Wednesday, April 15, 2015

बुरा होना अच्छा है

आपको नहीं लगता कि एक स्त्री को पूर्ण बनाने में जितना जरूरी उन प्राकृतिक गुणों जैसे- ममता; प्यार; धैर्य, सहनशीलता, त्याग और साहस का होना है, उतना ही जरुरी उन्हें खुद को सुरक्षित रखने के लिये अपने अंदर कुछ सांसारिक गुणों का भी समावेश करना है...? थोड़ी नफरत, थोड़ा क्रोध, थोड़ी लालच, थोड़ी चालाकी, कुछ क्रूरता और ढेर सारी ताकत! यह सब उन्हें इसी जमाने से सीखना होगा !!!

याद करिये, जब प्यार करने और अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करने के जुर्म में पंचायत के ग्यारह सदस्यों ने बारी-बारी से उसकी आबरू लूटी थी तो कहाँ थी उसकी ये अनमोल निधियां जो कथित रूप से एक बेहतर संसार की रचना करती हैं। ये जो सद्गुण एक अच्छी स्त्री में रचे-बसे हैं... इनमें से कोई भी तो उसका साथ देकर उसकी रक्षा के लिये सामने नहीं आये। उसका धैर्य; उसकी लज्जा; उसकी शाहनशक्ति; उसका प्रेम; उसकी ममता और वह करुणा भी; जो इस समाज के ढांचे को मजबूत बनाये रखने के लिये कथित तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्या प्रकृति प्रदत्त जन्मजात उसके ये सभी गुण इस समाजिक बर्बरता के आगे निरुत्तर नहीं हैं…?

जब यहाँ स्त्रियों को उनके पति की मृत्यु के पश्चात् उनकी चिता के साथ ही सती बनाने के लिए जबरदस्ती जलाया गया तब क्या वहां उसका यह ईश्वरीय गुण "साहस" उसकी सुरक्षा में ढाल बनकर खड़ा हुआ... काश उस समय उनके अंदर हिम्मत के अलावा हथियार उठाने की शक्ति भी होती तो उस समय यह प्रथा जन्म ही न लेने पायी होती।

16 दिसंबर की रात जब निर्भया उन दरिंदो द्वारा नोची जा रही तो क्या कर रही थी उसकी 'सहनशक्ति'... जो उसे टूटकर बिखर जाने से रोक न सकी? अगर इस सहनशक्ति के साथ उसके पास आर्थिक क्षमता भी होती तो उतनी रात में उसके पास खुद की गाड़ी; अपना ड्राइवर और अपनी सुरक्षा के लिये बॉडीगार्ड भी होता तब क्या उसके सामने यह नौबत आती...अगर आई भी होती तो क्या वे दरिंदे वहीं के वहीं ढेर न हो गये होते...?

जब कानपुर की ज्योति अपने पति की साजिश के तहत चाकुओं से गोद-गोद कर छलनी की जा रही थी उस समय भी तो उसका "धैर्य" जवाब दे गया... आपको नहीं लगता कि उसने भी समय रहते पहले ही थोड़ा अधीर होना सीखा होता तो उस दिन अपने पति के छलावे में नहीं आयी होती... और उसके जीवन की रौशनी भी आज हमारे बीच ही कहीं दीप्तिमान होती...!

और तो और, हमारी न जाने कितनी बहू-बेटियां माँ बनने के बाद भी जब दहेज के लोभ में जलायी जा रही थीं उस समय यह "ममता" और "त्याग" की निधियाँ किस कोने में दुबकी पड़ी हुईं थीं… जो उनको जलता देख थोड़ी भी पिघल न सकीं... अपनी सुरक्षा के लिये अगर इन्हें थोड़ी नफरत; थोड़ा क्रोध और थोड़ी लालच भी सीखनी पड़े तो क्या बुरा है...?

लखनऊ के निकट मोहनलाल गंज में जब एक महिला के साथ दुष्कर्म कर हत्या के बाद उसका लहू-लुहान नंगा बदन पूरी मीडिया में घण्टों तमाशा बनाया गया तब क्या  इस प्रकृति की "लज्जा" भी तार-तार न हुई...? ऐसे में अगर स्त्री थोड़ी बेहयाई ही सीख ले तो कम से कम इस "लज्जा" के लुटने के भय से कुछ पल मुक्त होकर जी तो सकेंगी...!

जहां कई दशकों से एक माँ की कोंख में इस दुनियां से बेखबर एक लड़की को ख़त्म करने की साजिश रची जाती रही हो और न जाने कितने तरह के औंजारों से उसके मोम से नाजुक बदन पर लगातार प्रहार किये गए हों उस समय क्या उसे "करुणा" की भीख भी मिलती है...? ऐसे में हम स्त्रियों को क्या सिर्फ भगवान् के भरोसे ही बैठे रहना काफी है...? उन्हें थोड़ा सा ज्ञान और गुण इस दुनिया और समाज से सीखकर अपनी सुरक्षा खुद से कर सकने के लिये अपना हथियार भी पहले से तैयार नहीं रखना चाहिये...?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 21, 2015

नकलची समाज के हाशिए पर लड़कियाँ-

ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के बारे में उनके अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक की यह सोच कि ज्यादा पढ़ा-लिखा कर इनसे भला कौन सी नौकरी करानी है, इनको और बेचारगी की तरफ ढकेलती है। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ने वाली बच्चियों के प्रति उनके घर, गाँव, समाज ही नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स का भी यही नजरिया देखकर निराशा होती है। उनकी नजर में पढ़ाई का उद्देश्य कमाई करना और कमाई के मायने सिर्फ 'अर्थ' यानी रूपया-पैसा कमाने से ही है जो सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। लड़कियों के हिस्से में तो सिर्फ घर में रहकर चूल्हा-चौका सम्हालना और बच्चे पैदा करके उन्हें पालना ही होता है।

यही वजह है कि परीक्षा के दौरान गुरुजनों की दृष्टि उन बच्चियों के ऊपर और उदार हो जाती है। आज-कल बिहार और यूपी में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल महायज्ञ जोरों पर है। वैसे तो इस बार फ्री फॉर आल का नज़ारा है लेकिन लड़कियों को विशेष सुविधा एक परम्परा बन चुकी है। परीक्षा-केंद्र पर गुरुजन उन्हें नकल करने-कराने की सामग्री सहित हर तरह की सुविधाओं की पूरी छूट मुहैया करा डालते हैं। इस नकल से प्राप्त डिग्री और उससे प्राप्त कन्या विद्याधन का लाभ उनके आगे की पढ़ाई में मिले या न मिले, इससे न तो उन बच्चियों के अभिभावक का कोई सरोकार होता और न ही उस स्कूल के टीचर्स का। वहाँ से उनको शिक्षा-दीक्षा में अपने अधिकारों और हितों के प्रति जाहिली और अनभिज्ञता के सिवा कुछ भी नहीं मिला होता।

ऐसे में उन बच्चियों को अगर नक़ल न कराया जाय तो बोर्ड परीक्षा में सफल बिद्यार्थियों का प्रतिशत बिगड़ने से 'स्कूल की इज्जत' मटिया-मेट होने का भय रहता है। बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए उसके प्रबंधकों को नक़ल की सुविधा उपलब्ध कराने के सभी उपाय कराने पड़ते हैं। वहाँ स्कूल की इज्जत का विकट सवाल खड़ा हो जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं जिनको अपने स्कूल का मुँह भी परीक्षा के दौरान पहली बार दिखाया जाता है। स्कूल की चारदीवारी का कोना-कोना उनसे इस कदर अपरिचित होता है कि वे अकेले अपने क्लास-रूम तक जाने में असमर्थ रहती हैं। उनकी शकल-सूरत भी दया की पात्र दिखाई देती है। पर दस-पन्द्रह दिन की जद्दोजहद से मिली मार्कशीट के आधार पर सरकारी कृपा वाली कन्या विद्याधन योजना उनके जीवन में थोड़ा सा 'अर्थ' तो जरूर प्रदान करती है। ऐसा तात्कालिक लाभ उनके परिवार वालों को उनकी वैवाहिक योजनाओं को सफल बनाने में जरूर मदद करता है। परन्तु इस तरह की शिक्षा-दीक्षा से यह जरुरी नहीं है कि वैवाहिक योजानाओं की सफलता की तरह उनकी भावी जिंदगी को भी कोई सम्मानजनक अर्थ मिल सके।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, March 8, 2015

महिला दिवस बाद में


मना लो अम्मा-चाची आज महिला दिवस

कल तुम्हारे छोटे बेटे की शादी है न 

फिर तो तुम भी हो जाओगी व्यस्त 

अपनी नई नवेली दुल्हन के स्वागत में 



बड़ी बहू ने तो सिर्फ बेटियां ही जनी है 

देखना इस बार कोई चूक न हो जाय 

बड़े-बुजुर्गों का उसे आशीर्वाद दिलवाने का 

पहले से ही कर लेना सारा प्रबन्ध 



टेंट-शामियाना, मेज-कुर्सी, चौकी-बेलन 

पड़ोसी के घर से एक छोटे से बच्चे का 

छुपा देना उस कलमुंही की बेटियों को 

रोते बिलखते किसी बंद कमरे में 



कहीं पड़ न जाये उनकी परछाईं कोहबर में 

झट से डाल देना दुल्हन की गोद में 

लड्डू खिलाते उस पड़ोसी के पोते को 

कल फिर मना लेंगे महिला दिवस 



(रचना त्रिपाठी)


Friday, March 6, 2015

होली के रंग में तंग

अपनी तो 'होली' भी होली पर किसी ने न तो जबरदस्ती मुझे रंग डाला और न ही चेहरे पर लगे रंग वाली एक भी तस्वीर खींची... इस बार मेरे हमजोली जो नहीं थे। फिर ऐसे में भला मेरी फ़ोटो कौन खींचता! वैसे भी इस बार मैंने बहुत रंग नहीं खेला| यह अच्छा ही हुआ वर्ना बिना रंग वाली होली की तस्वीर में बेइज्जती हो जाती। मेरे पड़ोसियों ने मेरे चेहरे पर बड़ी इज्जत के साथ थोड़ा-थोड़ा गुलाल लगाया।अपने-अपने कैमरे से मेरी तस्वीर भी खींची पर वे उसे अपने घर ले गये।

मन हुआ की बच्चों से कह दूं कि-जरा मुँह में लगे गुलाल के संग एक मेरी भी फ़ोटो खींच दो... लेकिन वे अपने रंग में इस कदर सराबोर थे कि पूछिये मत... मैंने भी सोचा छोड़ो जाने दो... उस समय उनसे फ़ोटो खिंचवाना उनके रंग में भंग डालने जैसा था। इस प्रकार इस होली की मेरी एक भी तस्वीर नहीं है जो मैं भी व्हाट्सएप और फेसबुक पर लगाऊँ।

इससे पहले कि आप लोग इन्हें लानत भेजे मैं अस्पष्ट कर दूं कि गाँव में इनकी भाभियों की शिकायत थी कि -"कई सालों से देवर के संग होली नहीं खेली, बिना देवर के होली का रंग फीका हो जाता है" और इनका भी कहना था कि भाभियों के रंग लगे हाथों से पुआ खाने-खिलाने का तो मजा ही कुछ और है ! सो मैंने इन्हें जाने दिया।

फिलहाल अपना तो कोई सगा छोटा देवर भी नहीं है जिसके साथ होली खेलती। बच्चों की यहाँ पर अपनी अलग कम्पनी है, जिसे वे होली में छोड़कर कहीं और जाना पसन्द नहीं करते हैं। उनको रंग खेलते देखकर मुझे भी बहुत आनन्द आता है।

इस बार व्हाट्सएप पर दोस्तों, मम्मी-पापा और भाइयों की होली में रंग लगे फ़ोटो के साथ लाइव कमेंट्री भी चल रही थी। उसे देखकर बचपन में भाइयों और दोस्तों के साथ की होली याद आ गयी। आज यकायक ऐसा लगा कि फिर से अगर संभव होता तो मैं भी अपनी "घर वापसी" करा लेती।

(रचना त्रिपाठी)

 

Wednesday, March 4, 2015

बलात्कार की चर्चा से मनोरंजन की मानसिकता

तिहाड़ जेल में बन्द एक दोषसिद्ध बलात्कारी का साक्षात्कार आजकल चर्चा में है। भूत-प्रेत, टोना-टोटका और स्टिंग ऑपरेशन के बाद मीडिया को अब यही दिखाना बाकी रह गया था। समाज के बारे में और खास तौर पर लड़कियों के रहन-सहन और ओढ़ने पहनने के बारे में इस अमानुष का प्रवचन सुनना ही अब नारी जाति के लिए बचा रह गया था। यह अधम प्रयास वे चैनेल कर रहे हैं जिनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी प्रतिष्ठा है। जिन विद्वानों और विदुषियों को लड़कियों के साथ बलात्कार होने का कारण उनके द्वारा छोटे वस्त्र पहनना, देर रात में अपने किसी पुरुष मित्र के साथ बाहर निकलना, फिल्में देखना आदि ही समझ में आ रहा है उन्हें यह बताना पड़ेगा कि फिर क्या हर उस नयी शादी-शुदा लड़की के साथ बलात्कार नहीं हो जाना चाहिये जो अपने पति के साथ हनीमून पर जाती है.. किसी अनजान होटल में ठहरती है... अपने नये नवेले पति के साथ देर रात तक बाहर रहती है या रात में फिल्म देखकर लौटती है..? ये लोग उदाहरण दे सकते हैं कि कहीं कहीं इस तरह के केस में भी बलात्कार होते सुना गया है। तो क्या यह मान लिया जाय कि हम अपने समाज को स्त्रियों के जीने लायक नहीं बना सकते।

जीव-जंतु, पेड़-पौधे, आकाश-पाताल, नदी-पहाड़ आदि सभी चीजों का निर्माण तो ईश्वर ने किया है और उसी ने इंसान के रूप में एक बच्चे (लड़का-लड़की) को जन्म दिया है- किसी साधू या अपराधी को नहीं। लेकिन आधुनिकता और उपभोक्तावाद के जंगल में तब्दील हो चुके हमारे समाज ने ऐसे नरपिशाचों को पैदा कर दिया है जिन्होंने इन्हें बनाने वाले को भी बदनाम करके रख दिया है। बलात्कारियों का अपना कोई नाम पता नहीं होता या उनके चेहरे पर नहीं लिखा होता की फला व्यक्ति बलात्कारी है जिसे देखते ही हर लड़की सावधान हो जाये और अपना काम-धाम छोड़कर किसी सुरक्षित बन्द कमरे में खुद को कैद कर ले अथवा कोई चादर ओढ़कर या बुरका पहनकर चोरी-चोरी छिपते-छिपाते बाहर निकले। लेकिन, क्या बुरका पहनने वाली स्त्रियों के साथ कभी बलात्कार नहीं हुआ है.. या किसी छह महीने की बच्ची से लेकर अधेड़ महिला के साथ इस तरह का दुष्कृत्य नहीं हुआ है?
अगर मिडिया को किसी केस का पोस्टमार्टम करना ही है तो जरा इस मानसिकता का पोस्टमार्टम करके बतायें कि लड़कियों के लिए छोटे कपड़ें बनते ही क्यों है..? और अगर ऐसे कपड़ो का प्रोडक्शन हो रहा है तो उनके पहनने पर आपत्ति क्यों..? यदि छोटे कपड़े बलात्कार को आमंत्रण देते हैं तो इसका उत्पादन करने और बेचने वाली फर्मों पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए? फिर यह भेद-भाव ही क्यों कि ऐसे कपड़े किस तरह की लड़की पहने या किस तरह की न पहने..? देर रात में सिनेमा हॉल में फिल्में चलती ही क्यों हैं..अगर देर रात में फिल्में चलती भी हैं तो लड़कियों के लिये प्रतिबंधित क्यों नहीं कर दिया जाता है...। यदि नहीं तो फिल्म देखकर लौटने वाली लड़की के साथ बलात्कार होने पर सिनेमाहाल के मालिक के खिलाफ़ एफ़.आई.आर क्यों नहीं? या फिर देर रात का सिनेमा मर्द ही क्यों देखे..? देर रात फ़िल्म देखकर घर लौटने पर ऐसी विकृति मानसिकता वाला पुरुष अपने घर में ही अपनी वीबी या बेटी-बहू के साथ बलात्कार नहीं कर सकता क्या..?

एक बलात्कारी जैसे जघन्य अपराधी का साक्षात्कार क्या इतना जरूरी है जो उसकी डॉक्यूमेंट्री बनाकर पब्लिक नें प्रसारित की जाय..? क्या मिलने वाला है उससे? सिवाय उस निर्भया और उस जैसी तमाम पीड़ित स्त्रियों और उनके रिश्तेदारों के अपमान और मानसिक उत्पीड़न के। ऐसी वाहियात बातों की चर्चा का प्रयास करना भी सामाजिक अपराध को एक खास तरह की मान्यता  देता है और मानसिक रुग्णता के शिकार लोगों के मनोरंजन का साधन बनता है। सरकार को इसपर अविलंब पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, February 26, 2015

अपनी जमीन की बात ही कुछ और है...!

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार को और शक्तिसंपन्न बनाने के लिए एक विधेयक संसद में आ गया है। इसके विरोध में आंदोलन भी शुरू हो गया है। यह ठीक है कि विकास के लिए उद्योग लगाने जरूरी हैं जो मजदूरों और कामगारों को रोजगार देंगे। लेकिन मुझे डर है कि जब किसानों के पास अपनी जमीन नहीं रहेगी तो ये प्राइवेट फैक्ट्रियां उन्हें घर बिठाकर पगार नहीं देगी। अगर रोजगार देगी तो उनकी छुट्टियों पर वेतन भी काटेंगी। उनके बीमार पड़ जाने पर उन्हें घर बिठाकर मुफ्त की चिकित्सा मुहैया नहीं करायेगी। इस तरह अगर किसानों की अपने जमीन पर अगर उनका अपना अधिकार नहीं रहा तो वे उद्यमियों के गुलाम बन कर रह जायेंगे। मेरा यह डर काल्पनिक नहीं है, बल्कि अपनी आँखों से देखा हुआ कड़वा यथार्थ है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले का मुख्य शहर है पडरौना। इस शहर में वर्षो पुरानी एक चीनी मिल हुआ करती थी जो पन्द्रह-बीस साल से बंद पड़ी है। इस फैक्ट्री के बन्द होने से छोटे किसानों और मजदूरों से लेकर बड़े-बड़े जमींदारों की आर्थिक स्थिति डगमगा गयी है। वहाँ के किसानों की जमीन पर आज भी गन्ने की पैदावार होती है और उस गन्ने की कीमत भी मिलती है। वे दूर के शहर तक ढुलाई का दोगुना खर्च उठाकर दूसरी चीनी मिल पर अपना गन्ना ले जाते हैं और देर-सवेर उसकी कीमत पा ही जाते है। वे अपने घर बाल- बच्चों के पास रहते हुए मेहनत की रोटियां जरूर खाते हैं पर वे रोज रात को चैन की नींद सोते हैं। उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर उठानी पड़ती है मगर वे इस बात से निश्चिन्त है कि उनकी जमीन उनके पास है जिसपर उनका अपना अधिकार है।

लेकिन जरा उन मजदूरों से पूछिये जिनके पास अपनी जमीनें नही हैं; जो उसी  फैक्ट्री में काम करते थे; जिनके परिवार का पेट उस फैक्ट्री में ही मेहनत-मजदूरी करने की बदौलत भरता था, वे आज किस दशा में होंगे...? जबतक फैक्ट्री चली उसमें काम करने वाले मजदूर बहुत मजे में रहे पर फैक्ट्री बन्द होने के कुछ दिनों बाद ही उनके घर में खाने के लाले पड़ने लगे। बहुतों की तो खटिया खड़ी हो गई। आज भी उनमें से कुछ फैक्ट्री को दुबारा चलवाने के लिये नेताओं का घेराव करते हैं, चक्का जाम करवाते हैं और भूख हड़ताल करते हैं। उस समय से अबतक फैक्ट्री चलवा देने के दावे के साथ कई सरकारें आयीं और चली गयीं; पर उस बन्द पड़ी चीनी मिल के अलग-अलग हिस्सों में जंग लगती गयी और कारखाना बन्द का बन्द ही पड़ा रहा। जो मजदूर इसकी देख-रेख और मरम्मत में लगे रहते थे आज वही इसके कल-पुर्जों को चोरी-चोरी कबाड़ में बेचना शुरू कर दिये हैं ताकि वे अपने परिवार के पेट की आग एक वक्त को ही सही, बुझा सके। पर वे कबतक ऐसा कर सकेंगे..?

इस जिले से एक से बढ़कर एक दिग्गज नेताओं का ताल्लुक भी रहा। जिसमें से एक जाना-माना नाम आर पी एन सिंह का भी है जो यहीं से सांसद रहे हैं और पिछली यूपीए सरकार में गृह, भूतल-परिवहन और पेट्रोलियम विभाग में राज्य-मंत्री भी रह चुके हैं। वे सोनिया और राहुल गांधी के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। पडरौना चीनी मिल की चारदिवारी से लगे हुए इनके राजमहल से ही इनकी राजनीति दिन-दूनी, रात-चौगुनी चमकती रही है। उधर गन्ना-किसान और मिल-मजदूर आंदोलित होते रहे हैं- कभी अपने खेतो में खड़े गन्ने को आग लगा कर तो कभी शहर चक्का जाम कर। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। बेचारे मजदूर जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी वे दूसरे शहर की ओर पलायन कर गये। कुछ ने अपनी बीबी-बच्चों को बेसहारा छोड़कर सन्यास धारण कर लिया तो कुछ ने बेरोजगारी से आहत होकर आत्महत्या कर ली। काश, आज उनके पास भी जमीन होती तो शायद वे ऐसा करने पर मजबूर नहीं होते।

(रचना त्रिपाठी) 

 

Friday, February 13, 2015

वैलेन्टाइन का रसिया

बचपन की दहलीज पार करके जब मैं किशोरावस्था में कॉलेज पहुँची तो पहली बार वैलेंटाइन-डे का नाम कान में पड़ा। वह भी किसी ऐसी चीज के रूप में जिसपर बड़े-बूढ़ों का पहरा लगा रहता है। बड़ा रहस्यमय टाइप लगा यह। मुझे इस वैलेन्टाइन-डे का मतलब समझने में ही सालों लग गये। जबतक इस डे को मैं पूरी तरह समझ पाती मेरी शादी हो चुकी थी। अब तो मन मसोसने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन मैंने अपना रास्ता निकाल लिया है।

सबका 'वैलेन्टाइन डे' मनाने का अपना-अपना तरीका होता है। मेरा भी यह दिन मनाने का अपना एक अलग तरीका है। शादी होने से लेकर आजतक कोई भी 'डे' हो हम अपने घर में ही अपने पति और परिवार के साथ मनाते हैं। इस दिन हम दाल भरी पूड़ी, सब्जी, खीर और साथ में ‘रसियाव’ बनाते हैं। कुछ लोग रासियाव को बखीर भी कहते हैं। इस व्यंजन का नाम तो सुनने में ही 'रसिया' की तरह बहुत मीठा लगता है। यह चावल में गुड़ डालकर पकाया जाता है । मीठी सुगन्ध वाले चावल में जब गुड़ भी मिल जाय तो यह और कितना मीठा हो जाएगा। हमें कोई भी 'डे' मनाना हो तो यह डिश जरूर बनाते हैं। घर में जिस दिन यह व्यंजन खाने को मिल जाय तो समझ लीजिये कि उस दिन हम जरूर कोई न कोई 'डे' मना रहें होते हैं जैसे- वैलेन्टाइन-डे, हग-डे, किस-डे, बर्थ-डे हो। रसियाव तब भी बनता है जब कोई निजी उत्सव जैसे शादी की सालगिरह हो, या कोई पारंपरिक त्यौहार हो जैसे- दीपावली, दशहरा, होली आदि।

वैलेन्टाइन डे पर एक मौज़ू गाना है सुनायी देता है जिसे आपने भी सुना होगा- "चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो ना" मुझे लगता है कि इस प्रेम-दिवस पर सभी प्रेमी जन इसी लक्ष्य का पीछा करते हैं कि कैसे अपने प्रिय के दिल में पक्की जगह बना ली जाय। प्रेम होने से पहले ही शादी हो जाने और जीवन साथी मिल जाने के बाद मुझे तो यह समझ में ही नहीं आया कि दिल में उतरने का काम भी बड़ा चुनौतीपूर्ण है। रास्ता भला कहाँ से ढ़ूढतें...। एक साथ रहते-रहते दिन, महीने, फिर साल गुजरते गये। हर एक 'डे' आता गया और इनके दिल में उतरने का रास्ता इनकी बातों से और दूसरे लक्षणों से प्रकट होता गया। हमारे यहाँ दिल में उतरने का एकमात्र और सटीक रास्ता है जो पारंपरिक भी है और ठोस आजमाया हुआ भी है। दिल तक पहुँचने का यह रास्ता न आँखों से होकर जाता है और न दिमाग से गुजरता है। यह रास्ता गुजरता है इनके पेट से होते हुये। अगर पेट की पूजा बढ़िया हो गयी तो दिल बाग-बाग हो जाता है और वहाँ अपना रिजर्वेशन पक्का।

अब ये वेलेंटाइन 'डे'! जिसमें फरवरी का महीना हो, रंग-बिरंगे फूलों के मौसम के साथ फूल गोभी और मटर का सीजन हो तो वेलेंटाइन 'डे' का क्या पूछना..यह तो कुछ ख़ास ही हो जाता है। हम दोनों इस दिन 'फूलगोभी' और 'मटर' जरूर खरीदते हैं। फरवरी का महीना आते तक तो मटर की कीमत भी कम हो जाती है। इस समय हम एक-दो किलो मटर नहीं खरीदते हैं। बल्कि पूरे तीस-चालीस किलो मटर  इकठ्ठा खरीदकर इसके दाने छुड़ा लेते हैं और फ्रीजर में रख लेते हैं। इसके बाद पूरे साल जितना भी अलाना-फलाना-‘डे’ पड़ता है, हमारी थाली का जायका हरी-मटर के साथ और भी बढ़ जाता है।

हाँ मटर छुड़ाने का बोरिंग काम भी मुझे नहीं करना पड़ता इसलिए यह आनंद दोगुना हो जाता है। मेरे पति को मेरा आलू-प्याज काटना और घंटों मटर छुड़ाना बिल्कुल नहीं देखा जाता। उनका मुझसे साफ-साफ कहना है कि- “मेरे होते हुये तुम प्याज काटो और मटर छीलो यह हो ही नहीं सकता, मैं हूँ ना...!" बस इस प्रकार मेरा तो 'वेलेंटाइन डे' ऐसे ही बहुत ख़ुशी-ख़ुशी घर के आनंद में पूरा हो जाता है।

(रचना त्रिपाठी)