Thursday, August 8, 2013

जनता के मुँह पर ढक्कन

भोजपूरी में एक कहावत है “जबरा मारे रोवहूँ न दे”। राज्य सरकार की नीयत कुछ ऐसी ही लगती है। जनता के मुँह में जानवरों की तरह जबरदस्ती जाबी (muzzle) लगाने के फिराक में जुटी है। अभिव्यक्ति की आजादी की तो बात ही छोड़ दीजिये यह तो अब लोकजनों का दाना-पानी भी बंद कर सकती है। आखिरकार कबतक लोकतंत्र के नाम पर जनहित की ठेकेदार होने का स्वांग करती रहेगी? कँवल भारती जी ने ऐसा क्या गलत कह दिया जो उनके खिलाफ़ मुकदमा कायम हो गया...?

(रचना)

Sunday, August 4, 2013

घुमरी पर‍इया…?

आज याद आया बचपन का एक खेल जिसमें दो दोस्त एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल-गोल खूब तेजी से चक्कर लगाते, जिसे हम लोग “घुमरी-परइया” कहते थे। गलती से भी किसी एक का हाथ छूट जाता तो बस दोनों की धड़ाम हो जाती। कितना आनन्दित करता था यह खेल!

ghumri-paraiyaलेकिन जरा सोचिये अगर जान-बूझ कर अपने मित्र के साथ कोई ऐसा मजाक करता है, यानी खेल-खेल में अगर एक खिलाड़ी द्वारा दूसरे का हाथ जान-बूझ कर छोड़ दिया जाय तो गिरने वाले का क्या हश्र होगा।

मैंने बचपन में यह खेल खूब खेला था। जब भी किसी को मजा चखाना होता या किसी से मौज लेनी होती तो बस यही तरीका अपनाया जाता था। कभी खुद भी इसका शिकार हुए तो अगले को दौड़ा लेते। बात मार-पीट तक भी पहुँच जाती।

आज बालकनी से खड़े-खड़े कुछ ऐसा ही नजारा मुझे नीचे सड़क पर दिखा। करीब सात-आठ साल की लड़की और ग्यारह-बारह साल का एक लड़का आपस में घुमरी-परइया खेल रहे थे। दोनों की आपसी सूझ-बूझ बहुत अच्छी लग रही थी। यह खेल खेलकर दोनों ही बहुत आह्लादित हो रहे थे, लेकिन उस लड़की को क्या पता कि आगे क्या होने वाला है। लड़के ने दो-चार बार बहुत सावधानी से उसे गोल-गोल घुमाया, जब वह लड़की पूरी तरह से आश्वस्त हो गयी कि इस खेल में कोई जोखिम नहीं है तो वह इसका पूरी  तरह आनन्द लेने लगी। तभी उस लड़के ने लड़की का हाथ अचानक छोड़ दिया। वह बुरी तरह से जमीन पर गिर पड़ी। लड़का हँसने लगा। उस लड़्की का चेहरा देखने लायक था। ना तो वह उठ पा रही थी और ना ही उस लड़के पर कोई नाराजगी व्यक्त कर पा रही थी। मैं लड़के की हँसी सुनकर खीझ गयी। लड़की की आँखें डबडबा आयी थीं। मैं अपने को बेबस महसूस कर रही थी।

इस खेल में धोखे का परिणाम देखकर मुझे बहुत बुरा लगा। आज सोच रही हूँ कि इस तरह का निष्ठुर मजाक अपने साथी या किसी अन्य से भी नही करना चाहिये। लेकिन तब ऐसी बात मन में क्यों नहीं आती थी? बचपन की अल्हड़ता शायद यही है।

(रचना)

Thursday, July 25, 2013

लोक सेवकों की आपराधिक लापरवाही

राज्य सरकार को कहें या संबंन्धित विभागीय अधिकारियों को सभी गान्धीजी के बन्दर हो गये हैं। नाक, कान और आँख सब बंद कर के बैठे हुए है। इनके दिमाग की बत्ती तब जलती है जब कोई दुर्घटना घटित हो जाती है।

poleइन्दिरा नगर लखनऊ के सेक्टर-१६ में पार्वती पैलेस अपार्टमेन्ट के ठीक सामने एक बिजली का खम्भा जो लोहे का बना हुआ है, उसका निचला हिस्सा लगभग २ फिट तक जंग लगकर पूरी तरह से जर्जर हो चुका है; और कभी भी गिर सकता है। यह खम्भा इसके आगे पीछे लगे हुए खंभों और ऊपर तने हुए तारों के मकड़्जाल के सहारे टिका हुआ है। इसकी शिकायत बिजली विभाग को हमने करीब दो हफ्ते पहले टेलीफोन के माध्यम से किया था। एसडीओ साहब ने इसे फौरन ठीक कराने का आश्वासन भी दिया। एक-दो दिन इंतजार करने के बाद हमने फिर से फोन किया। उन्होंने फिर कहा, “बस आज हर हाल में ठीक हो जायेगा”, लेकिन वह ‘आज’ आज तक नहीं आया।

pole1फिलहाल अब तो एसडीओ साहब का फोन भी नही लगता, अगर गलती से लग भी गया तो वह भूलकर भी नहीं उठाते। थक-हार कर हमने एक शिकायती पत्र सोसाइटी के  सेक्रेट्री की ओर से लिखवाकर प्रबन्ध निदेशक मध्यान्चल विद्युत वितरण निगम को भेजवा दिया है।

अब तो जब भी बाहर निकलती हूँ तो मेरा ध्यान उस खम्भे पर ही टिक जाता है। जहाँ दो-तीन गाड़िया खड़ी रहती है और रोज सुबह स्कूली रिक्शावाला वही खड़ा करके बच्चों को बैठाता है। उस खंभे को ठीक करवाने की लागत कुछ हजार होनी चाहिये। कितना बड़ा कलेजा है इन लोक सेवकों का जो कार्य हजारों में हो सकता है उसके लिए ये लाखों खर्च करने की तैयारी करके बैठे हुए है।

pole2आये दिन अखबारों में खबर छपती है कि बिजली हादसे में अमुक की जान गयी। पोल में करंट उतरा। आदि-आदि। अब शायद यहाँ से यह खबर छपने वाली है कि बिजली का तार पोल तोड़कर नीचे गिरा। जाने कितने और इस हादसे के शिकार होंगे? देखना है उसके बाद प्रदेश सरकार जान-माल के हानि की कितनी कीमत लगाती है?

कल यानी २३ ता.के अख़बार में पढ़ा कि करंट लगने से दिल्ली में एक फिल्ममेकर ‘आनन्द भास्कर मोर्ले’ जिसकी उम्र महज ३३ साल थी, कि मॄत्यु हो गयी। मॄत्यु का कारण एक दुकानदार की लापरवाही जिसने अपने दुकान में लगे ए.सी. के कम्प्रेशर का नंगा तार ही बाहर छोड़ दिया था जिसके संपर्क में लोहे का गेट आ गया। गेट खोलने के लिए छूते ही बेचारे वहीं ढेर हो गये।

यह छोटी-छोटी असावधानियाँ कितनी बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बन जाती है जिसका खामियाजा आम पब्लिक और कितने बेकसूर लोगों को अपनी जान गवाँ कर भरना पड़ता है।

क्या जनता के ये कथित सेवक नौकरशाह इस प्रकार की खतरनाक स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं जहाँ राह चलता कोई भी व्यक्ति अचानक काल के गाल में समा सकता है? क्या वास्तव में दुर्घटना घट जाने के पहले ही ऐसे लापरवाह कृत्य के लिए उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए?

(रचना)

Saturday, July 20, 2013

हॉट कुक्ड फूड : पैरासाइट बनाने की नर्सरी

बिहार के छपरा जिले में बच्चों को दिये जाने वाले मिड डे मील खाने के कारण हुए हादसे से नसीहत लेते हुए राज्य सरकार कुछ नये तरीके पर हाथ आजमाने कि कोशिश करने में जुट गयी है। जिसे `हॉट कुक्ड फूड’ के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। जिसमें ब्रान्डेड सामग्री के इस्तेमाल का निर्देश दिया गया है। मंत्रीजी का आदेश है कि मध्याह्न भोजन को बच्चों में वितरित करने से पहले संबन्धित आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री और रसोइयों को पहले चखना पड़ेगा। कितना उत्तम विचार है.. मन्त्रीजी से लेकर संबंधित विभागीय अधिकारी सभी विकास के रास्ते पर अग्रसर हो रहें है। ग्रामीण क्षेत्रों मे शैक्षिक गुणवत्ता में कितना सुधार है इसका तो उन्हें खूब अच्छी तरह से पता है। अब चले हैं भोजन की गुणवत्ता में सुधार करने..।

सोचने वाली बात है ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ २०० से अधिक बच्चों का भोजन एक साथ बनना है वहा सब्जियाँ भी उसी मात्रा में कटती है, अब एक हैंड पम्प के सहारे वह सब्जियां कितनी बार धुली जाती होंगी आप अन्दाजा लगा सकते है। यही नही यहाँ सब्जियाँ कटवाने से लेकर नल चलाने तक का कार्य भी स्कूली बच्चों से ही लिया जाता है। क्या मंत्रीजी या संबंधित अधिकारी इस स्कूल द्वारा दी जाने वाली शिक्षा और भोजन को अपने बच्चों के लिए इस्तेमाल कर सकते है?

ग्रामीण परिवेश में पले-बढे होने के नाते मै वहाँ के लोंगो कि मानसिकता से भली-भाँति परिचित हूँ। यहाँ का गरीब वर्ग जो अपनी रोजी-रोटी चलाने में असमर्थ है उनको सरकार ने अपने बच्चों के पेट पालने का  अच्छा मौका दे रखा है। इसे मौका कहें या सहारा.. पचहत्तर प्रतिशत ऐसे माँ-बाप हैं जो बच्चे पैदा करने के बाद उनका चलने का इंतजार करते है जिससे वह बच्चे को स्कूल का रास्ता दिखा सके। इससे इन्हें क्या हासिल होता है? गहराई से देखें तो सिर्फ़ एक वक्त की रोटी या  कहें तो एक बैसाखी। ग्रामीण क्षेत्र में देखे तो शैक्षिक गुणवत्ता का कोई पैमाना मंत्रीजी ने बनाया ही नहीं है।

गुरूजनों को देखा गया है इन रसोइयों से अपने लिये अलग से चाय-पकौड़िया बनवाकर खाते हुए। इनकी व्यवस्था अलग से होती है जिसके लिए साफ-सुथरे वर्तन और शायद वही ब्रान्डेड तेल और मसाले का इस्तेमाल होता है। मेरे कहने का मतलब है कि यह सारा विभाग जानता है कि ब्रान्डेड किसे पचेगा और किसे लोकल।

तरस आती है ऐसे माँ-बाप और ऐसे बच्चों पर जिनकी गरीबी का राज्य सरकार भी मजाक बना रही है। कटोरा लेकर एक पंक्ति में बैठते और भोजन का इंतजार करते बच्चों में ये कैसी आदत डाल रही है हमारी सरकार? मुफ़्त के भोजन वाली पढ़ाई समाप्त होने के बाद इन बच्चों की आँखों में स्वावलम्बी बनने की तमन्ना दूर-दूर तक नही दिखायी देती है। प्राय: यही देखा गया है कि हर वक्त इनकी लरियायी आँखें किसी को ढूँढती रहती हैं कोई आये और उन्हें कुछ दान ही सही दो पैसे दे जाये। शायद ऐसे ही बच्चों के लिए मनरेगा ने रास्ता साफ कर रखा है।

दूसरी तरफ उन पच्चीस प्रतिशत लोगों की बात भी करना चाहती हूँ जो मेहनत मजदूरी करके अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में न भेजकर, प्राइवेट स्कूलों में जहाँ २०० से लेकर ५०० रूपये फीस भी दे रहे हैं। इन दोनों संस्थाओं के बच्चों को देखकर उनकी शैक्षिक योग्यता का पता लगाया जा सकता है।

बिहार सरकार ने तो एक गरीब के एक बच्चे की कीमत दो लाख रूपये लगा डाली है। इनकी गरीबी का मजाक बना के रख दिया है।

(रचना)

Monday, July 8, 2013

लंपट के नाम एक संदेश

बहुत दिनो से मन में कुछ सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं। सोच रही हूँ इसे निकाल ही दूं..। सत्याथमित्र पर पोस्ट की गयी कहानी ‘लंपट’ के मुख्य पात्र प्रोफेसर आदित्यन के दृष्टिकोण से तो भारतीय संस्कृत में विवाह परंपरा  सबसे बोरिंग सभ्यता हो जाएगी। क्यों, है कि नहीं? जैसा लेखक ने पश्चिमी सभ्यता में गर्लफ्रेंड के बारे में लंपट महाशय का ‘एलीट’ विचार प्रस्तुत किया है उसे यदि भारतीय सामाजिक पृष्ठभूमि  में गर्लफ्रेंड के स्थान पर पत्नी को रख कर देखा जाय तो क्या यही सच्चाई उभर कर सामने आती है? बात तो यही हुई न..?

लेकिन नहीं, लंपट महाशय! स्त्री- पुरुष के संबंध  मात्र एक शरीर तक सीमित नहीं है बल्कि इससे भी आगे एक दुनिया है जहाँ स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी एक दूसरे से सिर्फ शारीरिक ही नही, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से भी जुडे होते हैं और इसी से परिवार और समाज की रचना होती है। हमारा देश  तो प्रेम, त्याग और समर्पण का एक जीता-जागता उदाहरण है। भारतीय सामाजिक परिवेश में इस परम्परा के जरिये ही स्त्री-पुरुष के रिश्तों की एक मजबूत नींव का निर्माण होता है। हम ये नही कह सकते कि हमारे देश में पूरी तरह ऐसे लोग नहीं हैं । यहाँ भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनके अंदर इस तरह कि कुंठाएं मौजूद है। बहुत से नराधम हमारे समाज में भी है जो औरत को सिर्फ भोग कि वस्तु समझते हैं और शायद यही विचार उन्हें तरह-तरह के यौन-अपराध करने को प्रेरित करते हैं।

तो लंपट महाशय! आपके विचार और आपकी सभ्यता आपको मुबारक हो...।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, December 23, 2010

दुनियादारी के दबाव में डगमगाता आत्मविश्वास

मेरी बचपन की सहेली ने, अपनी एक विचित्र समस्या से निज़ात पाने के लिए मुझे फोन किया और कहा,“ रचना! मेरे घर के सामने एक औरत आकर बस गयी है जो बहुत फूहड़ और बदतमीज है। अवैध रुप से कुछ जानवरों को सड़क पर ही पाल रखी है जिससे यहाँ गंदगी तो फैली ही रहती है साथ ही घर से निकलना भी मुश्किल हो गया है। गाय-भैंसों के चक्कर में यहाँ साँड़ भी आते हैं जिससे अक्सर अश्लील दृश्य उत्पन्न हो जाता है, बच्चों के घायल होने का खतरा तो बना ही रहता है। इससे मैं बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने देती। मुहल्ले के लोग भी उसे कुछ कहने से डरते हैं। झगड़ा करने पर उतारू रहती है। वह एक दलित जाति की है और बात-बात में ‘बहन जी’ का रौब दिखाती रहती है। एक दिन मैंने तय किया कि मै इसे सुधार दूंगी, इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करुँगी। मैने अपने पति महोदय से कहा कि… आप मेरी कुछ मदद करिये तो इन्होंने कहा कि बाकी मुहल्ले के लोग तुम्हे बेवकूफ लगते हैं क्या। इसके आगे पीछे का परिणाम सोच लो फिर आगे कदम बढ़ाना”। tabella-on-roads

उसके मन की बेचैनी को मै समझ सकती थी लेकिन मैं भी क्या कहती… उसके पति की तरफ़दारी करते हुए ही मैने कहा, “क्या गलत कह रहे हैं…ठीक ही तो कहा है। तुम तो शिकायत दर्ज कर के निकल लोगी लेकिन भुगतेगा कौन? यह सोचा है।”

उसने पूछा, “कौन भुगतेगा?”

उसकी नादानी पर मैं हँसते हुए बोली, “अरे मूर्ख तुम्हारे पति… और कौन?”

वह झुँझलाते हुए बोली, क्यों इसमें उनका क्या काम कि वह भुगतेंगे? ये पुरुष होने के नाते डर रहे हैं कि कहीं मेरे खिलाफ कोई गलत आरोप न लगा दे। लेकिन मैं तो एक महिला हूँ। सारे मुहल्ले के लोग पीठ पीछे इसका विरोध करते है लेकिन सामने कोई नही कहता। इस मुहल्ले में औरतें सकपकायी रहती हैं। पति जो बोलेगा वही करेंगी अपनी समस्याओं को बरदाश्त करती रहती हैं… पुरुष वर्ग तो अपने-अपने काम पर चला जाता है लेकिन हम महिलाएं और बच्चे कहाँ जाँय। मै तुमसे पूछती हूँ  कि इसके खिलाफ मुझे शिकायत दर्ज करवानी है कैसे करूँ? देखती हूँ कि मेरा कोई क्या बिगाड़ लेता है?

मैने उसे समझाया, “जोश में कोई ऐसी-वैसी हरकत मत कर बैठना। दलित उत्पीड़न में फँस जाओगी।  अगर तुम्हारे पति को सस्पेंड कर दिया जायेगा तो क्या करोगी?” उसने जोश में जवाब दिया, “शिकायत मैं करूँगी तो सरकार को या ‘बहिन जी’ को अगर बुरा लगता है तो मेरा नुकसान करे इसमें मेरे पति का क्या कुसूर?

मुझे भी मजाक सूझा तो मैने झट से बोला, पिक्चर नही देखती क्या? अगर हीरो से दुश्मनी निकालनी होती है तो गुन्डे उसकी माँ-बहन को परेशान करते हैं यही फ़ॉर्मूला है और क्या?

वह मेरे ऊपर भी नाराज होने लगी और बोली- तो क्या हम इस डर से बैठे रहें और चुपचाप यह सब अपनी आँखों से देखते रहें। मुझे तुमसे यह उम्मीद नही थी रचना… तुम मुझे समझा रही हो कि अन्याय को अपनी आँखों के सामने होते हुए देखते रहें और चुप बैंठे रहें। क्या तुम वही रचना हो जो कॉलेज लाइफ में बिना अंजाम की परवाह किए जो बुरा लगता था उसपर फ़ौरन आवाज़ उठाती थी। मैने कहा, “तबकी बात कुछ और थी तब अपने पापा के घर में थी और मेरे पापा सरकार के नौकर नही थे… लेकिन  अब बात कुछ और है।”cattle-menace

मैंने उसे दुनियादारी की बात समझा तो दी लेकिन यह बात मै खुद ही नही समझ पाती कि अब बात कुछ और क्यों है? मैं तो यह भी बताने में डरती हूँ कि वह महिला दलित है और  प्रदेश सरकार भी दलित आधार की है। आये दिन दलित महिलाओं को थाने जाते देखती और सुनती रही हूँ। कितने लोग  उनसे आरोपित होने के बाद अपनी निर्दोषिता सिद्ध करने में हलकान हो जाते हैं।

काश मेरे अंदर पहले जैसा आत्म-विश्वास होता। पहले जैसा यानी जैसा बचपन में था। किसी से बगैर पूछे दिल की आवाज़ पर कोई काम कर लेना- नतीजा चाहे जो निकले। इसकी किसको फिक्र थी!  साँच को आँच कहाँ?  लेकिन अब क्या है… ?

देखती हूँ कि सच्चाई का मोल घटता जा रहा है। ‘पोलिटिकली करेक्टनेस’ के चक्कर में नारों और जुमलों का हमारे व्यवहार पर बड़ा असर पड़ रहा है। बात-बात पर अपनी परवाह कम घर-परिवार, बच्चे और पति की चिंता ज्यादा रहती है। कभी-कभी अपने विचार खुद को ही सही नहीं लगते हैं, अपना ही व्यवहार टीसने लगता है। ऐसा क्यों हो जाता है?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, December 11, 2010

राम दुहाई राम दुहाई राम दुहाई भाई जी

आज अचानक कैलाश गौतमजी की एक कविता हाथ लग गयी। इसे पढ़कर मैं हैरत में पड़ गयी। मुझे नहीं मालूम कि इसे किस संदर्भ में उन्होंने लिखा था लेकिन मुझे विश्वास है कि आज भी आपको अपने आस-पास ऐसे चरित्र मिल सकते हैं। लीजिए आप लोगों के लिए प्रस्तुत है ये मंचीय कविता :


राम दुहाई राम दुहाई राम दुहाई भाई जी
आपके मुँह पर आपकी कितनी करूँ बड़ाई भाई जी।

गिरगिट को भी आपने पीछे छोड़ा रंग बदलने में
कोई सानी नहीं है मुँह पर कालिख लेकर चलने में
ठाकुर के घर में न रही ऐसी ठकुराई भाई जी।

गुड़िया बनकर बुढ़िया निकली खैर नहीं है बप्पारे
सोने की पायल के लायक पैर नही है बप्पारे
घर में केवल आग लगाने दुलहिन आई भाई जी।

नाक कटाकर बड़ी बहू अब नथ गढ़वाने बैठी हैं
कितने भर सोने का होगा वजन बताने बैठी हैं
रह-रहकर झनकातीं चूड़ी भरी कलाई भाई जी।

क्या कोई सुख-दुख बाँटेगा जैसा आपने बाँटा है  
सबके मन में चोर बसा है सबके मन में काँटा है
आपसे बढ़कर कौन दूसरा हातिमताई भाई जी।

कितना बड़ा पेड़ था कल तक अब है बेट कुल्हाड़ी का
बिका कसाई बाड़े जाकर फाटक ठाकुरवाड़ी का
हम सब भेंड़ बकरियों में हैं आप कसाई भाई जी।