Monday, April 20, 2020

लॉकडाउन में अच्छे हैं

लॉकडाउन से पूर्व सुबह-सुबह किचेन में घुसने पर पूरा सिंक जूठे बर्तन से भरा मिलता था। कामवाली के इंतजार में किसी तरह एक कप चाय बनाकर धीरे-धीरे अखबार की खबरों को उसकी चुस्कियों में घोंटते उसपर अपना मंथन तबतक चलता था जबतक कामवाली काम कर के घर से चली न जाय।

महीने भर से कामवाली की छुट्टी चल रही है। अपनी आदत कुछ ऐसी पड़ गई है- सुबह सो के उठो तो अभी आधी नींद में ही झाड़ू कब हाथ में आ जाता है पता नहीं लगता। कभी-कभी भ्रम होता है कि हमने झाड़ू को उठाया या झाड़ू ने हमें। एक-दूसरे की इज्जत रखते हुए सारे कमरे में झाड़ू लग जाता है। बुहारन के नाम पर चिटकी भर धूल निकलती है। उसे ठिकाने लगा देना होता है। 

महीने भर से किसी का बाहर से बहुत आना-जाना नहीं हो रहा तो एकाध-दिन झाड़ू न भी लगाओ तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। ऐसा कई बार ख्याल आया भी कि आज झाड़ू रहने देती हूँ कि तभी सासू माँ की बात याद आ जाती है- कि घर में झाड़ू प्रतिदिन दिन उगने (सूर्योदय) से पूर्व लग जाना चाहिए। लक्ष्मीजी खुश रहती हैं। लब्बोलुआब ये कि सूर्योदय से पहले बहुरिया को बिस्तर छोड़ देना है!

वैसे सुबह उठने की आदत बहुत अच्छी होती है। बहुत सारा काम जल्दी निपट जाता है। किचेन में किसी भी वक्त अब सिंक में जूठा बर्तन नहीं रहता है। एक-एक कर के उसे तुरंत निकाल लिया जाता है। कुछ भी करने के बाद साबुन से हाथों की रगड़ाई में हाथ फँसा रहता है तो कभी-कभी चूल्हे की नॉब ऐंठने में देरी हो जाती है और देखते ही देखते दूध उबल कर पूरे स्लैब पर पसर जाता है। इससे काम और बढ़ जाता है। इधर सुबह, दोपहर, शाम  बर्तन साफ करते-करते हथेलियां इतनी रूखी हो गईं हैं जैसे- खरहरा। 

उपमा समझ में न आई हो तो बता दें कि अरहर के ठठ्ठर से बने लम्बे झाड़ू को हमारे यहाँ खरहरा कहते हैं। इससे हमारे गांव में दरवाजे पर बंधे गाय-गोरु का घोठ्ठा और खेत-खलिहान बुहारा जाता है। 

घर के बाकी सदस्यों का व्यवहार तो गज़ब के सुखद परिवर्तन के दर्शन करा रहा है। पहले प्रायः सभी गृहकार्य गृहिणी के हिस्से में रहते थे लेकिन अब झाड़ू, पोंछा,बर्तन, कपड़ा धुलाई, सब्जी काटना, आटा गूंथना, बिस्तर ठीक करना, कूड़ा फेंकना आदि सभी कार्यों का बंटवारा सहर्ष हो गया है। घर में बेहतर साफ सफाई के साथ हंसी-खुशी का महौल भी बेहतर हो गया है। यह सामाजिक दूरी के समय पारिवारिक सामीप्य का अद्भुत अनुभव है।

रात में जबतक बिस्तर पकड़ न लो शरीर से हाथों का सम्पर्क कोरोना के भय से लगभग टूटा रहता है। मतलब मेरी हथेलियां भी शरीर से सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखती हैं। हथेलियों की घिसाई के बाद इसपर सेनेटाइजर और बॉडी-लोशन का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। घर छोटा है तो काम आसान लगता है। कुछ भी हो, इस लॉकडाउन में देसी पकवान और धूप-अगरबत्ती के मिश्रण से घर की खुशबू बड़ी अच्छी लगती है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2020

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

कोरोना की महामारी में देश शाहीनबाग से उबरकर तब्लीगी मरकज़ में उलझा ही था कि अब बांद्रा स्टेशन पर जाकर फंस गया। यहाँ हजारों की संख्या में गुमराह मजदूर अपने घर जाने के जोश में भूल गए हैं कि जहाँ जाएंगे वहाँ जाकर उन्हें क्या हासिल होगा। साथ में अपने परिवार को भी कितनी बड़ी मुसीबत में डालने वाले हैं। जोश में होश गवां बैठे ये बेचारे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके खैरख्वाह उन्हें घर नहीं बल्कि सपरिवार उन्हें श्मशान भेजने की साजिश में लगे हैं। 

इन्हें नहीं मालूम कि इस लॉकडाउन के सहारे उनको तो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। इसके लिए उन्हें इन मूर्खों की जमात से बेहतर शिकार नहीं मिलेगा। अगर वे वास्तव में इनके सच्चे खैरख्वाह होते तो इस आपात स्थिति में इन मजदूरों को घर पहुंचाने की बात कर के गुमराह नहीं करते। यह समझने की जरूरत है कि वे सिर्फ उनके साथ ही नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ जनता के साथ भी बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर वे कहते कि जो जहाँ फंसा है वही रहे, उसके रहने खाने की व्यवस्था अगर सरकार नहीं कर पा रही है तो वे खुद करेंगे; तब उनकी दिलदारी समझ में आती। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। 

मजबूरी वश ही सही यहाँ इकठ्ठी भीड़ के लोग मजदूर हैं या किसी शातिर हाथ के खिलौने मात्र? ऐसा नहीं है तो, उनको घर पहुँचाने का ठेका लेने के बजाय वे सरकार से उनके रहने खाने की व्यवस्था की लड़ाई क्यों नहीं लड़ रहे? जो जहां है वहीं पर उनकी व्यवस्था कराने की बात क्यों नहीं की जा रही है? हे नियति के शिकार प्रवासियों, कम से कम अपनी नहीं तो अपने परिवार की चिंता करिये और अभी जो जहां है वहीं रहे, इसी में सबकी भलाई समझिए।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, April 6, 2020

पुकार में दम है।

मोदीजी, आप ने देख ही लिया कि देश की जनता आपकी पुकार पर कुछ भी करने को तैयार है। इसलिए आप सावधान हो जाइए। 
जनता तो ठहरी भोली-भाली! आप जितना करने को कहेंगे हमेशा उससे चार कदम आगे ही कर के धर देगी। बारह-तेरह दिन हो गए लॉक-डाउन हुए - इस दौरान घर बैठकर इसने जितना खाया है उतना कहीं खर्च नहीं हुआ है। सारी ऊर्जा इकठ्ठा होकर कसमसा रही है। कल आपने एक-एक दीपक, मोमबत्ती या टॉर्च जलाने को कहा था और लोगों ने पूरा आकाश ही रौशन कर दिया। गगनचुम्बी आतिशबाजी की चकाचौंध देर तक इनकी बढ़ी हुई ऊर्जा का प्रदर्शन करती रही। इससे पहले आपने कहा था कि घर के खिड़की, दरवाजे या बालकनी से ही ताली-थाली बजायी जाय। लेकिन उत्साही जनता ने घंटा-घड़ियाल, ढोल-मजीरा, तुरही-भोंपू और शंख-पिपिहरी बजाते हुए पूरा जुलूस ही निकाल दिया।

ऐसे में मेरा आपसे एक अनुरोध है। आपको अपनी प्रजा से कुछ भी करवाना हो तो उससे थोड़ा कम करके बताइए। तभी बात बनेगी। आप कहेंगे मेरे प्यारे देशवासियो! योग करने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, आज आप सावधान की मुद्रा में खड़े रहिये तो जनता शीर्षासन करने लगेगी। कहीं आपने उसे गलती से शीर्षासन करने को कह दिया तो वे पूरा आसमान अपने सिर पर उठा लेगी। आप अब जान ही लीजिए। इस समय जनता हनुमान जी की तरह संजीवनी की तलाश में पूरा पहाड़ उखाड़कर अपने सिर पर उठा लेने को तैयार बैठी है। बाकी आपको क्या बताना! समझदार तो गजब के हैं। अद्भुत टाइप।

सोचा इतना कह दें, वैसे तुम्हरी लीला तुमही जानों। 🙏
(रचना त्रिपाठी)

Friday, January 17, 2020

नइहर के नेवता

       कादम्बिनी पत्रिका में 'नइहर के नेवता'
अपनी भतीजी वृंदा की शादी में सितली फुआ अपने गवने के पैंतीस-चालीस साल बाद पहली बार नइहर लौट रही थीं। इस बीच वे बहू-बेटों, नाती-नतकुर वाली हो गयी थीं। नइहर से सैकड़ों मील दूर उनकी ससुराल थी। उन दिनों आने-जाने के साधन कम थे और सामर्थ्य भी नहीं रही इस नाते तबसे अबतक वो मायके आ न सकीं थीं। आती भी कैसे भला? बाबा अपने में ही ताधड़ाम थे। जब एक बेटी को ब्याह रहे होते तो तभी अम्मा दूसरी को जन्म दे रही होती। यह सिलसिला खत्म ही नहीं होता।

अलबत्ता उनके पास जब कभी थोड़ी व्यवस्था बन जाती तो बेटियों के घर कहांर से भार भेजवा दिया करते थे। भार में रखी खाद्य सामग्री जैसे दही, चिउड़ा, कटहल, केला, कसार और वस्त्र आदि को वहाँ तक पहुँचने में भी कई दिन लग जाते थे। सितली फुआ के नइहर-सासुर की आर्थिक स्थिति 'जो गति तोरी सो गति मोरी' जैसी थी। दोनों एक दूसरे का मर्म भली-भांति जानते थे। इसलिए न तो बाबा को अपनी बेटी को कभी न बुला पाने का ज्यादा मलाल रहा और ना ही सीतली फुआ को उनसे इसकी कोई शिकायत रही।

समय बीतता गया और अब उनके बहू-बेटों का जमाना आ गया था। इस बार नेवता आया तो उन्होंने मां को नइहर भेजने में तनिक भी आना-कानी नहीं की। वैसे भी इस नेवते में उनकी टेंट से कुछ लगना नहीं था और अब काम ही क्या था उनका वहाँ जो वे उन्हे मना करते।

बड़े दिनों बाद शीतला देवी नइहर चली थी तो उनका शौक भी कुछ ज्यादा चर्राया था और जोश भी ख़ूब भरपूर था। आज सितली फुआ ने पाई-पाई जोड़कर वर्षों से इकठ्ठा किये हुए अपने चुरौंधे की पूरी गठरी  खोल दिया। वे अपनी छोटकी भउजी की तेजी का बखान लोगों के मुँह से सुन रखी थीं। रिश्तों में लेन-देन की उनके गणित के आगे आज तक कोई टिका नहीं था। भउजी शहर में पढ़ी-लिखी थी। घर में सभी उनका लोहा मानते थे। इसलिए सितली फुआ ने भी अपनी ओर से शादी की तैयारी में भरसक कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वे जानती थीं कि भउजी का हिसाब बड़ा पक्का था। उन्होंने अपने आस-पड़ोस से लेकर नात-रिश्तेदार तक व्यवहार के लेन-देन में किसने, कब, किसको, क्या-क्या लिया-दिया उसकी बाकायदा एक डायरी बना रखी थी। उनके बारे में आम धारणा थी कि वो फटक के देती हैं और फटक के ले भी लेती हैं। इसलिए सितली बुआ ने अपनी औकात से अधिक तैयारी की थी।
रेलगाड़ी से छत्तीस घंटे लंबी यात्रा में उनके हजारों रुपये तो किराये-भाड़े में खर्च हो गये। अपनी भतीजी के वास्ते नेवते की साड़ी-साया-ब्लाउज का सेट और उसपर चूड़ी, बिंदी, सिंदूर और एक जोड़ी बिछिया भी रख ली थीं। उनकी लंबी गैर-मौजूदगी के दौरान आई हुई नई-नवेली और अब बाल-बच्चेदार हो चुकी दुलहिनों को मुंह-दिखाई देने के लिए कुछ न कुछ खरीद के रख लिया था। अबतक जितना अपने पास चुरा-पचरा के जुटा रखी थीं लगभग सबकुछ इस नइहर के नेवता पर न्यौछावर कर डाली थीं। बड़ी मुश्किल से तो उनका यहाँ आने का संयोग बन पाया था। आखिर लम्बा इंतजार खत्म हुआ था और वो रिक्शे से उतरकर नइहर के द्वार पर खड़ी थीं। द्वार पर नजर टिकी तो उन्हें अपने पुराने नइहर में पहले जैसा कुछ भी नहीं दिखा।पूरा नजारा ही बदल गया था। न तो वह छान्ह का पुराना घर था न चचरा और न ही दुआर पर गाय-गोरू। सब अलोप। उन्हें लगा कि वो भटक कर किसी और गांव में आ गई हैं लेकिन दुआर पर खड़े बूढ़े पीपल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि यह उनके बाबा का गाँव ही है।

दरवाजे पर पहुँचते ही सामने बरामदे में तख्त पर बैठे बाबा का ठेहुना पकड़ चिघ्घाड़ मार कर रोने लगीं। इस तरह रोने की आवाज चौखठ के भीतर गयी तो सबको समझते देर न लगी कि सितली फुआ पधार चुकी हैं। घर के लड़के और मर्द बाहर आ गये और महिलाएं किवाड़ के पीछे दोगहा में जमा होकर उनका करुण- क्रंदन देखने लगीं। जब यह विलाप लम्बा खिंचने लगा तो वृंदा अपनी माँ से बुदबुदाते हुए बोली, "कहो न फुआ से बहुत हो गया अब चुप हो जाय... ये सब नाटक हमसे न होगा, माँ... बता देती हूँ...!" दूर खड़े शादी में आये रिश्तेदारों के छोटे-छोटे बच्चे सोच में पड़ गये। लगता है बूढ़ी फुआ जी को रास्ते में पुलिस ने मारा है इसलिये वो इतनी जोर से रो रही हैं। उन्हें क्या पता था कि उन दिनों लड़कियों को अपने ससुराल से मायके आने-जाने पर घर के पुरुष सदस्यों का पैर और महिलाओं का अँकवार पकड़  कर रो लेने की प्रथा थी। इसीलिए उनको इस प्रथा का निर्वाह करते देखकर वृंदा कि नाक-भौं चढ़ गई थी। अब उसकी वहाँ से विदा होने की बारी जो थी।

इस एकतरफा विलाप में फुआ की आँखों से जितनी अश्रुधारा बही थी शायद उतना ही उनपर  वृंदा का मन व्यथित हुआ था। उसे तो रोने का कोई अभ्यास ही नहीं था और वहाँ शादी में आये रिश्तेदारों में काका, मामा और भइया लोगों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। वह इस चुनौती से निपटने के बारे में सोच ही रही थी कि बाबा के तख्त से चिपका खड़ा नटखट निक्कू टुन्न से बोला, "तुम भी सीख लो, दीदी... विदाई के वक्त कैसे रोते हैं... सुना है कि जो लड़की अपनी विदाई पर जितना जोर-जोर से चिल्लाकर रोती है उसका मायका प्रेम उतना ही ज्यादा गहरा होता है।" वृंदा परेशान हो गयी। लेकिन वहाँ क्या कर सकती थी बेचारी, अपनी माँ को घूरने और झन्न-पट्ट करने के सिवाय।

बाबा की याददाश्त और नजरें दोनों कमजोर हो गयी थीं। उनका हाथ-पैर भी बेदम झूल रहा था। उन बूढ़ी टांगों पर फुआ की मोटी, थुल-थुल काया का भार असह्य हो रहा था। जब वह मन भर रो लीं तब बाबा बोले– "कउन ह रे?" 
फुआ की आंखों पर एक मोटा चश्मा चढ़ चुका था, परन्तु अकल पर अभी नहीं। वो भी तुरन्त समझ गयीं कि बाबा अब सठिया गये हैं। सट्ट से चुप हो गईं। बोली, " हsम, बाबा... सीतली... चीन्हत नाइ हउव?"

सुना था अपनी विदाई के वक्त फुआ जब डोली में चढ़ रही थीं तब भी इसी प्रकार ख़ूब टेहक्का कढ़ा-कढ़ा के रोयी थीं। पक्का उस समय अन्य ब्याहता लड़कियों के मुकाबले सितली फुआ के मायका-प्रेम का आंकड़ा सबसे अव्वल रहा होगा।

रोना-धोना पूरा हुआ तो फुआ ने अपनी पेटी खोली और सबको उपहार बांटा। वे जो साड़ी वृंदा के लिए लायी थीं वो छोटकी भउजी को फूटी आँख न सुहाई। उसे लेकर वह घर में आए सभी मेहमानों के सामने आँखें मटका-मटका कर इशारे से यह बताए जा रही थीं कि सितली फुआ वृंदा के लिए यही तीन सौ रुपये की साड़ी लायी हैं। जिस 'साध' से सितली फुआ ने यह नेग-नेवचार किया था उसकी धज्जियां उड़ रही थीं। भउजी फिर वृंदा के पास जाकर उसे साड़ी दिखाते हुए बोलीं– "जिज्जी को इतने के लिए वहाँ से यहाँ तक इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत थी...? नाउन के पहनने लायक भी तो यह साड़ी नहीं है... इससे अच्छा होता कि वहाँ से नेवते में एक लिफाफा ही भेज देतीं... मेरे किसी काम तो आता... "जेतना के कनिया नाहीं ओतना कहांरी"।

संझा-पराती का समय था। गीत गा रही महिलाओं के समूह में चकरा के बैठी सितली फुआ के कानों तक यह बात पहुँच गई। यह सुनकर वह सन्न रह गई। उनका कलेजा मुंह को आने लगा। कितने अरमान पाल रखे थी इस दिन के लिए! यहाँ एक-एक पल बिताना अब उनके लिए पहाड़ लग रहा था। पूरी शादी भर छुप-छुप कर रोती रही थीं।

शादी के अगले दिन जब वृंदा की विदाई हो रही थी तो भउजी उसकी सहेलियों को समझा रही थीं कि– "देखना कोई इससे लिपट-चिपट के ना रोये, नहीं तो इसका सारा मेकअप खराब हो जाएगा।" उधर सितली फुआ की आँखे बढ़ियाई जा रही थीं। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। चश्मा उठा-उठाकर उन्हें अपनी हथेलियों से बार-बार काछे जा रही थीं। उधर वृंदा के सपनों की डोली उठी और इधर सितली फुआ के वर्षो के अरमानों का जनाजा। अपने हिया की पीर  वो कहतीं भी किससे?

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 8, 2019

गुलाम हो या आजाद?

तू आजाद बताता खुद को
नबी गुलाम ये बात बता।
कश्मीरी को कहे बिकाऊ
पर खुद की औकात बता।।

किया गुलामी खानदान का
जो नेहरू ने छोड़ा था।
घाटी से ना जीत सका
तू सबसे बड़ा भगोड़ा था।।

बेच दिया तूने जमीर जब
पाकिस्तानी हाथों में।
देशद्रोह की झलक दिखी है
तेरी ठरकी बातों में।।

कितनी कीमत में तूने
बेची है अपनी आजादी
ऐ गुलाम पाकी पिठ्ठू
कितने में पार्टी बिकवा दी

राजनीति के व्यापारी
तेरी कुछ ऐसी संगत है।
क्रय-विक्रय की राजनीति में
तू सबसे पारंगत है।।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 1, 2019

जमाने की छुआ-छूत

अभी एक सज्जन जिन्होंने #zomato के अपने खाने का ऑर्डर इसलिए कैंसिल कर दिया क्योंकि डिलीवरी बॉय उनके पसंदीदा धर्म का नहीं था। इससे हमें एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। कई दशक पहले अपने बचपन की बात बता रही हूँ। मेरे घर में एक बड़की माई थीं, जो किसी का छुआ नहीं खाती थी, न ही किसी को अपनी रसोई में बिना नहाए घुसने की इजाजत देती थी। भोजन करने की घर में चाहे जितनी तेजी मची हो किन्तु वह किसी को अपनी बनाई रसोई छूने नहीं देती थीं। वे खाना खुद ही परोसती और सबको खिलाने के बाद अपने खाती थीं। रसोई की साफ-सफाई के मामले में उन्हें अपने सिवाय किसी पर भरोसा नहीं था। और तो और, भोजन बनाते वक्त बिना ब्लाउज के साड़ी लपेटे रहती थीं। पूछने पर कहती थी दर्जी मुसलमान होते हैं इसलिए वह उनका सिला कपड़ा नहीं पहनती हैं।

छुआ-छूत बहुत मानती थी। उनका धर्म भ्रष्ट न हो इसलिए वह पूरी जिंदगी इसी तरह रहीं। जब किसी सफर में होती थीं तो अपने पास थोड़ा चूड़ा-चीनी गठिया के रख लेती थीं। कहीं किसी आयोजन में जाने पर साड़ी की मैचिंग पेटीकोट का कपड़ा अपनी कमर में लपेट कर उसके दोनों छोरो को पकड़ कर आपस में गांठ बांध लेती थी, जिससे साड़ी पहनने में आसानी हो जाती थी। घर वालों के लाख समझाने के बावजूद उनका पूरा जीवन इसी प्रकार कटा। जिनको खाने की बड़ी तेजी मची रहती थी वे स्टोव पर रसोईघर से बाहर नमक डालकर गीलभात, खिचड़ी, अंडा, ऑमलेट बनाकर खा लिया करते और अपने काम पर निकल जाया करते थे। तब वहाँ #zomato या #swiggy जैसी सुविधाएं नहीं थी, नहीं तो शायद तब वे भी उसी से ऑर्डर कर के कुछ खाने का आइटम मंगवा लिया करते, जैसा कि अब वे भी अक्सर यही कर लिया करते हैं। घर के बाकी लोगों का इससे कोई लेना-लादना नहीं है कि zomato सर्विस कौन दे रहा है; उसके कर्मचारी हिंदू हैं या मुस्लिम; उसका रसोइया किस धर्म अथवा जाति का है? लेकिन बड़की माई के सिद्धांत के विरुद्ध कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ा। क्योंकि वह खुद बहुत बड़ी तपस्या कर रही थीं।

अपनी सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर जाड़ा-गर्मी-बरसात सब कुछ सहती रहीं लेकिन अपने सिद्धान्त से कभी कोई समझौता नहीं किया। बल्कि पूरा परिवार उनके इस त्याग के साथ सहानुभूति रखता रहा। क्योंकि जिस दिन वह भोजन स्वयं नहीं बनाती थी उस दिन वह दूध-दही फल-मूल खाकर पूरे दिन रह जाती थीं लेकिन सुविधानुसार प्राप्त किसी भी प्रकार का सुस्वाद भोजन करना उन्हें स्वीकार नहीं था। आप सोच रहे होंगे कि वह कितनी पाखण्डी थी! परन्तु मैं इसे उनका अपने धर्म और शुचिता के प्रति अंधविश्वास ही सही एक प्रकार का समर्पण मानती हूं। अपने इस व्यवहार से उन्हें खुद भी बहुत तकलीफ़ उठानी पड़ी थी। लेकिन उन्होंने परिवार के किसी भी सदस्य को किसी का छुआ खाने अथवा कुछ भी खाने से नहीं रोका। उनका मानना था कि 'उठाया' हुआ भोजन मतलब– जो चीज बनाई कहीं और जाय और उसे वहाँ से उठाकर कहीं दूर ले जाकर परोसा जाय तो वह भोजन अशुद्ध हो जाता है।

आजकल बने-बनाये खाने को ऑनलाइन ऑर्डर से मंगाकर खाने-खिलाने का चलन जोर पर है। उस खाने की तैयारी में कई तरह के लोग लगे रहते हैं। किसने देखा उन्हें नहाते जो लोग इसमें शामिल है? छुआ-छूत की बात अभी यहाँ छोड़ दीजिए, लेकिन जिस भोजन को अपनी आंखों के सामने बनते न देखा गया हो उसकी निरापद शुद्धता (हाइजीन) की क्या गारंटी है? इसलिए, जो लोग #zomato, #swiggy, या किसी रेस्तरां में जाकर खाना पसंद करते हैं उन्हें भोज्य पदार्थों की तैयारी से विभिन्न स्तरों पर जुड़े व्यक्तियों की जाति, धर्म या सामाजिक प्रास्थिति पर प्रश्न उठाने का कोई हक नहीं है। परहेज करना है तो बड़की माई की तरह करिये वर्ना ऐसी मूर्खता का परिचय मत दीजिये।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 13, 2019

जब तुम भागोगी

हम ताली बजायेंगे
तब, जब तुम
भागोगी!
तुम आजाद हो
भागो,
तेज भागो,
और तेज भागो,
हम गर्व करेंगे
तुम्हारे भागने पर,
शोर-शराबे भी करेंगे,
ताली भी खूब बजायेंगे,
जब तुम भागोगी,
पर ऐसे नहीं
हमारी, द्युतिचन्द की तरह।

(रचना त्रिपाठी)