Thursday, August 8, 2019

गुलाम हो या आजाद?

तू आजाद बताता खुद को
नबी गुलाम ये बात बता।
कश्मीरी को कहे बिकाऊ
पर खुद की औकात बता।।

किया गुलामी खानदान का
जो नेहरू ने छोड़ा था।
घाटी से ना जीत सका
तू सबसे बड़ा भगोड़ा था।।

बेच दिया तूने जमीर जब
पाकिस्तानी हाथों में।
देशद्रोह की झलक दिखी है
तेरी ठरकी बातों में।।

कितनी कीमत में तूने
बेची है अपनी आजादी
ऐ गुलाम पाकी पिठ्ठू
कितने में पार्टी बिकवा दी

राजनीति के व्यापारी
तेरी कुछ ऐसी संगत है।
क्रय-विक्रय की राजनीति में
तू सबसे पारंगत है।।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 1, 2019

जमाने की छुआ-छूत

अभी एक सज्जन जिन्होंने #zomato के अपने खाने का ऑर्डर इसलिए कैंसिल कर दिया क्योंकि डिलीवरी बॉय उनके पसंदीदा धर्म का नहीं था। इससे हमें एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। कई दशक पहले अपने बचपन की बात बता रही हूँ। मेरे घर में एक बड़की माई थीं, जो किसी का छुआ नहीं खाती थी, न ही किसी को अपनी रसोई में बिना नहाए घुसने की इजाजत देती थी। भोजन करने की घर में चाहे जितनी तेजी मची हो किन्तु वह किसी को अपनी बनाई रसोई छूने नहीं देती थीं। वे खाना खुद ही परोसती और सबको खिलाने के बाद अपने खाती थीं। रसोई की साफ-सफाई के मामले में उन्हें अपने सिवाय किसी पर भरोसा नहीं था। और तो और, भोजन बनाते वक्त बिना ब्लाउज के साड़ी लपेटे रहती थीं। पूछने पर कहती थी दर्जी मुसलमान होते हैं इसलिए वह उनका सिला कपड़ा नहीं पहनती हैं।

छुआ-छूत बहुत मानती थी। उनका धर्म भ्रष्ट न हो इसलिए वह पूरी जिंदगी इसी तरह रहीं। जब किसी सफर में होती थीं तो अपने पास थोड़ा चूड़ा-चीनी गठिया के रख लेती थीं। कहीं किसी आयोजन में जाने पर साड़ी की मैचिंग पेटीकोट का कपड़ा अपनी कमर में लपेट कर उसके दोनों छोरो को पकड़ कर आपस में गांठ बांध लेती थी, जिससे साड़ी पहनने में आसानी हो जाती थी। घर वालों के लाख समझाने के बावजूद उनका पूरा जीवन इसी प्रकार कटा। जिनको खाने की बड़ी तेजी मची रहती थी वे स्टोव पर रसोईघर से बाहर नमक डालकर गीलभात, खिचड़ी, अंडा, ऑमलेट बनाकर खा लिया करते और अपने काम पर निकल जाया करते थे। तब वहाँ #zomato या #swiggy जैसी सुविधाएं नहीं थी, नहीं तो शायद तब वे भी उसी से ऑर्डर कर के कुछ खाने का आइटम मंगवा लिया करते, जैसा कि अब वे भी अक्सर यही कर लिया करते हैं। घर के बाकी लोगों का इससे कोई लेना-लादना नहीं है कि zomato सर्विस कौन दे रहा है; उसके कर्मचारी हिंदू हैं या मुस्लिम; उसका रसोइया किस धर्म अथवा जाति का है? लेकिन बड़की माई के सिद्धांत के विरुद्ध कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ा। क्योंकि वह खुद बहुत बड़ी तपस्या कर रही थीं।

अपनी सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर जाड़ा-गर्मी-बरसात सब कुछ सहती रहीं लेकिन अपने सिद्धान्त से कभी कोई समझौता नहीं किया। बल्कि पूरा परिवार उनके इस त्याग के साथ सहानुभूति रखता रहा। क्योंकि जिस दिन वह भोजन स्वयं नहीं बनाती थी उस दिन वह दूध-दही फल-मूल खाकर पूरे दिन रह जाती थीं लेकिन सुविधानुसार प्राप्त किसी भी प्रकार का सुस्वाद भोजन करना उन्हें स्वीकार नहीं था। आप सोच रहे होंगे कि वह कितनी पाखण्डी थी! परन्तु मैं इसे उनका अपने धर्म और शुचिता के प्रति अंधविश्वास ही सही एक प्रकार का समर्पण मानती हूं। अपने इस व्यवहार से उन्हें खुद भी बहुत तकलीफ़ उठानी पड़ी थी। लेकिन उन्होंने परिवार के किसी भी सदस्य को किसी का छुआ खाने अथवा कुछ भी खाने से नहीं रोका। उनका मानना था कि 'उठाया' हुआ भोजन मतलब– जो चीज बनाई कहीं और जाय और उसे वहाँ से उठाकर कहीं दूर ले जाकर परोसा जाय तो वह भोजन अशुद्ध हो जाता है।

आजकल बने-बनाये खाने को ऑनलाइन ऑर्डर से मंगाकर खाने-खिलाने का चलन जोर पर है। उस खाने की तैयारी में कई तरह के लोग लगे रहते हैं। किसने देखा उन्हें नहाते जो लोग इसमें शामिल है? छुआ-छूत की बात अभी यहाँ छोड़ दीजिए, लेकिन जिस भोजन को अपनी आंखों के सामने बनते न देखा गया हो उसकी निरापद शुद्धता (हाइजीन) की क्या गारंटी है? इसलिए, जो लोग #zomato, #swiggy, या किसी रेस्तरां में जाकर खाना पसंद करते हैं उन्हें भोज्य पदार्थों की तैयारी से विभिन्न स्तरों पर जुड़े व्यक्तियों की जाति, धर्म या सामाजिक प्रास्थिति पर प्रश्न उठाने का कोई हक नहीं है। परहेज करना है तो बड़की माई की तरह करिये वर्ना ऐसी मूर्खता का परिचय मत दीजिये।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 13, 2019

जब तुम भागोगी

हम ताली बजायेंगे
तब, जब तुम
भागोगी!
तुम आजाद हो
भागो,
तेज भागो,
और तेज भागो,
हम गर्व करेंगे
तुम्हारे भागने पर,
शोर-शराबे भी करेंगे,
ताली भी खूब बजायेंगे,
जब तुम भागोगी,
पर ऐसे नहीं
हमारी, द्युतिचन्द की तरह।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, October 1, 2018

ईश्वर पुलिस को सद्बुद्धि दे

इस अर्थ-प्रधान युग में मनुष्य को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं। व्यापारी दिन-रात काम करता है। किसान खेतों में पसीना बहाता है। मजदूर दिहाड़ी की तलाश में दर-दर भटकता है। विद्यार्थी भी रोजी-रोटी कमाने लायक बन जाय इसी लक्ष्य का पीछा करते हुए रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है। कुछ नराधम इसी रोटी के लिए छोटे-मोटे अपराध शुरू कर देते हैं और रुपयों की हबस का शिकार होकर अपराध की नयी-नयी राहें तलाशते रहते हैं। धनोपार्जन के लिए शुरू किया गया छोटा भ्रष्टाचार शीघ्र ही एक आदत में बदल जाता है जिसका बड़ा नुकसान वृहत्तर समाज को उठाना पड़ता है।

एक सामान्य नौकरीशुदा व्यक्ति अपना समय व श्रम और अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता अपने नियोक्ता की इच्छाओं के अधीन कर देता है ताकि महीने के अंत में उसे वेतन के रूप में कुछ रुपये मिल सके जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। उसके पास नौकरी से बचे हुए अत्यल्प समय और क्षीण ऊर्जा पर पत्नी व बच्चों से लेकर माता-पिता तक और इष्ट-मित्रों से लेकर तमाम रिश्तेदारों तक की आस लगी होती है। इसी समय में वह अपने लिए भी सुख तलाशता है। जीविका की जद्दोजहद में एक सामान्य नागरिक का सामाजिक जीवन छीजता जा रहा है। अपराधी और भ्रष्टाचारी मिलकर इस साधारण मनुष्य के जीवन को बेहद असुरक्षित और कठिन बनाते जा रहे है।

प्रदेश की राजधानी में नौकरी करने वाले विवेक को देर रात तक काम करना पड़ता था। ऐसी ही एक काली रात आयी जब रात में घर लौटने से पहले उसे अपनी एक सहकर्मी को सुरक्षित उसके घर तक छोड़ते हुए आना था। लेकिन वह घर नहीं आ सका। रास्ते में गश्त पर निकले एक सिरफिरे और उद्दंड सिपाही ने उसे रोका और पता नहीं क्यों उसके सिर में गोली मार दी। एक निहत्था कामकाजी अकारण मारा गया और एक साथ कई जिंदगियां बर्बाद हो गयीं।

प्रश्न उठता है कि पुलिस विभाग ने उस सिपाही को  कैसी ट्रेनिंग दी थी। आखिर शहर के एक समृद्ध इलाके की गश्त करने वाले उस रंगरूट से उच्चाधिकारियों ने क्या अपेक्षा की थी जिसे पूरा करने के लिए उसे एक निरीह नागरिक की हत्या करनी पड़ी? जहाँ असली अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, रोज ब रोज हत्या, लूट, छिनैती व बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहाँ पुलिस प्रशासन प्रभुवर्ग की सेवा में लगा हुआ उनकी और अपनी झोली भरने में व्यस्त है।

बड़ी भयावह स्थिति है। सुबह घर से निकलने वाला परिवार का कमाऊ सदस्य शाम तक सकुशल वापस आ जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। घर की बेटी बाहर निकलकर अपना काम करते हुए अपनी गरिमा बचाकर घर लौट आएगी इसकी कोई गारंटी नहीं। घर में, बैंक में या जेब में रखा पैसा अचानक लूट नहीं लिया जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। देश के सभी नागरिकों के जान-माल की गारंटी देने वाला संविधान और इसी संविधान की शपथ लेकर शासन की बागडोर थामने वाले मंत्री और नौकरशाह इस गारंटी को नष्ट करने में लगे हुए है। न्यायालय भी लाचार हैं। ये अनेक गैर-जरूरी फैसले सुनाने में अपनी मेधा और समय खपा रहे हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सुरक्षा और न्याय पाने के लिए कौन सा दरवाजा खटखटाने जाय?

मुझे तो लगता है कि सबकुछ भगवान भरोसे ही रह गया है। केवल ईश्वर ही है जो आर्त्त की प्रार्थना सुन सकता है। सभी अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अपने-अपने भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, जीसस से प्रार्थना करेंगे कि वे हम अकिंचन प्राणियों के असुरक्षा बोध को कम करने के लिए तथा जीवन के प्रति सकारात्मक विश्वास बनाये रखने के लिए कोई चमत्कार करें। उन पुलिसकर्मियों को ऐसी सद्बुद्धि दें, उनके आचरण में ऐसा परिवर्तन कर दें कि उन्हें देखकर कोई शरीफ आदमी भयाक्रांत न हो, जान बचाकर भागने पर मजबूर न हो। उन्हें ऐसा कर्तव्यबोध करा दे कि कोई अपराधी उनसे दोस्ती गांठने और मेल-जोल बढ़ाकर अपराध की कमाई में हिस्सेदार बनाने की हिम्मत न करे।

ऐसी ही एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन हमारे मुहल्ले में किया गया है। सेक्टर-16 इंदिरानगर, लखनऊ के सांईंराम पार्क में शाम छः बजे सबलोग इकठ्ठा होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। सभी हाथों में मोमबत्तियां लेकर अपनी प्रार्थना के साथ मुंशीपुलिया पुलिस चौकी तक शांतिपूर्ण मार्च करेंगे और जलती हुई मोमबत्तियों को पुलिस चौकी के द्वार पर लगाएंगे ताकि ईश्वर की कृपा से उन पुलिसकर्मियों को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हो सके। ताकि उनके भीतर की मानवता का उदय हो सके। ताकि राक्षसी प्रवृतियों का अस्त हो सके। ताकि भविष्य में फिर कोई विवेक अकारण बीच सड़क पर इनकी गोलियों से न मार दिया जाय।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, September 27, 2018

लचीला रे...

प्रोमोशन में आरक्षण संबंधित 2006 का फैसला बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ते हुए भारतीय संविधान की जय बोल दी। इससे हमें इस देश की न्याय व्यवस्था और अपनी सासू माँ की पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुपालन के लिए लागू अनुशासन कुछ एक जैसा प्रतीत होता है।

घर में पूजा-पाठ, तीज-त्यौहार और मांगलिक कार्यों के विधि-विधान को लेकर वो बहुत कठोर हैं। लेकिन यदि ऐसे कार्यक्रम में परिस्थिति वश किसी पद्धति को पूरा करने में कोई बाधा आ जाती है तो वे उसका दूसरा विकल्प जरूर खोज लेती हैं। इससे स्थापित नीति का उलंघन भी नहीं होता और उनका इकबाल भी कायम रहता है।

कर्मकांड कराने वाले पुरोहित तो इस लचीलेपन के फन में इतने माहिर होते हैं कि भारतीय संविधान भी शर्मा जाय। इष्ट देवता के लिए यजमान जो वस्त्र नहीं ला सके तो देवता को वस्त्र के रूप में रक्षा-सूत्र पहना देते हैं।

पूजन सामग्री भी गरीब यजमान के लिए कुछ तो अमीर के लिए कुछ और हो जाती है। भोले शंकर को खुश करने के लिए घृत, शहद, दही, शर्करा और दूध से अभिषेक करते हुए घण्टों मंत्रोच्चार किया जाता है तो गरीब का एक लोटा जल भी उसके भक्तिभाव को प्रकट कर देता है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, July 29, 2018

खुद की सोचो

शांता, देखती हूँ, तुम दिनोदिन सूखती जा रही हो? ये बात सही है कि बच्चों का ख्याल तुम नहीं रखोगी तो कौन रखेगा! पर जरा सोचो, खाली पेट काम करते-करते बीमार पड़ गई तो क्या होगा? अभी जो तुम्हारे भीतर ऊर्जा संचित है वही तो दिन पर दिन खर्च हो रही है। लेकिन इसकी प्रतिपूर्ति कैसे होगी?

सुबह छः बजे घर से निकल लेती हो दोपहर के दो बजे तक सिर्फ चाय पी-पीकर अपना पेट लेसती रहती हो। ऐसे कबतक चलेगा?  ये रोज-रोज चाय के साथ की बिस्किट और ब्रेड घर लेकर चली जाती हो। कभी-कभार खुद भी तो खा लिया करो। तुम्हारी देह में जायेगा तो भी तुम्हारे बच्चों के काम आएगा...  तुम्हे कुछ देर और काम करने की शक्ति मिलेगी।

और उसका क्या? ... जबतक तुम्हारी हड्डी में दम है तभी तक तेरी राह ताकेगा... नहीं तो, ले आयेगा घर में दूसरी ब्याह कर।

(रचना त्रिपाठी)