Wednesday, December 18, 2013

सावधानी हटी दुर्घटना घटी..!

उत्तर प्रदेश सड़क परिवहन निगम की प्रायः सभी बसों में ड्राइवर के सामने लिखा यह सूक्ति वाक्य बहुत प्रासंगिक है : सावधानी हटी दुर्घटना घटी। यह तो तय है कि भय न हो तो मानवमन अनुशासित नहीं हो सकता। तेज रफ्तार में गाड़ी चलाई तो दुर्घटना होने का डर रहता है, इसलिए गाड़ी की स्पीड कम करनी पड़ती है। ऐसा नहीं होता तो सबको जल्दी निकलने की होड़ मची रहती और मिनटों का काम सेकेण्डों में पूरा कर हर आदमी अपनी पीठ थपथपाता रहता। अक्सर यह देखा जाता है कि बड़ी- बड़ी ट्रकों के पीछे यह लिखा होता है कि ‘सटला ता गईला’। यह ठेठ चेतावनी हर यात्री को आगाह करती है कि गाड़ी चलाने में जल्दबाजी न करें नहीं तो आप दुर्घटना के शिकार हो सकते। जानबूझकर लाइनमैन भी नंगे हाथ से बिजली प्रवाहित नंगा तार कत्तई नही छूते। ऐसा इसलिए होता है कि उन्हे करंट लगने का डर होता है, और यही डर उन्हे सावधानी से कार्य करने की चेतना प्रदान करता है।

‘‘विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत, बोले राम सकोप तब भय बिन होत न प्रीत’’। राम जी द्वारा प्रार्थना करने व लाख मान-मनुहार के बाद भी ‘जड़ समुद्र’  ने उन्हें लंका पहुँचने का रास्ता नहीं दिया। अंततः जब उन्होंने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ायी तो त्राहि माम्‌ की पुकार करते हुए समुद्र महराज पैर पर गिर पड़े। इसलिए डर की महिमा कम करके नहीं आंकी जा सकती।

ऐसा ही एक डर कानून का है, दंड संहिता का है जो अपराध न करने की चेतना प्रदान करता है। कानूनों के प्रति बढ़ती जागरूकता से और उनमें बताये गये दंड विधान के प्रचार-प्रसार से अब माहौल ऐसा बनता जा रहा है कि कुछ महापुरुषों को भी अब डर लगने लगा है। निर्भया ने जाते-जाते एक उपहार इस समाज को दे दिया। औरत अब चुप नहीं लगाने वाली। लाज की गठरी बनकर वहशी दरिन्दों का शिकार नहीं बनने वाली। अब उसने मुंह खोलना और संघर्ष करना शुरू कर दिया है। अब कोई माननीय हों या स्टिंग की शक्ति से मदान्ध ऊँची रसूख के दलाल सबके खिलाफ आवाज उठने लगी है। अब वह बात नहीं चलेगी कि कभी इनकी जुबान फिसले तो कभी उनके हाथ-पैर।

कानून का डर इन्हें फिसलने से जरूर रोकेगा। लेकिन इनके अंदर एक मलाल तो हमेशा बना रहेगा कि अन्जाने में भी ये फिसल नहीं सकते। अब इन्हें वही याद आएगा जो ट्रक के पीछे लिखा होता है - ‘सटला त गईला’।

इनका डर इतना भारी हो गया है कि अब ये दफ्तरों में महिला स्टाफ़ नियुक्त न करने की बात करते हैं। कहाँ-कहाँ बचोगे बच्चू इस तरह मुंह छिपाते? इससे तो अच्छा है कि अपनी आदत ही सुधार लो। अपना व्यवहार ही ऐसा बना लो जो तुम्हारे आस-पास दिखने वाली लड़कियों और औरतों की गरिमा के अनुकूल हो। अपने ऊपर इतना नियंत्रण तो रखो, विश्वास तो करो कि तुम्हारी आंखों में लंपटता का वास नहीं होगा, तुम्हारी नसों में पशुओं सा संवेग नहीं पनपेगा, तुम्हारे विवेक पर ताला नहीं पड़ेगा; जब तुमारे आस-पास किसी की माँ, बहन, बेटी या दोस्त अपना काम कर रही होगी। सभ्यता की परीक्षा देने में इतनी घबराहट क्यों?

अरे..! दुर्घट्ना होने के डर से हम घर से निकलता तो नही बंद कर देते...? हां , सावधानी जरूर बरतनी चाहिए। डर से ही सही, अब तो हमें सभ्य बन ही जाना चाहिए।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, December 12, 2013

समलैंगिको के साथ यह भेद-भाव क्यों..?

समलैंगिक भी इस लोकतांत्रिक समाज का एक हिस्सा हैं, जिन्हें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने का पूरा अधिकार है। जबतक उनसे इस समाज और देश का कोई नुकसान नहीं होता तबतक उनकी यौनिक पसन्द पर आपत्ति नहीं की जा सकती। समलैंगिकता अपराध तब है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य के साथ अप्राकृतिक ढंग से जबरदस्ती संबंध बनाने का प्रयास करे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस वर्ग के लोगों के लिए कदाचित उचित नहीं है क्योंकि समलैंगिक प्रवृत्ति, आप इसे गुण कहे या दोष; यह भी प्रकृत प्रदत्त ही है जो हार्मोन पर निर्भर करता है न कि समाज में किन्हीं अराजक तत्वों द्वारा उत्पन्न हुआ है। एक स्त्री का किसी अन्य स्त्री के प्रति आकर्षण या एक पुरुष का किसी अन्य पुरुष के प्रति आकर्षण उतना ही संभव है, जितना एक पुरुष अथवा स्त्री का विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है। प्रकृति में ऐसे मनुष्यों का आविर्भाव भी हो सकता है जिसे ठीक-ठीक स्त्री या पुरुष की श्रेणी में ही न रखा जा सके। प्रकृति प्रदत्त ऐसे विशिष्टियों के लिए किसी को अपराधी ठहरा देना कहाँ तक न्यायसंगत हो सकता है?  सुप्रीम कोर्ट ने अप्राकृतिक यौनाचार और समलैंगिक संबंधों को अपराध करार दिया है, जिसकी सजा में उम्रकैद तक का प्रावधान है।

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इस तरह से देखा जाय तो इस यौनवृत्ति को अवैधानिक घोषित कर सजा का प्रावधान गलत है। इसको सामान्य प्राकृतिक लक्षणों से अलग एक आंशिक विकृति मानकर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर उपचारात्मक प्रक्रिया की बात तो समझ में आती है। लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में रखकर देखा जाना उचित नहीं समझा जा सकता है। अगर लोकतंत्र मे सेरोगेसी को स्थान मिल सकता है, लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता मिल सकती है तो समलैंगिको के साथ यह भेद-भाव क्यों है? समलैगिकता को एक दायरे में सीमित कर देना तो उचित हो सकता है ताकि यह इस समाज में एक अपराध बनकर न उभरे; लेकिन इसे स्वयं एक अपराध घोषित कर देना ज्यादती होगी।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, December 7, 2013

मैन-मनी-मसल पावर में महिला है मिसफिट

संसद के इस शीतकालीन सत्र में अगर महिला आरक्षण बिल पास नहीं होता है तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जायेगा कि संसद और विधानसभा में बैठे हुए पुरुष राजनेता महिलाओं को अपनी बराबरी में नहीं देखना चाहते हैं, या वह इस बात से डरते है कि महिलाएं इन्हें कही इस क्षेत्र में भी कंधे से कंधा न मिलाने लगें।

राजनीति में महिलाओं की बराबर की भागीदारी होना अब जरूरी ही नहीं बल्कि अपरिहार्य हो गया है। महिलाओं की योग्यता और उसकी क्षमता पर बार-बार प्रश्नचिह्न खड़ा कर के एक तरह से उसका मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। स्त्री को अपने से कम आंकने की पुरुषों की नीयत सी बन गयी है । आज की तारीख में हर क्षेत्र का रिकार्ड उठाकर देख लेने की जरूरत है कि महिलाएं किस क्षेत्र में पीछे हैं। अंतरिक्ष से लेकर, चाहे पुलिस सेवा हो, सेना हो अथवा नेवी मे, महिलाएं अपनी योग्यता के बदौलत वहाँ आगे पहुंच रही हैं; लेकिन राजनीति के क्षेत्र में आशाजनक स्थिति नहीं बन पा रही है। आखिर क्यों नहीं?

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चित्र साभार : www.businessnewsthisweek.com

मुझे सुषमा स्वराज जी की यह बात सही लगती है कि राजनीति के प्रवेशद्वार पर अभी भी पुरुषों का ही पहरा है जो शायद महिलाओं को अन्दर नहीं जाने देना चाहते। शायद इस आशंका से कि महिलाएं उनकी कुर्सी पर कब्जा कर लेंगी और उन्हें अपनी जागीर छोड़नी पड़ेगी। इसमें स्पष्ट रूप से पुरुष नेताओं का अपना स्वार्थ हावी है। उनका अपना वर्चस्व बना रहे इसलिए वे राजनीति में महिलाओं के आने का रास्ता ही बंद कर रखे हैं। राजनीति में “मैन, मनी और मसल पावर” को सफलता की कुंजी मान लिया गया है क्योंकि आजकल जिस प्रकार चुनाव लड़े और जीते जाते हैं उसे देखकर यह सही भी लगता है। इसी ने इन पुरुष नेताओं को अहंकारी बना दिया है। उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी ने आज ही इलाहाबाद के एक माफिया डॉन को दुबारा पार्टी में शामिल करके संसद का चुनावी टिकट थमा दिया है।

ऐसे में महिलाओं की राह राजनीति में आसान नहीं है। लेकिन जहाँ भी महिलाओं को अवसर दिया गया है उन्होंने अपनी योग्यता का परिचय दिया है। राजनीति में नेतृत्व करने के लिए मसल और मनी पावर इस्तेमाल करना अवैध होता है। नेतृत्व हमेशा योग्यता के बल पर ही होना चाहिए परन्तु योग्यता की परिभाषा वह नहीं रह गयी है जो हम आप किताबों में पढ़ते हैं। आज के माहौल में तो महिला मिसफिट होती जा रही है; जबकि महिलाएँ ही इस स्थिति को सुधार सकती हैं।

महिलाओं का चुनाव क्षेत्र में उतरना इस समाज, देश, काल के लिए शुभ संकेत होगा। शायद बेहतर अनुशासन और साफ-सुथरा प्रशासन भी सामने आ जाये। ऐसा होने पर देश में विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। सत्य की जय और झूठ का नाश होगा।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, December 4, 2013

पुलिस की रासलीला

जानलेवा हमले और बलवा कराने के आरोप में उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा को पकड़ पाने में असफल रहने पर कोर्ट ने उनकी संम्पत्ति कुर्क करने का आदेश दिया था। अब खबर छपी है कि विधायक जी को गिरफ्तार करने में असफल रहने वाली पुलिस विधायक जी के घरपर आयोजित ऐटहोम समारोह में बाकायदा मौजूद थी और राज्य सरकार के कद्दावर मन्त्री शिवपाल सिंह यादव जी भी दावत में शामिल थे। दैनिक जागरण की आज (03 दिसंबर) की इस खबर को पढ़कर यह तो स्पष्ट दिख रहा है कि यह सरकार सिर्फ गुंडों-मवालियों की खैरख्वाह होकर रह गयी है।

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जिन पुलिस वालों को रविदास मेहरोत्रा को गिरफ्तार करना चाहिए था वे उन्हीं के कूचे में बैठे दावत उड़ा रहे थे। यह देखकर अखबारों में छपी इन खबरों पर भी विश्वास करने का मन करता है कि कथित तौर पर पुलिस को चकमा दे रहे नारायण साईं को भी किसी न किसी सत्ता प्रतिष्ठान का आश्रय प्राप्त है।

अपराधी और नेता की रासलीला में पुलिस की भूमिका गोपियों की तरह लगने लगी है। अपराधी आए दिन लूट, हत्या, बलात्कार जैसी घिनौनी हरकतें किए जा रहे हैं; और पुलिस उनके इस अपराध में खड़ी मूकदर्शक बनी मुस्कराती और उनके द्वारा दिये गये लूट के हिस्से का लुत्फ उठाती रहती है।

जनता भी आँखों-देखी मक्खी निगलने को मजबूर है; और कर भी क्या सकती है भला! जिसे आम लोग अपना रखवाला मानते है,वह पुलिस खुद अपराधियों के गिरोह में शामिल हो गयी है। ऐसे में अपने समाज के हितों के बारे में सोचने के लिए आम जनता की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है जिसका निर्वहन उसे करना ही चाहिए। लेकिन कैसे करे? अगर आम जनता उन पुलिसवालों केनिलम्बन की मांग करती है तो क्या शासन उस पर कार्यवाही करेगा? शायद नहीं। जब सरकार की ऊँची पायदान पर बैठे एक वरिष्ठ मंत्री ही उस वांछित अपराधी के साथ गलबहियाँ डाले दावत उड़ाते देखे गये तो भला उन पुलिस वालों को क्या दोष दें?

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, November 26, 2013

समाज का अपराध

 

कुछ अपराध ऐसे होते है जिसका कूसूरवार सिर्फ उस घटना को अंजाम देने वाला ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार और कभी-कभी तो हमारा समाज भी होता है जो परोक्ष रूप से उस अपराध को करने के लिए मजबूर करता है। कितनी विडम्बना है कि एक स्त्री जो नौ महीने अपने गर्भ में पालने के बाद बेटी को जन्म देती है; उसकी हर छोटी-बड़ी खुशियों का खयाल रखती है; उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए डाँटती-समझाती है और जिसमें अपना अक्स देखती है उसी के साथ ऐसा निष्ठुर घात कर बैठती है जिसपर यकीन करना कठिन हो जाता है। किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते ही बेटी से ऐसी कौन सी गलती हो गयी जो एक माँ के लिए भी अक्षम्य थी और जिसकी सजा मौत बन गयी? मेरा मन नहीं मान रहा कि इस तरह के अपराध में एक माँ का हाथ हो सकता है। लेकिन कानून ने फिलहाल उसे अपराधी ठहरा दिया है। ऐसे में कानून की नजर में अगर ऐसे अपराध की सजा मौत है तो भी कम है...। इसने तो माँ की छवि ही कलंकित कर दी। अब आगे से कोई माँ के रिश्ते को वह ऊँचा स्थान कैसे दे पाएगा जिसके आंचल में अपनी संतान के लिए सागर से भी गहरा प्यार और आसमान से भी ऊँचा वात्सल्य होता है।

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आरुषी की हत्या के मामले में कानून तो अपना कार्य कर गया; लेकिन एक माँ की ममता इतनी क्रूर कैसे हो गयी? इसके पीछे क्या सामाजिक दबाव एवं झूठी प्रतिष्ठा के लिए मन की बेचैनी है? एक माँ को अपने बच्चे से ज्यादा प्रिय समाज में अपनी इज्जत कैसे हो गयी? क्या परिवार और समाज की गरिमा बेटियों की इज्जत से जुड़ी होती है। इस माँ से मै पूछना चाहती हूँ - क्या आरुषी की जगह उसका बेटा होता और एक नौकरानी के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए पकड़ा जाता तो उसकी भी सजा माँ की नजर में यही होती जो उसने अपनी बेटी को दी? अगर एक ही भूल बेटियां करती हैं तो बहुत बड़ी भूल बन जाती है और बेटे करें तो मामूली बात कह के रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश हो जाती है। शायद तब दाँव पर बेटा लगा होता है जो बेटी से अधिक कीमती है।

बेटी और सामाजिक इज्जत का आपस में क्या ऐसा संबंध है? अगर है तो मत जनो बेटी को... गर्भ में मार डालने का अपराध भी शायद इसी की एक कड़ी है। “समाज को क्या मुंह दिखाएंगे” इस चिन्ता के दबाव में अपना हाथ रक्तरंजित कर लेने से मुँह काला नहीं होता क्या? आज सभी लोग उन्हें थू-थू कर रहे हैं लेकिन इसी समाज का भय क्या उस दुष्कृत्य के लिए उत्प्रेरक नहीं रहा होगा? इस सारे घटनाक्रम में हमारे समाज का दोहरा मापदण्ड है जो इस तरह के कुकृत्य करने पर लोगों को मजबूर करते हैं। मुझे लगता है कि आरुषी हत्याकांण्ड में यह समाज भी उतना ही दोषी है जितना उसके माता-पिता।

(रचना)

Tuesday, November 19, 2013

गिफ्ट कहो या तिहवारी बात बराबर है…

तिहवारी देने का प्रचलन हमारी सदियों पुरानी परंम्परा से चला आ रहा है। घर में काम करने वाले नौकर-चाकर, धोबी-मोची, स्वीपर आदि छोटे कर्मचारियों एवं समाज में रहने वाले छोटे तबके के लोगों को होली, दिवाली जैसे त्यौहारों पर कुछ पैसे, अनाज, कपड़े जैसी बस्तुएं दी जाती है जिसे हम तिहवारी के नाम से जानते है। सगे-संबंधियों के यहाँ से आने वाले नाई-कहाँर को भी तीज-त्यौहार के समय तिहवारी देकर विदा करने का रिवाज बहुत पुराना है।

त्यौहारों के आगमन में हम महीनों पहले से इसकी तैयारी के लिए जुटे रहते है; जैसे- होली-दिवाली हो या दशहरा, किसी का जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह; इन सभी कार्यक्रमों में सबसे महत्वपूर्ण काम होता है गिफ्ट का लेन-देन। जितना समय घर की साफ-सफाई और साज-सज्जा पर नहीं लगता है उससे कहीं ज्यादा समय यह सोचने और करने में लग जाता है कि किसको क्या और कैसा गिफ्ट देना है । घर हो या दफ्तर, सचिवालय हो या मंत्रालय; गिफ्ट का आदान-प्रदान सब ओर होता रहता है। बस उसके तौर-तरीकों, उनके मूल्य व प्रकार को देखकर गिफ्ट पाने वाले व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। खरीदारी के समय गिफ्ट के चुनाव के साथ-साथ उसकी पैकिंग में भी प्रोटोकॉल का ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है।

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मैं सोच रही थी कि तात्विक रूप से तिहवारी और गिफ्ट में कोई खास अंतर नहीं है। दोनो मामलों में देने वाले का उद्देश्य लेने वाले को खुश करना होता है। खास त्यौहारों के अवसर पर सेवक टाइप कर्मचारियों को उनके मालिक या गृहिणियों द्वारा जो बख्शीश दी जाती है वह तिहवारी है और जब ऐसे ही अवसरों पर छोटे कर्मचारी या अधिकारी अपने बॉस या वरिष्ठ अधिकारी को कुछ भेंट करते है तो उसे ‘गिफ़्ट’ कह देते हैं। मैंने एक ही व्यक्ति को अलग-अलग लोगों को तिहवारी बाँटते और गिफ़्ट लेते तथा गिफ़्ट देते देखा है। समाजिक पायदान पर वह जहाँ खड़ा है उसी के अनुसार यह आदान-प्रदान आकार लेता है। इसको समझने के लिए दी जाने वाली वस्तु या कैश की मात्रा पर एक नजर डाले तो पता चल जाता है कि क्या तिहवारी है और क्या गिफ्ट। लेने व देने वाले की हैसियत का पता भी यह सामग्री दे देती है।

गिफ्ट के मामले में लेने वाला इसकी डिमांड नहीं करता जबकि तिहवारी लेने वाले पीछे पड़कर ले लेते हैं। गिफ़्ट शौकिया दिया जाता है या भयवश इसमें विद्वानों में मतभेद है। किसी वांछित कार्य के हो जाने पर या अवांछित कार्य के रुक जाने पर जो खुशी मिलती है उसे प्रकट करने के लिए अपने संबंधित अधिकारी या मंत्री को गिफ़्ट दिया जाता है। लेकिन कभी कभी उस खुशी की प्रत्याशा में पहले ही गिफ़्ट टिकाना पड़ता है; वह भी आकर्षक पैकिंग व वजन के साथ। इसकी तुलना में तिहवारी देने में इतना टिटिम्मा पालने की जरूरत नही पड़ती। उसे झोले में लटकाकर दिया जाय, किसी प्लास्टिक में बांध कर दे दीजिए या वैसे ही खुले में थमा दीजिए पाने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ता।

गिफ्ट देने वाला तो महान होता है लेकिन गिफ्ट पाने वाला उससे भी कहीं ज्यादा बड़ा महान व्यक्ति होता है। जिसका जितना बड़ा गिफ्ट, उसकी उतनी बड़ी इज्जत होती है। तिहवारी तो हर व्यक्ति अपनी हैसियत के अनुसार दे सकता है; लेकिन गिफ्ट देने के लिए अपनी पॉकेट से पहले उस व्यक्ति की हैसियत देखनी पड़ती है जिसे गिफ्ट देना होता है।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, November 15, 2013

जुबान जो संभलती नही…

SLIP OF TONGUE

चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। वह देश के बारे में नहीं सोच सकता। आजादी के बाद हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा भले ही कर लें लेकिन हमारे नेता आज भी ऐसा सोचते हैं।

इस देश की प्रगति में सबसे बड़े बाधक के रूप में बैठे हुए सामंती सोच वाले उच्च पदाधिकारी और राजनेता हैं, जो अपने स्वार्थ के वशीभूत अपनी जिम्मेदारियों को भूल चुके हैं और सिर्फ अपनी गद्दी के बारे में ही सोचते हैं। इनका राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र यह बताता है कि “चाय बेचने वाले का बेटा चाय ही बेचेगा, मोची का बेटा मोची ही होगा, एक बड़े नेता का बेटा एक बड़ा नेता ही बनेगा।”

यह सोच नयी नहीं है। जिसके पास ताकत आ जाती है वह दंभ से भर ही जाता है। मै कक्षा आठ में पढ़ती थी तो मुझे याद है जब स्कूल के प्रिंसिपल साहब ने एक मास्टर साहब से बोला था कि ‘मास्टर का बेटा होकर प्रिंसिपल के बेटे की बराबरी करता है...!’ मास्साब का बेटा और प्रिंसिपल का बेटा दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। ये दोनों मुझसे दो साल सीनियर थे। किसी बात को लेकर उन दोनों में लड़ाई हो गई थी। यह बात प्रिंसिपल को नागवार लगी और उन्होंने अपनी नाराजगी मास्साहब से इन शब्दों में व्यक्त किया था। उस समय मास्साब हम लोगों को अंग्रेजी पढ़ाने आये तो प्रिंसिपल साहब की इस सामंती सोच पर बहुत दुखी लग रहे थे। वाचाल होने की वजह से मै मास्साहब की मुँहलगी थी, इस वजह से मै उनसे पूछ पड़ी, ‘प्रिंसिपल सर आप से किस बात पर नाराज हुए है? मास्साब मुझसे बोले- “तुम देखना मास्टर का बेटा मास्टर ही बनेगा!” यानि कि हर क्षेत्र में प्रवीण

इस फार्मूले के हिसाब से तो सचिन के बेटे अर्जुन को सचिन जैसा बड़ा और धुरंधर बल्लेबाज होना चहिए। अगर गाँधी जी अपने जैसे चार गाँधी और पैदा किए होते तो इस देश का नजारा कुछ और होता। लेकिन ‘सौभाग्य से’ ऐसा हो ही नहीं सकता। व्यक्तिगत प्रतिभा और परिश्रम का मूल्य हमेशा बड़ा होता है। बाँस की जड़ से रेंड़ उगना आम बात है। फिर राजनीति में अंधे ये बयानबाज अपनी सहूलियत से ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हैं?

सीमा पर जवानों के सिर कलम कर दिए जाते है तो भी देश के मुखिया का मुंह नहीं खुलता। आतंकवादी हमले करने वालों की हदें नही समझायी जाती है, लेकिन जब सी.बी.आई. प्रधानमंत्री की जाँच में लगती है तो प्रधानमंत्री के द्वारा बेशर्मी से मौन व्रत तोड़ते हुए उसकी हदें बतायी जाने लगती है। इन नेताओं और नौकरशाहों की यह सोच आखिर क्या दर्शाती है? क्या इस तरह के लोग लोकतंत्र को चलाने के काबिल हैं?

भोजपुरी की एक कहावत याद आ गई, “आन के पाड़े दिन देलें अपने घमावन लेलें।” इसका अर्थ यही निकलता है कि जब सूर्य निकलता है तो पांडेजी खुद तो आराम से बैठे धूप का आनंद लेते है मगर दूसरो को नसीहत देते है कि जाकर अपना काम करो, मेहनत करो।

विकास की गति में भ्रष्टाचार, राजनीति और महंगाई का स्पीडब्रेकर देखकर आम पब्लिक का मन उद्विग्न हो रहा है, और ये बड़े-बड़े लोग इसकी नयी-नयी परिभाषाएं गढ़ने और व्याख्या करने में लगे हुए है। इनको लगता है कि देश पर शासन करने और इसे लूटने का एक्स्क्लूसिव राइट इन्हीं के पास है और इसलिए सबको प्रवचन देने का भी काम इन्हीं के लायक है। बाकी सभी मूर्ख और नालायक हैं। कैसा लोकतंत्र है यह?

मै एक घर और परिवार सम्हालने वाली सामान्य स्त्री हूँ; फिर भी इस परिवार के अलावाँ अपने समाज तथा देश के विकास के बारे में सोचती हूँ। मुझे भी लगता है कि मै अगर प्रधानमंत्री होती तो यह देश बेहतर उत्थान की राह पर होता। नरेश अग्रवाल जैसे दम्भी नेता क्या इस सोच को बन्द कर सकते हैं।

(रचना)