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Wednesday, May 13, 2015

आस्तीन में मुंहनोचवा

सन् 2002-03 की बात है, जब हम लोग नेपाल से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिला मुख्यालय की सरकारी कालोनी में रहते थे। उस समय पूरा शहर 'मुंहनोचवा' की मार से आजिज था।

आये-दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता था, आज यहाँ देखा गया तो कल वहाँ। कोई कहता कि पंजो वाला बड़ा जंतु है, नाखूनों से वार करता है। तो कोई उसे बड़ी टांगों और लंबी पूछ वाला कीड़ा बताता था। अखबार का एक पूरा पेज मुंहनोचवा से प्रताड़ित लोगों की तस्वीरों से भरा रहता था। इस विचित्र हमलावर का प्रहार अक्सर शरीर के खुले हिस्से में होता था। जैसे- हाथ, पैर और गर्दन का ऊपरी हिस्सा... घाव देखकर ऐसा लगता था मानों कोई  किसी साजिश के तहत रात में लोगों के ऊपर तेज़ाब फ़ेंक कर भाग जाता हो। ऐसा अखबारों में पढ़ा था। मुंहनोचवा की खोज का सिलसिला भी महीनों अख़बारों में जारी रहा। पर ठीक से किसी को मालूम नहीं चला कि वह देखने में कैसा था...?

उस दिन सुबह से शाम हो गई थी पर हमारी पड़ोसन मिसेज शर्मा नीचे नहीं उतरीं। दिन में करीब एक से दो बार बड़े करीने से पतली प्लेट्स में साड़ी पहने... कभी अपने दाहिने हाथ की तर्जनी में घर के दरवाजे की चाभी की रिंग डाले, उसे गोल गोल घुमाते हुए तो कभी ऊन-सलाई के साथ अपनी बुनाई का काम लिए वे नीचे सड़क पर निकल पड़ती थी। अक्सर सिर ऊपर उठाकर मेरी बालकनी की तरफ देखतीं और मुझे भी आवाज लगातीं- " जुनजुन की मम्मी नीचे आइये, चौकड़ी जमाते हैं।"

मेरी भी आदत सी बन गई थी - साहब लोगों के ऑफिस या कहीं बाहर जाने के बाद मुहल्ले की सभी गृहिणियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाते हुये ठहाके मारने की। मिसेज शर्मा के हाथों स्वेटर की बुनाई की चर्चा तो पूरी कालोनी में थी। अक्सर कोई न कोई स्वेटर की डिजाइन सीखने के बहाने हमारी चौकड़ी में साथ देने पहुंच ही आता था। फिर तो दो-तीन घण्टे कैसे बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता।

उस दिन उनके घर का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन वे दिख नहीं रहीँ थीं। मुझसे भी रहा नहीं गया। मैं जायजा लेने अंदर चल पड़ी। भाभीजी...! आवाज लगाते उनके ड्राइंग रूम से होकर भीतर वाले कमरे  की तरफ बढ़ी।

"आप भी यहीं आ जाइये" किचेन की तरफ से आवाज आई। देखा तो पकौड़ियाँ बनाने के लिए प्याज काट रही थीं। मैंने पूछा- "कोई आने वाला है?"
"नहीं तो!"
"फिर इतनी सारी तैयारी किसके लिए?"
"आज चुन्नी के पापा ऑफिस से घर जल्दी आ गये थे। चाय के साथ पकौड़ियाँ भी बनाने को बोले हैं।"
"ओय-होय... तो ये बात है... तभी मैं कहूँ आज आप इतनी व्यस्त क्यूँ है जो नीचे नहीं उतरीं?"
" ऐसी कोई बात नहीं... सुबह से मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी"
"ओहो, इसीलिए भाई साहब घर जल्दी आ गये होंगे...? पर यह भी क्या खूब रही! जब तबियत ठीक नहीं थी तो आपको आराम करना चाहिए था और आप हैं की पकौड़ियों में लगीं हैं...? इससे तो अच्छा था कि वो ऑफिस में ही रहते"

मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह भावुक होकर अप्रत्याशित आवेश में आ गई। मेरी तरफ पलटकर बड़ी तेजी से बोली- " उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है...?" बुदबुदाते हुये... उनकी आवाज फिर कुछ ऐसी आई- "मरती रहो पर करती रहो"

मेरी नजर  उनके चेहरे पर टिक गयी थी। जो गोरा-चिट्टा, चमकदार और गुलाबी नाजुक चेहरा देखकर बहुतों को रश्क हो जाता था उसकी हालत देखकर  मैं चौक पड़ी।
"अरे, ये क्या! आज फिर वही काला धब्बा...हो न हो भाभी जी, आपके घर में भी मुंहनोचवा है!"
अब मुंहनोचवा को लेकर मेरी उत्सुकता और चिंता बढ़ गई थी। मैं पूरी तरह विश्वास कर चुकी थी कि यह प्राणी काल्पनिक नहीं है। उनका बिगड़ा चेहरा देखकर मैंने मन में सोचा शायद इसीलिए लोगों ने उसका नाम मुंहनोचवा रख दिया हो।

मैं उनसे ठिठोली करने पर उतर आई- "अब पता चला इस मुएं मुंहनोचवा का राज... इसका टारगेट भी ख़ूबसूरत चेहरे ही हैं।" लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अनमनी सी थी। सच में दुःखी लग रही थीं।

तत्काल हमने भाव बदला और उन्हें अलर्ट किया- "देखिये, आप सावधान हो जाइए! रोज रात में मच्छरदानी लगाकर सोया करिये। मैं कुछ दिनों से देख रही हूँ कि आपके चेहरे का एक दाग अभी ठीक नहीं होता तबतक दूसरा धब्बा फिर उग आता है। हो न हो यह मुंहनोचवा का ही प्रकोप है! और सुनिये, अगर आपको कहीं दिख जाय तो मुझे भी बताइयेगा। मैं भी उसे देखना चाहती हूँ। फिर हम दोनों अखबार वालों को जीते-जागते सबूत के साथ उस मुंहनोचवा के बारे में बताएँगे। सच में भाभी, फिर बड़ा मजा आएगा!"

हमेशा की तरह उनके चेहरे की चमक और बिंदास ठहाके वाली हंसी आज गायब थी। अचानक मेरे सामने एक अदद मुस्कान बनाये रखने की उनकी कोशिश भी नाकामयाब हो रही थी।
मेरे प्रश्नवाचक चेहरे की ओर आँख उठाकर उन्होंने देखा तो भीतर दबाया हुआ दर्द जुबान पर आ ही गया।
पीड़ा से भरी मुस्कान को सहेजकर धीरे से बोली-  "...और मुंहनोचवा जब मच्छरदानी के भीतर ही मौजूद हो तब क्या करेंगे...?"
इतना सुनकर कुछ देर तक मैं सन्न रह गई...! सोच नहीं पा रही थी की क्या बोलूँ। उनकी पीड़ा पर मुझे अबतक मजाक सूझ रहा था। अब ग्लानि ने घेर लिया।
मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा-
"यह तो बलात्कार है...?"
"नहीं-नहीं, यही उनका प्यार है...!" उनके चेहरे की वितृष्णा साफ़ झलक रही थी।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 14, 2015

पीके जैसी फिल्मों से सीखती पीढ़ी

आज सुबह-सुबह मेरी बचपन की सहेली का फोन आया। वह एक तरफ थोड़ी परेशान सी लग रही थी तो दूसरी तरफ अपनी बात बताते हुए हँसती भी जा रही थी। मैंने बोला- "अजीब हो यार, या तो पहले मुझे पूरी बात बताओ या पहले खूब हंस लो।" वह चुप हो गयी और अपने को संयत करके बताने लगी। उसकी बातों में शर्मिंदगी भी थी और झुंझलाहट भी; फिर भी बीच-बीच में हँसती जा रही थी। बच्चों ने हरकत ही ऐसी की थी कि उसपर न तो क्रोध किया जा सकता है, न उसे स्वीकार किया जा सकता है और न तो सराहा ही जा सकता है। बता रही थी कि उसका दस साल का बेटा अपने पिता से पीके फ़िल्म में “डांसिंग कार” के बारे में बात कर रहा था। बेटे ने कहा-

pk-parody

" वो डांसिग कार नहीं थी पापा।"

पापा ने पूछा- फिर क्या था..?

"उसमें सेक्स हो रहा था"

वो क्या होता है..?

"इसी से तो पापुलेशन बढ़ता है"

तुम्हें कैसे पता चला.?

"फ़िल्म से ही, आपने देखा नहीं उसमें स्ट्राबेरी फ्लेवर कामसूत्र  कंडोम का सीन था...!"

वो क्या होता है..?

"अरे मेरे बुद्धू पापा! वो पापुलेशन कंट्रोल ले लिए सेक्स के दौरान पहना जाता है"

पापा की थूक तो गले में सटक गई। बेटे का डिस्क्रिप्शन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसने फिर बताया-

" पापा मुझे तो लगा कार में बच्चा पैदा हो रहा हो रहा है"

वो कैसे पता चला..?

“आपने सुना नहीं उसमें इह.. इह..की आवाज आ रही थी। ”

अब उसे हम दस साल का बच्चा कहें या दस साल का जवान बेटा! हद होती है। हास्य और मनोरंजन के नाम पर ऐसे फूहड़ दृश्य परोसे जा रहे हैं जो हमारे सामान्य जन जीवन का हिस्सा भी नहीं हैं। हो सकता है फिल्म के कर्ता-धर्ता लोग ऐसे वातावरण में रहने के आदी हों लेकिन भारतीय समाज के आम आदमी के लिए तो इस फिल्म ने लगातार मर्यादा की सीमा पार की है। व्यावसायिक सिनेमा बनाने वालों की अधिक से अधिक पैसा कमाने की चाह और उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में उलझा हुआ जनमानस मिलकर जो काकटेल बना रहे हैं उससे मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसे असहज दृश्य उत्पन्न होते ही रहेंगे। हम एक भयानक पैराडाइम-शिफ़्ट देख रहे हैं।

फिल्मों में आजकल जिस तरह के दृश्य दिखाये जा रहें हैं उसपर हमारे बच्चों का बालमन समय से पहले वयस्क हो रहा है। इन फिल्मों से करोड़ों की कमाई करने वाले डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और एक्टर ने फ़िल्म बनाते समय देश के नौनिहालों के बारे में रत्ती भर भी विचार नहीं किया होगा; और सेंसर बोर्ड ने तो अपनी आँख पर सिर्फ धर्म से जुड़ी समस्याओं का ही चश्मा चढ़ा रखा होगा; जिसने इन बेहूदे दृश्यों को नजरअंदाज कर फ़िल्म दिखाने की इजाजत दे डाली होगी। इन फिल्मी कलाकारों का क्या इन्हें तो सिर्फ अपने नाम, पैसा और शोहरत से मतलब है। हमारे बच्चों के भविष्य से तो जैसे कोई ताल्लुक़ ही न हो। सत्यमेव जयते के माध्यम से लोकप्रिय प्रवचन देने वाले आमिर खान से इसकी उम्मीद नहीं थी।

एक तरफ आमिर खान की फ़िल्म थ्री इडियट्स ने मासूम बच्चों के सामने नार्मल डिलेवरी की प्रक्रिया  का सीधा प्रसारण कर डाला तो दूसरी तरफ अब फ़िल्म पीके में बार-बार डांसिंग कार का दृश्य दिखाकर हमारे बच्चों को सेक्स के बारे में और जानने की उत्कंठा बढ़ा दी। ज़रा सोचिए, ऐसे दृश्यों से उनके दिमाग में कितने रहस्य अपनी छाप छोड़ गए होंगे...? अब ये बालमन आगे क्या करेगा.. उनका जिज्ञासु मन किस प्रकार शांत होगा..?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, August 23, 2014

उभय-लिंगी चोला

आज के इस दौर में लड़कियों और स्त्रियों के प्रति बढ़ती असुरक्षा और हमारे कथित खैरख्वाहों की बयानबाजी को देखते हुए मेरे मन को एक तरकीब सूझ गयी है। लड़कियों की छेड़छाड़ से लेकर उनका यौन उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार का कारण उनके पहनावे को बताया जा रहा है। सूरज उगने से पहले और डूबने के बाद इस औरत जात को घर से बाहर निकलने की बीमारी भी एक बड़ी समस्या है जो समाज के ठेकेदारों से सम्हाले नहीं सम्हल रही है। मैं जो सोच रही हूँ उसे आप इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान भी कह सकते हैं -

सरकार को चहिए कि स्त्री और पुरुष दोनो को घर से बाहर निकलने पर एक ही जैसा वस्त्र यानी ‘उभय-लिंगी चोला’ पहनना अनिवार्य कर दे; ठीक वैसे ही जैसे स्कूली बच्चों के लिए यूनिफार्म में होना जरूरी होता है। इस चोले की बनावट ऐसी होनी चाहिए जिससे वह पूरे ‘बदन’ को अच्छी तरह से ऊपर से नीचे तक ढक लें…इस प्रकार कि घर से बाहर निकलने वाला वह मनुष्य स्त्री है या पुरुष, लड़की है या लड़का इसकी पहचान करना मुश्किल हो जाय… और बाहर निकलने वाला प्रत्येक व्यक्ति “पादरी” लगने लगे। इस चोले को पहनने के बाद किसी के मन में असमानता की भावना या हीनता ग्रन्थि नहीं पनपने पाएगी… अमीर- गरीब सभी एक समान दिखेंगे...घर से बाहर जाने वाले वाले सभी लोग यूनीफार्म में एक ही जैसे नजर आने लगे तो सड़क पर आवारा घूमते जानवरों, सॉरी शोहदों के द्वारा स्त्रियों की पहचान करना मुश्किल हो जायेगा। जिससे लड़कियों के साथ बलात्कार और एसिड अटैक जैसी घटनाओं की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाएगी।

दूसरी तरफ हमारे खैरख्वाह भी लड़कियों और माताओं-बहनों के वस्त्र पर बेवजह टिप्पणी करने की तकलीफ से बचे रहेंगे… स्त्री-पुरुष के अंदर एक दूसरे को देख आकर्षण बल में भी कमी आएगी; स्त्री का बदन ढका रहेगा तो उसे देखकर उसी की तरह ढके बदन वाले पुरुष को कोई उत्तेजना नहीं पैदा होगी और स्त्री देह पर यौन हमले की घटनाओं में भारी गिरावट आ जाएगी…। इस तरह सामाजिक वातावरण भी स्वस्थ बना रहेगा। काम वसना से प्रेरित पुरुष अगर किसी स्त्री से दुराचार करने का दुस्साहस करेगा भी तो उसकी सफलता का प्रतिशत बहुत ही कम रहेगा क्योंकि ऐसा करने में उसे बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा... पकड़े जाने के डर से  उसके पास छोड़कर भाग निकलना ही एक मात्र विकल्प बचेगा और पादरी के परिधान में सरपट भागना भी आसान नहीं होगा। फिर कोई मूर्ख ही ऐसा रिस्क लेगा अपनी फजीहत कराने के लिए।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 13, 2014

राखी की परंपरा और आधुनिक परिवेश

तीन दिन हो गया रक्षाबंधन का त्यौहार बीते हुए…लेकिन मै आज भी उस पर्व की महत्ता पर अटकी हुई हूँ...रोज यही सोचती हूँ कि इस पर्व को मनाने की आखिर क्या वजह रही होगी… सुरक्षा तो सबके लिए जरूरी है, वह स्त्री हो या पुरुष…लेकिन यह विशेषतौर पर स्त्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से ही क्यों मनाया जाता है… यह भाई-बहनों के बीच एक विश्वास की डोर है… प्यार का बंधन है… मगर इस त्यौहार को रक्षाबंधन के नाम से मनाते है… इस पर्व के उपलक्ष्य में हर एक स्त्री अपने भाई को वह चाहे उससे उम्र मे दस साल छोटा हो या बड़ा… रक्षासूत्र बांधती है और उससे यह संकल्प लेती है कि वह उसकी रक्षा करे… ऐसा क्यों है…? एक बेटी या लड़की के मन में जन्म से ही असुरक्षा का बोध कराना और फिर उस घर का लड़का/ भाई की कलाई में एक लड़की/ बहन के द्वारा राखी बंधवाना, यह प्रथा क्यों बनायी गई…?

सोशल मीडिया पर ऐसी बहस चल रही है कि क्या आज के दौर में यह पर्व एक स्त्री के मन में असुरक्षा का भाव उत्पन्न नहीं करता…! जहां एक तरफ स्त्रियां अपने को पुरुष से किसी भी मामले में कम न होने का दावा करती हैं… दूसरी तरफ इस पर्व के माध्यम से राखी बांधकर भाई; पिता; चाचा या भतीजा के आगे अपनी सुरक्षा का वादा मांगती हैं…कहीं न कहीं उनके अंदर यह बात बचपन से ही बैठायी जा रही है कि वह इन सभी से कमजोर है…। सवाल है कि अगर कमजोर हैं भी तो किस मामले में- शारीरिक, आर्थिक या मानसिक या बौद्धिक…?

मुझे तो रक्षाबंधन का पर्व स्त्री सुरक्षा के प्रश्न का एक मनोवैज्ञानिक समाधान लगता है… वो इसलिए कि भाई-बहन दोनों लम्बें समय तक अपना जीवन एक दूसरे के संपर्क में रहकर बिताते हैं… उनके जीवन काल में ऐसे मौके भी कई बार आते हैं, जहां उन्हें एकांत समय भी व्यतीत करने को मिलता हैं… ऐसे में दो विपरित लिंगों के प्रति उनके अंदर भी आकर्षण होना स्वाभाविक है… मगर ऐसा नही होता… यह इसी संस्कृति की देन है…जिसके बहाने एक परिवार में रहने वालों बच्चों को यह संस्कार दिया जाता है कि भाई-बहन का रिश्ता बहुत पवित्र होता है… हर भाई का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी बहन को प्यार देने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा का भी ख्याल रखे… उसके साथ किसी तरह की अभद्रता न करे…

याद है मुझे जब मै छोटी थी तो राखी वाले दिन अपने भाइयों को राखी तो बांधती ही थी…साथ में अपने आस-पड़ोस में रहने वाले अपने से छोटे-बड़े लड़को को भी बांधती थी…तो कहीं न कहीं रक्षाबंधन का त्यौहार एक मनोवैज्ञानिक अनुकूलन की प्रक्रिया है, जिससे एक घर ही नहीं बल्कि पूरे समाज को लाभ मिलता है। यह कहना कि इससे लड़की के मन में जन्म से ही कमजोर होने और लड़कों की तुलना में हीनता का भाव पैदा होता है कोरी सैद्धान्तिक बात है। बल्कि हमारी सामाजिक वस्तुस्थिति को नकारने का प्रयास है।

यह तो एक आदर्श स्थिति होगी जब प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा उसकी लैंगिकता से निरपेक्ष होगी; जहाँ लड़की और लड़के को कहीं भी आने-जाने, कोई भी काम कर लेने और किसी भी प्रकार की जीवन चर्या चुन लेने का समान अवसर और अधिकार हो तथा उसमें लिंग के आधार पर कोई विभेद न हो। लेकिन दुर्भाग्यवश वास्तविक समाज अभी ऐसा नहीं हो पाया है। इस समाज में केवल आदर्श पुरुष नहीं रहते कि लड़कियाँ उनकी ओर से निश्चिन्त होकर अपनी स्वतंत्रता का पूरा लाभ उठा सकें। समाज में ऐसे तत्वों की कमी नहीं जो एक लड़की को कमजोर करने और उसकी कमजोरी का फायदा उठाने की ताक में रहते हैं। हमारे समाज के लिए तो यह जुमला मुफीद है- सावधानी हटी- दुर्घटना घटी।

जब तक हम एक आदर्श समाज की स्थापना नहीं कर लेते तबतक ऐसे तत्वों के प्रति सावधान रहने, उन्हें ऐसा मौका हाथ न लगने देने के लिए यदि कुछ व्यावहारिक उपाय करना पड़े तो करना ही चाहिए। इसे स्त्री स्वातंत्र्य और आधुनिकता के नाम पर खारिज कर देना उचित नहीं होगा।

(रचना त्रिपाठी)