमान ने इनका सबसे प्रिय खिलौना तोड़ दिया हो, और यह एक ‘नमस्ते’ का डंडा मारकर चले जाते हैं।

क्रमश:

रचना त्रिपाठी

Saturday, June 6, 2009

हरा ही हरा… पर गाय ने नहीं चरा !? :(

सत्यार्थ के मुण्डन के उद्देश्य से गाँव जाना हुआ। करीब दस दिनों के बाद घर वापस आकर देख रही हूँ कि आस-पास काफी कुछ बदल गया है।

मुण्डन नहीं कर्तन हुआ जी.. बेटे के सिर पर उग आयी फसल तो परम्परा के अनुसार कटवा- छँटवा कर ‘कोट माई’ के स्थान पर चढ़वा दिया। लेकिन इस अवधि में यहाँ घर के चारो तरफ खूब हरियाली उग आयी है- खर पतवार की। अवांछित घास-पात की बढ़वार से सब्जियाँ तो उसमें खो ही गयी हैं। घर के अंदर से लेकर बाहर तक और लॉन से लेकर किचेन गार्डेन तक हरा ही हरा दिख रहा है। जिस लॉन की हरियाली बनाये रखने के लिए मई के महीने में पानी दे-देकर मैं थक गयी थी, आज उसी लॉन में एक फिट लम्बी घास आ गयी है।

किचेन गार्डेन की हालत तो देखने लायक है। इसको गाय से बचाने के लिये महीनों पहले मेरे श्रीमान जी ने क्या-क्या जतन नहीं किए थे। गेट की सॉकल ठीक कराने के लिए लोक निर्माण विभाग को पत्र लिखा। नहीं बन सका तो उसे तार से बांधा, ईंट का ओट लगाया ताकि गेट को धकियाकर वह ‘शहरी बदमाश’ गाय अंदर न आ सके। लेकिन आज मन होता है कि गेट को खोलकर गाय-भैंसों को दावत दे दूँ। शायद मेरा काम थोड़ा हल्का ही कर जाँय। लेकिन अब तो गाय भी आने से रही। बाहर की सड़क पर ही अघा रही है।

फूलों में घास या घासों में फूल फूलों में घास या घासों में फूलमैं तुलसी तेरे आँगन की मैं तुलसी तेरे आँगन कीभिण्डी का सत्यानाशभिण्डी का सत्यानाश 

गाँव से लौटकर कितना काम बढ़ गया है मेरे जिम्में- घर की सफाई, खेती की निराई और इससे भी बड़ा मेरा ब्लॉग जो लम्बा अन्तराल ले चुका है। कैसे होगा ये सब? इसी में हफ़्तों से मेरे कई सीरियल भी छूट गये हैं। बेटी के ग्रीष्मावकाश का लम्बा होमवर्क भी पूरा कराना है। :(

ये कह रहे हैं, “बहुत कुछ गिना दिया जी… अब रहने भी दो…!”

“अच्छा रहने देती हूँ… ”

अरे वाह! बातों-बातों में मेरा एक काम तो पूरा ही हो गया। नहीं समझे…? अरे वही, ब्लॉग पोस्ट लिखने का…। ये दबाया मैने पब्लिश बटन…॥smile_regular

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, May 19, 2009

घर में ब्लॉगेरिया का प्रकोप …भूल गये बालम!!!

मैने सुना था कि आइंस्टीन अपने घर का पता ही भूल जाया करते थे। आज मेरे घर भी कुछ ऐसा अजीबोगरीब हादसा हुआ। यहाँ कसूरवार भौतिकी की कोई उलझन नहीं थी। …शायद ब्लॉगरी रही हो इसके पीछे। पढ़कर आप भी पूछेंगे जैसे मैं पूछ रही हूँ-

“क्या ब्लॉगरी करते-करते ऐसा भी हो जाया करता है?”

भूल गये बालम आज श्रीमान जी सुबह अच्छे भले उठे। अपना दैनिक कार्य किया और स्टेडियम खेलने भी गये। अपने समय से ऑफिस को निकल पड़े। दोपहर में ऑफिस से फोन आया।

पूछने लगे, “वहाँ कम्प्यूटर टेबल पर मेरे चश्में का शीशा है क्या?”

मैं दोपहर की मीठी नींद से उठी, मेज पर टटोल कर देखा फिर जवाब दिया, “ यहाँ तो नहीं है? क्या हुआ?”

“देखो, शायद फ्रिज के ऊपर या उसके कवर वाली जेब में हो”

“अच्छा…!! …यहाँ भी नहीं है जी। …आखिर बात क्या है”

“ओफ़्फ़ो…! ठीक से ढूँढो न, ”

“कहाँ खोजूँ…? …एक ही शीशा है कि दोनो…?” “…और चश्मा कहाँ है?”

“वो तो मेरे पास है…” “ अच्छा देखो… बैडमिण्टन किट की ऊपरी जेब में तलाशो।”

अरे, वहाँ कहाँ पहुँच जाएगा…? ….लीजिए, यहीं है। लेकिन एक ही शीशा तो है?”

“चलो ठीक है…” उन्होंने फोन काट दिया। मैं बच्चों को लेकर फिरसे सुलाने चली गयी।

? ? ? ? ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ? ? ? ?

शाम को जब ये ऑफिस से लौटे तो कुछ देर बाद मैंने चश्में के शीशे के बारे में जानना चाहा। जब पूरी कहानी मालूम हुई तो हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो गये।

हुआ यूँ कि इन्होंने धूप की वजह से ऑफिस के लिए पैदल न निकल कर स्कूटर से जाने की सोची और हमेशा की तरह आँखों को गर्म हवा से बचाने के लिये फोटोक्रोमेटिक चश्मा भी चढ़ा लिया। वो चश्मा जिसका एक शीशा बेवफाई करके सुबह-सुबह मेयो हाल में ही फ्रेम से अलग हो बैडमिन्टन-किट की जेब में दुबक गया था। मेरे श्रीमान जी को स्टेडियम से शीशाविहीन चश्मा लगाकर घर आने और फिरसे तैयार होकर ऑफिस जाने के समय दुबारा लगाते वक्त भी इस बात का पता नहीं चल पाया था।

बता रहे थे कि इन्हें ऑफिस में जब एक दो घण्टे का शुरुआती काम पूरा करने के बाद फुरसत मिली तब अचानक मेज पर रखे चश्में पर निगाह डालने पर अपनी भूल का ज्ञान हुआ… लिखने पढ़ने का काम तो ये बिना चश्में के ही करते हैं। केवल स्कूटर पर धूल, हवा और धूप से बचने के लिए ही लगाते हैं।

उसके बाद चश्में का बाँया शीशा अपने कार्यालय कक्ष में कई राउण्ड खोजते रहे। सारी फाइलें उलट-पलट कर देख डालीं। मेज कुर्सी के नीचे भी झाड़ू लगवाया। बॉस के कमरे में भी गये। वहाँ सबने मिलकर ढूँढा। सभी दराजें और रैक भी चेक कर लिए गये। इसी बहाने कम्प्यू्टर टेबल के पिछवाड़े जमी धूल भी साफ हो गयी। तीन चार चपरासी लगाये गये। ...लेकिन सब बेकार। अन्ततः नया शीशा लगवाने का निर्णय हुआ।

अब एक के चक्कर में दोनो शीशे नये लेने पड़ेंगे...। अचानक इन्हें सूझा कि एक बार घर पर भी पता कर लेना चाहिए। फोन पर डायरेक्शन देकर मुझसे खोज करायी गयी तो शीशा ऐसी जगह मिला जहाँ सबसे कम सम्भावना थी।

“तो क्या दो-दो बार स्कूटर चलाने पर भी काना चश्मा आपका ध्यानाकर्षण नहीं कर सका?”

“वही तो..., मैं भी हैरत में हूँ। मुझे पता क्यों नहीं चल सका?”

हँसते-हँसते मेरी हालत खस्ती हुई जा रही थी। तभी इन्होंने आखिरी बात बतायी-

“जानती हो, इसी बात का पता लगाने के लिए मैं ऑफिस से वापस आते वक्त भी यही चश्मा लगा कर आया हूँ। …शहर में स्कूटर की स्पीड इतनी तेज होती ही नहीं कि आँख पर हवा का दबाव महसूस हो। बिना नम्बर का सादा चश्मा ऐसी बेवकूफ़ी भी करा गया…”

“तो क्या बिलकुल अन्तर नहीं था दोनो आँखों में…?”

मुझे सबसे ज्यादा मजा तब आया जब इन्होंने बताया कि ध्यान देने पर एक आँख मे हवा लगती महसूस हो रही थी।

क्या आप इसे ब्लॉगेरिया नहीं कहेंगे?

दरअसल गलती मेरी ही थी। आज ऑफिस निकलते समय मैनें इन्हें ‘सी-ऑफ़’ नहीं किया था। शायद ‘किचेन गार्डेन’ में पानी लगा रही थी।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, April 30, 2009

अब मैं भी हाजिर हूँ ... अपनी टूटी-फूटी के साथ

मेरे अज़ीज हिन्दी चिठ्ठाकार सज्जनों,

एक जद्दोजहद मेरे मन में बहुत दिनों से थी। ...आज उसे परे धकेलकर मैने फ़ैसला कर ही लिया। जी हाँ, मैने अपना एक अलग ब्लॉग बना लिया है। मैं हिन्दी भाषा और टाइपिंग की बहुत अच्छी जानकार नहीं हूँ। बस मुझे टूटी-फूटी ही आती है। लेकिन बातें मन में बहुत सी हैं जो आप से बाँटने का मन करता है। हिम्मत कर रही हूँ तो इसलिए कि यहाँ तक की यात्रा मैने सत्यार्थमित्र के माध्यम से की है, थोड़ा बहुत जान गयी हूँ। आप सबका लिखा पढ़ती रही हूँ और इस सब में पतिदेव का साथ भी मिलता रहा है।

अलग इसलिए होना पड़ा कि कई बार इनके मानक में मेरी टूटी-फूटी फिट नहीं बैठ पाती है। मेरे लिखे को ये ‘और सुधार के लायक’ बताकर किनारे कर देते हैं। मन मसोस कर रह जाता है।

इसे एक विद्रोह न समझा जाय बल्कि मुक्त आकाश में स्वतंत्र होकर उड़ने की व्यग्रता मान कर उत्साहबर्द्धन किया जाय। पतिदेव तो धकिया ही रहे हैं, आगे बढ़ने के लिए।

आज तीस अप्रैल को इसे प्रारम्भ करने की एक खास वजह भी है। हमारी शादी को आज दस साल पूरे हुए हैं। आज मैं कुछ नया करना चाहती थी। सोचा, क्यों न आज से एक सिलसिला शुरू हो जिसमें एक आम गृहिणी की आवाज आप लोगों तक पहुँचायी जाय..!

मैं कोई प्रोफ़ेशनल लेखिका, कवयित्री या विचारक नहीं हूँ। लेकिन अखबारों की खबरें पढ़कर, टीवी देखकर या ब्लॉग्स में इस विचित्र दुनिया की तस्वीरें देखकर मेरा मन भी परेशान होता है। कुछ बातें अनगढ़ ही सही लेकिन एक भँवर सी भीतर से उठती तो हैं।

पुछल्ला:

डॉ. अरविन्द मिश्रा ने आज हमारी जोड़ी की तस्वीर तलाश किया जो थी ही नहीं। नहीं मिली तो किसी जोड़ा-जामा टाइप फोटू की फरमाइश भी कर दिए। हम ठहरे तकनीक से पैदल, सो शादी वाली फोटू यहाँ चेंप न सके। लेकिन एकदम ताजी फोटू भतीजे से खिंचवा ली है। आप भी देखिए :)

 परिणय दशाब्दि  (2) (रचना)