Showing posts with label छोटी-छोटी खुशियां. Show all posts
Showing posts with label छोटी-छोटी खुशियां. Show all posts

Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 22, 2017

सावन के महीने में शिवकृपा

कॉलेज़ में परीक्षा हो जाने के बाद की छुट्टियाँ थी। मैं अपनी बुआ के घर आयी हुई थी। सावन का महीना था और पहला सोमवार भी। रिमझिम बारिश हो रही थी। सुबह-सुबह लड़कियों का एक झुंड अपने हाथों में धतूरे का फूल, फल, भांग, बेलपत्र और लोटे का जल लिए घर में घुसा और मुझे ढूंढने लगा। सुबह के सात बज रहे थे और मैं सो रही थी। उन दिनों पढ़ाई से छुट्टी लेकर सिर्फ खाना-पीना, सोना और खूब मौज-मस्ती का रूटीन था। इतने दिनों में अड़ोस-पड़ोस की लड़कियों के साथ मैं भी थोड़ा घुल-मिल गई थी। उस झुण्ड की आवाज मेरे कानों में आ रही थी लेकिन मैं उससे बचने के लिए अपने कानों को तकिये से दबाकर सोने की मुद्रा बनाये पड़ी हुई थी। लेकिन मुझे सोने नहीं दिया गया। 

बुआ ने झकझोरकर मुझे जबरदस्ती जगा दिया और बोली - ''जल्दी नहा-धो के तैयार हो लो, शिव मंदिर जाना है... सारी लड़कियां तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।" 

आंगन में चहल-पहल और उन सखियों के हंसी-विनोद की बातें मेरे कमरे तक भी आ रही थी- ''देखा जाय इसबार शिव जी किस-किस पर प्रसन्न होते हैं''

अवधड़ दानी शिव की महिमा तो मैंने ख़ूब सुन रखी थी लेकिन मुझे अभी उनकी मंगल कृपा पाने की कोई जल्दी नहीं थी। लेकिन उसदिन मैं जबरदस्ती शिवालय भेज दी गई थी। बड़े अनमने होकर पहली बार ही मैंने उन्हें जल चढ़ाया था। पर इतनी जल्दी उनकी कृपा हमपे बरस जाएगी ये नहीं सोचा था। वर्षों से अपने वर के इंतजार में बैठी अनेक लड़कियों को इग्नोर मार के महादेवजी मुझपर इतने प्रसन्न हो गये कि अभी साल भी नहीं बीता कि मेरी शादी पक्की हो गई।

मुझे इतनी 'खुशियां' एक साथ मिल जाएंगी मैंने कभी सोचा न था। कहाँ दो-चार कपड़ो में कॉलेज का आना-जाना था.. और अब बिन मांगे बहुत कुछ मिल रहा था। अटैची भर-भर के रंग-बिरंगी साड़ियां, गहने, सुंदर-सुंदर चप्पलें, ब्यूटी किट और साथ में चार पहिये वाली गाड़ी भी। मैंने तो सोचा था पढ़-लिख कर कोई अच्छी सी जॉब मिल जाय तो एक-एक कर अपने सारे शौक पूरी करूंगी। लेकिन यहाँ तो 'बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न चून' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सुना था कि भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। इसे साक्षात् देखने और महसूस करने का मौका मेरे हाथ लग गया था।

एक सेट कौन पूछता है, पूरे डबल-ट्रिपल सेट सामान बक्से में कस-कस कर मिले। इस मामले में मायका और ससुराल दोनों मेरे ऊपर मेहरबान थे। अब इतनी सारी 'खुशियां' एक साथ बरस गयीं कि कैसे सम्हालू, कहाँ उठाऊँ, कहाँ धरूँ और कहाँ सरियाऊँ इसी उधेड़बुन में आज तक लगी हूँ। घर में जूते-चप्पल, कपड़े लत्ते, अब मेरे अकेले के ही नहीं हैं। पति व बच्चों के उससे चार-गुने हो गए हैं। आलमारियां छोटी पड़ रही हैं। इनसब चीजों को सम्हालने से अभी तक फुर्सत नहीं मिल पायी कि दुबारा शिवजी को जल चढ़ाने जाऊँ।

जल्दी-जल्दी अब सबकुछ समेट लेना चाहती हूँ ताकि अगली बार जल चढ़ाने से पहले थोड़ा 'स्पेस' रहे। कहीं शिवजी हमपे दुबारा प्रसन्न हो गए तो आगे क्या होगा!

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, July 30, 2015

वो लाल स्कार्फ

मेरा वो लाल स्कार्फ! कहाँ होगा...? जो मुझे आज  बिल्कुल भी याद नहीं है। कैसा था वो... कहाँ से लाऊँ उसे...? दिमाग के कपबोर्ड को खंगालते हुए अपने स्मृति-पटल पर उसकी कोई छवि नहीं बना पा रही हूँ। वही तो मेरी पहचान थी। काश मुझे वो मिल जाता तो मैं फिर से उसे ही पहनती। हो सकता है उसको पहनने के बाद मैं आज भी उतनी ही प्यारी लगने लगूँ जितनी कि कॉलेज के दिनों में अपने सीनियर्स को लगती थी।

मुझे कैसे पता होता कि मैं उसको पहनने के बाद कैसी लगती थी? आज से पहले किसी ने मेरे मुँह पर ये बात तो कही नहीं कि मैं लाल स्कार्फ में बहुत प्यारी लगती थी।

मेरी एक सीनियर जो इंटरमीडिएट में मेरे से एक क्लास आगे थी, आज उनका फोन आया। उन्होंने अपना परिचय देते हुये कहा- रचना! मैं रेनू... रेनू पांडे...तुम्हें कुछ याद आया...हम दोनों उदित (कॉलेज) में पढ़ते थे। मैं ख़ुशी से चौक कर बोल पड़ी- ओओओओ... रेनू दीईईईईई... कैसी हैं आप... कहाँ हैं आजकल... मेरी याद कैसे याद आई आपको...? मुझे तो सिर्फ आपकी ब्लू-सूट में दो चोटी वाली, चेहरे की एक हल्की परछाई सी याद है। चूँकि आप पढ़ने में बहुत अच्छी थीं, तो नाम कभी नहीं भूला। क्या आपको मेरा चेहरा याद है?

उनकी वो मधुर आवाज अभी तक मेरे कानों में गूँज रही है-
" अरे! मुझे तो अभी तक नहीं भुला वो  'लाल स्कार्फ' वाला गुलाबी चेहरा जिसमें तुम बहुत प्यारी लगती थी।"

ओहोहो... मेरा मन तो ऐसे झूमा कि बस पूछिये मत! सुना तो मैंने बिल्कुल स्पष्ट था। पर मुझे अपने ही कानों पर भरोसा न हुआ। और मैं उनसे गोल-मोल बातें घुमाते हुये फिर से पूछ बैठी- "क्या कहा... लाल स्कार्फ! कहीं मैं उसमें बेवकूफ तो नहीं लगती थी?"

"नहीं यार! तुम हम लोगों को बहुत प्यारी लगती थी। पहले तुमसे कभी ये बात कही नहीं। पर जब तुम लाल स्कार्फ लगाकर आती थी, तो तुम्हें बार-बार देखने का मन होता था। सच में।"

जी, तो मुझे कहना ये था कि अब वे बीते हुये दिन तो वापस आ नहीं सकते। पर रेनू दी! काश आपने मुझे ये बात पहले बता दी होती, तो मैं अपना 'वो' लाल स्कार्फ अपने साथ लेकर आयी होती! 

(रचना त्रिपाठी)

Friday, March 6, 2015

होली के रंग में तंग

अपनी तो 'होली' भी होली पर किसी ने न तो जबरदस्ती मुझे रंग डाला और न ही चेहरे पर लगे रंग वाली एक भी तस्वीर खींची... इस बार मेरे हमजोली जो नहीं थे। फिर ऐसे में भला मेरी फ़ोटो कौन खींचता! वैसे भी इस बार मैंने बहुत रंग नहीं खेला| यह अच्छा ही हुआ वर्ना बिना रंग वाली होली की तस्वीर में बेइज्जती हो जाती। मेरे पड़ोसियों ने मेरे चेहरे पर बड़ी इज्जत के साथ थोड़ा-थोड़ा गुलाल लगाया।अपने-अपने कैमरे से मेरी तस्वीर भी खींची पर वे उसे अपने घर ले गये।

मन हुआ की बच्चों से कह दूं कि-जरा मुँह में लगे गुलाल के संग एक मेरी भी फ़ोटो खींच दो... लेकिन वे अपने रंग में इस कदर सराबोर थे कि पूछिये मत... मैंने भी सोचा छोड़ो जाने दो... उस समय उनसे फ़ोटो खिंचवाना उनके रंग में भंग डालने जैसा था। इस प्रकार इस होली की मेरी एक भी तस्वीर नहीं है जो मैं भी व्हाट्सएप और फेसबुक पर लगाऊँ।

इससे पहले कि आप लोग इन्हें लानत भेजे मैं अस्पष्ट कर दूं कि गाँव में इनकी भाभियों की शिकायत थी कि -"कई सालों से देवर के संग होली नहीं खेली, बिना देवर के होली का रंग फीका हो जाता है" और इनका भी कहना था कि भाभियों के रंग लगे हाथों से पुआ खाने-खिलाने का तो मजा ही कुछ और है ! सो मैंने इन्हें जाने दिया।

फिलहाल अपना तो कोई सगा छोटा देवर भी नहीं है जिसके साथ होली खेलती। बच्चों की यहाँ पर अपनी अलग कम्पनी है, जिसे वे होली में छोड़कर कहीं और जाना पसन्द नहीं करते हैं। उनको रंग खेलते देखकर मुझे भी बहुत आनन्द आता है।

इस बार व्हाट्सएप पर दोस्तों, मम्मी-पापा और भाइयों की होली में रंग लगे फ़ोटो के साथ लाइव कमेंट्री भी चल रही थी। उसे देखकर बचपन में भाइयों और दोस्तों के साथ की होली याद आ गयी। आज यकायक ऐसा लगा कि फिर से अगर संभव होता तो मैं भी अपनी "घर वापसी" करा लेती।

(रचना त्रिपाठी)

 

Friday, February 13, 2015

वैलेन्टाइन का रसिया

बचपन की दहलीज पार करके जब मैं किशोरावस्था में कॉलेज पहुँची तो पहली बार वैलेंटाइन-डे का नाम कान में पड़ा। वह भी किसी ऐसी चीज के रूप में जिसपर बड़े-बूढ़ों का पहरा लगा रहता है। बड़ा रहस्यमय टाइप लगा यह। मुझे इस वैलेन्टाइन-डे का मतलब समझने में ही सालों लग गये। जबतक इस डे को मैं पूरी तरह समझ पाती मेरी शादी हो चुकी थी। अब तो मन मसोसने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन मैंने अपना रास्ता निकाल लिया है।

सबका 'वैलेन्टाइन डे' मनाने का अपना-अपना तरीका होता है। मेरा भी यह दिन मनाने का अपना एक अलग तरीका है। शादी होने से लेकर आजतक कोई भी 'डे' हो हम अपने घर में ही अपने पति और परिवार के साथ मनाते हैं। इस दिन हम दाल भरी पूड़ी, सब्जी, खीर और साथ में ‘रसियाव’ बनाते हैं। कुछ लोग रासियाव को बखीर भी कहते हैं। इस व्यंजन का नाम तो सुनने में ही 'रसिया' की तरह बहुत मीठा लगता है। यह चावल में गुड़ डालकर पकाया जाता है । मीठी सुगन्ध वाले चावल में जब गुड़ भी मिल जाय तो यह और कितना मीठा हो जाएगा। हमें कोई भी 'डे' मनाना हो तो यह डिश जरूर बनाते हैं। घर में जिस दिन यह व्यंजन खाने को मिल जाय तो समझ लीजिये कि उस दिन हम जरूर कोई न कोई 'डे' मना रहें होते हैं जैसे- वैलेन्टाइन-डे, हग-डे, किस-डे, बर्थ-डे हो। रसियाव तब भी बनता है जब कोई निजी उत्सव जैसे शादी की सालगिरह हो, या कोई पारंपरिक त्यौहार हो जैसे- दीपावली, दशहरा, होली आदि।

वैलेन्टाइन डे पर एक मौज़ू गाना है सुनायी देता है जिसे आपने भी सुना होगा- "चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो ना" मुझे लगता है कि इस प्रेम-दिवस पर सभी प्रेमी जन इसी लक्ष्य का पीछा करते हैं कि कैसे अपने प्रिय के दिल में पक्की जगह बना ली जाय। प्रेम होने से पहले ही शादी हो जाने और जीवन साथी मिल जाने के बाद मुझे तो यह समझ में ही नहीं आया कि दिल में उतरने का काम भी बड़ा चुनौतीपूर्ण है। रास्ता भला कहाँ से ढ़ूढतें...। एक साथ रहते-रहते दिन, महीने, फिर साल गुजरते गये। हर एक 'डे' आता गया और इनके दिल में उतरने का रास्ता इनकी बातों से और दूसरे लक्षणों से प्रकट होता गया। हमारे यहाँ दिल में उतरने का एकमात्र और सटीक रास्ता है जो पारंपरिक भी है और ठोस आजमाया हुआ भी है। दिल तक पहुँचने का यह रास्ता न आँखों से होकर जाता है और न दिमाग से गुजरता है। यह रास्ता गुजरता है इनके पेट से होते हुये। अगर पेट की पूजा बढ़िया हो गयी तो दिल बाग-बाग हो जाता है और वहाँ अपना रिजर्वेशन पक्का।

अब ये वेलेंटाइन 'डे'! जिसमें फरवरी का महीना हो, रंग-बिरंगे फूलों के मौसम के साथ फूल गोभी और मटर का सीजन हो तो वेलेंटाइन 'डे' का क्या पूछना..यह तो कुछ ख़ास ही हो जाता है। हम दोनों इस दिन 'फूलगोभी' और 'मटर' जरूर खरीदते हैं। फरवरी का महीना आते तक तो मटर की कीमत भी कम हो जाती है। इस समय हम एक-दो किलो मटर नहीं खरीदते हैं। बल्कि पूरे तीस-चालीस किलो मटर  इकठ्ठा खरीदकर इसके दाने छुड़ा लेते हैं और फ्रीजर में रख लेते हैं। इसके बाद पूरे साल जितना भी अलाना-फलाना-‘डे’ पड़ता है, हमारी थाली का जायका हरी-मटर के साथ और भी बढ़ जाता है।

हाँ मटर छुड़ाने का बोरिंग काम भी मुझे नहीं करना पड़ता इसलिए यह आनंद दोगुना हो जाता है। मेरे पति को मेरा आलू-प्याज काटना और घंटों मटर छुड़ाना बिल्कुल नहीं देखा जाता। उनका मुझसे साफ-साफ कहना है कि- “मेरे होते हुये तुम प्याज काटो और मटर छीलो यह हो ही नहीं सकता, मैं हूँ ना...!" बस इस प्रकार मेरा तो 'वेलेंटाइन डे' ऐसे ही बहुत ख़ुशी-ख़ुशी घर के आनंद में पूरा हो जाता है।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 15, 2014

होली की मौज

मन हमारी इन्द्रियों का राजा है और इन्द्रियां उसकी प्रजा। होली के दिन मन अपनी प्रजा को पूरी तरह संतुष्ट करने की सोचता है। पूरे साल बेचारी इन्द्रियों पर बहुत ही अंकुश रहता है। यह मत छुओ; वह मत देखो; यह मत सुनो; वह मत चखो; यह मत सूंघों। होली के  दिन मन इन्द्रियों से कहता है- आज तुम सभी स्वतंत्र हो! जाओ, और जी लो अपनी जिंदगी! इतना सुनते ही इन्द्रियां  बहैल्ला हो जाती है। अपने सभी दमित इच्छाओं को इसी एक दिन में ही पूरा कर लेना चाहती हैं। लड़कियों सरीखा इनके ऊपर भी बहुत पहरा लगा रहता है। होली के अवसर पर मेरी शुभकामनाएं इनके साथ है। होली के रंग में  इनका विवेक बना रहे ताकि हर साल ये इसी तरह हँसी-खुशी होली मना सके।holi-2014

हम सभी जानते है कि होली की मादकता, दीवाली की रौशनी, दशहरे का भोज, बॉलीवु्ड का संगीत और बसंती रंग बिरंगे फूल  किसे अच्छे नहीं लगते। लेकन इसका उपभोग करने से पहले यह हमारे लिए कितना स्वास्थ्यवर्धक होगा यह जरूर सोच लेना चाहिए। कुछ लोग तो इस दिन ‘बुरा न मानों होली है’ के बहाने अपनी जुबान तक तरह-तरह के शब्दों और वाक्यों से रंग डालते है। होली में मस्ती के साथ आत्मानुशासन जीवन के रंग को और भी बढ़ा देता है।

रंगों के बहाने हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हमने होली के रंगों की तरह अपने जीवन में भी कई रंग देखे हैं। बचपन के दिनों की रंगीनियां याद कर मन बहुत प्रसन्न हो जाता है। कितने कीमती थे वो दिन जो बीत गये। कुछ खट्टी-मीठी यादें रह गई हैं जिसे याद करके मैं हँस लेती हूँ। लेकिन  कभी-कभी तो रोने का मन भी होने लगता है। काश वो दिन लौट आते!

मैं भाइयों के साथ मिलकर होली के चार दिन पहले से ही रंग खेलना शुरु कर देती थी। उनकी की तरह मुझे भी सभी खेल खेलने की आजादी मिली हुई थी; लेकिन  होलिकादहन में जब पापा के साथ भाई भी जाने लगते थे तो मैं भी जाने की जिद्द करने लगती थी लेकिन मुझे नहीं जाने दिया जाता था। मम्मी का कहना था कि लड़कियों का होलिकादहन देखना अशुभ माना जाता है। मम्मी ऐसा क्यों कहती मैं नहीं समझ पाती थी। उस समय मेरा मन मुझे कोसने लगता था कि काश मैं भी लड़का होती तो मुझे भी वहां जाने दिया जाता..।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, March 6, 2014

छोटी बातों में बड़ी खुशी..

एक दिन की बात है मैं सुबह-सुबह बाथरूम में कपड़े धुलने के बाद स्नान करके बाहर निकली तो मेरे हा्थ में कपड़े से भरी बाल्टी को देखकर मेरे श्रीमानजी ने कहा- “अरे यार, तुम्हे ठंड लग जाएगी जल्दी से स्वेटर पहन लो” इतना सुनते ही मेरा हृदय प्रफुल्लित हो गया लेकिन मै उन्हें अपने इस आनंन्द का एहसास न दिलाकर थोड़ा सा इतराते हुए बोली- “अगर इतनी ही चिंता है मेरी तो कपड़े आप फैला दीजिए, मै तब-तक स्वेटर पहन लेती हूँ।” मुझे नहीं पता कि मेरी यह बात उन्हें कैसी लगी होगी..? इतना सुनते ही ये मेरे हाथ से बाल्टी लेकर बालकनी में कपड़े फैलाने लगे। मै स्वेटर पहनते हुए बालकनी में आकर खड़ी हो गई। उस दिन मै बहुत खुश थी। इस तरह की छोटी-छोटी खुशियां हमारे जीवन में बहुत सुख दे जाती हैं।

बहुत लोगों का मानना है कि अगर जीवन में पैसा है तो सब कुछ है। लेकिन हमें लगता है खुशियां खरीदी नहीं जा सकती और ना ही किसी से छीनी जा सकती है। वह इंसान जिसके पास अकूत सम्पत्ति का भंडार पड़ा हो; ऐश-आराम; धन-दौलत; बंगला; गाड़ी-घोड़ा; नौकर-चाकर; मोटरकार के साथ ड्राइवर भी हो; बीवी के साथ बैरा भी; इज्जत-प्रतिष्ठा; मान-सम्मान;  बच्चों के साथ एक भरा पूरा परिवार और साथ में माँ भी हो; तो ऐसे इंसान अगर प्रसन्न होते होंगे तो कैसे दिखते होंगे? उन्हें देखकर हम कैसे समझ सकेंगे कि वे आज बहुत खुश हैं..? उनके आनंद के पल कैसे होते होंगे जिन्हें कभी किसी चीज का अभाव न हुआ हो? उनकी थकान कैसी होती होगी जिनका पाला कभी शारीरिक और मानसिक श्रम से न पड़ा हो; बैठे बिठाए सब कुछ मिल जाता हो?

हम जैसे सामान्य लोगों को रोजमर्रा की थकान भरी जिंदगी में कभी कोई मूल्यवान वस्तु मिल जाने पर जिस खुशी का एहसास हमें होता है, ऐसे खुशी के पल उनके जीवन में किस तरीके से आते होंगे..? एक तरफ जहां हमें अपने बच्चों  की छोटी-छोटी खुशियों को पूरा करने के लिए सौ बार सोचना पड़ता है और उसके लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, तदुपरान्त हमें उनकी खुशियों को पूरा करके जिस चैन और सकून की अनुभूति होती है क्या ऐसा ही चैन उनके जीवन को नसीब होता है या इससे भी कहीं ज्यादा मिलता है, जिनके पास सब कुछ है? ऐसे घर के बच्चे और स्त्रियों की खुशियां किन-किन बोतों पर निर्भर करती होंगी जहां हर जरूरत की वस्तुएं पहले से मौजूद हों? स्त्रियों का अपने पति से नोंक-झोंक होती होगी भी तो किस बात पर..अगर नोंक-झोंक नहीं है तो प्यार कैसा होगा?

अक्सर स्त्रियां पति के द्वारा अपने छोटे-छोटे क्रिया-कलापों पर मिलने वाली सहानुभूति से बहुत प्रसन्न हो जाती हैं। जैसे- अगर उसका पति उसे एक बार प्यार से पूछ दे कि- तुमने अभी कुछ खाया कि नहीं.. सुबह से काम में लगी हो थोड़ा सा आराम कर लो.. किचेन में काम करते समय कितना पसीना आ जाता है तुम्हें आओ मैं इसे पोछ दूं.. मै समझ सकता हूं कि तुम पूरे परिवार के लिए कितना कुछ करती हो.. खाना लगाते समय पति से मिलने वाली छोटी-छोटी मदद जैसे टेबल पर खुद से पानी रख लेना खाने के प्लेट्स लगाना..इत्यादि। आखिर इनकी खुशियों का भी कुछ तो पैमाना होगा..

(रचना त्रिपाठी)