Friday, May 15, 2020

नज़रबट्टू



दैनिक भास्कर के 'मधुरिमा' में छपी मेरी कहानी 'नजरबट्टू'
            
पिछले कितने ही वर्षों की घटनाएं, किसी फिल्म के फ्रेम्स सी, मानस पर तेजी से प्रक्षेपित हो रही  थीं - जैसे किसी ने फ़ास्ट फॉरवर्ड की बटन दबा दिया हो। यदि ट्रेन की गति उन बदलते मनोभावों की गति से साम्य रख रही थी, तो उसकी धड़-धड़ाहट उनके आपस में टकराहट की ।

कितनी ही बार तो उसने सुना था कि लक्ष्मी समान बेटी को जन्म देने के बाद परिवार में उसकी माँ शोभा का मान और बढ़ गया था। फूल सी कोमल और चाँद सी सुन्दर बिटिया के क़दम पड़ते ही परिवार की खुशियों में पंख लग गये। पिता जगदीश का व्यापार दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से आगे बढ़ने लगा। उसके चाचा विजय की वर्षों की तपस्या का फल मिल गया। उसे बहुप्रतीक्षित प्रतिष्ठित नौकरी मिल गई। भाइयों की पढ़ाई भी अब कस्बे से दूर शहर के एक अच्छे पब्लिक स्कूल में होने लगी। अपने दोनों भाइयों के लिये वह ईश्वर की अनमोल भेंट थी। सालों बाद उन्हें अपनी कलाइयों पर राखी बाँधने वाली सलोनी सी बहन जो मिली थी!  इसके पहले तो उन दोनों को अपनी बुआ की राखियों का ही इंतजार रहता था। कभी-कभी तो राखी वाली डाक भी उन्हें समय से नहीं मिल पाती थी तो पुरोहित जी आकर उन्हें रक्षासूत्र बाँध जाते थे।

जगदीश जी ने अपने पुराने घर की जगह एक नया घर बनवाया। गुलाबी रंग की दीवारों के बॉर्डर और छत के किनारों की रेलिंग को जब चटक पर्पल रंग की पट्टियों में रंग दिया गया तो घर की सुंदरता गजब खिल उठी। गाँव में दूर से ही यह घर लोगों को आकर्षित करता। जो देखता वह प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। शोभा ने एक मिट्टी का गोल बर्तन मंगाया, उसके पेंदे को कालिख से रंगकर, उसके ऊपर सफ़ेद चूने से आँख, नाक, मुँह और मूछ उकेरकर उसे घर के कंगूरे पर टंगवा दिया। इस प्रकार घर को बुरी नजर से बचाने के लिए तैनात कर दिया गया यह 'नजरबट्टू'। 

उसके पैदा होने के बाद के दिनों में उसके घर में अद्भुत खुशहाली छा गयी थी। सबका उत्साह अपने चरम पर था। घर का कोई भी नया कार्य अब बिना उससे 'शगुन' कराये आरम्भ नहीं होता। घर में शगुन की ऐसी गूँज उठी कि उसका नाम ही शगुन पड़ गया। चयनित होते ही चाचा विजय की शादी के लिये दरवाजे पर गाड़ियों की लाइन लगने लगी। एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे। तस्वीरों का ढेर लगने लगा। सब बड़ी दुविधा में थे कि शादी की बात कहाँ पक्की की जाय! दो-चार तस्वीरें ऐसी थीं जिसको विजय ने छाँट कर अलग कर ली थी। एक दिन विजय ने शगुन को अपनी गोद में उठाया। दुलारते हुए उससे हाथ में पकड़ी उन चार तस्वीरों में से किसी एक पर उंगली रखने को कहा। चार वर्ष की शगुन की एक उँगली के इशारे ने एक लड़की से उसके चाचा की शादी पक्की कर डाली।

विजय के तिलक की तैयारी हो रही थी। घर की साज-सज्जा की जा रही थी। इलेक्ट्रिशियन छत से नीचे बिजली की रोशनी फेंकते लट्टुओं की लड़ी लटका रहे थे। तभी अचानक धक्का खाकर वो नजरबट्टू नीचे गिरा और टूट गया। शोभा को यह बहुत बुरा लगा। उसने वहां काम करने वालों को खूब फटकार लगाई और फौरन दूसरी हाँड़ी मंगाकर उसे कालिख से टीक-फानकर छत की मुंडेर पर टांग दिया। शगुन उसका आँचल पकड़े सबकुछ कौतूहल से देख रही थी। उसने पूछा - माँ यह क्या होता है? शोभा ने उसे पूरी आस्था से समझाया - इसको लगाने से घर में सबकुछ अच्छा होता है और किसी की बुरी नजर नहीं लगती।

शगुन ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही थी उसका सौंदर्य और निखरता जा रहा था। माँ का पूरा ध्यान यौवन की दहलीज पर खड़ी बेटी के इर्द-गिर्द ही रहता था। गाँव में घर से रहकर मात्र इंटरमीडिएट तक पढ़ सकी थी वह। ईश्वर ने उसे अच्छे रूप के साथ अच्छा मस्तिष्क भी दिया था। अपने क्लास में ही नहीं, पूरे स्कूल के मेधावी बच्चों में उसकी गिनती होती थी। 

शगुन ने पिताजी से आगे की पढ़ाई शहर के हॉस्टल में रहकर जारी रखने की बात कही तो वे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने इस बारे में विजय से राय ली तो उसने कहा- ''उसे हॉस्टल ना ही भेजिये तो अच्छा है। हॉस्टल का माहौल बहुत खराब होता है, और उसपर अपनी शगुन तो कभी घर से दूर रही नहीं।"  जगदीश सोचने लगे कि विजय की बेटी तो हॉस्टल में ही रहती है फिर भी यह शगुन के लिए मना क्यों कर रहा है। लेकिन वे यह प्रश्न पूछ नही सके। फोन पर बड़े भाई की चुप्पी से विजय ने उनके मन के भाव पढ़ लिए तो सफाई देते हुए बोले- "इस नौकरी में मेरी भी मजबूरी है भइया, वरना मैं भी प्राची को कभी बोर्डिंग नहीं भेजता।" जगदीश अपने उच्चपदस्थ भाई की हाँ में हाँ मिलाते रहे। विजय ने शगुन को प्राइवेट ग्रेजुएशन कराने की सलाह दी - ''मैं उसकी किताबें वहीं भेजवा देता हूँ... उससे कहिये कि वह घर में रहकर आराम से पढ़ाई करे, सिर्फ इम्तिहान के समय ही कॉलेज जाना पड़ेगा... और कौन सी हमें अपनी शगुन से नौकरी करानी है।'' विजय की बात उन्हें बहुत आसानी से समझ में आ गयी। उन्होंने बिल्कुल वैसा ही किया जैसा छोटे भाई ने समझाया था।

पहले गर्मी की छुट्टियों में प्रायः उसके दोनों भाई और चाचा-चाची भी गाँव आ जाया करते थे, पर इस बार कोई नहीं आया। शगुन ने उदास होकर माँ से कहा- ''पहले तो चाची प्राची को लेकर छुट्टियों में यहीं आ जाती थीं। जबसे वो बोर्डिंग गई है तबसे तो वे लोग भी यहाँ आना कम कर दिए हैं। मेरा तो कॉलेज भी आना-जाना नहीं है माँ... इसलिए मेरी कोई सहेली भी नहीं है जिसके साथ कुछ समय बिताती। माँ, क्यों न हम लोग ही इस बार छुट्टियों में चाची के पास 
चले?'' 

सुबह-सुबह द्वार की घण्टी बजी। प्राची ने दरवाजा खोला। सामने अपनी दीदी शगुन को पाकर उससे लिपट गई। उसके चंचल अंदाज घर की भीतरी दीवारों को अपनी अठखेलियों से गुंजित कर रहे थे। शगुन ने अंदर घुसते ही अपनी चाची के साथ घर के सब कामकाज में अपना दखल जमा लिया। गुणवंती माँ ने बेटी को पाक-कला और सिलाई-बुनाई-कढ़ाई में आखिर निपुण जो  कर दिया था। पर हाँ, उसने अपनी बेटी को अरमानों के पर लगाकर उड़ने से जरूर रोक रखा था।

विजय के पड़ोस वाले बंगले में शर्मा जी रहते थे और दोनों घरों में खूब आना-जाना था। शर्मा दंपत्ति ने शगुन की गृहकार्य-दक्षता और सुन्दरता की चर्चा सुन रखी थी। जब सामने पाकर उसकी शालीनता के दर्शन हुए तो मन ही मन अपने बेटे  से उसकी जोड़ी मिलाने लगे और शादी के लड्डू फोड़ने लगे। उनका इकलौता बेटा विनीत सैनिक स्कूल से निकलकर ग्रेजुएशन करने के बाद सीडीएस की तैयारी में लगा था। अनेक बार एसएसबी का इंटरव्यू दे चुका था लेकिन अंतिम सफलता हाथ से फिसल जाती थी। शर्मा जी अब और इंतजार करने के बजाय सेवानिवृत्त होने से पहले उसकी शादी निपटा देना चाहते थे। 

शगुन के हाथो के बने नाना प्रकार के सुस्वादु व्यंजन शर्मा जी को भी चखने के लिए मिलते रहे। और भला चाहिये भी क्या था उन्हें अपनी होने वाली बहू में! घर-खानदान अच्छा था और जाति भी मेल खा ही रही थी। मौका देखकर शर्मा जी ने शादी की बात छेड़ डाली। देखने में सुन्दर और सुशील शगुन विनीत को भी सुघड़ लगी थी। नौकरी के बगैर इससे अच्छे रिश्ते की उम्मीद करना भी फ़िजूल था। तिसपर लड़की के चाचा और भाइयों के ऊँचे ओहदों का भी आकर्षण था ही। शादी की बात पक्की होते देर न लगी। आनन-फानन में सगाई की रस्म पूरी कर दी गयी। शगुन से किसी ने पूछा भी नहीं। वैसे उसके पास हाँ करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था।

इधर सगाई हुई और उधर विनीत के लिए अगला एसएसबी सफलता का परिणाम लेकर आया। अब तो सारा श्रेय शगुन के भाग्य को दिया जाने लगा। सास के लिए भी घर में शगुन का पैर बड़ा शुभ रहा। गुणवंती बहु के आते ही घर की रौनक बदल गयी थी। प्रायः बीमार रहने वाली सासू माँ उसकी सेवा पाकर बिस्तर से उठ खड़ी हुईं। शर्मा जी भी रिटायर होने से पहले पदोन्नति पाकर विभाग के निदेशक बन गये।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद विनीत लौटा तो शगुन को अपने साथ लेकर पोस्टिंग पर चला गया। शगुन के लिए वहाँ का माहौल एकदम अपरिचित था। डांस-पार्टी और क्लब संस्कृति से लेकर खान-पान तक, और सामाजिक संबंधों से लेकर उठने-बैठने के तौर-तरीकों तक, उसके लिए कुछ भी सहज नहीं था। विनीत मन ही मन अपने दोस्तों की पत्नियों से उसकी तुलना करता और उसे ले कर उनके सामने झेंपने सा लगा था। पाश्चात्य लिबास में चमकती-दमकती उन आधुनिकाओं के आगे शगुन आखिर  फीकी जो पड़ जाती थी। 
और फिर अकस्मात उसने सुन लिया उस रात एक्सटेंशन फोन पर वह वार्तालाप।

- मम्मी, शगुन मेरे लायक नहीं है।
- अरे, क्या हुआ बेटा। शगुन तो साक्षात् लक्ष्मी है हमारे घर की।
- तुम नहीं समझोगी मम्मी । मुझे अपने दोस्तों के सामने बहुत शर्म आती है।
- कैसी शर्म बेटा, इतनी सुन्दर और गुणवंती दुल्हन मिली है तुम्हें।
- तुम क्या जानो, मेरे ब्रदर ऑफिसर्स की पत्नियां बहुत पढ़ी-लिखी हैं। उनके सामने यह             मोम की गुड़िया गूंगी बनी खड़ी रहती है। 
- लेकिन उसकी अच्छाई भी तो देखो...
- नहीं माँ, मुझसे नहीं होगा। ... मैं उसे साथ नहीं रख सकता हूँ।
- नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं करते। इतनी संस्कारी बहू है हमारी, कितनी शुभ। जब से घर में  उसके कदम पड़े है सबकुछ कितना अच्छा होता गया। तुम्हे मनचाही नौकरी मिली, पापा को प्रोमोशन मिला, उनकी आमदनी कितनी बढ़ गयी, अपना घर बन गया,... और तो और मैं तो अब तक मर ही गयी होती। कोई दवा काम नहीं कर रही थी लेकिन इसका हाथ लगते ही वही दवा फायदा करने लगी।
- मम्मी, ये सब फालतू की बातें हैं। मैं यह सब नहीं मानता। मुझे उसके साथ नहीं रहना है अब, बस!
- अच्छा रुक । अपने पिताजी से तो बात कर ले।

श्रीमती शर्मा अपने बेटे की बात अपने पति को बतायी तो वे कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गये। 
फिर उनकी धीमी आवाज़ फोन पर सुनायी दी -‘तुम्हीं बात करो उस से । बोल दो कि कि चाहे जैसे रहना चाहे रहे लेकिन शगुन से तलाक की बात जबान पर मत लाये। उसे यहाँ छोड़ जाय... हमारे पास। उसके बाद वहाँ किसी को रख ले हम कुछ नही बोलेंगे। ...यहाँ हमारे साथ रहेगी हमारी शगुन। हमारी शुभंकर।’ 

फोन पर 'माँ की तबियत खराब होने का' सन्देश पाकर विनीत उसे अगली सुबह ही ट्रेन से ‘माँ की देखभाल के लिए' घर लेकर आ रहा था। ट्रेन कि गति कम होने लगी थी। गंतव्य शायद आ रहा था। वह समझ चुकी थी कि अब वह उसके घर की देहरी पर बैठायी गयी नजरबट्टू बन चुकी है।

( रचना त्रिपाठी)

Tuesday, May 12, 2020

वार्डरोब

लॉकडाउन में विधाता ऐसे पशोपेश में डाल देंगे यह कभी सोचा न था। बहुत दिनों से अपार्टमेंट के बाहर निकलना नहीं हुआ था। होम डिलीवरी की सुविधा ने सबकुछ फोन से ही संभव करा दिया है। बहुत दिनों से बाहर निकलने की तमन्ना कुलाँचे मार रही थी कि पड़ोस के बुजुर्ग दम्पति ने यह मौका दे दिया।

दरअसल आज आंटी को एक मेडिकल जांच के लिए हॉस्पिटल ले जाने की जरूरत पड़ी। संयोग से उनके साथ में मुझे भी जाने का ऑफर मिला। खुशी-खुशी वहाँ जाने के वास्ते तैयार होने के लिए जब मैं अपने कमरे में घुसी तो मेरे सामने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई। 

बाहर निकलना तो ठीक था लेकिन कोरोना की खबरों से घबराया मन हास्पिटल जाने से पहले अपने सुरक्षा कवच को कैसे मजबूत करे कि वहाँ से सुरक्षित घर वापसी हो सके, इस उधेड़-बुन में भी लगा था। कपड़ों की आलमारी के पास जाकर देखा तो वो भी मानो कराह रही थी। मेरे रंग-बिरंगे कपड़े बाहर के सैर-सपाटे के लिए छटपटा रहे थे और आलमारी को भीतर से लात मार रहे थे। 

मेरा दिल ये गीत गाने लगा-  'क्या करूँ क्या ना करूँ ये कैसी मुश्किल हाय, कोई तो बता दे इसका हल ओ मेरे भाई।' उधर हास्पिटल जाने की जल्दी थी और इधर मैंने ज्यों ही आलमारी खोला कि वे सभी 'मैं भी... मैं भी...' करते छोटे बच्चों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े। इतने दिनों बाद किसी तरह से ये मौका हाथ लगा था। एक अकेला शरीर और इतने सारे कपड़ो की डिमांड भला कैसे पूरी करता! 

इनको समझाने लगी कि बाहर अभी खतरा है। बाहर यमराज घूम रहे हैं। लेकिन वे तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे। कह रहे थे - अपने तो जा रही हैं हमें भी घुमा लाइए। मैंने झिड़का - ऐसे कैसे सबको अपने ऊपर चढ़ा लूं। इस मान-मनौव्वल में काफी वक्त लगने लगा। उनमें से कई तो ऐसे थे जो तत्काल के नहाए-धोए, बिना कंघी-पाउडर के तैयार हुए बिना बच्चों की भांति बेतरतीब आलमारी से उछलकर नीचे मेरी ओर हड़बड़-तड़बड़ में गिरे जा रहे थे। मुश्किल से उनको समेटते-समझाते दूसरी ओर ठेलना पड़ा। 

तभी उनमें से कुछ पूरे कॉन्फिडेंस से मुझे देखने लगे जो बाकायदा इश्तरी किये हुए थे और इस बात से आश्वस्त थे कि वे पहले से एकदम 'रेडी' हैं। इनको मना करने का मेरे पास कोई बहाना नहीं है। मुझे तो इन्हें अपने कंधे पर चढ़ाना ही पड़ेगा! वे एक गुरुर में एकटक मेरी ओर ताक रहे थे। 

उनको देखकर मैं समझाने लगी कि ऐसे खतरनाक माहौल में क्योंकर अपने साथ तुम्हे लाद लूँ। इतने अच्छे से चमचमाते हुए आराम से आलमारी में पड़े हो, पड़े रहो। बेवजह जाओगे तो घर लौट के आते ही पहले तुम डिटर्जेंट में डुबोए जाओगे, कचारे जाओगे फिर कड़ी धूप में टांग दिए जाओगे। सूखने के बाद गर्म लोहे से दबाए जाओगे। कितनी साँसत होगी तुम्हारी। …मेरा क्या! मैं तो खुद को सेनिटाइज करने के बाद घर में पुनः अपने रूटीन में आ जाऊंगी - वही बच्चों की फरमाइश, झाड़ू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा, किचेन, टीवी और मोबाइल। लेकिन बेटा, तुम तो कुछ दिनों के लिए आइसोलेशन में चले जाओगे। इस एक दिन का सुख तुम्हे बड़ा भारी पड़ने वाला है। इसलिए मेरी मानो तो घर में रहो, सुरक्षित रहो। 

मैं तो उसे बाहर ले जाऊंगी जो ऐसे समय में मेरे लिए कोई परेशानी न खड़ी करे। इधर-उधर न मचले न लहराए। चुपचाप जाए और मन मारकर लौट आए।

(रचना त्रिपाठी) 🙏

Monday, May 4, 2020

ऑनलाइन शिक्षा में कितनी समानता?

लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा पद्धति को अपनाते सभी शैक्षिक संस्थानों कक्षा नर्सरी से लेकर जूनियर हाईस्कूल स्कूल, इंटर, कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक, सरकारी हो अथवा प्राइवेट दोनों ही इसे अपने कठिन परिश्रम के बदौलत सफल बनाने में रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। यह तकनीक कितनी व्यवहारिक है? क्या इसका वास्तविक लाभ समाज के सभी तबके को मिल पाना संभव है? सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्राप्त हो ऐसी सरकार की नीति कहती है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा इस सामाजिक ढांचे में कितना फिट बैठेगी? 

इस अवधि में यह तकनीक निश्चित तौर पर कारगर हो सकेगी लेकिन सीमित वर्गों तक ही। शिक्षा का उद्देश्य वृहत्त होना चाहिए जिससे हर वर्ग को इसका लाभ बराबर मिले। लॉकडाउन के चलते निश्चित तौर पर बच्चों की पढ़ाई पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। परन्तु सिलेबस से इतर भी बच्चों को बहुत कुछ पढ़ाने और सिखाने की जरूरत है जैसे स्किल्स को बढ़ावा देना, अपने इतिहास की जानकारी देना, पौराणिक कथाओं के माध्यम से उन्हें नैतिक शिक्षा का ज्ञान देना। यह सभी चीजें इस दौरान बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। जिसपर कोई परीक्षा आधारित न हो जिससे किसी भी बच्चे के रिजल्ट पर किसी भी प्रकार से गैरबराबरी का प्रभाव ना पड़े। 

स्कूल प्रबंधन को इस बिंदु पर अपना ध्यान जरूर देना चाहिए। आज के दौर में निम्न-मध्यम वर्ग से जुड़े अभिभावक भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का एक अहम हिस्सा उनके आस-पास के नामी प्रतिष्ठानों में एडमिशन के लिए  लगा देते हैं। ऐसे में यदि एक ही परिवार में अलग-अलग उम्र के दो-तीन बच्चे भिन्न-भिन्न कक्षाओं में पढ़ते हों तो प्रत्येक बच्चे के लिए ऑनलाइन क्लासेस के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे स्मार्टफोन/लैपटॉप/कम्प्यूटर पर अतिरिक्त खर्चे का वहन कर पाना उस परिवार के लिए मुश्किल है! 

परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की अनुपलब्धता को देखते हुए भले ही सरकार उन्हें नाश्ता-पानी, भोजन, यूनिफार्म से लेकर स्कूल बैग कॉपी-किताब तक मुफ्त मुहैया करा रही है। तब भी उनके अभिभावकों से ऑनलाइन शिक्षा पद्धति के नख़रे झेल पाना आसान नहीं है। जहाँ रोटी के लाले पड़े हों वहाँ हाथों-हाथ बिजली, स्मार्ट-फोन, कम्प्यूटर और डेटा-पैक क्या उनकी गरीबी का उपहास नहीं है?
(रचना त्रिपाठी)

Saturday, April 25, 2020

आ अब लौट चलें

लॉक डाउन में इस बात से मध्यमवर्ग भली-भाँति परिचित हो गया होगा कि जिंदगी, जिसको हमने बहुत कठिन बना रखा था वह कितनी आसान है। कम से कम सुविधाओं में जितना अच्छा हो सकता है वो सब हो रहा है। पहले की अपेक्षा कहीं से किसी के वजन में कोई घटोत्तरी नहीं आयी है। बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा ही गुजर रहा है।

लॉकडाउन से पूर्व महीने में घर-गृहस्थी पर जितने खर्चे हो रहे थे अब उसके आधे हो गए हैं। बच्चों ने कोरोना के भय से पिज्जा-बर्गर और दूसरे ऊल-जुलूल खाद्य पदार्थों से काफी दूरी बना ली है। अब सबको समझ में आ गया होगा कि अपनी रसोई में बने देसी पकवान में जितना खर्च नहीं होता है उससे कहीं ज्यादा खर्च भूसा जैसे-पिज्जा-बर्गर, पेस्ट्री, केक, कोल्ड ड्रिंक इत्यादि खाने-खिलाने पर होता है। मेरे बच्चों ने राय दी कि इस दौरान घर के खर्चे में जितना अंतर आया है उस बचत को सरकार के आपदा राहत कोष में जमा कर दिया जाय।

अब न तो मंदिर न जाने का कोई मलाल है और न ही मॉल नहीं खुलने से खान-पान, रहन-सहन में कोई कमी आयी है। भरा-पूरा घर-परिवार अपने-आप ही एक बहुत बड़ा मंदिर है। यह भी बोध हो गया कि सबका स्वास्थ्य, खान-पान, रहन-सहन और प्रेम-सौहार्द बना रहे तो यही सबसे बड़ी पूजा है। 

रसोई में चूल्हे की आंच से किस्म-किस्म के व्यंजन के स्वाद आपसी संबंधो में जो गर्माहट लाते हैं वही सबसे बड़ा तीर्थलाभ है। अफसोस कि आधुनिक पीढ़ी ने इस सहज सुलभ आनंद को पीछे धकेल कर भौतिक उपासना में अपना रात-दिन नष्ट कर दिया था। 

घर में जितने सदस्य नहीं होते हैं उससे ज्यादा कपड़े और जूतों की आलमारियां होती हैं। उनके भार से अलमारी फट कर कब बाहर आएगी कुछ कहा नहीं जा सकता। कोरोना के लॉक डाउन ने ऐसा मारा कि बाहर निकलने वालों का अब चोला ही बदल दिया। सब कुछ धरा का धरा रह गया है।

मनुष्य द्वारा अपनी सीमाओं का ऐसा अतिक्रमण हुआ कि शायद प्रकृति ने कुपित होकर हस्तक्षेप कर दिया। शायद इसी के कारण नौबत यह आ गई है कि बहुत से धंधे बन्द हो जाने वाले हैं। जैसे मास्क ने लिपस्टिक पर बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। जिससे स्त्रियों का साज-श्रृंगार अब किसी पार्टी की रौनक का मोहताज हो गया है। अब तो केवल रोज सुबह स्नान-ध्यान के बाद "सजना है मुझे सजना के लिए" का गीत ही गा सकती हैं। वो भी इस बात का ख्याल रखते हुए कि जैसे सौदागर फ़िल्म में इस गीत का हश्र हुआ वैसा यहाँ न हो जाय। देख लें कि उस मुए गुड़ जैसी कोई चीज चूल्हे पर जल तो नहीं रही। क्या पता कहीं श्रृंगार रस असावधानी वश अचानक वीभत्स रस में न परिवर्तित हो जाय। 

इसलिए अब यह संदेश सुनने का समय आ गया है कि अबसे प्रकृति की ओर लौट जाने में ही सबकी भलाई है।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 20, 2020

लॉकडाउन में अच्छे हैं

लॉकडाउन से पूर्व सुबह-सुबह किचेन में घुसने पर पूरा सिंक जूठे बर्तन से भरा मिलता था। कामवाली के इंतजार में किसी तरह एक कप चाय बनाकर धीरे-धीरे अखबार की खबरों को उसकी चुस्कियों में घोंटते उसपर अपना मंथन तबतक चलता था जबतक कामवाली काम कर के घर से चली न जाय।

महीने भर से कामवाली की छुट्टी चल रही है। अपनी आदत कुछ ऐसी पड़ गई है- सुबह सो के उठो तो अभी आधी नींद में ही झाड़ू कब हाथ में आ जाता है पता नहीं लगता। कभी-कभी भ्रम होता है कि हमने झाड़ू को उठाया या झाड़ू ने हमें। एक-दूसरे की इज्जत रखते हुए सारे कमरे में झाड़ू लग जाता है। बुहारन के नाम पर चिटकी भर धूल निकलती है। उसे ठिकाने लगा देना होता है। 

महीने भर से किसी का बाहर से बहुत आना-जाना नहीं हो रहा तो एकाध-दिन झाड़ू न भी लगाओ तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। ऐसा कई बार ख्याल आया भी कि आज झाड़ू रहने देती हूँ कि तभी सासू माँ की बात याद आ जाती है- कि घर में झाड़ू प्रतिदिन दिन उगने (सूर्योदय) से पूर्व लग जाना चाहिए। लक्ष्मीजी खुश रहती हैं। लब्बोलुआब ये कि सूर्योदय से पहले बहुरिया को बिस्तर छोड़ देना है!

वैसे सुबह उठने की आदत बहुत अच्छी होती है। बहुत सारा काम जल्दी निपट जाता है। किचेन में किसी भी वक्त अब सिंक में जूठा बर्तन नहीं रहता है। एक-एक कर के उसे तुरंत निकाल लिया जाता है। कुछ भी करने के बाद साबुन से हाथों की रगड़ाई में हाथ फँसा रहता है तो कभी-कभी चूल्हे की नॉब ऐंठने में देरी हो जाती है और देखते ही देखते दूध उबल कर पूरे स्लैब पर पसर जाता है। इससे काम और बढ़ जाता है। इधर सुबह, दोपहर, शाम  बर्तन साफ करते-करते हथेलियां इतनी रूखी हो गईं हैं जैसे- खरहरा। 

उपमा समझ में न आई हो तो बता दें कि अरहर के ठठ्ठर से बने लम्बे झाड़ू को हमारे यहाँ खरहरा कहते हैं। इससे हमारे गांव में दरवाजे पर बंधे गाय-गोरु का घोठ्ठा और खेत-खलिहान बुहारा जाता है। 

घर के बाकी सदस्यों का व्यवहार तो गज़ब के सुखद परिवर्तन के दर्शन करा रहा है। पहले प्रायः सभी गृहकार्य गृहिणी के हिस्से में रहते थे लेकिन अब झाड़ू, पोंछा,बर्तन, कपड़ा धुलाई, सब्जी काटना, आटा गूंथना, बिस्तर ठीक करना, कूड़ा फेंकना आदि सभी कार्यों का बंटवारा सहर्ष हो गया है। घर में बेहतर साफ सफाई के साथ हंसी-खुशी का महौल भी बेहतर हो गया है। यह सामाजिक दूरी के समय पारिवारिक सामीप्य का अद्भुत अनुभव है।

रात में जबतक बिस्तर पकड़ न लो शरीर से हाथों का सम्पर्क कोरोना के भय से लगभग टूटा रहता है। मतलब मेरी हथेलियां भी शरीर से सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखती हैं। हथेलियों की घिसाई के बाद इसपर सेनेटाइजर और बॉडी-लोशन का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। घर छोटा है तो काम आसान लगता है। कुछ भी हो, इस लॉकडाउन में देसी पकवान और धूप-अगरबत्ती के मिश्रण से घर की खुशबू बड़ी अच्छी लगती है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2020

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

कोरोना की महामारी में देश शाहीनबाग से उबरकर तब्लीगी मरकज़ में उलझा ही था कि अब बांद्रा स्टेशन पर जाकर फंस गया। यहाँ हजारों की संख्या में गुमराह मजदूर अपने घर जाने के जोश में भूल गए हैं कि जहाँ जाएंगे वहाँ जाकर उन्हें क्या हासिल होगा। साथ में अपने परिवार को भी कितनी बड़ी मुसीबत में डालने वाले हैं। जोश में होश गवां बैठे ये बेचारे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके खैरख्वाह उन्हें घर नहीं बल्कि सपरिवार उन्हें श्मशान भेजने की साजिश में लगे हैं। 

इन्हें नहीं मालूम कि इस लॉकडाउन के सहारे उनको तो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। इसके लिए उन्हें इन मूर्खों की जमात से बेहतर शिकार नहीं मिलेगा। अगर वे वास्तव में इनके सच्चे खैरख्वाह होते तो इस आपात स्थिति में इन मजदूरों को घर पहुंचाने की बात कर के गुमराह नहीं करते। यह समझने की जरूरत है कि वे सिर्फ उनके साथ ही नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ जनता के साथ भी बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर वे कहते कि जो जहाँ फंसा है वही रहे, उसके रहने खाने की व्यवस्था अगर सरकार नहीं कर पा रही है तो वे खुद करेंगे; तब उनकी दिलदारी समझ में आती। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। 

मजबूरी वश ही सही यहाँ इकठ्ठी भीड़ के लोग मजदूर हैं या किसी शातिर हाथ के खिलौने मात्र? ऐसा नहीं है तो, उनको घर पहुँचाने का ठेका लेने के बजाय वे सरकार से उनके रहने खाने की व्यवस्था की लड़ाई क्यों नहीं लड़ रहे? जो जहां है वहीं पर उनकी व्यवस्था कराने की बात क्यों नहीं की जा रही है? हे नियति के शिकार प्रवासियों, कम से कम अपनी नहीं तो अपने परिवार की चिंता करिये और अभी जो जहां है वहीं रहे, इसी में सबकी भलाई समझिए।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 6, 2020

पुकार में दम है।

मोदीजी, आप ने देख ही लिया कि देश की जनता आपकी पुकार पर कुछ भी करने को तैयार है। इसलिए आप सावधान हो जाइए। 
जनता तो ठहरी भोली-भाली! आप जितना करने को कहेंगे हमेशा उससे चार कदम आगे ही कर के धर देगी। बारह-तेरह दिन हो गए लॉक-डाउन हुए - इस दौरान घर बैठकर इसने जितना खाया है उतना कहीं खर्च नहीं हुआ है। सारी ऊर्जा इकठ्ठा होकर कसमसा रही है। कल आपने एक-एक दीपक, मोमबत्ती या टॉर्च जलाने को कहा था और लोगों ने पूरा आकाश ही रौशन कर दिया। गगनचुम्बी आतिशबाजी की चकाचौंध देर तक इनकी बढ़ी हुई ऊर्जा का प्रदर्शन करती रही। इससे पहले आपने कहा था कि घर के खिड़की, दरवाजे या बालकनी से ही ताली-थाली बजायी जाय। लेकिन उत्साही जनता ने घंटा-घड़ियाल, ढोल-मजीरा, तुरही-भोंपू और शंख-पिपिहरी बजाते हुए पूरा जुलूस ही निकाल दिया।

ऐसे में मेरा आपसे एक अनुरोध है। आपको अपनी प्रजा से कुछ भी करवाना हो तो उससे थोड़ा कम करके बताइए। तभी बात बनेगी। आप कहेंगे मेरे प्यारे देशवासियो! योग करने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, आज आप सावधान की मुद्रा में खड़े रहिये तो जनता शीर्षासन करने लगेगी। कहीं आपने उसे गलती से शीर्षासन करने को कह दिया तो वे पूरा आसमान अपने सिर पर उठा लेगी। आप अब जान ही लीजिए। इस समय जनता हनुमान जी की तरह संजीवनी की तलाश में पूरा पहाड़ उखाड़कर अपने सिर पर उठा लेने को तैयार बैठी है। बाकी आपको क्या बताना! समझदार तो गजब के हैं। अद्भुत टाइप।

सोचा इतना कह दें, वैसे तुम्हरी लीला तुमही जानों। 🙏
(रचना त्रिपाठी)