Sunday, August 23, 2020
दहिजरा कोरोना-1 (कोठरी में संडास)
Friday, July 24, 2020
कम-अक्ल औरतें भी न...
Sunday, July 29, 2018
खुद की सोचो
शांता, देखती हूँ, तुम दिनोदिन सूखती जा रही हो? ये बात सही है कि बच्चों का ख्याल तुम नहीं रखोगी तो कौन रखेगा! पर जरा सोचो, खाली पेट काम करते-करते बीमार पड़ गई तो क्या होगा? अभी जो तुम्हारे भीतर ऊर्जा संचित है वही तो दिन पर दिन खर्च हो रही है। लेकिन इसकी प्रतिपूर्ति कैसे होगी?
सुबह छः बजे घर से निकल लेती हो दोपहर के दो बजे तक सिर्फ चाय पी-पीकर अपना पेट लेसती रहती हो। ऐसे कबतक चलेगा? ये रोज-रोज चाय के साथ की बिस्किट और ब्रेड घर लेकर चली जाती हो। कभी-कभार खुद भी तो खा लिया करो। तुम्हारी देह में जायेगा तो भी तुम्हारे बच्चों के काम आएगा... तुम्हे कुछ देर और काम करने की शक्ति मिलेगी।
और उसका क्या? ... जबतक तुम्हारी हड्डी में दम है तभी तक तेरी राह ताकेगा... नहीं तो, ले आयेगा घर में दूसरी ब्याह कर।
(रचना त्रिपाठी)
Monday, March 19, 2018
आत्ममुग्धो भव...!
कुछ लोग अपने काम और नाम की बातों को प्रस्तुत करने में इतने माहिर होते हैं कि उन्हें कभी भरोसा ही नहीं होता कि उनसे बेहतर कोई दूसरा भी यह काम कर सकता है। इस मामले में कुछ महान आत्माएं इतनी स्वावलंबी होती हैं कि दूसरों को करने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ना चाहतीं। अपनी प्रशंसा के लिए दूसरों का मुँह ताकना उन्हें नहीं भाता। अपने काम को ठीक से करने का शऊर हो न हो, आत्मविश्वास भले ही डगमगाता रहे लेकिन सबके सामने अपने करतब का बखान करने के लिए उनमें आत्मनिर्भरता कूट-कूट कर भरी रहती है। सामने वाले का क्या भरोसा? क्या पता कोई चूक कर दे, कुछ गुणों पर जोर देने में कंजूसी कर दे। जब उन महान गुणों के प्रथम पारखी वे स्वयं हैं तो उनसे बेहतर उनका गुणगान कोई और कैसे कर सकता है? इसे आप स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता की आदर्श स्थिति भी कह सकते हैं। अब किसी भी आदर्श को हासिल करना कोई मजाक नहीं है। इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। अपने लिए चुन-चुनकर नायाब शब्दों को संजोए रखना और मौके बे मौके झोंकते रहना पड़ता है। यह सबके वश की बात थोड़ी न है।
आत्ममुग्धता की इस पराकाष्ठा को हासिल करने में सफल होने वाले कुछ ही काबिल लोग हैं। जी तो करता है इनके बीच एक प्रतियोगिता करा दी जाय और इसके विजेता को राष्ट्रीय पुरस्कार भेंट किया जाय। अलबत्ता इस प्रतियोगिता से देश के कुछ सर्वोच्च नेताओं को दूर रखना पड़ेगा नहीं तो रिजल्ट पहले ही आउट हो जाएगा। अपने आपको तालियों की गड़गड़ाहट और विक्ट्री साइन का सबसे बड़ा हकदार बताने की कला में कम लोग ही निष्णात होते हैं। कहीं ये कलाकार विलुप्त न हो जाय इसलिए इनके संरक्षण और संवर्द्धन की कोशिश की जानी चाहिए। हम जैसे साधारण लोग जो इनके आगे मूक बने रहते हैं, इनके बिना क्या कर पायेंगे? कहीं इनके बिना हमारा जीवन सूनेपन का शिकार न हो जाय। इसलिए ऐसी दक्ष प्रजाति को बढ़ावा देते रहने की बड़ी जरूरत है।
(रचना त्रिपाठी)
Saturday, July 1, 2017
बहू-अधूरी
ससुराल में दो साल बीत गये। कमली की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही थी। पूर्वा के मुकाबले वह कहीं नहीं टिक पा रही थी। दोनों बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर रात में बिस्तर पर उन्हें सुलाते वक़्त लोरी की आवाज़ में भी अम्माजी पूर्वा को ही ढूँढती रहती। बच्चों की देखभाल में कहीं कोई कमी न आ जाए इसके लिए कमली भरसक कुछ भी उठा नहीं रखती। आज अधिक रक्तस्राव के कारण वह कमरदर्द से परेशान कमरे के भीतर पलंग पर लेटी पड़ी थी। उसकी आँखों के दोनों कोनों से झर-झर आँसू बह रहे थे।
अम्मा जी मोबाइल कानों पर लगाये कमली की माँ से उसकी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ गयी थीं - "जबसे आयी है यह तीसरी बार है... आज चार दिन हो गया, बच्चों को न तो समय से नहलाया-धुलाया और न ही घर के किसी काम में हाथ बँटा रही है... पूछिए ज़रा, अपनी लाडली से कबतक मातम मनाएगी? जाने क्या सिखा-पढ़ा कर भेजा है आपने!"
-"ऐसी स्थिति में मन को दुःख तो होगा ही न समधिन जी! भला कौन स्त्री माँ बनना नहीं चाहती? बिन बाप की बच्ची थी बेचारी... मैं भी अपनी परिस्थितियों के आगे मजबूर थी... इसमें उसका क्या दोष?" उसकी माँ ने विनती की।
"हाँ तो मैंने कब गिड़गिड़ाया था आपके सामने उसे अपनी बहू बनाने के लिए? ...और मेरे बेटे ने तो पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसे बीवी नहीं अपने बच्चों की माँ चाहिए। ....शील-संकोच तो मायक़े में ही छोड़कर आ गई थी। उसके कंठ ससुराल में आते ही खुल गए... और तो और सिर पर पल्लू आजतक नहीं ठहरता... दुल्हन हमेशा पर्दे में ही शोभा देती है।" उनकी आवाज़ कमली के कानों में भाले की तरह चुभ रही थी। अम्माजी ने आज फिर उसकी माँ को कोसना शुरू कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। पलंग से धीरे से उठकर दीवाल का सहारा लिए वह बरामदे में आकर खड़ी हो गई।
"अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी जान गए कि बहू पेट से थी। ...हमारी पूर्वा हमें छोड़कर चली गई लेकिन ऊँची आवाज़ तो दूर गुन्नू पैदा हो गया तब तक किसी ने उसकी झिरखिरी तक नहीं देखी। ये महारानी तो किसी की परवाह किए बिना सारा दिन बच्चों के साथ चपड़-चपड़ करती रहती हैं..." अम्मा जी का गुबार बाहर आ रहा था।
- "तो फिर शिकायत किस बात की अम्माँ जी? पूर्वा दी आपके बेटे की दुल्हन बनकर आयी थी और मैं दो बच्चों की माँ, तो पहले बच्चों को संभालू या पल्लू... इतना अंतर तो होगा ना मुझमें और उनमें...?" आज पहली बार अधूरी बहू का कंठ अम्मा जी के सामने खुल गया था।
(रचना त्रिपाठी)
Wednesday, June 29, 2016
बेटियों का अपराध
(रचना त्रिपाठी)
Saturday, February 20, 2016
स्वच्छता अभियान की जय हो
कूड़े वाली गाड़ी आयी
रम पम पम... पों पों पों
कूड़ा हम उठायेंगे, लखनऊ स्वच्छ बनायेंगे...
रम पम पम... पों पों पों
तेज आवाज में यह गाना गाती और भोंपू बजाती हुई यह गाड़ी सुबह 8.30 से 9 बजे के बीच मोहल्ले में आती तो सभी घरों से लोग कूड़े के थैले लेकर बाहर आ जाते। घरों के बच्चे तो कौतूहल से गाड़ी देखने और उसका संगीत सुनने ही निकल पड़ते थे। बच्चों के साथ बड़े भी कुछ देर के लिए इस नज़ारे को देखने बालकनी में निकल आया करते थे। इस पूरे खेल में कुल 10-15 मिनट लगते थे।
कूड़े-कचरे के उन्मूलन के लिये नगर निगम द्वारा की गयी यह पहल बहुत ही सराहनीय है, और कामयाब होते भी दिख रही है।
पर पिछले दो चार दिनों से यह रोचक संगीत सुनने को नहीं मिल रहा है। पता चला कि एक दिन हमारी ही बिल्डिंग के एक महोदय ने गाड़ी वाले को ज़ोर से डाँट कर भोंपू बजाने से मना कर दिया। उसके भोंपू बजाने से उनकी सुबह की नींद में खलल पड़ रहा था। तबसे वह नहीं बजाता। नाइट ड्यूटी करने वालों की सुबह की नींद भी जरुरी है। ऐसे में कूड़े वाले का शोर मचाकर घर घर से कूड़ा इकठ्ठा करने का अभियान इनकी नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा था। सुविधा संपन्न लोगों को तो कमरे में विंडो ए.सी. की आवाज भी डिस्टर्ब कर देती है; भला इसके भोंपू की आवाज कैसे बर्दाश्त हो सकती है? अब गाड़ी रोज़ आती तो है पर चुपचाप। बच्चे दौड़कर बालकनी में उसे देखने नहीं जा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि कूड़े वाली ट्राली कब आयी और चली गई।
आज मैंने तय समय पर बालकनी से नीचे झाँककर देखा तो ट्राली नीचे खड़ी थी। घरों से कूड़े के थैले आ रहे थे। सड़क पर ट्रैफिक की आवाजाही के शोर-शराबे के बीच ट्रॉली में कूड़े के ढेर से सटकर गहरी नींद में सोता हुआ कर्मचारी दिखा। यह किसी भी आवाज से बिल्कुल बेखबर, बेसुध सा पड़ा था। कोई शोर उसे डिस्टर्ब नहीं कर पा रहा था।
मेरे मोहल्ले की सड़कें और पार्क जिसपर कचरे का ढेर लगा रहता था अब ज़्यादा साफ़-सुथरी दिखने लगीं हैं। जिसने बच्चों के अंदर भी सफ़ाई के प्रति नई जागरूकता पैदा कर डाली है। स्वच्छता के प्रति बड़ों से ज़्यादा बच्चों में उत्साह, उमंग और प्रतिबद्धता देखने को मिल रही है। घर में वे अब सफ़ाई के प्रति सजग तो रहते ही हैं बाहर भी इस अभियान को सफल बनाने में उनका बहुत ज़्यादा सपोर्ट मिल रहा है। राह चलते सड़क पर हम बड़ों से यदि ग़लती से भी कोई अवांछित पदार्थ गिर जाय तो वे फ़ौरन हमारी भी क्लास लगा देते हैं। बाहर कार की खिड़की से खरीदी हुई आइसक्रीम का रैपर वे संभाल कर घर तक लाते हैं और डस्टबिन में ही डालते हैं। अब टोके जाने के डर से बड़े-बूढ़े भी ऐसा करने को मजबूर हैं। यह सकारात्मक बदलाव मन में आशा जगाता है कि शायद अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे।
(रचना त्रिपाठी)

