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Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, July 24, 2017

चक दे छोरियों

आज मैं लड़कियों को विश्व स्तर पर क्रिकेट खेलते हुए  देखकर अभिभूत हूँ। ऐसा लग रहा है मानो मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है। इन्हें देखकर स्कूल का अपना दिन याद आ गया जब लड़कियों के लिए खेलकूद प्रायः वर्जित क्षेत्र हुआ करता था।

अस्सी के दशक की बात है। बचपन से ही मुझे भाइयों के साथ क्रिकेट खेलने की छूट मिली हुई थी। बल्कि भाग-दौड़ वाले सभी खेल खेलने की आदत सी पड़ गई थी। जब मैं स्कूल में जाती थी तो वहाँ हम लड़कियों को गेम के नाम पर उछलने वाली रस्सी और रिंग-बॉल खेलने को मिलती थी। यह मुझे शारीरिक व्यायाम से ज्यादा कुछ नहीं लगता था। स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर से मैं अक्सर क्रिकेट अथवा बैडमिंटन की डिमांड किया करती थी। इसके लिए कई बार अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों को लेकर अक्सर स्पोर्ट्स ऑफिस के सामने धरने पर बैठ जाया करती थी। कुछ देर तक स्पोर्ट्स टीचर जो वहाँ पी टी मास्टर कहलाते थे, उनसे मेरी क्रिकेट पर बहस हो जाया करती थी। उनका कहना था - ''लड़कियां क्रिकेट नहीं खेलती है, आजतक कभी किसी लड़की को क्रिकेट खेलते देखा है?'' मुझे उनका यह वक्तव्य और भी उद्वेलित कर देता था। चूंकि मैंने भी अपने अलावा वहाँ किसी और लड़की को क्रिकेट खेलते नहीं देखा था इसलिए मुझे उनके इस सवाल का सही जवाब नहीं सूझता। फिर मन में पीटी मास्टर साहब को कोसते और बुदबुदाते हुए झक मार कर अपने क्लास की ओर चल पड़ती थी।

हमारे मन को चुभने वाली बात यही तक नहीं थी। उसी वक्त वे डांटते हुए यह कहकर हमें भगा दिया करते थे कि ''तुम सब जाओ, गृहविज्ञान पढ़ो।'' जिस पीरियड में लड़के फुटबॉल और क्रिकेट खेला करते थे वही हम लड़कियों के लिए गृहविज्ञान पढ़ने का पीरियड हुआ करता था। उस वक्त हम सबका ध्यान अपने विषय पर कम और स्कूल प्रांगण में ज्यादा रहा करता था।

काश मेरी मुलाकात उस पी टी मास्टर साहब से होती, तो मैं उनको साक्ष्य के साथ बताती कि लड़कियां भी कितना उम्दा क्रिकेट खेलती हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, September 26, 2013

वर्धा में जो हमने देखा…

विगत 20-21 सितम्बर को हिन्दी ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर एक राष्ट्रीय सेमीनार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में आयोजित हुआ। इस विचार गोष्ठी में एक से बढ़कर एक दिग्गज ब्लॉगर मौजूद थे। मुझे भी इनके साथ इस ब्लॉगरी पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया गया था। उद्‍घाटन सत्र में सोशल मीडिया के महत्व और उसकी विशेषताओं पर हुई चर्चा से काफी गहमा-गहमी बनी रही। इसी दौरान इस विश्वविद्यालय के कुलपति जी श्री विभूति नारायण राय ने हिंदी ब्लॉग जगत को एक शानदार सौगात देने की घोषणा की- विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर शुरू होगा  “चिट्ठा समय” ब्लॉग संकलक जो हिंन्दी ब्लॉगों को जोड़ने के लिए एग्रीगेटर का कार्य करेगा।

उद्‍घाटन सत्र से लेकर समापन समारोह तक चर्चा के लिए जितने भी विषय दिए गये थे उन सभी विषयों पर चर्चा हो चुकी थी; बस एक विषय छूटा जा रहा था जो मनीषा पान्डेय जी के द्वारा विशेष उल्लेख के अनुरोध से पूरा किया गया- ‘स्त्री और उनके अधिकार’। मनीषा जी ने बहुत सी आँखे खोलने वाली बातें कीं। लड़कों की ही तरह लड़कियों को मिलनी चाहिए घूमने की आजादी और पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी आदि।

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लेकिन हमें लगता है नारीवाद अपने आप में एक विवाद का विषय हो गया है। स्त्रियों के अधिकारों की बात सुनकर बहुत अच्छा लगता है। मिल जाए तो उससे भी कहीं ज्यादा अच्छा लगेगा। लेकिन नारीवादियों का भी एक आदर्श होना चाहिए जिससे इसके उद्देश्यों की प्राप्ति में तेजी आ सके। स्वतंत्रता और खुलेपन की अंधी दौड़ में शामिल होने की आतुरता हमें ऐसी दिशा में तो नहीं ले जा रही जहाँ जाकर हमें खुद ही लज्जित होना पड़े। अपनी मूल संस्कृति और संस्कारों को केवल प्रगतिशीलता के नाम पर तिलांजलि दे देने से हमें क्या कुछ बड़ा और महत्वपूर्ण हासिल होगा? इसका ठीक-ठीक  उत्तर मिलना अभी शेष है। एक नया मूल्य स्थापित करने की ललक में हमें अनेक पारंपरिक मूल्यों को नष्ट करने से पहले ठहरकर शांतचित्त हो कुछ सोच लेना चाहिए।

यदि हम सजग नहीं रहे तो इस देश की देवीस्वरूपा नारी और राष्ट्रभाषा हिन्दी की शायद एक ही प्रकार से दुर्गति होने वाली है। सेमिनार में एक छात्र तो हिंदी को बदलकर पूरी तरह हिंगलिश बनाने के लिए व्याकुल दिख रहा था। भला हो कि हमारे बीच से ही कुछ लोगों ने उसकी व्यग्रता कम करने की कोशिश की। देखते हैं कब गाड़ी पटरी पर आती है?

इन बड़े-बड़े ब्लॉगरों के बीच हम तो भिला (खो) से गये थे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा जहाँ पर मैं अपने परिवार के साथ जून-2010  में गयी थी, पूरे नौ महीने रहने के बाद उस जगह का रूखा वातावरण देखकर मेरा धैर्य जवाब दे गया था और हम पुन: यू.पी. वापस चले आये थे। लेकिन अब वहाँ जाकर इस ढाई साल में हुए अद्भुत परिवर्तन को देखकर हम दंग रह गये। बड़ा ही जीवंत माहौल था वहाँ का। चारों तरफ हरियाली और फूलों से सुसज्जित ‘नागार्जुन सराय’ नामक गेस्ट हाउस जिसका दो साल पहले लगभग कोई अस्तित्व नहीं था, हमारे लिए बिल्कुल नया था। इस विश्वविद्यालय की खुशनुमा शाम पूरे सुर-लय-ताल में बँधी वीणा की तरह बज रही थी। इसका सारा श्रेय कुलपति महोदय को जाता है। यह श्री विभूति नारायण राय की वीणा है। जब तक यह वीणा इस विश्वविद्यालय में रहेगी इसका स्वरूप और अनोखा होता जायेगा, यह मेरा मानना है।

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इन दो दिनों में सभी ब्लॉगर मित्रों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हिंदी ब्लॉग के प्रथम हस्ताक्षर/ निर्माणकर्ता आलोक कुमारजी से मिलना भी मेरे लिए इस सम्मेलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कुलपति जी द्वारा दिये गये रात्रिकालीन प्रीतिभोज के पहले अरविन्द मिश्र जी की सुरीली आवाज में गाये गीत ने इस आकर्षक माहौल में चार चाँद लगा दिये।

(रचना)

Friday, July 10, 2009

चींटी की खटिया खड़ी, टिड्डा करता मौज... कहानी में ट्विस्ट है...!

हिन्दी भारत समूह से आने वाला एक सन्देश मिला। प्रेषक थे श्री भगवान दास त्यागी जी। इस अंग्रेजी सन्देश में The Ant and the Grasshopper नामक कहानी को आधार बनाकर भारतीय राजनैतिक समाज की एक विडम्बना को दर्शाया गया है। मुझे यह आख्यान अच्छा और सच्चा लगा। मैने यहाँ इसका भावानुवाद करने की कोशिश की है। आदरणीय त्यागी जी से क्षमा याचना के साथ मैने इसमें कुछ नयी बातें जोड़ भी दी हैं।

कथा – १

चींटी और टिड्डा एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता।

जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहकर पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह। वह खुले आकाश के नीचे ठ्ण्ड से ठिठुरता रहा और अन्ततः मर गया।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल मीठा होता है

कथा – २

एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता। जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहते हुये पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह।

ठण्ड से काँपते टिड्डे ने एक प्रेस कान्फ़रेन्स बुलाई। मास मीडिया के समक्ष इस बात की जाँच कराने की माँग उठा दिया कि आखिर चींटी को क्यों गर्म घर में रहने और पर्याप्त भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है जब कि उसके जैसे दूसरे जीव ठण्ड से ठिठुर रहे हैं और भूखों मर रहे हैं।

आपतक, ऐण्टीटीवी, एबीसी, सीएमएन, हण्डिया टीवी,  और दूसरे तमाम चैनल ठ्ण्ड से काँपते ठिठुरते टिड्डे की तस्वीरें दिखाने लगते हैं। वही बगल के फ्रेम में आरामदेह और प्रचुर भोजन से लदी मेज के साथ चींटी का वीडियो प्रसारित हो रहा है। दुनिया इस विरोधाभास को देखकर आहत है। बेचारा गरीब टिड्डा इतने कष्ट में जीने को मजबूर है? उफ़्फ़्‌ ये कैसी विडम्बना है? उसके प्रति संवेदना की लहर दौड़ जाती है।

चींटी और टिड्डा (२) चींटी के घर के सामने अन्धमति राय एक जोरदार प्रदर्शन आयोजित करती हैं।

बाधा डालेकर अन्य बहुत से टिड्डों को इकठ्ठा करके उनके साथ अनशन पर बैठ जाती हैं। उनकी माँग है कि जाड़े के मौसम में सभी टिड्डों का गर्म जलवायु के स्थान पर पुनर्वास करवाया जाय।

मायाजटी बयान देती हैं कि यह गरीब अल्पसंख्यकों व दलित टिड्डों के साथ घोर अन्याय है। मनुवादी चींटियों द्वारा किए गये अन्याय के विरुद्ध टिड्डासमाज को एकजुट रहने का नारा देती हैं।

एम-नास्टी(aim-nasty) इण्टरनेशनल, संयुक्तराष्ट्र संघ(UN- unnecessary nuiscence) , यूनीसेफ़, वर्डबैंक (bird bank) और दूसरी मानवाधिकारवादी संस्थाओं द्वारा भारत सरकार के विरुद्ध बयान जारी किए जाते हैं। एक अन्तर्राष्ट्रीय शिष्टमण्डल भारत की यात्रा पर आता है। विपक्षी सांसदों ने संसद की कार्यवाही से वाकआउट कर दिया है। वामपन्थी दलों ने मामले की न्यायिक जाँच की माँग करते हुये ‘बंगाल बन्द’ और ‘केरल बन्द’ का अह्वाहन किया। केरल में सीपीएम की सरकार ने कानून बनाकर चीटियों को गर्मी में कड़ी मेहनत करने पर पाबन्दी लगा दी जिससे चींटियों और टिड्डों में ‘गरीबी की समानता’ (equality of poverty)  लायी जा सके।

‘आलू पर स्वाद जादो’ सभी रेलगाडियों में टिड्डों के लिए निःशुल्क कोच जोड़े जाने की मांग करते है। ‘कम था एलर्जी’ दबाव के आगे झुकते हुए संसद में इस फैसले की घोषणा करती हैं कि सभी गाड़ियों में एक स्पेशल टिड्डा कोच जोड़ने के साथ ही विशेष गाड़ी भी चलायी जाएगी जिसका नाम “टिड्डा रथ”  होगा।

अन्ततः सरकार द्वारा एक न्यायिक जाँच समिति गठित की जाती है जो आनन-फानन में ‘टिड्डा विरोधी आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटागा)’ का एक प्रारूप तैयार करती है जो संसद द्वारा ध्वनिमत से पारित होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षरोपरान्त कानून बनकर जाड़ा प्रारम्भ होने से पूर्व ही लागू कर दिया जाता है।

राष्ट्र के शिक्षा मन्त्री ‘कपि से अव्वल’ ने शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में विशेष टिड्डा आरक्षण की घोषणा कर दी है।

पोटागा के प्राविधानों का उल्लंघन करने के आरोप में चींटी गिरफ़्तार कर ली गयी है। उसपर लगे आरोप सिद्ध हो जाने के फलस्वरुप अर्थदण्ड लगा दिया गया है। अपने अपकृत्य के लिए जुर्माना अदा न कर पाने पर चींटी का घर सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता है तथा उसे गरीब बेसहारा टिड्डों को आबंटित कर दिया जाता है। इस गृह वितरण समारोह के सीधे प्रसारण के लिए देश और विदेश के न्यूज चैनल जमा होते हैं।

अन्धमति राय इसे न्याय की जीत बताती हैं। आलू पर स्वाद जादो इसे समाजवाद की जीत बताते हैं। सीपीएम सरकार इसे ‘गिरे हुओं के क्रान्तिकारी उदभव’ की संज्ञा देती है।

उस क्रान्तिकारी टिड्डे को संयुक्त राष्ट्र महासभा को सम्बोधित करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया उसका सीधा प्रसारण करता है। नाटो देशों के राष्ट्राध्यक्ष धनदोहन सिंह की पीठ थपथपाते हैं:

बहुत वर्षों बाद-

चींटी ने अमेरिका प्रवास करके वहाँ सिलिकॉन घाटी में अरबों डालर की कम्पनी स्थापित कर ली है। दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल होने लगी है। जब कि भारत में सैकड़ों टिड्डे आरक्षण के बावजूद भूख से आज भी मर रहे हैं।

कड़ी मेहनत करने वाली असंख्य चींटियों के देश छोड़कर बाहर चले जाने तथा मूढ़, आलसी व अकर्मण्य  टिड्डों को सरकारी खर्च पर पालने-पोसने के परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था प्रतिगामी होती गयी है जिससे विकसित देशों का पिछलग्गू भारत आज भी एक विकासशील देश बना हुआ है।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल अपने देश में नीचा देखना होता है।

(निवेदन: यदि यहाँ किसी कॉपी राइट का उल्लंघन निहित हो तो कृपया सूचित करें। इसे सहर्ष हटा लिया जाएगा।)

रचना त्रिपाठी

Tuesday, June 16, 2009

एक भिखारन को सरकारी सम्मान...!?!

आपने श्रीमती रागिनी शुक्ला की लिखी दो कहानियाँ दुलारी और कर्ज शीर्षक से सत्यार्थमित्र पर पढ़ी और सराही हैं। रागिनी दीदी की लिखी एक और मार्मिक कहानी यहाँ प्रस्तुत है। यह कहानी भी एक वास्तविक पात्र के दुखड़े को सच-सच बयान करती है:

हत्‌भाग्य

दादी के यहाँ आज सुबह से ही चहल-पहल थी। मुहल्ले में सभी उन्हें दादी ही तो कहते थे। यूँ तो वे यहाँ अब अकेले ही रहती थीं, लेकिन आज घर में बहू-बेटे से लेकर नाती-पोते तक सभी आए हुए थे और दादी को सजा-सवाँर कर तैयार करने में जुटे थे। दादी परिवार के सदस्यों का नया रूप और व्यवहार देखकर चकित थीं। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है?

बहूरानी दादी को नई, सफेद, स्वच्छ चाँदनी सी चमकती हुई साड़ी पहनाने लगी। महीनों से उलझे बालों को जल्दी-जल्दी सुलझाने का प्रयास करती। इतने में उसका बेटा दादी के पैरों में मोजे पहनाने लगा, बड़ी पोती ने अपनी नई चप्पल लाकर पहना दिया। उनके बेटे ने अपनी नई पैंट-शर्ट चढ़ा ली थी। किराये का टैंपो भी आकर दरवाजे पर खड़ा हो गया। दादी को खिला-पिला कर चलने को तैयार किया गया।

आखिरकार दादी ने पूछ ही लिया, “हमें जाना कहाँ है?”

बहू बड़े प्यार से बोल उठी, “अम्माजी आप जानती नहीं हैं, आज १५ अगस्त है। कलेक्टर साहब ने आपको सम्मानित करने के लिए बुलाया हैं। …इस गाँव-शहर में जितने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं या उनके परिवार में कोई बुजुर्ग हैं, उन लोगो को बुलाया गया है। आज सबका सम्मान किया जाएगा।”

“सम्मान!” यह शब्द तो दादी का साथ कबका छोड़ चुका था।

टैम्पो में बैठते हुए दादी की आँखों में अपना अतीत नाच उठा। बर्षों पहले गुजर चुके दादाजी की याद ही बची है अब। देश में आजादी की लड़ाई अपने अन्तिम दौर में थी। देश को आजाद कराने के लिये वे महीनों घर नही आते थे। कभी अचानक रात के अंधेरे में आते और मुँह-अंधेरे ही निकल जाते। उनके पास ढेरों पैतृक सम्पत्ति व जगह-जमीन होने के बावजूद उन्होंने अपने घर को सुखी बनाने की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।

दादी अकेले घर में बैठी उनकी राह देखती, लेकिन भारत माँ आजाद नहीं थी इसलिए दादा जी को घर की ओर देखने की फुरसत नहीं थी। देश आजाद होने से पहले ही वे भारत माता के चरणों में शहीद हो गये। उनके गुजरने के बाद विधवा का जीवन एकाकी हो गया। उस अकेलेपन को दूर करने के लिए दादी ने अपने भाई के बेटे को गोद लिया। उसकी बुआ से बुआ-माँ बन गयीं।

दादी ने बड़े ही प्यार से अपने भतीजे को दत्तक पुत्र बनाकर उसका पालन-पोषण किया। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पत्नी होने के नाते जो पेंशन मिलती थी उन पैसों से बेटे की हर फरमाइश पूरी करतीं। अपने सुखद भविष्य की आशा लिये उन्होंने उस बेटे को बड़ा किया। जिस तरह माली अपने पौधों को इस उम्मीद में सींचता है कि उनमें फूल आये तो उसे देखकर मन खुश हो जाये, घर-आँगन में रौनक आ जाए और चारों तरफ हरियाली और सुख का एहसास हो, दादी ने उसी उम्मीद में अपने बेटे को बड़ा किया।

लेकिन बेटे ने बड़ा होते ही अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये। सबसे पहले महीने मे जो पेंशन मिलती थी उसकी पासबुक उसने अपने हाथ में ले ली और हर महीने माँ से अंगूठा लगवाकर पैसे उड़ा लेता। जमीन-जायदाद की देख-भाल करना तो दूर उसे बेचने के लिए उसने माँ को मारना पीटना भी शुरू कर दिया। माँ ने हमेशा उसे समझाने की कोशिश की लेकिन बेटे को मुफ़्त के पैसे उड़ाने की आदत पड़ गयी थी।

बूढ़ी माँ ने सोचा कि अगर बेटे की शादी हो जाए और कन्धे पर परिवार की जिम्मेदारी आ जाए तो यह शायद सुधर जाए। उन्होंने रिश्तेदारों से कह-सुनकर उसकी शादी तय कर दी। बड़े ही अरमान से अपने बेटे को सजाकर, दुल्हा बनाकर बारात भेंजा। नई बहू का उत्सुकता और उत्साह से इंतजार करने लगी। उन्होंने अपनी बहू के लिए दरवाजे से लेकर अंदर तक पियरी (पीले रंग में रंगी हुई धोती) बिछायी, ताकी बहू के पैर जमीन पर न पड़े। उन्हें लगा शायद बहू बेटे को सम्भाल ले जायेगी, लेकिन किसे पता था वह उससे भी चार कदम आगे निकल जाएगी। बूढ़ी माँ का सहारा बनना तो दूर, उसने माँ का घर मे रहना भी मुश्किल कर दिया।

जिस भारत माँ को आजाद कराने के लिए एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसी की पत्नी आज अपने ही घर में आजाद नहीं थी। अब जमीन-जायदाद ज्यादा तेजी से बिकने शुरू हो गये और माँ ने जब-जब उसका विरोध किया, तब-तब उसे बेटे-बहू से मार खानी पड़ी। बूढ़ी दादी अब अपने ही घर में डरी-सहमी रहती। हार कर सब कुछ सहते रहना उन्होंने मन्जूर कर लिया था। जब-जब घर में बहू को बच्चे होते या दूसरा कोई कार्यक्रम होता दादी अपना सब दुख भूलकर ‘सोहर’ या ‘संझा-पराती’ गाना नहीं भूलती।

बेटे ने एक-एक करके जब यहाँ की सारी जमीनें बेच दी तो उसे अपने पैतृक गाँव की याद आने लगी और वह अपने भाई बंधुओं के साथ रहने का निर्णय लेकर चला गया। बेचारी बुढ़िया दर-दर भटकते हुए भिक्षा मांगकर अपना जीवन चलाने पर मजबूर हो गयी। बेटे-बहू ने जाते-जाते बूढ़ी माँ का घर तक बेच दिया। जब वह उनके साथ रहने के लिए मायके गयी तो उसे बार-बार एहसास दिलाया गया कि यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है। बेचारी वहाँ से लौट आयी थी। अपने पति के बिक चुके मकान के एक कोने में रहने लगी।

आज दादी जहाँ भी जाती उसके दुख से सब दुखी होते लेकिन उस बिगड़ैल बेटे से कोई नहीं पूछता कि उसकी बूढ़ी माँ दर-दर की ठोकर क्यों खा रही है? दिन भर तो वह घूम-घूम कर भिक्षा मांगती और शाम को यदि किसी के दरवाजे पर रूकती तो उसे वहाँ से जाने के लिए कह दिया जाता। सबको यह डर होता कि अगर वह मर गई तो कौन उसका क्रिया-कर्म करेगा?

लेकिन आज दादी को बेटे-बहू सुबह से ही बड़े प्यार से पुचकार रहे थे। बेटा तो महीने के अन्त में केवल एक बार उसकी पेंशन निकालने और उड़ाने के लिए आता था। आज महीने के बीच में ही सबको आया देखकर उसे हैरानी हो रही थी। आखिर ऐसा क्या होने वाला है आज? दादी इसी उधेड़-बुन में उलझी हुई थीं तभी टैपू की खड़खड़ बन्द हो गयी। बेटे ने बताया कि मन्जिल आ गयी है और उसने दादी की बाँह पकड़कर नीचे उतार लिया।

समारोह स्थल की भव्य सजावट देखकर दादी चकित रह गयीं। वहाँ कार्यक्रम की तैयारियाँ देख दादी फूली नही समा रहीं थीं। झक सफेद कपड़ों का बड़ा सा पाण्डाल लगा था। भारत माता के तिरंगे झण्डे चारो तरफ लहरा रहे थे। जिले के सभी बड़े अफसर और गणमान्य लोग जुटे हुए थे। जमीन पर लाल-हरी कालीन बिछी थी, लाल फोम की गद्दी लगे हुए सोफे पड़े थे, चारों तरफ खाकी वर्दी में पुलिस वाले खड़े थे। दादी को लगता सब उन्हें सलामी देने के लिए खड़े हैं। आज दादी बहुत प्रसन्न थीं।

कार्यक्रम पूरी भव्यता से प्रारम्भ हुआ। बुजुर्ग सेनानियों या उनकी विधवाओं में से एक-एक कर के सबको बुलाया गया। दादी की बारी भी आयी। कमर से झुक कर चलने वाली दादी कुछ सीधे चलने का प्रयास करती हुई मंच तक पहुँची। कलेक्टर साहब ने सम्मान स्वरूप पच्चीस सौ रूपये और एक शॉल भेंट करते हुए जब झुककर प्रणाम किया तो दादी के चेहरे पर गौरव का भाव चमक उठा। खुशी के आँसू छलक आए।

धीरे-धीरे समारोह समापन की ओर चल दिया। बेटे ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह माँ का हाथ पकड़कर टैम्पो में बिठा दिया और दादी वापस लौट पड़ीं। लेकिन यह क्या…? कुछ दूर चलने के बाद टैम्पो रोअक दिया गया। दादी को नीचे उतारा गया। टैम्पो का भाड़ा देने के लिए ‘सम्मान’ वाले पच्चीस सौ रूपये बेटे के हाथ में आ चुके थे। माँ को वहाँ से गाँव की ओर जा रहे एक ट्रैक्टर की ट्रॉली में बिठा दिया गया। बेटा उन रुपयों के साथ बाजार में गुम हो गया।

घर पहुँचने पर बहूरानी ने झटसे साड़ी उतरवा ली। व्यंग्य वाण चलाये जा रही थी- “क्यों माँ जी…! सम्हल कर नहीं बैठ पा रही थीं। …नई साड़ी में मिट्टी पोत आयीं।” पोती ने अपने चप्पल निकाल लिए और धोकर रखने लगी। पोते को अपने मोजे खराब लगने लगे। बेचारी बुढ़िया ने एक कोने में पड़ी कई जगह से फटी और गाँठ लगी धोती जमीन से उठकर पहना और घर के दूसरे कोने में जाकर टूटी चारपाई पर लेट गयी। अब उसकी ओर देखने वाला कोई नहीं था।

लेटे-लेटे उनकी आँखो में सम्मान समारोह का दृश्य नाच उठा। कितने बुजुर्ग सेनानी आए थे। काश वे भी उनमें एक होते। उनकी याद करते-करते आँख लग गयी…। किसी ने खाना खाने के लिए भी नहीं जगाया। सुबह होने पर घर वालों ने देखा कि दादी की चारपायी खाली है। उन्हें ढूँढने का प्रयास कम ही किया गया। उस दिन के बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा…।

शायद सम्मान पाने के बाद वह ‘उनके’ पास चली गयी। उन्हें बताने…

-(श्रीमती) रागिनी शुक्ला

प्रस्तुति: रचना त्रिपाठी