Saturday, February 13, 2010

न नारी स्वातंत्र्यमर्हति (नारी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है… )!!!

इस सूक्तिवाक्य को पढ़ने के बाद मैं सन्न रह गयी। मनुस्मृति में एक ओर कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ तो दूसरी ओर नारी को स्वतंत्रता के अयोग्य ही ठहरा दिया गया। आखिर ऐसा क्यों कहा गया ?

बर्षों पहले दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था जिसे मै  बहुत गौर से देखती  थी। उस विज्ञापन में एक गीत कुछ इस प्रकार था:-

हम और विरना खेले एक साथ,

खेले एक साथ अम्मा खायें एक साथ ।

विरना कलेवा अम्मा हँसी-हँसी देबो,

हमरा कलेवा तुम दीजो रिसियायी।

एक ही पेट से जन्में हुए भाई-बहन दोनों एक साथ खेलते-कूदते बड़े होते है लेकिन जब खाने का वक्त आता है तो माँ बेटे को बड़े प्यार से खाना खिलाती है और बेटी कि तरफ घूरते हुए खाने की थाली परोस देती है। इस गीत का भाव उसकी बेटी के चेहरे पर दिखायी तो पड़ता था, लेकिन वह खुल कर अपनी माँ से सवाल भी नही कर पाती। इसका असर मेरे उपर भी पड़ा। मैने बात-बात पर मम्मी के व्यवहार पर नज़र रखना शुरू कर दिया जिसका मुझे जगह-जगह पर लाभ भी मिला। भाइयों की तुलना में अपने साथ कोई पक्षपात होता देख मैं तत्काल पापा से शिकायत कर देती।

मैं देखती हूँ कि अशिक्षित महिलाओं के साथ साथ कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता मिली उनमें उसका दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति उजागर हो गयी। शायद स्त्री अभी भी बहुत कमजोर है। आत्मनियन्त्रण की शक्ति का अभाव दिखता है मुझे। उसे अपने आप को मजबूत बनाने में कोई कसर नही छोड़नी चाहिये। यह मजबूती उचित शिक्षा ही दिला सकती है, नारी को शिक्षा के प्रति जागरुक होना बहुत जरूरी है। मेरा मतलब यह है कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ निरर्थक स्वतंत्रता प्राप्त करना या नौकरी करने से नही है। यह जरूरी नही है कि जिस घर की स्त्रियाँ नौकरी करती हों या मंच  पर खड़े होकर कुछ भी कहने को  स्वतंत्र है उनके घर की बहू-बेटियों पर अत्याचार नहीं होता हो… यह जरूरी नहीं है कि पढ़ी-लिखी महिलाएं  कन्या भ्रूण हत्या का अपराध नहीं करती हो…

औरत ही औरत की दुश्मन होती है। जरा एक बार गहराई से सोचिये कि स्त्रियों के लिए ऐसा क्यों कहा गया ? समाज में इसके असंख्य उदाहरण क्यों देखने को मिलते हैं? सास-बहू या ननद- भाभी का रिश्ता दोनो पक्षों के स्त्री होते हुए भी क्यों एक दूसरे के प्रति बहुत अच्छा नहीं रह पाता? एक दूसरे में खोट निकालने को उद्यत क्यों रहती हैं ये नारियाँ? एक परिवार मे औसतन पुरुष और स्त्रियों की संख्या बराबर होती है; अपवाद स्वरूप कम या अधिक भी होती है, लेकिन वहाँ अगर जली तो स्त्री ही क्यों …?  पुरुष क्यों नही….. ? क्योंकि स्त्री या तो बहुत कमजोर है या अवसर पाकर स्वछंद हो गयी है। उस परिवार में कन्या भ्रूण हत्या क्यों? ससुर को या उस परिवार के मालिक को पोता ही चाहिये पोती क्यों नही? उस घर की मालकिन या सास यह प्रश्न क्यों नही उठाती? इस जघन्य कृत्य में घर की सभी नारियाँ शामिल कैसे हो जाती हैं? कबतक इसे पुरुष वर्ग की साजिश करार देकर अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ती रहेंगी ये नारियाँ?

इस हत्या की अपराधी एक महिला प्रसूति रोग विशेषज्ञ या फिर मिड्वाइफ भी होती है। इसे नारी शिक्षा और उससे मिली स्वतंत्रता का उत्थान कहें या पतन…. ?

नारी का स्वतंत्र होना बहुत जरूरी है!  इसलिये नही कि वह स्वछन्द होकर कुछ भी कर जाये बल्कि इसलिये कि वह एक स्वस्थ समाज का निर्माण करे। नारी तो ब्रह्मा का रूप होती है जो इस सृष्टि के रचयिता हैं। नारी ही नारी को मजबूत बना सकती है । अगर एक माँ ही अपनी बेटी को तबज्जो नही देगी तो पिता या समाज क्यों देगा? अगर एक बहू को उसकी सास ही सुरक्षा की दीवार नही बनेगी तो ससुर से उम्मीद क्यों करें?

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, December 20, 2009

जिस दिन एक गृहिणी के कार्यों को महत्व मिलने लगेगा उसी दिन नारीवादी आन्दोलन समाप्त हो जायेगा…।

मेरा भी अजीब दिमाग है छोटी-छोटी बातों को पकाने के लिए बैठ जाती हूं। कई दिनों से इस उधेड़-बुन में लगी हूं कि क्या पति-पत्नी एक साथ रह कर स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को समाज में व्यक्त नही कर सकते? क्या उनके विचार अलग-अलग होने का मतलब उनके आपस में अच्छे सम्बन्ध का नही होना बताता है? जरूरत के हिसाब से किसको कहाँ होना चाहिए, किसे कौन सी जिम्मेदारी निभानी है, इसका निर्णय मिल बैठकर कर लिया जाता है और पति-पत्नी में कोई विवाद नहीं पैदा होता, तो क्या यह खराब बात मानी जाएगी? दूसरों को यह तय करने की जरूरत ही क्यों पड़ती है कि घर की महिला और पुरुष में कौन अधिक स्वतंत्र है। क्या नारी की स्वतंत्रता तभी मानी जायेगी जब वह बात-बात पर पति का विरोध करती रहे?

मै पूछती हूँ कि पूरी तरह स्वतंत्र रहने का इतना ही शौक है तो नर-नारी वैवाहिक सूत्र में बंधते ही क्यों हैं?

archives 094

शादी करना किसी की भी मजबूरी नही होती। न ही शादी कर लेने से किसी कि स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होती है। शादी का मतलब ही यही होता है कि इस समाज को एक स्वस्थ माहौल देना। एक सामाजिक अनुशासन और सुव्यवस्था के लिए यह बहुत जरूरी है। मुझे तो लगता है कि शादी के बाद हमारी स्वतंत्रता बढ़ जाती है। व्यक्ति मानसिक रूप से और भी मजबूत हो जाता है। एक नारी को प्रकृति ने जो जिम्मेदारियाँ दी हैं उनका निर्वाह शादी के बगैर कैसे हो सकता है? शादी और परिवार के अनुभव से उसके निर्णय लेने की क्षमता और बढ़ जाती है। उसको गलत और सही का भान अच्छी तरह हो जाता है।

इलाहाबाद में हुए ब्लॉगर सम्मेल्लन में नामवर सिंह जी का यह वक्तव्य मुझे बहुत अच्छा लगा था कि ब्लॉगरी में  हम कुछ भी लिखने पढ़ने को स्वतंत्र है लेकिन इसके साथ एक जिम्मेद्दारी भी है कि हम क्या लिख रहे हैं। हमें स्वतंत्र होना चाहिए मगर स्वछन्द नही होना चाहिए कि जो मन में आया लिख दिया। ब्लॉगरी भी एक जिम्मेद्दारी है। इसी प्रकार हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से किसी भी क्षेत्र में भाग नहीं सकते।

क्या आप जानते है कि हर एक व्यक्ति को चाहे नर हो या नारी ईश्वर ने कितनी बड़ी जिम्मेद्दारी सौपी है? प्रत्येक नर-नारी का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस देश और समाज को एक सच्चा इंसान दे। अगर हम यह प्रण कर ले कि हमें स्वयं के रूप में और अपने बच्चों के रूप में इस समाज को एक अच्छा और सच्चा नागरिक प्रदान करना है तो इससे बड़ी जिम्मेद्दारी और क्या होगी?

इसलिए मै कहूंगी कि एक स्त्री जो घर के अंदर रहती है जिसे हम गृहिणी कहते है वह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही है। उसके जिम्मे समाज ही नही बल्कि पूरे देश की नींव ही टिकी है अगर वही मजबूत नही होगी तो देश का क्या होगा? घर के कुशल संचालन और बच्चों की उचित परवरिश का काम समाज और राष्ट्र के निर्माण की पहली शर्त है।

इसलिए आप सबसे मेरा  विनम्र निवेदन है कि आप एक स्त्री के कार्यों के महत्व को समझे और उसका सम्मान करें। जिस दिन एक गृहिणी के कार्यों को महत्व मिलने लगेगा हमें लगता है कि उसी दिन नारीवादी आन्दोलन समाप्त हो जायेगा। 

(रचना त्रिपाठी)

Monday, November 2, 2009

संतोषी भला कि महत्वाकांक्षी...?

 

बचपन से यह सुनते आते हैं कि संतोष का फल मीठा होता है। अपने मन को हमेशा संतोष करने लिए तैयार करना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग यही सिखाते रहे। लेकिन मुझे लगता है कि किसी के भीतर यदि इस आत्म संतोष की अधिकता है तो इसका अर्थ है अपने आप को एक बीमारी की दावत देना।

प्राय: लोग एक-दूसरे को समझाते रहते है कि आप जितने में हो संतुष्ट रहो। संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है।

गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खान।

जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान॥

भला आप ही बतायें जरा....। यदि यूँ संतोष करके हर आदमी बैठ जाय तब तो विकास करने की बात हो चुकी? मेरा तो मानना है कि हर इंसान के अंदर कुछ न कुछ पाने की चाहत होनी ही चाहिए। उसकी नयी सोच उसके जीवन की अभिलाषा को बढ़ाने और उसे पूरा करने वाली होनी चाहिए।

आज दुनिया कहां से कहां पहुँच गयी है? क्या यह उसके संतोष का फल है? नहीं, सब कुछ संतोष कर लेने से नहीं बल्कि कुछ नया पा लेने की अधीरता ने ही हमें वह सब कुछ दिया है जिसे देख हमारी पीढ़ी को पहली बार आश्चर्य होता है।

अब एक नवजात शिशु को ही ले लिजिए। ज्यों-ज्यों उसकी भूख बढ़ती है वह हाथ-पैर मारना, रोना-चिल्लाना शुरु कर देता है। इससे उसका शारीरिक और मानसिक दोनों ही विकास होता है। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि उस बच्चे के अंदर संतोष नही होता कि वह चुप-चाप बैठ जाये। अगर बच्चा पालने में संतोष कर के बैठ जाता कि - मुझे कुछ नहीं करना है, मेरी माँ मुझे दूध पिला ही देती है तो मुझे क्या जरुरत है रोने और चिल्लाने की- तो शायद वह अपाहिज हो जाता!

हर इंसान के अंदर असंतोष का भाव होना चाहिए, यही असंतोष उसे उसके लक्ष्य की ओर धकेलता है।

आप किसी भी संतोषी व्यक्ति को देख लिजिए, उसके चेहेरे की निराशा और कब्जियत भरी मुस्कान ही बता देती है कि वह कितना खुश है!

इस तरह की संतोषी मुस्कान से तो अच्छा है चिल्लाते और चिघ्घाड़ते रहना। मन में महत्वाकांक्षा न हो, अधिक से अधिक सफल होने की कामना न हो, अर्जित करने कि लालसा न हो तो व्यक्ति कोई उद्यम क्यों करेगा? यही तो वह शक्ति है जो हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।

मानवता के विकास की कहानी में जो भी मील के पत्थर गाड़े गये वे किसी संतोषी ने नहीं बल्कि किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति की ही देन हैं| जय असंतोष।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, September 14, 2009

ब‍उका की तो बन आयी...!

मेरे गाँव में एक लड़का था- ब‍उका। ‘ब‍उका’ मतलब अक्ल से कमजोर, मन्द बुद्धि और किस्मत का मारा। यह नाम उसे गाँव वालों ने उसकी दशा देखकर दे रखा था।

उसके पैदा होने के कुछ दिनो बाद ही उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी थी। बच्चे को किसी तरह उसकी चाची-काकी ने शहद-चीनी चटाकर  जिला तो दिया लेकिन कोई उसकी माँ नही बन सकी। वह बचपन में अनाथ ही बना रहा।

image

हम देखते थे- गांव के एक कोने में पड़ी उसकी झोपड़ी, जिसमें झांकने पर एक-दो टिन के बर्तन, कलछी-पलटा, चिलम और एक-दो बोतलें ही दिखतीं। नहीं दिखता तो सिर्फ उस घर का वारिस- ब‍उका। जाने कहाँ-कहाँ  दिन भर घूमता रहता... कभी किसी के चौखट पर बैठा रोटियां मांगता, तो कभी किसी मालिक का पैर दबाता या फिर किसी के घर के बर्तन साफ करते हुए दिखता, सिर्फ एक रोटी के लिए ताकि उसके पेट की आग बुझ सके। हमें हैरत होती कि अपने घर का इकलौता वारिस ऐसा क्यों करता है? ऐसा भी नही कि वह घर का दरिद्र था। कुल पांच-छ: बीघे का अकेला मालिक था।

कम उम्र में ही पत्नी के मर जाने के बावजूद उसके बाप दुक्खी ने दूसरी शादी नही की थी। पुत्रमोह में आकर, गरीबी में या यूँ ही... पता नहीं। उसकी नज़र में दूसरी माँ शायद उसके बेटे को वह प्यार नहीं देती, जो उसको अपनी माँ से मिलता। दुक्खी अपने कबाड़ के धंधे में गाँव-गाँव की फेरी लगाने सुबह सबेरे ही निकल जाता तो रात को नशे में गिरते-पड़ते दरवाजे पर आकर बच्चे को सौ-सौ गालियाँ देता। सुबह जब वो होश में आता तो अपने बच्चे का हाल-चाल दूसरे लोगों से जान लेता। धीरे-धीरे बेटा बड़ा होने लगा, और उसकी जरूरतें भी बढ़ती गयी। अच्छी परवरिश के अभाव में उसका व्यक्तित्व अविकसित सा रह गया।

वह जिसको देखता उसके सामने हाथ फैला देता। लोंगो से बात करने में अटकता था, डरने भी लगा, कुछ पूछने पर कम बोलता आवाज भी साफ नही निकलती। सब लोग उसे ‘ब‍उका’ कहने लगे।

ब‍उका को कभी याद भी नही होगा कि कब उसने नये कपड़े पहने होंगे। गांव के लोग ही उसे अधनंगा देखते तो फटा पुराना दे देते, उसी से उसका काम चल जाता। गाँव के बच्चे उसके साथ दुर्व्यवहार करते। झगड़े में जाने कितने कटने के निशान उसके हाथ-पैर और चेहरे पर पड़े रहते। जब कभी खून निकल जाता तो वह उसपर मिट्टी डालकर सुखा देता। उसको कभी किसी दवा की जरूरत नही पड़ी। जाने कितनी बार तो उसे कुत्ते ने काट लिया होगा लेकिन उसे कभी कोई इन्जेक्शन नही लगा।

मैंने अपनी आँखों से कभी दुक्खी को उसकी मलहम-पट्टी करते नही देखा। एक दिन तो वह बाप के डर से  अपने चाचा के छत पर सो गया, रात में न जाने कब नीचे गिर गया था और अन्धेरे में सुबकियां लेता रहा था। जब सुबह हो गयी तब लोंगो को यह बात पता चली।

जाको राखे साइयां मार सके न कोई...

दुक्खी तो गांजा और शराब पीकर अपनी जान का दुश्मन बन गया। आखिर में वही हुआ... दुक्खी मर गया। लेकिन मैने देखा बऊका की आँख में आंसू के नाम पर एक बूंद पानी तक नहीं था।

चूँकि उसके नाम कुछ बीघा जमीन थी इस नाते गांव वालो ने उसकी शादी एक गरीब लड़की से करा दी। इस लड़की के भी मां-बाप नही थे। घर में दुल्हन के आते ही बऊका ने रोज नहाना और टिप-टाप से रहना शुरू कर दिया। उसके घर में भी रोज चूल्हा जलना शुरू हो गया। उसने खुद भी कबाड़ का धंधा अपना लिया।

वह दिन पर दिन अपने घर को सवाँरने में लगा रहता... लेकिन उसकी बीबी को रोज-रोज एक बात सालती रहती थी कि आखिर उसके पति को लोग ‘ब‍उका’ कहकर क्यों बुलाते है? वह उसकी उधेड़-बुन में लग गयी और इस बात की जड़ तक जा पहुंची। उसे पता चल गया कि उसकी मां ने तो पैदा होते ही उसका नाम ओमप्रकाश रखा था लेकिन हालात के थपेड़ों ने उसे बऊका बना दिया। उसकी पत्नी ने इसका विरोध करना शूरू किया जब भी कोई उसे बऊका कह कर बुलाता तो वह उसे समझाती कि इनका नाम बऊका नही है, इनका नाम ओमप्रकाश है। आइंदा कोई इन्हें बऊका कह कर नही बुलाएगा।

image

जब गांव में लोगो को इस बात का पता चला तो लोग मौज लेने के लिए उसे जानबूझ कर बऊका कहते। उसकी पत्नी पहले समझाती, फिर चिल्लाती और उसपर भी लोग नही मानते तो गालियाँ देती। गाली खाने के डर से लोगो को यह सम्बोधन छोड़ना ही पड़ा।

आज जब भी कोई उसके दरवाजे पर जाता है तो उसे ओमप्रकाश कहकर ही बुलाता है। अब वह बऊका से ओमप्रकाश हो गया है। लोग बताते हैं कि महीने में दस से पंद्रह हजार तक कमा लेता है। जब भी बेटियों को कहीं जाना होता है तो अपने हाथों से उन्हें नये-नये कपड़े पहनाता है। खुद तो अनपढ़ रह गया लेकिन अपनो बच्चों को स्कूल जरूर भेजता है। बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता जरूर करता है बच्चे स्वस्थ रहे इसके लिए अपने दरवाजे पर दूध देने वाली गाय भी पाल रखा है। बच्चों से जो दूध बच जाता उसे बेच कर उसकी बीबी घरेलू खर्च के लिए कुछ पैसे बना लेती है।

उसे पाँच बेटियां हो चुकी हैं और एक बेटा भी है। गांव के जिस कोने में निकल जाइए वहाँ ओमप्रकाश की एक बेटी जरूर दिखायी देती है। हाल ही में मुलाकात होने पर मैने उसकी पत्नी को नसबंदी कराने की सलाह दी तो उसने कहा कि एक बेटा और हो जाये तब। मैने नाराजगी दिखाते हुए कहा कि अगर फिर बेटी हो गयी तो क्या करोगी ?

उसने बहुत हँस कर जवाब दिया, “दीदी, अभी मैं दो बेटियों की परवरिश और कर सकती हूँ।”

मुझे उसकी यह बात सुनकर थोड़ी देर के लिए बहुत बुरा लगा लेकिन जब मैं ओमप्रकाश को अपनी बेटियों को फ्रॉक पहनाते और तैयार करते देखती तो बहुत खुशी भी होती कि घर में एक स्त्री के होने से उसकी जिंदगी बदल गयी। ओमप्रकाश को देखकर मुझे यह कहावत याद आ जाती है-

‘बिन घरनी घरनी घर भूत का डेरा।

 (रचना त्रिपाठी)

Friday, August 28, 2009

कौन सा दिन सुहाना है...? रविवार...???

सप्ताह में रविवार सबसे सुहाना होता है यह मेरा नही गणितज्ञों का मानना है। क्या आपने कभी विचार किया है कि यह दिन इतना सुहाना क्यों होता  है?

सप्ताह में ६ दिन काम करने के बाद रविवार की छुट्टी का इंतजार पूरी दुनिया करती है।

जहाँ तक रही गणितज्ञों की बात उनके विचार से मै भी सहमत हूँ जिन्होंने २० लाख ४० हजार ब्लॉगों का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला है  कि रविवार सप्ताह का सबसे खुशनुमा दिन होता है। एक समाचार एजेन्सी के अनुसार वेरमोन्ट विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह सामने आया है कि रविवार हर किसी का पसंदीदा दिन है जबकि बुधवार सबसे खराब।

गृहकार्य दक्ष लेकिन क्या आप ने उन कामकाजी महिलाओं के बारे में सोचा है जो सप्ताह के बाकी दिन दफ्तर में, और छुट्टी के दिन घर के बीच  अलग प्रकार का जीवन व्यतीत करती हैं। उनके लिए तो रविवार अतिरिक्त व्यस्तता का दिन होता है।

मैने किसी ब्लॉग पर शोध नही किया है, बल्कि अपने दायें-बायें, आस-पास,  बिल्कुल पड़ोस की बात कर रही हूँ। मेरे सामने वाले घर में एक महिला ऑफिसर रहती हैं। इन्हें एक साल का बेटा भी है। मेरे ठीक बगल वाले मकान में एक और महिला ऑफिसर रहती हैं जिनकी  करीब १० साल की एक बिटिया  है। जैसा कि मै रोज इनको आते-जाते देखती रहती हूँ इसलिए इनकी व्यस्तता का भी अंदाजा लगा सकती हूँ।

दोनों महिलाएं जिनमें एक आई.ए.एस. प्रोबेशनर और दूसरी एक पी.सी.एस. अधिकारी है उनकी दिनचर्या और कार्यशैली देखकर मेरे अंदर आश्चर्य का भाव पैदा हो जाता है। चूँकि एक अच्छी पड़ोसन का धर्म निभाते हुए मेरा इनके घर के भीतर आना जाना है इसलिए प्रायः इनकी सामान्य गतिविधियों की मुझे जानकारी रहती है।

आई.ए.एस. महिला प्रोबेशनर जो आंध्र प्रदेश की रहने वाली है और इनके पति स्वयं सीविल इन्जीनियर हैं एक अच्छी फेमिली से जुड़ी हुई है, मगर सर्विस में उत्तर प्रदेश कैडर मिलते ही वह अपनी बेटी को साथ-साथ लेकर ट्रेनिंग भी करती है। उनका यह कठिन परिश्रम देखकर मै तो दंग रह जाती हूँ। 

एक दिन मुझसे नही रहा गया। मै इनसे पूछ बैठी ...कैसे करती है आप यह सब अकेले? उन्होंने कहा, “...मत पूछो, ...मेरी ड्युटी तो सुबह के साढ़े चार बजे से लेकर रात को बारह बजे तक रहती है।” मैने उनको सलाह दिया जबतक आप ट्रेनिंग में हैं तबतक बेटी को उसके पापा के पास ही छोड़ देती। उन्होंने जवाब दिया, “नही... पुरूष यह काम अच्छे से नही कर सकता। रही बात महिलाओं की तो महिलाए हर तरह से सक्षम है। वह कुछ भी कर सकती है।” ...पुरूष के अंदर इतना धैर्य कहां?

मुझे भी यह बात सही लगी। अगर २४ घंटे के लिए बच्चों को उनके पापा के हवाले छोड़ दिया जाय तो इनकी हालत देखने लायक होती है। अगले दिन पता चलेगा ऑफिस से छुट्टी लेकर घर बैठ जाएंगे।

भारतीय गृहिणीजो महिला एस.डी.एम हैं उन्हें घर के काम का भी अच्छा अनुभव रहा है और इसमें रुचि भी लेती हैं। एक दिन मैं उनसे भी पूछ बैठी, “आप बतायें ...घर के काम और दफ्तर के काम में क्या अंतर है?”

उन्होंने जवाब दिया, “घर का काम बहुत कठिन है...।”

“मैं तो यही समझती थी कि घर का काम आसान होता है... आप लोग कितना मेहनत करते हैं, इतनी कड़ी धूप में बाहर का काम तो और भी कठिन हो जाता होगा।” मैने कहा था।

उन्होंने बड़ी तेजी से सिर हिलाते हुए कहा- “ना ना ना ना... घर का काम बहुत कठिन है। दिमाग भी लगाओ और मेहनत भी... तब भी घर का काम समाप्त नही होता।”

इसके पहले इसी कॉलोनी में बिल्कुल नयी उम्र की एक कुँआरी लड़की भी ट्रेनी ऑफिसर बनकर आयी थी। कितनी खुशमिजाज दिखती रही वह... उसके चेहरे पर किसी तरह की चिन्ता की लकीरे नही दिखाई देती। चेहरे से खुशी टपकी पड़ती थी। यह तेजतर्रार लड़की पहले उसी घर मे रहती थी जिसमें आजकल एक बेटी वाली आईएस महिला रहती है।

एक दिन वह अपने पुराने घर को देखने और उनसे मिलने चली आयी। संयोगवश मै भी पहुँच गयी थी। बहुत खुश लग रही थी। उसके चेहरे की मुस्कान साफ साफ बता रही थी कि उसको अब किसका इंतजार है? लेकिन बात-बात में विवाहिता अधिकारी ने उसे बताया कि अभी जितने मजे कर सकती हो कर लो... शादी के बाद तो यह मुस्कान गुम ही हो जाएगी। यह सुनकर मेरा माथा घूम गया।

किरन वेदी अपने पति के साथ आखिर ऐसा क्यों कहा उन्होंने? यह बात मेरे जैसी एक आम गृहिणी करती तो शायद मुझे भी यह वही घिसा-पिटा रिकार्ड लगता। लेकिन एक सक्षम, योग्य और सम्पन्न महिला अधिकारी के मुँह से ऐसा सुनकर मैं आज एक उधेड़बुन मे लगी हूँ।

स्त्री अपने कैरियर की सीढ़ी में चाहे जितनी ऊँचाइयाँ छू ले, लेकिन जब घर-परिवार को सजाने सँवारने और बच्चों के जन्म से लेकर उनकी  देखभाल करने का प्रश्न खड़ा होता है तो उसकी जिम्मेदारी बाँटने वाला कोई नहीं होता है। शायद इसीलिए वैवाहिक विज्ञापनों में लड़की के बायोडाटा में ‘गृहकार्य दक्ष’ लिखना अनिवार्य सा लगता है।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 20, 2009

चम्पा आई रे...!

maid-servant आज मैं बहुत खुश हूँ। मालूम है क्यों?

इसलिए नहीं कि किचेन में व्यस्त हूँ बल्कि इसलिए कि आज मेरी चम्पा आ रही है। अब आप पूछेंगे चम्पा कौन है?

अरे!.. वही जिसके रहने से मेरी आँखों में खुशियां हमेशा बरकरार रहती है। जिसके चले जाने से मुझे ब्लॉग देखे कई सप्ताह बीत गये हैं। आजकल मुझे अपने बीतते समय का पता ही नहीं चल रहा है। मेरे लिए दिन और रात दोनों एक ही समान हो गये है। कब आराम करना है और कब काम करना है, यह निश्चित ही नहीं हो पा रहा है। मुझे अब पता चला है कि मेरे घर में खुशियों के पीछे चम्पा की भूमिका कितनी है?

एक दिन भी अगर मुझे घर में अकेले रहना पड़ जाता है तो घर मुझे काटने को दौड़ता है। असल में मेरी ससुराल एक संयुक्त परिवार में है। अपने पति और बेटी-बेटे के अलावा घर में कुल तीन जोड़ी सास-ससुर, दो जोड़ी जेठ-जेठानी एक देवरानी, पाँच देवर (चार कुँआरे), व छ: भतीजे हैं। तीन ननदें भी हैं और इनसे छः भान्जे-भान्जियाँ। इन सबके बीच रह कर जो मजा मुझे आता है उसका वर्णन कठिन है। शायद आप आसानी से इसका अंदाजा भी नही लगा सकते। अब तो श्रीमानजी की सरकारी नौकरी के कारण मुझे अपने भरे पूरे घर को छोड़कर बाहर रहना पड़ता है। यह सारी चहल-पहल घर से दूर रह कर मैं बहुत मिस करती हूँ, लेकिन इस बात कि खुशी है कि मेरे पास घर के लोगों का बराबर आना-जाना लगा रहता है। घर से दूर होने के बावजूद उन लोगों का प्यार बना रहता है।

आजकल संगम नगरी में होने की वजह से सास-ससुर के अलावा गाँव में रहने वाले दूसरे लोगों की सेवा के अवसर भी मिलते रहते है। इलाहाबाद तीर्थ-स्थल तो है ही, साथ ही शिक्षा के लिए भी यह पूर्वी उत्तर प्रदेश का सर्वोत्तम शहर माना जाता है। इस शहर में कंपटीशन की तैयारी करने वाले हमारे अपने नाते-रिश्तेदार भी बहुत है इसलिए मुझे जब भी किसी चीज की जरूरत होती मै इन्हें बुला लिया करती हूँ। यह तो रही ससुराल वालों की उपस्थिति, लेकिन मायके का सुख भी यदा-कदा मिलता रहता है। पापा, मम्मी, छोटा भाई, भैया, दोनो भाभियाँ और भतीजे यहाँ-वहाँ मिलते ही रहते हैं। कुल मिलाकर अपनों के सानिध्य का सुख मिलता ही रहता है। लेकिन पिछले पन्द्रह दिनों से इस सुख में खलल पड़ गया है। इसकी वजह वही चम्पा है जो पहाड़ पर अपने गाँव चली गयी है। मैं इस समय सारा ध्यान किचेन की साफ-सफाई और पाक-कला में लगा रही हूँ।

जब मेरी चम्पा रहती है तो मुझे कुछ अलग तरह की खुशी होती है। तन को सुख और मन को शांति मिलती है, दिल को करार आता है। अपने बच्चे प्यारे लगने लगते है। पति महोदय पर भी कुछ ज्यादा प्यार आता है। घर की खुशियों में चार-चाँद लग जाता है। सब कुछ कूल-कूल लगता है। लेकिन जब वो नहीं है तो मेरी दुनिया ही सिमट गयी है...।

बहुत दिनों से ये कह रहे हैं चलो तुम्हें  पिक्चर दिखा लाऊँ। सिविल लाइन्स चलकर सॉफ़्टी कॉर्नर की आइसक्रीम खिला लाऊँ। अब तो ‘कमीने’ भी लग गयी है और ‘लव आजकल”  भी। बच्चों को कृष्ण जन्माष्टमी की झाँकी भी दिखानी थी, लेकिन यह सब कुछ नहीं हो सका, क्योंकि मैं किचेन में काफी व्यस्त हूँ।

आज मेरा भी मन हो रहा है बिग बाजार, मैक्डॉवेल्स और सिनेप्लेक्स जाने का, पिक्चर देखने और मौज-मस्ती से इश्क लड़ाने का...! मालूम है क्यों ? क्योंकि मेरी चम्पा आ रही है। अरे वही चम्पा जिसे हमने किचेन सम्हालने के लिए काम पर लगा रखा है। हमारी मेड-कम-कूक। बस इससे ज्यादा और कुछ नहीं। केवल सुबह-शाम एक-दो घण्टे के लिए आती है, लेकिन वो है बड़े काम की। जब तक उसने ‘ब्रेक’ नहीं लिया था तबतक मुझे इसका अन्दाजा भी नहीं था।

कोई भी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा, सबका अपना एक अलग महत्व होता है। घर में बच्चा हो या बड़ा, सबका एक अपना व्यक्तित्व होता है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ खास बात जरूर होती है। कौन इंसान   किसके लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।

आज मुझे भी इस बात एहसास हुआ कि चम्पा जो चंद पैसों  के लिए हमारे घर में काम करती है उसका होना भी हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, July 19, 2009

घरघुसना कहीं का, जब देखो तब अपनी बीबी का मुँह देखता रहता है...

परिवार को चलाने के लिए माँ-बाप घर के अंदर एक आचार संहिता और कुछ नियम-कानून बनाते हैं। वे यह उम्मीद भी करते हैं कि परिवार में रहने वाले सभी छोटे-बड़े इस नियम कानून के भीतर रहकर ही संबधों का निर्वाह करें।

सास-बहू लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि यही माता-पिता अपने बेटे से कुछ अलग और दामाद से कुछ अलग तरीके का व्यवहार पसंद करते हैं। माता-पिता जब अपनी बेटी के विवाह के लिये वर ढूँढते हैं तो वे अपने दामाद में कुछ खास गुणों की अपेक्षा जरूर करते हैं। लड़का नौकरी-शुदा हो ताकि मेरी बेटी को कभी किसी वस्तु के लिये किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। …लड़का ऐसा होना चाहिए जो मेरी बेटी की हर तकलीफ को अपनी तक़लीफ समझे। मेरी बेटी की खुशियों में ही उसे खुशी मिले। माता-पिता के लिए ऐसा दामाद आदर्श होता है। अगर उनको मनचाहा दामाद मिल जाता है तो वह उसकी प्रशंसा कुछ इस प्रकार करते है:-

मेरा दामाद कितना अच्छा है जो मेरी बेटी के हर काम में हाथ बँटाता है। जब वह खाना बनाती है तो किचेन में उसकी मदद करता है। …कपड़े धुलती है तो वह कपड़ों को बाहर फैला देता है। …मेरी बेटी से पूछे बिना कोई काम नही करता। जरूर मैने पिछले जनम में कोई पुण्य किए होंगे तभी मुझे इतना सुयोग्य दामाद मिला है। हम तो धन्य हो गये उसे पाकर।

लेकिन जब वही माँ-बाप अपने बेटे के लिए बहू ढूँढते हैं तो उससे उनकी उम्मीदें कुछ इस प्रकार होती है:

लड़की पढ़ी-लिखी, सुशील और गुणवन्ती होनी चाहिए जो घर को अच्छी तरह सम्हाल सके, सास-श्वसुर की सेवा करे, उनकी आज्ञा का पालन करे वगैरह-वगैरह…। लेकिन अगर इनका बेटा बिल्कुल इनके पसन्दीदा दामाद की तरह अपनी पत्नी पर कुछ अधिक ध्यान देने लगता है तो इनका नज़रिया अपने बेटे के लिए ही बदल जाता है। अगर वह अपनी पत्नी के साथ किचेन में हाथ बँटा रहा है तो ‘जोरू का गुलाम’ कहलाने लगता है। अगर उसे अपनी पत्नी की परेशानी से तकलीफ होने लगे और वह उसे दूर करने के लिए कुछ उपाय करे तो उसे कुछ इस तरह कहा जाता है- “घरघुसना कहीं का, जब देखो तब अपनी बीबी का मुँह देखता रहता है। ...इतनी तपस्या से पाल-पोस कर बड़ा किया लेकिन बहू के आते ही हाथ से निकल गया।” अपने आप को कोसते हैं- ‘न जाने पिछले जन्म में कौन सा कर्म किया था जो हमें यह दिन देखने को मिल रहा है।’

इसी प्रकार अधिकांशत: ऐसा देखा जाता है कि माँ-बाप का नजरिया बेटी के लिए कुछ और बहू के लिए कुछ और ही होता है। यह मेरे विचार से सरासर गलत है। आपका क्या ख़याल है?

(रचना त्रिपाठी)