Wednesday, December 4, 2013

पुलिस की रासलीला

जानलेवा हमले और बलवा कराने के आरोप में उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा को पकड़ पाने में असफल रहने पर कोर्ट ने उनकी संम्पत्ति कुर्क करने का आदेश दिया था। अब खबर छपी है कि विधायक जी को गिरफ्तार करने में असफल रहने वाली पुलिस विधायक जी के घरपर आयोजित ऐटहोम समारोह में बाकायदा मौजूद थी और राज्य सरकार के कद्दावर मन्त्री शिवपाल सिंह यादव जी भी दावत में शामिल थे। दैनिक जागरण की आज (03 दिसंबर) की इस खबर को पढ़कर यह तो स्पष्ट दिख रहा है कि यह सरकार सिर्फ गुंडों-मवालियों की खैरख्वाह होकर रह गयी है।

politician-criminal-nexus-results-in-bad-laws

जिन पुलिस वालों को रविदास मेहरोत्रा को गिरफ्तार करना चाहिए था वे उन्हीं के कूचे में बैठे दावत उड़ा रहे थे। यह देखकर अखबारों में छपी इन खबरों पर भी विश्वास करने का मन करता है कि कथित तौर पर पुलिस को चकमा दे रहे नारायण साईं को भी किसी न किसी सत्ता प्रतिष्ठान का आश्रय प्राप्त है।

अपराधी और नेता की रासलीला में पुलिस की भूमिका गोपियों की तरह लगने लगी है। अपराधी आए दिन लूट, हत्या, बलात्कार जैसी घिनौनी हरकतें किए जा रहे हैं; और पुलिस उनके इस अपराध में खड़ी मूकदर्शक बनी मुस्कराती और उनके द्वारा दिये गये लूट के हिस्से का लुत्फ उठाती रहती है।

जनता भी आँखों-देखी मक्खी निगलने को मजबूर है; और कर भी क्या सकती है भला! जिसे आम लोग अपना रखवाला मानते है,वह पुलिस खुद अपराधियों के गिरोह में शामिल हो गयी है। ऐसे में अपने समाज के हितों के बारे में सोचने के लिए आम जनता की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है जिसका निर्वहन उसे करना ही चाहिए। लेकिन कैसे करे? अगर आम जनता उन पुलिसवालों केनिलम्बन की मांग करती है तो क्या शासन उस पर कार्यवाही करेगा? शायद नहीं। जब सरकार की ऊँची पायदान पर बैठे एक वरिष्ठ मंत्री ही उस वांछित अपराधी के साथ गलबहियाँ डाले दावत उड़ाते देखे गये तो भला उन पुलिस वालों को क्या दोष दें?

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, November 26, 2013

समाज का अपराध

 

कुछ अपराध ऐसे होते है जिसका कूसूरवार सिर्फ उस घटना को अंजाम देने वाला ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार और कभी-कभी तो हमारा समाज भी होता है जो परोक्ष रूप से उस अपराध को करने के लिए मजबूर करता है। कितनी विडम्बना है कि एक स्त्री जो नौ महीने अपने गर्भ में पालने के बाद बेटी को जन्म देती है; उसकी हर छोटी-बड़ी खुशियों का खयाल रखती है; उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए डाँटती-समझाती है और जिसमें अपना अक्स देखती है उसी के साथ ऐसा निष्ठुर घात कर बैठती है जिसपर यकीन करना कठिन हो जाता है। किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते ही बेटी से ऐसी कौन सी गलती हो गयी जो एक माँ के लिए भी अक्षम्य थी और जिसकी सजा मौत बन गयी? मेरा मन नहीं मान रहा कि इस तरह के अपराध में एक माँ का हाथ हो सकता है। लेकिन कानून ने फिलहाल उसे अपराधी ठहरा दिया है। ऐसे में कानून की नजर में अगर ऐसे अपराध की सजा मौत है तो भी कम है...। इसने तो माँ की छवि ही कलंकित कर दी। अब आगे से कोई माँ के रिश्ते को वह ऊँचा स्थान कैसे दे पाएगा जिसके आंचल में अपनी संतान के लिए सागर से भी गहरा प्यार और आसमान से भी ऊँचा वात्सल्य होता है।

social stigma

आरुषी की हत्या के मामले में कानून तो अपना कार्य कर गया; लेकिन एक माँ की ममता इतनी क्रूर कैसे हो गयी? इसके पीछे क्या सामाजिक दबाव एवं झूठी प्रतिष्ठा के लिए मन की बेचैनी है? एक माँ को अपने बच्चे से ज्यादा प्रिय समाज में अपनी इज्जत कैसे हो गयी? क्या परिवार और समाज की गरिमा बेटियों की इज्जत से जुड़ी होती है। इस माँ से मै पूछना चाहती हूँ - क्या आरुषी की जगह उसका बेटा होता और एक नौकरानी के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए पकड़ा जाता तो उसकी भी सजा माँ की नजर में यही होती जो उसने अपनी बेटी को दी? अगर एक ही भूल बेटियां करती हैं तो बहुत बड़ी भूल बन जाती है और बेटे करें तो मामूली बात कह के रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश हो जाती है। शायद तब दाँव पर बेटा लगा होता है जो बेटी से अधिक कीमती है।

बेटी और सामाजिक इज्जत का आपस में क्या ऐसा संबंध है? अगर है तो मत जनो बेटी को... गर्भ में मार डालने का अपराध भी शायद इसी की एक कड़ी है। “समाज को क्या मुंह दिखाएंगे” इस चिन्ता के दबाव में अपना हाथ रक्तरंजित कर लेने से मुँह काला नहीं होता क्या? आज सभी लोग उन्हें थू-थू कर रहे हैं लेकिन इसी समाज का भय क्या उस दुष्कृत्य के लिए उत्प्रेरक नहीं रहा होगा? इस सारे घटनाक्रम में हमारे समाज का दोहरा मापदण्ड है जो इस तरह के कुकृत्य करने पर लोगों को मजबूर करते हैं। मुझे लगता है कि आरुषी हत्याकांण्ड में यह समाज भी उतना ही दोषी है जितना उसके माता-पिता।

(रचना)

Tuesday, November 19, 2013

गिफ्ट कहो या तिहवारी बात बराबर है…

तिहवारी देने का प्रचलन हमारी सदियों पुरानी परंम्परा से चला आ रहा है। घर में काम करने वाले नौकर-चाकर, धोबी-मोची, स्वीपर आदि छोटे कर्मचारियों एवं समाज में रहने वाले छोटे तबके के लोगों को होली, दिवाली जैसे त्यौहारों पर कुछ पैसे, अनाज, कपड़े जैसी बस्तुएं दी जाती है जिसे हम तिहवारी के नाम से जानते है। सगे-संबंधियों के यहाँ से आने वाले नाई-कहाँर को भी तीज-त्यौहार के समय तिहवारी देकर विदा करने का रिवाज बहुत पुराना है।

त्यौहारों के आगमन में हम महीनों पहले से इसकी तैयारी के लिए जुटे रहते है; जैसे- होली-दिवाली हो या दशहरा, किसी का जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह; इन सभी कार्यक्रमों में सबसे महत्वपूर्ण काम होता है गिफ्ट का लेन-देन। जितना समय घर की साफ-सफाई और साज-सज्जा पर नहीं लगता है उससे कहीं ज्यादा समय यह सोचने और करने में लग जाता है कि किसको क्या और कैसा गिफ्ट देना है । घर हो या दफ्तर, सचिवालय हो या मंत्रालय; गिफ्ट का आदान-प्रदान सब ओर होता रहता है। बस उसके तौर-तरीकों, उनके मूल्य व प्रकार को देखकर गिफ्ट पाने वाले व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। खरीदारी के समय गिफ्ट के चुनाव के साथ-साथ उसकी पैकिंग में भी प्रोटोकॉल का ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है।

2095391-concept-of-business-growth-gift-and-donation-many-dollars-in-the-format-of-a-gift-box

मैं सोच रही थी कि तात्विक रूप से तिहवारी और गिफ्ट में कोई खास अंतर नहीं है। दोनो मामलों में देने वाले का उद्देश्य लेने वाले को खुश करना होता है। खास त्यौहारों के अवसर पर सेवक टाइप कर्मचारियों को उनके मालिक या गृहिणियों द्वारा जो बख्शीश दी जाती है वह तिहवारी है और जब ऐसे ही अवसरों पर छोटे कर्मचारी या अधिकारी अपने बॉस या वरिष्ठ अधिकारी को कुछ भेंट करते है तो उसे ‘गिफ़्ट’ कह देते हैं। मैंने एक ही व्यक्ति को अलग-अलग लोगों को तिहवारी बाँटते और गिफ़्ट लेते तथा गिफ़्ट देते देखा है। समाजिक पायदान पर वह जहाँ खड़ा है उसी के अनुसार यह आदान-प्रदान आकार लेता है। इसको समझने के लिए दी जाने वाली वस्तु या कैश की मात्रा पर एक नजर डाले तो पता चल जाता है कि क्या तिहवारी है और क्या गिफ्ट। लेने व देने वाले की हैसियत का पता भी यह सामग्री दे देती है।

गिफ्ट के मामले में लेने वाला इसकी डिमांड नहीं करता जबकि तिहवारी लेने वाले पीछे पड़कर ले लेते हैं। गिफ़्ट शौकिया दिया जाता है या भयवश इसमें विद्वानों में मतभेद है। किसी वांछित कार्य के हो जाने पर या अवांछित कार्य के रुक जाने पर जो खुशी मिलती है उसे प्रकट करने के लिए अपने संबंधित अधिकारी या मंत्री को गिफ़्ट दिया जाता है। लेकिन कभी कभी उस खुशी की प्रत्याशा में पहले ही गिफ़्ट टिकाना पड़ता है; वह भी आकर्षक पैकिंग व वजन के साथ। इसकी तुलना में तिहवारी देने में इतना टिटिम्मा पालने की जरूरत नही पड़ती। उसे झोले में लटकाकर दिया जाय, किसी प्लास्टिक में बांध कर दे दीजिए या वैसे ही खुले में थमा दीजिए पाने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ता।

गिफ्ट देने वाला तो महान होता है लेकिन गिफ्ट पाने वाला उससे भी कहीं ज्यादा बड़ा महान व्यक्ति होता है। जिसका जितना बड़ा गिफ्ट, उसकी उतनी बड़ी इज्जत होती है। तिहवारी तो हर व्यक्ति अपनी हैसियत के अनुसार दे सकता है; लेकिन गिफ्ट देने के लिए अपनी पॉकेट से पहले उस व्यक्ति की हैसियत देखनी पड़ती है जिसे गिफ्ट देना होता है।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, November 15, 2013

जुबान जो संभलती नही…

SLIP OF TONGUE

चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। वह देश के बारे में नहीं सोच सकता। आजादी के बाद हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा भले ही कर लें लेकिन हमारे नेता आज भी ऐसा सोचते हैं।

इस देश की प्रगति में सबसे बड़े बाधक के रूप में बैठे हुए सामंती सोच वाले उच्च पदाधिकारी और राजनेता हैं, जो अपने स्वार्थ के वशीभूत अपनी जिम्मेदारियों को भूल चुके हैं और सिर्फ अपनी गद्दी के बारे में ही सोचते हैं। इनका राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र यह बताता है कि “चाय बेचने वाले का बेटा चाय ही बेचेगा, मोची का बेटा मोची ही होगा, एक बड़े नेता का बेटा एक बड़ा नेता ही बनेगा।”

यह सोच नयी नहीं है। जिसके पास ताकत आ जाती है वह दंभ से भर ही जाता है। मै कक्षा आठ में पढ़ती थी तो मुझे याद है जब स्कूल के प्रिंसिपल साहब ने एक मास्टर साहब से बोला था कि ‘मास्टर का बेटा होकर प्रिंसिपल के बेटे की बराबरी करता है...!’ मास्साब का बेटा और प्रिंसिपल का बेटा दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। ये दोनों मुझसे दो साल सीनियर थे। किसी बात को लेकर उन दोनों में लड़ाई हो गई थी। यह बात प्रिंसिपल को नागवार लगी और उन्होंने अपनी नाराजगी मास्साहब से इन शब्दों में व्यक्त किया था। उस समय मास्साब हम लोगों को अंग्रेजी पढ़ाने आये तो प्रिंसिपल साहब की इस सामंती सोच पर बहुत दुखी लग रहे थे। वाचाल होने की वजह से मै मास्साहब की मुँहलगी थी, इस वजह से मै उनसे पूछ पड़ी, ‘प्रिंसिपल सर आप से किस बात पर नाराज हुए है? मास्साब मुझसे बोले- “तुम देखना मास्टर का बेटा मास्टर ही बनेगा!” यानि कि हर क्षेत्र में प्रवीण

इस फार्मूले के हिसाब से तो सचिन के बेटे अर्जुन को सचिन जैसा बड़ा और धुरंधर बल्लेबाज होना चहिए। अगर गाँधी जी अपने जैसे चार गाँधी और पैदा किए होते तो इस देश का नजारा कुछ और होता। लेकिन ‘सौभाग्य से’ ऐसा हो ही नहीं सकता। व्यक्तिगत प्रतिभा और परिश्रम का मूल्य हमेशा बड़ा होता है। बाँस की जड़ से रेंड़ उगना आम बात है। फिर राजनीति में अंधे ये बयानबाज अपनी सहूलियत से ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हैं?

सीमा पर जवानों के सिर कलम कर दिए जाते है तो भी देश के मुखिया का मुंह नहीं खुलता। आतंकवादी हमले करने वालों की हदें नही समझायी जाती है, लेकिन जब सी.बी.आई. प्रधानमंत्री की जाँच में लगती है तो प्रधानमंत्री के द्वारा बेशर्मी से मौन व्रत तोड़ते हुए उसकी हदें बतायी जाने लगती है। इन नेताओं और नौकरशाहों की यह सोच आखिर क्या दर्शाती है? क्या इस तरह के लोग लोकतंत्र को चलाने के काबिल हैं?

भोजपुरी की एक कहावत याद आ गई, “आन के पाड़े दिन देलें अपने घमावन लेलें।” इसका अर्थ यही निकलता है कि जब सूर्य निकलता है तो पांडेजी खुद तो आराम से बैठे धूप का आनंद लेते है मगर दूसरो को नसीहत देते है कि जाकर अपना काम करो, मेहनत करो।

विकास की गति में भ्रष्टाचार, राजनीति और महंगाई का स्पीडब्रेकर देखकर आम पब्लिक का मन उद्विग्न हो रहा है, और ये बड़े-बड़े लोग इसकी नयी-नयी परिभाषाएं गढ़ने और व्याख्या करने में लगे हुए है। इनको लगता है कि देश पर शासन करने और इसे लूटने का एक्स्क्लूसिव राइट इन्हीं के पास है और इसलिए सबको प्रवचन देने का भी काम इन्हीं के लायक है। बाकी सभी मूर्ख और नालायक हैं। कैसा लोकतंत्र है यह?

मै एक घर और परिवार सम्हालने वाली सामान्य स्त्री हूँ; फिर भी इस परिवार के अलावाँ अपने समाज तथा देश के विकास के बारे में सोचती हूँ। मुझे भी लगता है कि मै अगर प्रधानमंत्री होती तो यह देश बेहतर उत्थान की राह पर होता। नरेश अग्रवाल जैसे दम्भी नेता क्या इस सोच को बन्द कर सकते हैं।

(रचना)

 

Monday, October 28, 2013

नक्कारों की फौज भर्ती को तैयार…

प्रदेश सरकार की मेहरबानियों पर पलता-बढ़ता हमारा समाज और इस समाज के युवा वर्ग की हालत देखकर मन उद्विग्न है। यह प्रचार हो रहा है कि उनकी पढ़ाई के लिए कितने खर्चे अपने सिर पर ढो रही है उत्तर प्रदेश की सरकार। इन बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक बनी रहे इसके लिए इन्हें कितने तोहफे बांट चुकी है। लेकिन सच्चाई यह है कि नकल की खुली छूट देकर बोर्ड परीक्षाओं में सामान्यतः सत्तर प्रतिशत से ऊपर अंक देने के बाद एक-एक घर में चार-चार लैपटॉप और टैबलेट बाँटना कहीं से जायज नहीं कहा जा सकता। राजनीति के तोहफे इसी प्रकार लुटाये जाते है हमारे देश के बेरोजगार युवाओं पर। सरकार अब उन्हें आसान नौकरी का भी तोहफा देने की तैयारी कर चुकी है।

उत्तर-प्रदेश में ग्राम पंचायत अधिकारियों की भर्ती होने जा रही है। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा के अंको के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जायेगी और रिक्तियों के दस-बीस गुना अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए काल कर लिया जायेगा। जिले के सरकारी अधिकारी इनका इंटरव्यू लेंगे और उसमें प्राप्त अंकों के आधार पर नियुक्ति कर दी जाएगी। यानि कोई लिखित प्रतियोगी परीक्षा नहीं करायी जाएगी। एक अभ्यर्थी चाहे जितने जिलों से आवेदन कर सकेगा और अपना भाग्य आजमा सकेगा। इस भर्ती प्रक्रिया में बेरोजगार युवाओं से अधिक तैयारी और दौड़-धूप उनके अभिभावक कर रहे हैं। जिसकी जितनी ऊँची पहुँच और जितनी भारी जेब है वह उतना अधिक आश्वस्त है।

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के सबसे निचले स्तर की इकाई ग्राम पंचायत के सचिव की कुर्सी की शोभा बढ़ाने वाले इन ग्राम पंचायत अधिकारियों की सरकारी योजनाओं को ग्राम स्तर पर लागू करने में बहुत अहम भूमिका होती है। इसलिए इस पद के लिए एक से बढ़कर एक बोली लगायी जा रही है। सुना है एक कैन्डीडेट पर करीब बारह लाख रूपए तक की बोली लग चुकी है। देखना रोचक होगा कि तृतीय श्रेणी के इस पद के लिए बारह लाख देने वाले ‘बेरोजगार’ की हैसियत क्या होगी? जो बेरोजगार बारह लाख नहीं दे पायेगा वह अपने आप को जीवन भर कोसता रहेगा। अब इस बारह लाख के लिए उन्हें या उनके घर वालों को जाने कौन-कौन से कार्य करने पड़ेंगे- चोरी, डकैती लूट, हत्या और आत्महत्या जैसे अनेक प्रयासों के वे भागीदारी बनेंगे।

ऐसे युवाओं को शुरू से ही भ्रष्टाचार और निकम्मेपन की राह पर भटकाने के अलावा हमें उनके हित की कोई बात नही दिख रही। इन शर्तों पर भी यदि भर्ती प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है तो इन ग्राम पंचायत अधिकारियों के हाथों हमारा गांव और समाज किस तरह का विकास कार्य कर पाएगा?

प्रदेश सरकार ऐसे में बेरोजगारों को रोजगार देने जा रही है, या गोंवों के विकास के लिए एक प्रतिबद्ध कर्मचारी? बारह लाख देने के बाद वह बेरोजगार कैसे विकास का कार्य करेगा? इस पर जरा एक बार हम सबको विचार करना चाहिए और इस भर्ती प्रक्रिया की जड़ों को तलाशना चाहिए। जो सरकार अपने प्रशासनिक तंत्र में योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के निष्पक्ष चयन को प्राथमिकता देने के बजाय नकलची और जुगाड़ू लड़कों की नकारा फौज भर्ती करने पर उतारू हो उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है?

ऐसा कहा गया है कि मेहनत के फल मीठे होते हैं। लेकिन यह कैसा फल है? जिसमें हमें न तो मेहनत नजर आ रही है और ना ही ईमानदारी नाम की कोई चीज। यह सरकार तो बेरोजगार युवाओं के साथ खिलवाड़ करती नजर आ रही है। एक उच्च शिक्षा प्राप्त युवा मुख्यमंत्री के हाथों में चलती सरकार से क्या यही उम्मीद थी? उन्हें अपने प्रदेश के युवाओं के साथ इस तरह का भद्दा मजाक नहीं करना चाहिए। यह सस्ती लोकप्रियता का हथकंडा प्रदेश और इसके युवाओं को ले डूबेगा। तो क्या वह गद्दी बची रहेगी जिसे बनाये रखने के लिए यह आत्मघाती राह चुनी जा रही है।

क्या किसी न्यायालय की दृष्टि इस बड़ी धांधली की साजिश पर पड़ने का समय नहीं आ गया जो समय रहते इसको रोकने के लिए प्रभावी कदम उठा सके? नौकरशाही क्या इतनी कमजोर और डरपोक हो गयी है जो साफ-साफ दिख रही अंधेरगर्दी को आगे बढ़ाने में बिल्कुल संकोच नहीं कर रही है? एक एक साफ-सुथरी प्रतियोगी परीक्षा कराकर योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों का चयन करने में हमारा तंत्र क्या बिल्कुल अक्षम हो चुका है? पिछले चार-पाँच सालों में टी.ई.टी., बी.टी.सी., टी.जी.टी., और शिक्षकों की नियुक्ति सम्बंधी तमाम प्रकरणों को देखने से तो यही महसूस हो रहा है।

(रचना)

Wednesday, October 16, 2013

गरीबों के अनाज पर डाका..

खाद्य सुरक्षा कानून पर महामहिम के दस्तखत की स्याही अभी सूखी भी नहीं होगी कि इसके माध्यम से मिलने वाले सस्ते अनाज की कालाबाजारी की खबरें न्यूज चैनेलों में सुर्खियाँ बटोरने लगीं हैं। आजतक न्यूज चैनल ने सरकार की सवा लाख करोड़ की सबसे बड़ी योजना के काले सच का खुलासा किया है। देश की राजधानी से ही शुरू हो गया खाद्य सुरक्षा के अनाज की कालाबाजारी का गोरखधंधा। गरीबों का पेट भरने की दलील देने वाली सरकार इस कालेधंधे की सच्चाई से अछूती तो नहीं होगी। इस घोटाले में नौकरशाह और राजनेता दोनों ही संलिप्त नजर आ रहे हैं।

लगता है कि सरकार को गरीबों की भूख की फिक्र कम, अपने चुनाव में होने वाले खर्चे की चिंता ज्यादा सता रही है। शायद इस योजना के तहत सरकार की एक अलग योजना पूरी करने की साजिश रही है, तभी तो सरकार ने चुनाव होने के शीघ्र पहले ही इस योजना को लागू किया ताकि इनके खजाने में कहीं कोई कमी आए बगैर चुनाव लड़ा जा सके। नहीं तो इतने सालों तक गरीबों के भूखे पेट की ओर से यह सरकार क्या आँख पर पट्टी बांधे बैठी रहती? सरकार के मंत्री से लेकर अधिकारी तक सभी इस योजना में हो रही कालाबाजारी में संलिप्त लगते हैं। गरीबों को दो रुपये में मिलने वाला गेहूं निजी आटा चक्कियों पर बारह रूपये मे बेचा जा रहा है। थाने से लेकर फूड इंस्पेक्टर का बंधा हुआ है कमीशन।

खाद्यसुरक्षा योजनाओं से लाभ लेने वाले पात्र लोगों के पास तो राशन कार्ड भी नहीं है; और ना ही इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी किसी पात्र गरीब का राशन कार्ड समय से बना पा रहे हैं। मेरे घर में बर्तन माँजने वाली जो अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए प्रतिदिन लगभग दस घरों में काम करती है, बताती है- “मै सालों से दौड़ रही हूँ, मेरा न तो कोई कार्ड बना और ना ही कभी कम दाम में मुझे अनाज ही मिला।” इस योजना की सच्चाई यह भी है कि गरीबों के अनाज पर डाका डालने के लिए फर्जी राशन कार्ड भी बनाए जा रहे हैं। लगता है कि यह मूक-बधिर सरकार अपने स्वार्थ के आगे अब अंधी भी हो गयी है। लोक-लुभावन योजनाओं की आड़ में गरीबों के पेट पर लात मारती सरकार संवेदना विहीन एक काठ का पुतला नज़र आती है।

(रचना)

Thursday, October 10, 2013

राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही...

 

राजनीति का मंच सार्वजनिक होता है... आखिर यह लोकतंत्र जो है. देश के हर नागरिक को राजनीति के क्षेत्र में भाग्य आजमाने का अधिकार है। सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी पर काबिल लोग आ सकें इसके लिए यह व्यवस्था की गयी होगी; लेकिन इस मंच पर जो आते हैं उनका बायोडेटा देखने पर हाल कुछ और नजर आता है। यहाँ आने के लिए जो काबिलियत चाहिए वह कुछ दूसरी तरह की है। पढ़ा-लिखा हो या नहीं इससे क्या मतलब है देश को..? चोर, लुटेरे, व्यभिचारी, सूदखोर, ब्लैकमेलर, हत्यारोपी, रंगदार, भांड़, नचनिया, गवनियां सब राजनीति के मजे चखना चाहते है... आखिर मालामाल जो है। इन्होंने तमाम गलत रास्तों से पहले पूँजी इकठ्ठा कर ली और फिर कूद पड़े।

पूछिए इनसे - राजनीति में आने के लिए कालाधन क्यों उगाते हो भाई? बोलेंगे- खाएंगे तभी तो खिलाएंगे.. इतनी सहूलियत और कहाँ मिलेगी इन्हें..? एक बार बस गद्दी हाथ लग जाय तो देखो कमाल इनका.. न तो कमर मटकाने की जरूरत पड़ेगी और न ही अपने फिटनेस के लिए किसी जिम में जाकर जी तोड़ मेहनत कर पसीने बहाने की.. इस देश की राजनीति में क्या जरूरत है किसी सोसल वर्कर की..? कहीं समाज जागरुक हो गया तो इनकी माला कौन जपेगा..?

indian_politics

ऐसी स्थिति में पेशेवर सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए कोई गुंजाइश बचती है क्या? समाज के लिए कार्य करना अपना समय बर्बाद करने के बराबर है.. यूँ कहे तो राख में घी डालने के बराबर..। समाज इन्हें देता ही क्या है..? अमुक जी नाच-गाना कर के या दूसरे तरीकों से करोड़ों कमाकर रखे है- इसी दिन रात के लिए कि बैठाकर मुफ्त की रोटियाँ खिलाएंगे.. गाँव में वीडियो चलाकर तिवारी जी का नाच-गाना दिखाएंगे और उसके बाद कुछ खिला-पिलाकर सुबह वोट बटोर के ले जायेंगे.. फिर क्या! मंच पर कोई दूसरे बाबा का अवतार होगा..और फिर शुरू होगा ‘‘ओठवा में लगवले बाड़ी, कनवा में पहिने बाली चाल चलेली मतवाली, बगल वाली जान मारेली”। कितने रोजगार जैसे शिक्षक की भर्तियाँ इत्यादि सफेद पोशाक वाले सालों से सिकहर पर टांगे बैठे हैं कि कही कोई और बिल्ली झपट्टा न मार ले इनके वोट के खजाने को..।

..फिर क्या बगल वाली हो या अपना पड़ोसी, जान मारे या मरवाये.. हम तो भई! जैसे हैं वैसे रहेंगे.. देश मुंआ मुह पिटाये, आखिर यही तो होता रहा है आज तक यहाँ की राजनीति में.. ये कौन सी इस परम्परा से अलग हट कर कुछ नया करने को सोचने वाले हैं.. बड़का-बड़का राजनितिज्ञ तो जेल की हवा खा रहे हैं.. करमजला कानून ने भी एक लफड़ा लगा दिया है.. इनको आराम फरमाने का.. दूसरा कोई करे भी तो क्या..? ऐसा कोई माई का लाल पैसे वाला जन्मा ही नही कि चुनाव में अपना लगाकर जीत जाये.. क्योंकि यह भी जानते है आम जनता की हालत इतनी खस्ती है कि दो दिन भी भरपेट भोजन, दारू नाच-गाना में इनको मस्त कर दिए तो ३६३ दिन की चिंता तो इन्हें भूल जायेगी.. आखिर भूखमरी की शिकार जनता को दो-चार दिन खिला-खिला कर अघवाएंगे नही तो अपने फिर पाँच साल कैसे अघाएंगे..?

(रचना)