Wednesday, May 27, 2015
मैगी-कांड के साइड-इफ़ेक्ट्स
Wednesday, May 13, 2015
आस्तीन में मुंहनोचवा
सन् 2002-03 की बात है, जब हम लोग नेपाल से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिला मुख्यालय की सरकारी कालोनी में रहते थे। उस समय पूरा शहर 'मुंहनोचवा' की मार से आजिज था।
आये-दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता था, आज यहाँ देखा गया तो कल वहाँ। कोई कहता कि पंजो वाला बड़ा जंतु है, नाखूनों से वार करता है। तो कोई उसे बड़ी टांगों और लंबी पूछ वाला कीड़ा बताता था। अखबार का एक पूरा पेज मुंहनोचवा से प्रताड़ित लोगों की तस्वीरों से भरा रहता था। इस विचित्र हमलावर का प्रहार अक्सर शरीर के खुले हिस्से में होता था। जैसे- हाथ, पैर और गर्दन का ऊपरी हिस्सा... घाव देखकर ऐसा लगता था मानों कोई किसी साजिश के तहत रात में लोगों के ऊपर तेज़ाब फ़ेंक कर भाग जाता हो। ऐसा अखबारों में पढ़ा था। मुंहनोचवा की खोज का सिलसिला भी महीनों अख़बारों में जारी रहा। पर ठीक से किसी को मालूम नहीं चला कि वह देखने में कैसा था...?
उस दिन सुबह से शाम हो गई थी पर हमारी पड़ोसन मिसेज शर्मा नीचे नहीं उतरीं। दिन में करीब एक से दो बार बड़े करीने से पतली प्लेट्स में साड़ी पहने... कभी अपने दाहिने हाथ की तर्जनी में घर के दरवाजे की चाभी की रिंग डाले, उसे गोल गोल घुमाते हुए तो कभी ऊन-सलाई के साथ अपनी बुनाई का काम लिए वे नीचे सड़क पर निकल पड़ती थी। अक्सर सिर ऊपर उठाकर मेरी बालकनी की तरफ देखतीं और मुझे भी आवाज लगातीं- " जुनजुन की मम्मी नीचे आइये, चौकड़ी जमाते हैं।"
मेरी भी आदत सी बन गई थी - साहब लोगों के ऑफिस या कहीं बाहर जाने के बाद मुहल्ले की सभी गृहिणियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाते हुये ठहाके मारने की। मिसेज शर्मा के हाथों स्वेटर की बुनाई की चर्चा तो पूरी कालोनी में थी। अक्सर कोई न कोई स्वेटर की डिजाइन सीखने के बहाने हमारी चौकड़ी में साथ देने पहुंच ही आता था। फिर तो दो-तीन घण्टे कैसे बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता।
उस दिन उनके घर का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन वे दिख नहीं रहीँ थीं। मुझसे भी रहा नहीं गया। मैं जायजा लेने अंदर चल पड़ी। भाभीजी...! आवाज लगाते उनके ड्राइंग रूम से होकर भीतर वाले कमरे की तरफ बढ़ी।
"आप भी यहीं आ जाइये" किचेन की तरफ से आवाज आई। देखा तो पकौड़ियाँ बनाने के लिए प्याज काट रही थीं। मैंने पूछा- "कोई आने वाला है?"
"नहीं तो!"
"फिर इतनी सारी तैयारी किसके लिए?"
"आज चुन्नी के पापा ऑफिस से घर जल्दी आ गये थे। चाय के साथ पकौड़ियाँ भी बनाने को बोले हैं।"
"ओय-होय... तो ये बात है... तभी मैं कहूँ आज आप इतनी व्यस्त क्यूँ है जो नीचे नहीं उतरीं?"
" ऐसी कोई बात नहीं... सुबह से मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी"
"ओहो, इसीलिए भाई साहब घर जल्दी आ गये होंगे...? पर यह भी क्या खूब रही! जब तबियत ठीक नहीं थी तो आपको आराम करना चाहिए था और आप हैं की पकौड़ियों में लगीं हैं...? इससे तो अच्छा था कि वो ऑफिस में ही रहते"
मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह भावुक होकर अप्रत्याशित आवेश में आ गई। मेरी तरफ पलटकर बड़ी तेजी से बोली- " उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है...?" बुदबुदाते हुये... उनकी आवाज फिर कुछ ऐसी आई- "मरती रहो पर करती रहो"
मेरी नजर उनके चेहरे पर टिक गयी थी। जो गोरा-चिट्टा, चमकदार और गुलाबी नाजुक चेहरा देखकर बहुतों को रश्क हो जाता था उसकी हालत देखकर मैं चौक पड़ी।
"अरे, ये क्या! आज फिर वही काला धब्बा...हो न हो भाभी जी, आपके घर में भी मुंहनोचवा है!"
अब मुंहनोचवा को लेकर मेरी उत्सुकता और चिंता बढ़ गई थी। मैं पूरी तरह विश्वास कर चुकी थी कि यह प्राणी काल्पनिक नहीं है। उनका बिगड़ा चेहरा देखकर मैंने मन में सोचा शायद इसीलिए लोगों ने उसका नाम मुंहनोचवा रख दिया हो।
मैं उनसे ठिठोली करने पर उतर आई- "अब पता चला इस मुएं मुंहनोचवा का राज... इसका टारगेट भी ख़ूबसूरत चेहरे ही हैं।" लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अनमनी सी थी। सच में दुःखी लग रही थीं।
तत्काल हमने भाव बदला और उन्हें अलर्ट किया- "देखिये, आप सावधान हो जाइए! रोज रात में मच्छरदानी लगाकर सोया करिये। मैं कुछ दिनों से देख रही हूँ कि आपके चेहरे का एक दाग अभी ठीक नहीं होता तबतक दूसरा धब्बा फिर उग आता है। हो न हो यह मुंहनोचवा का ही प्रकोप है! और सुनिये, अगर आपको कहीं दिख जाय तो मुझे भी बताइयेगा। मैं भी उसे देखना चाहती हूँ। फिर हम दोनों अखबार वालों को जीते-जागते सबूत के साथ उस मुंहनोचवा के बारे में बताएँगे। सच में भाभी, फिर बड़ा मजा आएगा!"
हमेशा की तरह उनके चेहरे की चमक और बिंदास ठहाके वाली हंसी आज गायब थी। अचानक मेरे सामने एक अदद मुस्कान बनाये रखने की उनकी कोशिश भी नाकामयाब हो रही थी।
मेरे प्रश्नवाचक चेहरे की ओर आँख उठाकर उन्होंने देखा तो भीतर दबाया हुआ दर्द जुबान पर आ ही गया।
पीड़ा से भरी मुस्कान को सहेजकर धीरे से बोली- "...और मुंहनोचवा जब मच्छरदानी के भीतर ही मौजूद हो तब क्या करेंगे...?"
इतना सुनकर कुछ देर तक मैं सन्न रह गई...! सोच नहीं पा रही थी की क्या बोलूँ। उनकी पीड़ा पर मुझे अबतक मजाक सूझ रहा था। अब ग्लानि ने घेर लिया।
मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा-
"यह तो बलात्कार है...?"
"नहीं-नहीं, यही उनका प्यार है...!" उनके चेहरे की वितृष्णा साफ़ झलक रही थी।
(रचना त्रिपाठी)
Wednesday, April 15, 2015
बुरा होना अच्छा है
आपको नहीं लगता कि एक स्त्री को पूर्ण बनाने में जितना जरूरी उन प्राकृतिक गुणों जैसे- ममता; प्यार; धैर्य, सहनशीलता, त्याग और साहस का होना है, उतना ही जरुरी उन्हें खुद को सुरक्षित रखने के लिये अपने अंदर कुछ सांसारिक गुणों का भी समावेश करना है...? थोड़ी नफरत, थोड़ा क्रोध, थोड़ी लालच, थोड़ी चालाकी, कुछ क्रूरता और ढेर सारी ताकत! यह सब उन्हें इसी जमाने से सीखना होगा !!!
याद करिये, जब प्यार करने और अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करने के जुर्म में पंचायत के ग्यारह सदस्यों ने बारी-बारी से उसकी आबरू लूटी थी तो कहाँ थी उसकी ये अनमोल निधियां जो कथित रूप से एक बेहतर संसार की रचना करती हैं। ये जो सद्गुण एक अच्छी स्त्री में रचे-बसे हैं... इनमें से कोई भी तो उसका साथ देकर उसकी रक्षा के लिये सामने नहीं आये। उसका धैर्य; उसकी लज्जा; उसकी शाहनशक्ति; उसका प्रेम; उसकी ममता और वह करुणा भी; जो इस समाज के ढांचे को मजबूत बनाये रखने के लिये कथित तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्या प्रकृति प्रदत्त जन्मजात उसके ये सभी गुण इस समाजिक बर्बरता के आगे निरुत्तर नहीं हैं…?
जब यहाँ स्त्रियों को उनके पति की मृत्यु के पश्चात् उनकी चिता के साथ ही सती बनाने के लिए जबरदस्ती जलाया गया तब क्या वहां उसका यह ईश्वरीय गुण "साहस" उसकी सुरक्षा में ढाल बनकर खड़ा हुआ... काश उस समय उनके अंदर हिम्मत के अलावा हथियार उठाने की शक्ति भी होती तो उस समय यह प्रथा जन्म ही न लेने पायी होती।
16 दिसंबर की रात जब निर्भया उन दरिंदो द्वारा नोची जा रही तो क्या कर रही थी उसकी 'सहनशक्ति'... जो उसे टूटकर बिखर जाने से रोक न सकी? अगर इस सहनशक्ति के साथ उसके पास आर्थिक क्षमता भी होती तो उतनी रात में उसके पास खुद की गाड़ी; अपना ड्राइवर और अपनी सुरक्षा के लिये बॉडीगार्ड भी होता तब क्या उसके सामने यह नौबत आती...अगर आई भी होती तो क्या वे दरिंदे वहीं के वहीं ढेर न हो गये होते...?
जब कानपुर की ज्योति अपने पति की साजिश के तहत चाकुओं से गोद-गोद कर छलनी की जा रही थी उस समय भी तो उसका "धैर्य" जवाब दे गया... आपको नहीं लगता कि उसने भी समय रहते पहले ही थोड़ा अधीर होना सीखा होता तो उस दिन अपने पति के छलावे में नहीं आयी होती... और उसके जीवन की रौशनी भी आज हमारे बीच ही कहीं दीप्तिमान होती...!
और तो और, हमारी न जाने कितनी बहू-बेटियां माँ बनने के बाद भी जब दहेज के लोभ में जलायी जा रही थीं उस समय यह "ममता" और "त्याग" की निधियाँ किस कोने में दुबकी पड़ी हुईं थीं… जो उनको जलता देख थोड़ी भी पिघल न सकीं... अपनी सुरक्षा के लिये अगर इन्हें थोड़ी नफरत; थोड़ा क्रोध और थोड़ी लालच भी सीखनी पड़े तो क्या बुरा है...?
लखनऊ के निकट मोहनलाल गंज में जब एक महिला के साथ दुष्कर्म कर हत्या के बाद उसका लहू-लुहान नंगा बदन पूरी मीडिया में घण्टों तमाशा बनाया गया तब क्या इस प्रकृति की "लज्जा" भी तार-तार न हुई...? ऐसे में अगर स्त्री थोड़ी बेहयाई ही सीख ले तो कम से कम इस "लज्जा" के लुटने के भय से कुछ पल मुक्त होकर जी तो सकेंगी...!
जहां कई दशकों से एक माँ की कोंख में इस दुनियां से बेखबर एक लड़की को ख़त्म करने की साजिश रची जाती रही हो और न जाने कितने तरह के औंजारों से उसके मोम से नाजुक बदन पर लगातार प्रहार किये गए हों उस समय क्या उसे "करुणा" की भीख भी मिलती है...? ऐसे में हम स्त्रियों को क्या सिर्फ भगवान् के भरोसे ही बैठे रहना काफी है...? उन्हें थोड़ा सा ज्ञान और गुण इस दुनिया और समाज से सीखकर अपनी सुरक्षा खुद से कर सकने के लिये अपना हथियार भी पहले से तैयार नहीं रखना चाहिये...?
(रचना त्रिपाठी)
Saturday, March 21, 2015
नकलची समाज के हाशिए पर लड़कियाँ-
ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के बारे में उनके अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक की यह सोच कि ज्यादा पढ़ा-लिखा कर इनसे भला कौन सी नौकरी करानी है, इनको और बेचारगी की तरफ ढकेलती है। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ने वाली बच्चियों के प्रति उनके घर, गाँव, समाज ही नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स का भी यही नजरिया देखकर निराशा होती है। उनकी नजर में पढ़ाई का उद्देश्य कमाई करना और कमाई के मायने सिर्फ 'अर्थ' यानी रूपया-पैसा कमाने से ही है जो सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। लड़कियों के हिस्से में तो सिर्फ घर में रहकर चूल्हा-चौका सम्हालना और बच्चे पैदा करके उन्हें पालना ही होता है।
यही वजह है कि परीक्षा के दौरान गुरुजनों की दृष्टि उन बच्चियों के ऊपर और उदार हो जाती है। आज-कल बिहार और यूपी में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल महायज्ञ जोरों पर है। वैसे तो इस बार फ्री फॉर आल का नज़ारा है लेकिन लड़कियों को विशेष सुविधा एक परम्परा बन चुकी है। परीक्षा-केंद्र पर गुरुजन उन्हें नकल करने-कराने की सामग्री सहित हर तरह की सुविधाओं की पूरी छूट मुहैया करा डालते हैं। इस नकल से प्राप्त डिग्री और उससे प्राप्त कन्या विद्याधन का लाभ उनके आगे की पढ़ाई में मिले या न मिले, इससे न तो उन बच्चियों के अभिभावक का कोई सरोकार होता और न ही उस स्कूल के टीचर्स का। वहाँ से उनको शिक्षा-दीक्षा में अपने अधिकारों और हितों के प्रति जाहिली और अनभिज्ञता के सिवा कुछ भी नहीं मिला होता।
ऐसे में उन बच्चियों को अगर नक़ल न कराया जाय तो बोर्ड परीक्षा में सफल बिद्यार्थियों का प्रतिशत बिगड़ने से 'स्कूल की इज्जत' मटिया-मेट होने का भय रहता है। बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए उसके प्रबंधकों को नक़ल की सुविधा उपलब्ध कराने के सभी उपाय कराने पड़ते हैं। वहाँ स्कूल की इज्जत का विकट सवाल खड़ा हो जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं जिनको अपने स्कूल का मुँह भी परीक्षा के दौरान पहली बार दिखाया जाता है। स्कूल की चारदीवारी का कोना-कोना उनसे इस कदर अपरिचित होता है कि वे अकेले अपने क्लास-रूम तक जाने में असमर्थ रहती हैं। उनकी शकल-सूरत भी दया की पात्र दिखाई देती है। पर दस-पन्द्रह दिन की जद्दोजहद से मिली मार्कशीट के आधार पर सरकारी कृपा वाली कन्या विद्याधन योजना उनके जीवन में थोड़ा सा 'अर्थ' तो जरूर प्रदान करती है। ऐसा तात्कालिक लाभ उनके परिवार वालों को उनकी वैवाहिक योजनाओं को सफल बनाने में जरूर मदद करता है। परन्तु इस तरह की शिक्षा-दीक्षा से यह जरुरी नहीं है कि वैवाहिक योजानाओं की सफलता की तरह उनकी भावी जिंदगी को भी कोई सम्मानजनक अर्थ मिल सके।
(रचना त्रिपाठी)
Sunday, March 8, 2015
महिला दिवस बाद में
Friday, March 6, 2015
होली के रंग में तंग
अपनी तो 'होली' भी होली पर किसी ने न तो जबरदस्ती मुझे रंग डाला और न ही चेहरे पर लगे रंग वाली एक भी तस्वीर खींची... इस बार मेरे हमजोली जो नहीं थे। फिर ऐसे में भला मेरी फ़ोटो कौन खींचता! वैसे भी इस बार मैंने बहुत रंग नहीं खेला| यह अच्छा ही हुआ वर्ना बिना रंग वाली होली की तस्वीर में बेइज्जती हो जाती। मेरे पड़ोसियों ने मेरे चेहरे पर बड़ी इज्जत के साथ थोड़ा-थोड़ा गुलाल लगाया।अपने-अपने कैमरे से मेरी तस्वीर भी खींची पर वे उसे अपने घर ले गये।
मन हुआ की बच्चों से कह दूं कि-जरा मुँह में लगे गुलाल के संग एक मेरी भी फ़ोटो खींच दो... लेकिन वे अपने रंग में इस कदर सराबोर थे कि पूछिये मत... मैंने भी सोचा छोड़ो जाने दो... उस समय उनसे फ़ोटो खिंचवाना उनके रंग में भंग डालने जैसा था। इस प्रकार इस होली की मेरी एक भी तस्वीर नहीं है जो मैं भी व्हाट्सएप और फेसबुक पर लगाऊँ।
इससे पहले कि आप लोग इन्हें लानत भेजे मैं अस्पष्ट कर दूं कि गाँव में इनकी भाभियों की शिकायत थी कि -"कई सालों से देवर के संग होली नहीं खेली, बिना देवर के होली का रंग फीका हो जाता है" और इनका भी कहना था कि भाभियों के रंग लगे हाथों से पुआ खाने-खिलाने का तो मजा ही कुछ और है ! सो मैंने इन्हें जाने दिया।
फिलहाल अपना तो कोई सगा छोटा देवर भी नहीं है जिसके साथ होली खेलती। बच्चों की यहाँ पर अपनी अलग कम्पनी है, जिसे वे होली में छोड़कर कहीं और जाना पसन्द नहीं करते हैं। उनको रंग खेलते देखकर मुझे भी बहुत आनन्द आता है।
इस बार व्हाट्सएप पर दोस्तों, मम्मी-पापा और भाइयों की होली में रंग लगे फ़ोटो के साथ लाइव कमेंट्री भी चल रही थी। उसे देखकर बचपन में भाइयों और दोस्तों के साथ की होली याद आ गयी। आज यकायक ऐसा लगा कि फिर से अगर संभव होता तो मैं भी अपनी "घर वापसी" करा लेती।
(रचना त्रिपाठी)
Wednesday, March 4, 2015
बलात्कार की चर्चा से मनोरंजन की मानसिकता
तिहाड़ जेल में बन्द एक दोषसिद्ध बलात्कारी का साक्षात्कार आजकल चर्चा में है। भूत-प्रेत, टोना-टोटका और स्टिंग ऑपरेशन के बाद मीडिया को अब यही दिखाना बाकी रह गया था। समाज के बारे में और खास तौर पर लड़कियों के रहन-सहन और ओढ़ने पहनने के बारे में इस अमानुष का प्रवचन सुनना ही अब नारी जाति के लिए बचा रह गया था। यह अधम प्रयास वे चैनेल कर रहे हैं जिनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी प्रतिष्ठा है। जिन विद्वानों और विदुषियों को लड़कियों के साथ बलात्कार होने का कारण उनके द्वारा छोटे वस्त्र पहनना, देर रात में अपने किसी पुरुष मित्र के साथ बाहर निकलना, फिल्में देखना आदि ही समझ में आ रहा है उन्हें यह बताना पड़ेगा कि फिर क्या हर उस नयी शादी-शुदा लड़की के साथ बलात्कार नहीं हो जाना चाहिये जो अपने पति के साथ हनीमून पर जाती है.. किसी अनजान होटल में ठहरती है... अपने नये नवेले पति के साथ देर रात तक बाहर रहती है या रात में फिल्म देखकर लौटती है..? ये लोग उदाहरण दे सकते हैं कि कहीं कहीं इस तरह के केस में भी बलात्कार होते सुना गया है। तो क्या यह मान लिया जाय कि हम अपने समाज को स्त्रियों के जीने लायक नहीं बना सकते।
जीव-जंतु, पेड़-पौधे, आकाश-पाताल, नदी-पहाड़ आदि सभी चीजों का निर्माण तो ईश्वर ने किया है और उसी ने इंसान के रूप में एक बच्चे (लड़का-लड़की) को जन्म दिया है- किसी साधू या अपराधी को नहीं। लेकिन आधुनिकता और उपभोक्तावाद के जंगल में तब्दील हो चुके हमारे समाज ने ऐसे नरपिशाचों को पैदा कर दिया है जिन्होंने इन्हें बनाने वाले को भी बदनाम करके रख दिया है। बलात्कारियों का अपना कोई नाम पता नहीं होता या उनके चेहरे पर नहीं लिखा होता की फला व्यक्ति बलात्कारी है जिसे देखते ही हर लड़की सावधान हो जाये और अपना काम-धाम छोड़कर किसी सुरक्षित बन्द कमरे में खुद को कैद कर ले अथवा कोई चादर ओढ़कर या बुरका पहनकर चोरी-चोरी छिपते-छिपाते बाहर निकले। लेकिन, क्या बुरका पहनने वाली स्त्रियों के साथ कभी बलात्कार नहीं हुआ है.. या किसी छह महीने की बच्ची से लेकर अधेड़ महिला के साथ इस तरह का दुष्कृत्य नहीं हुआ है?
अगर मिडिया को किसी केस का पोस्टमार्टम करना ही है तो जरा इस मानसिकता का पोस्टमार्टम करके बतायें कि लड़कियों के लिए छोटे कपड़ें बनते ही क्यों है..? और अगर ऐसे कपड़ो का प्रोडक्शन हो रहा है तो उनके पहनने पर आपत्ति क्यों..? यदि छोटे कपड़े बलात्कार को आमंत्रण देते हैं तो इसका उत्पादन करने और बेचने वाली फर्मों पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए? फिर यह भेद-भाव ही क्यों कि ऐसे कपड़े किस तरह की लड़की पहने या किस तरह की न पहने..? देर रात में सिनेमा हॉल में फिल्में चलती ही क्यों हैं..अगर देर रात में फिल्में चलती भी हैं तो लड़कियों के लिये प्रतिबंधित क्यों नहीं कर दिया जाता है...। यदि नहीं तो फिल्म देखकर लौटने वाली लड़की के साथ बलात्कार होने पर सिनेमाहाल के मालिक के खिलाफ़ एफ़.आई.आर क्यों नहीं? या फिर देर रात का सिनेमा मर्द ही क्यों देखे..? देर रात फ़िल्म देखकर घर लौटने पर ऐसी विकृति मानसिकता वाला पुरुष अपने घर में ही अपनी वीबी या बेटी-बहू के साथ बलात्कार नहीं कर सकता क्या..?
एक बलात्कारी जैसे जघन्य अपराधी का साक्षात्कार क्या इतना जरूरी है जो उसकी डॉक्यूमेंट्री बनाकर पब्लिक नें प्रसारित की जाय..? क्या मिलने वाला है उससे? सिवाय उस निर्भया और उस जैसी तमाम पीड़ित स्त्रियों और उनके रिश्तेदारों के अपमान और मानसिक उत्पीड़न के। ऐसी वाहियात बातों की चर्चा का प्रयास करना भी सामाजिक अपराध को एक खास तरह की मान्यता देता है और मानसिक रुग्णता के शिकार लोगों के मनोरंजन का साधन बनता है। सरकार को इसपर अविलंब पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
(रचना त्रिपाठी)
