Tuesday, May 12, 2020

वार्डरोब

लॉकडाउन में विधाता ऐसे पशोपेश में डाल देंगे यह कभी सोचा न था। बहुत दिनों से अपार्टमेंट के बाहर निकलना नहीं हुआ था। होम डिलीवरी की सुविधा ने सबकुछ फोन से ही संभव करा दिया है। बहुत दिनों से बाहर निकलने की तमन्ना कुलाँचे मार रही थी कि पड़ोस के बुजुर्ग दम्पति ने यह मौका दे दिया।

दरअसल आज आंटी को एक मेडिकल जांच के लिए हॉस्पिटल ले जाने की जरूरत पड़ी। संयोग से उनके साथ में मुझे भी जाने का ऑफर मिला। खुशी-खुशी वहाँ जाने के वास्ते तैयार होने के लिए जब मैं अपने कमरे में घुसी तो मेरे सामने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई। 

बाहर निकलना तो ठीक था लेकिन कोरोना की खबरों से घबराया मन हास्पिटल जाने से पहले अपने सुरक्षा कवच को कैसे मजबूत करे कि वहाँ से सुरक्षित घर वापसी हो सके, इस उधेड़-बुन में भी लगा था। कपड़ों की आलमारी के पास जाकर देखा तो वो भी मानो कराह रही थी। मेरे रंग-बिरंगे कपड़े बाहर के सैर-सपाटे के लिए छटपटा रहे थे और आलमारी को भीतर से लात मार रहे थे। 

मेरा दिल ये गीत गाने लगा-  'क्या करूँ क्या ना करूँ ये कैसी मुश्किल हाय, कोई तो बता दे इसका हल ओ मेरे भाई।' उधर हास्पिटल जाने की जल्दी थी और इधर मैंने ज्यों ही आलमारी खोला कि वे सभी 'मैं भी... मैं भी...' करते छोटे बच्चों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े। इतने दिनों बाद किसी तरह से ये मौका हाथ लगा था। एक अकेला शरीर और इतने सारे कपड़ो की डिमांड भला कैसे पूरी करता! 

इनको समझाने लगी कि बाहर अभी खतरा है। बाहर यमराज घूम रहे हैं। लेकिन वे तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे। कह रहे थे - अपने तो जा रही हैं हमें भी घुमा लाइए। मैंने झिड़का - ऐसे कैसे सबको अपने ऊपर चढ़ा लूं। इस मान-मनौव्वल में काफी वक्त लगने लगा। उनमें से कई तो ऐसे थे जो तत्काल के नहाए-धोए, बिना कंघी-पाउडर के तैयार हुए बिना बच्चों की भांति बेतरतीब आलमारी से उछलकर नीचे मेरी ओर हड़बड़-तड़बड़ में गिरे जा रहे थे। मुश्किल से उनको समेटते-समझाते दूसरी ओर ठेलना पड़ा। 

तभी उनमें से कुछ पूरे कॉन्फिडेंस से मुझे देखने लगे जो बाकायदा इश्तरी किये हुए थे और इस बात से आश्वस्त थे कि वे पहले से एकदम 'रेडी' हैं। इनको मना करने का मेरे पास कोई बहाना नहीं है। मुझे तो इन्हें अपने कंधे पर चढ़ाना ही पड़ेगा! वे एक गुरुर में एकटक मेरी ओर ताक रहे थे। 

उनको देखकर मैं समझाने लगी कि ऐसे खतरनाक माहौल में क्योंकर अपने साथ तुम्हे लाद लूँ। इतने अच्छे से चमचमाते हुए आराम से आलमारी में पड़े हो, पड़े रहो। बेवजह जाओगे तो घर लौट के आते ही पहले तुम डिटर्जेंट में डुबोए जाओगे, कचारे जाओगे फिर कड़ी धूप में टांग दिए जाओगे। सूखने के बाद गर्म लोहे से दबाए जाओगे। कितनी साँसत होगी तुम्हारी। …मेरा क्या! मैं तो खुद को सेनिटाइज करने के बाद घर में पुनः अपने रूटीन में आ जाऊंगी - वही बच्चों की फरमाइश, झाड़ू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा, किचेन, टीवी और मोबाइल। लेकिन बेटा, तुम तो कुछ दिनों के लिए आइसोलेशन में चले जाओगे। इस एक दिन का सुख तुम्हे बड़ा भारी पड़ने वाला है। इसलिए मेरी मानो तो घर में रहो, सुरक्षित रहो। 

मैं तो उसे बाहर ले जाऊंगी जो ऐसे समय में मेरे लिए कोई परेशानी न खड़ी करे। इधर-उधर न मचले न लहराए। चुपचाप जाए और मन मारकर लौट आए।

(रचना त्रिपाठी) 🙏

Monday, May 4, 2020

ऑनलाइन शिक्षा में कितनी समानता?

लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा पद्धति को अपनाते सभी शैक्षिक संस्थानों कक्षा नर्सरी से लेकर जूनियर हाईस्कूल स्कूल, इंटर, कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक, सरकारी हो अथवा प्राइवेट दोनों ही इसे अपने कठिन परिश्रम के बदौलत सफल बनाने में रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। यह तकनीक कितनी व्यवहारिक है? क्या इसका वास्तविक लाभ समाज के सभी तबके को मिल पाना संभव है? सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्राप्त हो ऐसी सरकार की नीति कहती है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा इस सामाजिक ढांचे में कितना फिट बैठेगी? 

इस अवधि में यह तकनीक निश्चित तौर पर कारगर हो सकेगी लेकिन सीमित वर्गों तक ही। शिक्षा का उद्देश्य वृहत्त होना चाहिए जिससे हर वर्ग को इसका लाभ बराबर मिले। लॉकडाउन के चलते निश्चित तौर पर बच्चों की पढ़ाई पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। परन्तु सिलेबस से इतर भी बच्चों को बहुत कुछ पढ़ाने और सिखाने की जरूरत है जैसे स्किल्स को बढ़ावा देना, अपने इतिहास की जानकारी देना, पौराणिक कथाओं के माध्यम से उन्हें नैतिक शिक्षा का ज्ञान देना। यह सभी चीजें इस दौरान बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। जिसपर कोई परीक्षा आधारित न हो जिससे किसी भी बच्चे के रिजल्ट पर किसी भी प्रकार से गैरबराबरी का प्रभाव ना पड़े। 

स्कूल प्रबंधन को इस बिंदु पर अपना ध्यान जरूर देना चाहिए। आज के दौर में निम्न-मध्यम वर्ग से जुड़े अभिभावक भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का एक अहम हिस्सा उनके आस-पास के नामी प्रतिष्ठानों में एडमिशन के लिए  लगा देते हैं। ऐसे में यदि एक ही परिवार में अलग-अलग उम्र के दो-तीन बच्चे भिन्न-भिन्न कक्षाओं में पढ़ते हों तो प्रत्येक बच्चे के लिए ऑनलाइन क्लासेस के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे स्मार्टफोन/लैपटॉप/कम्प्यूटर पर अतिरिक्त खर्चे का वहन कर पाना उस परिवार के लिए मुश्किल है! 

परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की अनुपलब्धता को देखते हुए भले ही सरकार उन्हें नाश्ता-पानी, भोजन, यूनिफार्म से लेकर स्कूल बैग कॉपी-किताब तक मुफ्त मुहैया करा रही है। तब भी उनके अभिभावकों से ऑनलाइन शिक्षा पद्धति के नख़रे झेल पाना आसान नहीं है। जहाँ रोटी के लाले पड़े हों वहाँ हाथों-हाथ बिजली, स्मार्ट-फोन, कम्प्यूटर और डेटा-पैक क्या उनकी गरीबी का उपहास नहीं है?
(रचना त्रिपाठी)

Saturday, April 25, 2020

आ अब लौट चलें

लॉक डाउन में इस बात से मध्यमवर्ग भली-भाँति परिचित हो गया होगा कि जिंदगी, जिसको हमने बहुत कठिन बना रखा था वह कितनी आसान है। कम से कम सुविधाओं में जितना अच्छा हो सकता है वो सब हो रहा है। पहले की अपेक्षा कहीं से किसी के वजन में कोई घटोत्तरी नहीं आयी है। बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा ही गुजर रहा है।

लॉकडाउन से पूर्व महीने में घर-गृहस्थी पर जितने खर्चे हो रहे थे अब उसके आधे हो गए हैं। बच्चों ने कोरोना के भय से पिज्जा-बर्गर और दूसरे ऊल-जुलूल खाद्य पदार्थों से काफी दूरी बना ली है। अब सबको समझ में आ गया होगा कि अपनी रसोई में बने देसी पकवान में जितना खर्च नहीं होता है उससे कहीं ज्यादा खर्च भूसा जैसे-पिज्जा-बर्गर, पेस्ट्री, केक, कोल्ड ड्रिंक इत्यादि खाने-खिलाने पर होता है। मेरे बच्चों ने राय दी कि इस दौरान घर के खर्चे में जितना अंतर आया है उस बचत को सरकार के आपदा राहत कोष में जमा कर दिया जाय।

अब न तो मंदिर न जाने का कोई मलाल है और न ही मॉल नहीं खुलने से खान-पान, रहन-सहन में कोई कमी आयी है। भरा-पूरा घर-परिवार अपने-आप ही एक बहुत बड़ा मंदिर है। यह भी बोध हो गया कि सबका स्वास्थ्य, खान-पान, रहन-सहन और प्रेम-सौहार्द बना रहे तो यही सबसे बड़ी पूजा है। 

रसोई में चूल्हे की आंच से किस्म-किस्म के व्यंजन के स्वाद आपसी संबंधो में जो गर्माहट लाते हैं वही सबसे बड़ा तीर्थलाभ है। अफसोस कि आधुनिक पीढ़ी ने इस सहज सुलभ आनंद को पीछे धकेल कर भौतिक उपासना में अपना रात-दिन नष्ट कर दिया था। 

घर में जितने सदस्य नहीं होते हैं उससे ज्यादा कपड़े और जूतों की आलमारियां होती हैं। उनके भार से अलमारी फट कर कब बाहर आएगी कुछ कहा नहीं जा सकता। कोरोना के लॉक डाउन ने ऐसा मारा कि बाहर निकलने वालों का अब चोला ही बदल दिया। सब कुछ धरा का धरा रह गया है।

मनुष्य द्वारा अपनी सीमाओं का ऐसा अतिक्रमण हुआ कि शायद प्रकृति ने कुपित होकर हस्तक्षेप कर दिया। शायद इसी के कारण नौबत यह आ गई है कि बहुत से धंधे बन्द हो जाने वाले हैं। जैसे मास्क ने लिपस्टिक पर बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। जिससे स्त्रियों का साज-श्रृंगार अब किसी पार्टी की रौनक का मोहताज हो गया है। अब तो केवल रोज सुबह स्नान-ध्यान के बाद "सजना है मुझे सजना के लिए" का गीत ही गा सकती हैं। वो भी इस बात का ख्याल रखते हुए कि जैसे सौदागर फ़िल्म में इस गीत का हश्र हुआ वैसा यहाँ न हो जाय। देख लें कि उस मुए गुड़ जैसी कोई चीज चूल्हे पर जल तो नहीं रही। क्या पता कहीं श्रृंगार रस असावधानी वश अचानक वीभत्स रस में न परिवर्तित हो जाय। 

इसलिए अब यह संदेश सुनने का समय आ गया है कि अबसे प्रकृति की ओर लौट जाने में ही सबकी भलाई है।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 20, 2020

लॉकडाउन में अच्छे हैं

लॉकडाउन से पूर्व सुबह-सुबह किचेन में घुसने पर पूरा सिंक जूठे बर्तन से भरा मिलता था। कामवाली के इंतजार में किसी तरह एक कप चाय बनाकर धीरे-धीरे अखबार की खबरों को उसकी चुस्कियों में घोंटते उसपर अपना मंथन तबतक चलता था जबतक कामवाली काम कर के घर से चली न जाय।

महीने भर से कामवाली की छुट्टी चल रही है। अपनी आदत कुछ ऐसी पड़ गई है- सुबह सो के उठो तो अभी आधी नींद में ही झाड़ू कब हाथ में आ जाता है पता नहीं लगता। कभी-कभी भ्रम होता है कि हमने झाड़ू को उठाया या झाड़ू ने हमें। एक-दूसरे की इज्जत रखते हुए सारे कमरे में झाड़ू लग जाता है। बुहारन के नाम पर चिटकी भर धूल निकलती है। उसे ठिकाने लगा देना होता है। 

महीने भर से किसी का बाहर से बहुत आना-जाना नहीं हो रहा तो एकाध-दिन झाड़ू न भी लगाओ तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। ऐसा कई बार ख्याल आया भी कि आज झाड़ू रहने देती हूँ कि तभी सासू माँ की बात याद आ जाती है- कि घर में झाड़ू प्रतिदिन दिन उगने (सूर्योदय) से पूर्व लग जाना चाहिए। लक्ष्मीजी खुश रहती हैं। लब्बोलुआब ये कि सूर्योदय से पहले बहुरिया को बिस्तर छोड़ देना है!

वैसे सुबह उठने की आदत बहुत अच्छी होती है। बहुत सारा काम जल्दी निपट जाता है। किचेन में किसी भी वक्त अब सिंक में जूठा बर्तन नहीं रहता है। एक-एक कर के उसे तुरंत निकाल लिया जाता है। कुछ भी करने के बाद साबुन से हाथों की रगड़ाई में हाथ फँसा रहता है तो कभी-कभी चूल्हे की नॉब ऐंठने में देरी हो जाती है और देखते ही देखते दूध उबल कर पूरे स्लैब पर पसर जाता है। इससे काम और बढ़ जाता है। इधर सुबह, दोपहर, शाम  बर्तन साफ करते-करते हथेलियां इतनी रूखी हो गईं हैं जैसे- खरहरा। 

उपमा समझ में न आई हो तो बता दें कि अरहर के ठठ्ठर से बने लम्बे झाड़ू को हमारे यहाँ खरहरा कहते हैं। इससे हमारे गांव में दरवाजे पर बंधे गाय-गोरु का घोठ्ठा और खेत-खलिहान बुहारा जाता है। 

घर के बाकी सदस्यों का व्यवहार तो गज़ब के सुखद परिवर्तन के दर्शन करा रहा है। पहले प्रायः सभी गृहकार्य गृहिणी के हिस्से में रहते थे लेकिन अब झाड़ू, पोंछा,बर्तन, कपड़ा धुलाई, सब्जी काटना, आटा गूंथना, बिस्तर ठीक करना, कूड़ा फेंकना आदि सभी कार्यों का बंटवारा सहर्ष हो गया है। घर में बेहतर साफ सफाई के साथ हंसी-खुशी का महौल भी बेहतर हो गया है। यह सामाजिक दूरी के समय पारिवारिक सामीप्य का अद्भुत अनुभव है।

रात में जबतक बिस्तर पकड़ न लो शरीर से हाथों का सम्पर्क कोरोना के भय से लगभग टूटा रहता है। मतलब मेरी हथेलियां भी शरीर से सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखती हैं। हथेलियों की घिसाई के बाद इसपर सेनेटाइजर और बॉडी-लोशन का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। घर छोटा है तो काम आसान लगता है। कुछ भी हो, इस लॉकडाउन में देसी पकवान और धूप-अगरबत्ती के मिश्रण से घर की खुशबू बड़ी अच्छी लगती है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2020

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

कोरोना की महामारी में देश शाहीनबाग से उबरकर तब्लीगी मरकज़ में उलझा ही था कि अब बांद्रा स्टेशन पर जाकर फंस गया। यहाँ हजारों की संख्या में गुमराह मजदूर अपने घर जाने के जोश में भूल गए हैं कि जहाँ जाएंगे वहाँ जाकर उन्हें क्या हासिल होगा। साथ में अपने परिवार को भी कितनी बड़ी मुसीबत में डालने वाले हैं। जोश में होश गवां बैठे ये बेचारे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके खैरख्वाह उन्हें घर नहीं बल्कि सपरिवार उन्हें श्मशान भेजने की साजिश में लगे हैं। 

इन्हें नहीं मालूम कि इस लॉकडाउन के सहारे उनको तो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। इसके लिए उन्हें इन मूर्खों की जमात से बेहतर शिकार नहीं मिलेगा। अगर वे वास्तव में इनके सच्चे खैरख्वाह होते तो इस आपात स्थिति में इन मजदूरों को घर पहुंचाने की बात कर के गुमराह नहीं करते। यह समझने की जरूरत है कि वे सिर्फ उनके साथ ही नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ जनता के साथ भी बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर वे कहते कि जो जहाँ फंसा है वही रहे, उसके रहने खाने की व्यवस्था अगर सरकार नहीं कर पा रही है तो वे खुद करेंगे; तब उनकी दिलदारी समझ में आती। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। 

मजबूरी वश ही सही यहाँ इकठ्ठी भीड़ के लोग मजदूर हैं या किसी शातिर हाथ के खिलौने मात्र? ऐसा नहीं है तो, उनको घर पहुँचाने का ठेका लेने के बजाय वे सरकार से उनके रहने खाने की व्यवस्था की लड़ाई क्यों नहीं लड़ रहे? जो जहां है वहीं पर उनकी व्यवस्था कराने की बात क्यों नहीं की जा रही है? हे नियति के शिकार प्रवासियों, कम से कम अपनी नहीं तो अपने परिवार की चिंता करिये और अभी जो जहां है वहीं रहे, इसी में सबकी भलाई समझिए।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 6, 2020

पुकार में दम है।

मोदीजी, आप ने देख ही लिया कि देश की जनता आपकी पुकार पर कुछ भी करने को तैयार है। इसलिए आप सावधान हो जाइए। 
जनता तो ठहरी भोली-भाली! आप जितना करने को कहेंगे हमेशा उससे चार कदम आगे ही कर के धर देगी। बारह-तेरह दिन हो गए लॉक-डाउन हुए - इस दौरान घर बैठकर इसने जितना खाया है उतना कहीं खर्च नहीं हुआ है। सारी ऊर्जा इकठ्ठा होकर कसमसा रही है। कल आपने एक-एक दीपक, मोमबत्ती या टॉर्च जलाने को कहा था और लोगों ने पूरा आकाश ही रौशन कर दिया। गगनचुम्बी आतिशबाजी की चकाचौंध देर तक इनकी बढ़ी हुई ऊर्जा का प्रदर्शन करती रही। इससे पहले आपने कहा था कि घर के खिड़की, दरवाजे या बालकनी से ही ताली-थाली बजायी जाय। लेकिन उत्साही जनता ने घंटा-घड़ियाल, ढोल-मजीरा, तुरही-भोंपू और शंख-पिपिहरी बजाते हुए पूरा जुलूस ही निकाल दिया।

ऐसे में मेरा आपसे एक अनुरोध है। आपको अपनी प्रजा से कुछ भी करवाना हो तो उससे थोड़ा कम करके बताइए। तभी बात बनेगी। आप कहेंगे मेरे प्यारे देशवासियो! योग करने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, आज आप सावधान की मुद्रा में खड़े रहिये तो जनता शीर्षासन करने लगेगी। कहीं आपने उसे गलती से शीर्षासन करने को कह दिया तो वे पूरा आसमान अपने सिर पर उठा लेगी। आप अब जान ही लीजिए। इस समय जनता हनुमान जी की तरह संजीवनी की तलाश में पूरा पहाड़ उखाड़कर अपने सिर पर उठा लेने को तैयार बैठी है। बाकी आपको क्या बताना! समझदार तो गजब के हैं। अद्भुत टाइप।

सोचा इतना कह दें, वैसे तुम्हरी लीला तुमही जानों। 🙏
(रचना त्रिपाठी)

Friday, January 17, 2020

नइहर के नेवता

       कादम्बिनी पत्रिका में 'नइहर के नेवता'
अपनी भतीजी वृंदा की शादी में सितली फुआ अपने गवने के पैंतीस-चालीस साल बाद पहली बार नइहर लौट रही थीं। इस बीच वे बहू-बेटों, नाती-नतकुर वाली हो गयी थीं। नइहर से सैकड़ों मील दूर उनकी ससुराल थी। उन दिनों आने-जाने के साधन कम थे और सामर्थ्य भी नहीं रही इस नाते तबसे अबतक वो मायके आ न सकीं थीं। आती भी कैसे भला? बाबा अपने में ही ताधड़ाम थे। जब एक बेटी को ब्याह रहे होते तो तभी अम्मा दूसरी को जन्म दे रही होती। यह सिलसिला खत्म ही नहीं होता।

अलबत्ता उनके पास जब कभी थोड़ी व्यवस्था बन जाती तो बेटियों के घर कहांर से भार भेजवा दिया करते थे। भार में रखी खाद्य सामग्री जैसे दही, चिउड़ा, कटहल, केला, कसार और वस्त्र आदि को वहाँ तक पहुँचने में भी कई दिन लग जाते थे। सितली फुआ के नइहर-सासुर की आर्थिक स्थिति 'जो गति तोरी सो गति मोरी' जैसी थी। दोनों एक दूसरे का मर्म भली-भांति जानते थे। इसलिए न तो बाबा को अपनी बेटी को कभी न बुला पाने का ज्यादा मलाल रहा और ना ही सीतली फुआ को उनसे इसकी कोई शिकायत रही।

समय बीतता गया और अब उनके बहू-बेटों का जमाना आ गया था। इस बार नेवता आया तो उन्होंने मां को नइहर भेजने में तनिक भी आना-कानी नहीं की। वैसे भी इस नेवते में उनकी टेंट से कुछ लगना नहीं था और अब काम ही क्या था उनका वहाँ जो वे उन्हे मना करते।

बड़े दिनों बाद शीतला देवी नइहर चली थी तो उनका शौक भी कुछ ज्यादा चर्राया था और जोश भी ख़ूब भरपूर था। आज सितली फुआ ने पाई-पाई जोड़कर वर्षों से इकठ्ठा किये हुए अपने चुरौंधे की पूरी गठरी  खोल दिया। वे अपनी छोटकी भउजी की तेजी का बखान लोगों के मुँह से सुन रखी थीं। रिश्तों में लेन-देन की उनके गणित के आगे आज तक कोई टिका नहीं था। भउजी शहर में पढ़ी-लिखी थी। घर में सभी उनका लोहा मानते थे। इसलिए सितली फुआ ने भी अपनी ओर से शादी की तैयारी में भरसक कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वे जानती थीं कि भउजी का हिसाब बड़ा पक्का था। उन्होंने अपने आस-पड़ोस से लेकर नात-रिश्तेदार तक व्यवहार के लेन-देन में किसने, कब, किसको, क्या-क्या लिया-दिया उसकी बाकायदा एक डायरी बना रखी थी। उनके बारे में आम धारणा थी कि वो फटक के देती हैं और फटक के ले भी लेती हैं। इसलिए सितली बुआ ने अपनी औकात से अधिक तैयारी की थी।
रेलगाड़ी से छत्तीस घंटे लंबी यात्रा में उनके हजारों रुपये तो किराये-भाड़े में खर्च हो गये। अपनी भतीजी के वास्ते नेवते की साड़ी-साया-ब्लाउज का सेट और उसपर चूड़ी, बिंदी, सिंदूर और एक जोड़ी बिछिया भी रख ली थीं। उनकी लंबी गैर-मौजूदगी के दौरान आई हुई नई-नवेली और अब बाल-बच्चेदार हो चुकी दुलहिनों को मुंह-दिखाई देने के लिए कुछ न कुछ खरीद के रख लिया था। अबतक जितना अपने पास चुरा-पचरा के जुटा रखी थीं लगभग सबकुछ इस नइहर के नेवता पर न्यौछावर कर डाली थीं। बड़ी मुश्किल से तो उनका यहाँ आने का संयोग बन पाया था। आखिर लम्बा इंतजार खत्म हुआ था और वो रिक्शे से उतरकर नइहर के द्वार पर खड़ी थीं। द्वार पर नजर टिकी तो उन्हें अपने पुराने नइहर में पहले जैसा कुछ भी नहीं दिखा।पूरा नजारा ही बदल गया था। न तो वह छान्ह का पुराना घर था न चचरा और न ही दुआर पर गाय-गोरू। सब अलोप। उन्हें लगा कि वो भटक कर किसी और गांव में आ गई हैं लेकिन दुआर पर खड़े बूढ़े पीपल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि यह उनके बाबा का गाँव ही है।

दरवाजे पर पहुँचते ही सामने बरामदे में तख्त पर बैठे बाबा का ठेहुना पकड़ चिघ्घाड़ मार कर रोने लगीं। इस तरह रोने की आवाज चौखठ के भीतर गयी तो सबको समझते देर न लगी कि सितली फुआ पधार चुकी हैं। घर के लड़के और मर्द बाहर आ गये और महिलाएं किवाड़ के पीछे दोगहा में जमा होकर उनका करुण- क्रंदन देखने लगीं। जब यह विलाप लम्बा खिंचने लगा तो वृंदा अपनी माँ से बुदबुदाते हुए बोली, "कहो न फुआ से बहुत हो गया अब चुप हो जाय... ये सब नाटक हमसे न होगा, माँ... बता देती हूँ...!" दूर खड़े शादी में आये रिश्तेदारों के छोटे-छोटे बच्चे सोच में पड़ गये। लगता है बूढ़ी फुआ जी को रास्ते में पुलिस ने मारा है इसलिये वो इतनी जोर से रो रही हैं। उन्हें क्या पता था कि उन दिनों लड़कियों को अपने ससुराल से मायके आने-जाने पर घर के पुरुष सदस्यों का पैर और महिलाओं का अँकवार पकड़  कर रो लेने की प्रथा थी। इसीलिए उनको इस प्रथा का निर्वाह करते देखकर वृंदा कि नाक-भौं चढ़ गई थी। अब उसकी वहाँ से विदा होने की बारी जो थी।

इस एकतरफा विलाप में फुआ की आँखों से जितनी अश्रुधारा बही थी शायद उतना ही उनपर  वृंदा का मन व्यथित हुआ था। उसे तो रोने का कोई अभ्यास ही नहीं था और वहाँ शादी में आये रिश्तेदारों में काका, मामा और भइया लोगों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। वह इस चुनौती से निपटने के बारे में सोच ही रही थी कि बाबा के तख्त से चिपका खड़ा नटखट निक्कू टुन्न से बोला, "तुम भी सीख लो, दीदी... विदाई के वक्त कैसे रोते हैं... सुना है कि जो लड़की अपनी विदाई पर जितना जोर-जोर से चिल्लाकर रोती है उसका मायका प्रेम उतना ही ज्यादा गहरा होता है।" वृंदा परेशान हो गयी। लेकिन वहाँ क्या कर सकती थी बेचारी, अपनी माँ को घूरने और झन्न-पट्ट करने के सिवाय।

बाबा की याददाश्त और नजरें दोनों कमजोर हो गयी थीं। उनका हाथ-पैर भी बेदम झूल रहा था। उन बूढ़ी टांगों पर फुआ की मोटी, थुल-थुल काया का भार असह्य हो रहा था। जब वह मन भर रो लीं तब बाबा बोले– "कउन ह रे?" 
फुआ की आंखों पर एक मोटा चश्मा चढ़ चुका था, परन्तु अकल पर अभी नहीं। वो भी तुरन्त समझ गयीं कि बाबा अब सठिया गये हैं। सट्ट से चुप हो गईं। बोली, " हsम, बाबा... सीतली... चीन्हत नाइ हउव?"

सुना था अपनी विदाई के वक्त फुआ जब डोली में चढ़ रही थीं तब भी इसी प्रकार ख़ूब टेहक्का कढ़ा-कढ़ा के रोयी थीं। पक्का उस समय अन्य ब्याहता लड़कियों के मुकाबले सितली फुआ के मायका-प्रेम का आंकड़ा सबसे अव्वल रहा होगा।

रोना-धोना पूरा हुआ तो फुआ ने अपनी पेटी खोली और सबको उपहार बांटा। वे जो साड़ी वृंदा के लिए लायी थीं वो छोटकी भउजी को फूटी आँख न सुहाई। उसे लेकर वह घर में आए सभी मेहमानों के सामने आँखें मटका-मटका कर इशारे से यह बताए जा रही थीं कि सितली फुआ वृंदा के लिए यही तीन सौ रुपये की साड़ी लायी हैं। जिस 'साध' से सितली फुआ ने यह नेग-नेवचार किया था उसकी धज्जियां उड़ रही थीं। भउजी फिर वृंदा के पास जाकर उसे साड़ी दिखाते हुए बोलीं– "जिज्जी को इतने के लिए वहाँ से यहाँ तक इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत थी...? नाउन के पहनने लायक भी तो यह साड़ी नहीं है... इससे अच्छा होता कि वहाँ से नेवते में एक लिफाफा ही भेज देतीं... मेरे किसी काम तो आता... "जेतना के कनिया नाहीं ओतना कहांरी"।

संझा-पराती का समय था। गीत गा रही महिलाओं के समूह में चकरा के बैठी सितली फुआ के कानों तक यह बात पहुँच गई। यह सुनकर वह सन्न रह गई। उनका कलेजा मुंह को आने लगा। कितने अरमान पाल रखे थी इस दिन के लिए! यहाँ एक-एक पल बिताना अब उनके लिए पहाड़ लग रहा था। पूरी शादी भर छुप-छुप कर रोती रही थीं।

शादी के अगले दिन जब वृंदा की विदाई हो रही थी तो भउजी उसकी सहेलियों को समझा रही थीं कि– "देखना कोई इससे लिपट-चिपट के ना रोये, नहीं तो इसका सारा मेकअप खराब हो जाएगा।" उधर सितली फुआ की आँखे बढ़ियाई जा रही थीं। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। चश्मा उठा-उठाकर उन्हें अपनी हथेलियों से बार-बार काछे जा रही थीं। उधर वृंदा के सपनों की डोली उठी और इधर सितली फुआ के वर्षो के अरमानों का जनाजा। अपने हिया की पीर  वो कहतीं भी किससे?

(रचना त्रिपाठी)