Saturday, September 24, 2016

कुछ अपने मन की

बहुत हुआ अब इनकी-उनकी
रीति-रिवाज और पोथी से
अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

तुम निकलो या हम निकले
छोड़ो उन मनोविकारों को
जो आए दिन ही चरते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

छोड़ के हाथ के कंगन को
सारे मोह के बंधन को
जो डर से हमें जकड़ते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

मंदिर मस्जिद बँटवारों को
तोड़ के इन दीवारों को
निर्माण राष्ट्र का करते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, September 20, 2016

ईप्सा

वर्षों पहले 
कुछ स्वप्न थे बुने
कुछ नींद में सजोये 
कुछ ,जगती आँखों में पले  I

कर्तव्य पथ पर डटी 
अथक, अनवरत  
चलती  रही 
निःशब्द, होठ  सिले I

लड़ती  दिन-रात
स्वाभाविक इच्छाओं से
हो परिवार  की धुरी
अभिलषित सब टले I

तिनके तिनके
जोड़ती-बटोरती
सहेजती-समेटती
स्वयं से बतकही 
स्वयं से ही गिले I

आह ! अचानक
एक एहसास 
 चालीस पार !
 अब चाहती है 
काश !
 निःशब्दता को  
 दे  आकार I
और तोड़ मौन 
निर्द्वन्द 
कर ले
हर सपना साकार I

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, September 17, 2016

छोटा नुस्खा बड़ा फायदा

यदि आपके हृदय में अपनी हिंदी के लिए तनिक भी प्रेम और सम्मान है तो हिंदी दिवस के प्रति सच्ची श्रद्धा दिखाते हुए अपने ग़ुस्से पर थोड़ा क़ाबू पाना सीख लीजिए! वो इसलिए कि ग़ुस्से में आदमी अक्सर अंग्रेज़ी में बोलने लगता है। ऐसा माना जाता है कि अंग्रेज़ी में ख़राब से ख़राब बात भी उतनी बुरी नहीं लगती जितनी हिंदी में कहने पर लगती है। तो इधर गुस्से पर लगाम का सीधा मतलब होगा उधर हिंदी की संभावना में तेज उछाल।

हाँ, ग़ुस्से पर क़ाबू पाने के लिए थोड़ी सी प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। किसी खास तरकीब की ज़रूरत भी पड़ सकती है। उसके लिए आप गूगल पर सर्च न मारे। मेरी बात पर थोड़ा गौर फ़रमाए। जब भी आपको महसूस हो कि अब गुस्सा आने वाला है तो उसे हलक में रोक लें, फिर मुँह में अपने ग़ुस्से को पान की तरह थोड़ी देर चबाए जैसे च्युइंग गम चबाते हैं, उसके बाद अपने बायें-दाएँ देखे बिना और पच्च की आवाज किये बिना उसे थूक डालें। इससे किसी का कुछ भी नुक़सान नहीं होने वाला। 

आप सोच रहे होंगे कि इस नुस्खे में कौन सा रॉकेट-साइंस मने बड़ा विज्ञान है जो हिंदी दिवस बीत जाने के बाद अब शक्तिवर्द्धक विज्ञापनों की तरह फ़ेसबुक पर चस्पा किया जा रहा है? तो जान लीजिए, इसमें सच में ऐसा कुछ भी नहीं है। बस आप ये समझिए कि ये बाबा रामदेव का पतंजलि नुस्ख़ा है। केमिकल और जहरीले रसायनों से दूर , एकदम प्राकृतिक गुणों से भरपूर जिसमें सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है। इसका प्रयोग यदि आपने पूरे साल बिना नागा कर लिया तो पक्का मानिए अगले हिंदी दिवस की सूरत एकदम फ़ेयर एंड लवली वाली त्वचा की तरह खिली-खिली और निखरी नज़र आयेगी।

मान लीजिए आपको देर हो रही हो और आपको जल्दबाजी में हिंदी दिवस के किसी कार्यक्रम में जाना है। रास्ते में कहीं ट्रैफिक जाम मिल जाय और आपकी गाड़ी में पीछे से कोई टक्कर मार दे। ऐसे में यदि आप गुस्सा थूकने की आदत डाल चुके होंगे तो आप उस समय हिंदी का सम्मान करने लगेंगे। आपके मुँह से ग़ुस्से वाली उल्टी-पुल्टी अंग्रेज़ी के बजाय सीधी सरल हिंदीे के बोल फूट पड़ेंगे और आपको ऐसा करते देख आसपास के लोग पहले हैरत से और बाद में सम्मान से देखने लगेंगे। संभव है आपकी महानता के दर्शन के लिए कुछ लोग दूसरी गाड़ियों से निकलने शुरू हो जाएं। 

संयोग से ऐसा भी हो सकता है कि सामने वाला भी आप पर अंग्रेजी में पलटवार करने के बजाय हिंदी को सम्मान दे बैठे। अगर उसने भी पूरे साल बिना नागा इस नुस्ख़े का प्रयोग किया होगा तो ऐसे में दोनों तरफ से हिंदी ही हिंदी शुरू हो जाएगी। फिर क्या पूछना, हिंदी-हिंदी भाई-भाई मतलब पूरा साहित्य दर्शन। 

इस नुस्ख़े को अपना कर आप कहीं भी हिंदी दिवस की शुरुआत कर सकते हैं। हिंदी में अच्छी-बुरी सारी बातें लगभग सभी के समझ में आती हैं। ऐसे में दोनों पक्ष ख़ूब ज़बरदस्त तरीके से एक-दूसरे की भावनाओं को उसकी हैसियत के हिसाब से उचित सम्मान देने लगेंगे। हिंदी में व्यक्त भावनाओं के इस मधुर आदान-प्रदान का आनंद बिना टिकट पब्लिक भी ले सकती है। ऐसे में फिर हिंदी की तो चाँदी कटने लगेगी।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 11, 2016

आस्था का विसर्जन

यह नज़ारा लखनऊ के मुंशीपुलिया चौराहे की पुलिस चौकी के सामने एक पीपल के नीचे के चबूतरे का है।

हिन्दू आस्था की प्रतीक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ जिन्हें लोग अपने घरों में सबसे साथ-सुथरे और पवित्र स्थान पर रखते हैं, इनकी पूजा करते हैं और अपने लिए सुख समृद्धि की कामना करते हैं; वहाँ शुद्धता और संस्कारों की रक्षा के लिए नाना प्रकार की वर्जनाएँ भी काम करती हैं; वहीं मूर्तियाँ पूजा-पाठ और अनुष्ठान की समाप्ति के बाद इस पेड़ के नीचे गाड़ियों के धुँए व शोर-गुल के बीच धूल-धूसरित क्षत-विक्षत पड़ी हुई जानवरों के मलमूत्र पर रोज़ टूटती... बिखरती... विलाप करती नज़र आ रही हैं।

ये कैसी आस्था है जो अपने इष्ट के प्रतीक का विसर्जन भी समुचित ढंग से नहीं कर पाती।नवरात्रि के बाद माँ दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन हो या गणपति महोत्सव के बाद बप्पा का; नदियों-तालाबों और दूसरे घाटों पर अगले दिन हृदय-विदारक दृश्य उपस्थित हो जाता है। क्या हमारी ऐसी लापरवाही हमारी संस्कृति को अशोभनीय और गंदे स्वरुप में नहीं प्रकट कर रही है?


(रचना त्रिपाठी)


Wednesday, June 29, 2016

बेटियों का अपराध

किसी घर की छत पर टंगे महिलाओं के अंत:वस्त्र देखकर कुछ असामाजिक तत्व छत फाँदकर उस घर की बहू-बेटियों की इज़्ज़त लूटने की कोशिश कर डालते हैं, या सड़क पर बिना दुपट्टे के निकलने वाली लड़की को देखकर उनके भीतर का शैतान जाग जाता है और मौका देखकर उसे दबोचने का दुस्साहस कर डालते हैं, रात को किसी महिला ने अगर अकेले बाहर निकलने की गलती कर दी तो उसके ऊपर हाथ साफ करने का लोभसंवरण ये लंपट नहीं कर पाते है। इसके बाद यदि ये अपराधी पकड़े जाते हैं तो ख़ुद को बेक़सूर साबित करने ले लिए सारा दोष उन लड़कियों व महिलाओं के सिर मढ़ देते हैं। इनका समर्थन कुछ व्यवहारवादी बुध्दिजीवी भी इस प्रकार करते हैं कि क्यों वे अपने अंत:वस्त्र बिना किसी लज्जा के खुले में सूखने के लिए डालकर, या अपने अंगों से दुपट्टा हटाकर, या रात के समय अकेले बाहर निकलकर पुरुष कामाग्नि को आमंत्रण देती हैं। 

 लड़कियाँ अपनी रोज़मर्रा के कार्यों में इस बात से कदाचित् अनभिज्ञ रहती हैं कि कौन सा कार्य उनके अपने लिये ही घातक साबित हो जाय और उनका ज़ख़्म ही इस समाज की नज़र में जुर्म बन जाए और तब, वहाँ की सामाजिक व्यवस्था उन्हें दोषी क़रार देने में कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो जाती है। 

रुबी राय का जुर्म भी कुछ इसी प्रकार का लगता है। उसने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उसके आसपास के दूसरे लड़के-लड़कियाँ न करना चाहती हों। बस मात्रा का फर्क हो सकता है और उपलब्ध सुविधा का, लेकिन आज उसे जेल जाना पड़ा है। वहाँ की पूरी शिक्षा प्रणाली ख़ुद को बेक़सूर साबित करने में अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती और वहाँ के क़ानून के रखवाले अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए खूब सक्रिय हो गये हैं। अब रुबी को गिरफ़्तार कर एक नयी मिसाल पेश की जा रही है। असली अपराधी अपने कृत्य को अपना नैसर्गिक धर्म क़रार देते हुए सीना ताने बड़े शान से इस समाज के विशेष वर्ग का हिस्सा बने आज भी बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। 

बोर्ड परीक्षा में नक़ल एक सामाजिक बीमारी है जिसमें विद्यार्थी सबसे छोटा अपराधी है जो एक अबोध अल्पवयस्क किशोर है। असली अपराधी तो उसके अभिभावक हैं; और परीक्षा संचालित करने वाले शिक्षक, केंद्र व्यवस्थापक तथा शैक्षिक व प्रशासनिक अधिकारी हैं जो इस नक़ल उद्योग से काली कमाई करने में लिप्त हैं। क्या कानून का हाथ इन अपराधियों की गर्दन तक पहुंचेगा? 

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, May 28, 2016

नयी फ्रॉक

ओसारे में बाँस की खाट पर पड़े-पड़े उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। दो महीने हो गये थे घर में बचिया के ऊपर ‘महरानी जी’ का आसन आये। उसके बालों में महीने भर से कंघी नहीं पड़ी थी। चट-चट करते बालों ने आपस में लट्ट बाँध लिये थे। खाट पर सिर्फ़ दरी बिछी थी और उसके सिरहाने नींम के पत्ते वाली छोटी-छोटी कुछ टहनियां रखी गयी थीं। वहीं बगल में गोंइठा की आग लगातार सुलगती रहती थी। उसका पूरा शरीर लाल पड़ गया था। ऐसे में उसके ऊपर चन्दन और पियरी माटी का लेप लगाने के अलावा और कोई दवा भी नहीं दी जा रही थी। ऐसी मान्यता थी कि दवा देने पर देवी माँ और कुपित हो जायेंगी और बचिया जल्दी ठीक नहीं होगी। उसके शरीर पर पड़े फफोले सूखते, फिर हरे हो जाते। चेचक के साथ उसे बुखार भी रहने लगा था। उसके होठ सूखे सन्तरे की फांक की तरह मुरझा गये थे। कई दिन हो गये थे। वह न कुछ खाती, न पीती। बस टुकुर-टुकुर आने जाने-वालों को बेबस निहारती रहती।

घर में महरानी जी के आसन को अब काफ़ी लम्बा समय हो गया था। ऐसे में ‘बाबू’ की अम्मा की चिंता और बढ़ती जा रही थी। घर में दवा-दारु, लहसुन-प्याज और दाल में तड़का लगाना सब वर्जित था। भुनी हुई कलेजी और बाजार का समोसा-जलेबी बन्द हो जाने से बाबू की जीभ सुन्न होने लगी थी। फीका और उबला खाना बिल्कुल नहीं सुहा रहा था। बाऊजी को भी महीनों से घर का बना भोजन बेस्वाद लगने लगा था। वे अक्सर भोजन का एक निवाला मुंह में डालते ही बेटी सोनल पर चिल्ला पड़ते थे- " एक़रे लगे कवनो ढंग-सहूर नइखे, भोजन बनवले बाड़े कि आपन कपार... ले तेही खो "। कभी-कभी नाराज़ होकर भोजन की थाली उसके आगे ही पटक दिया करते। 

अम्मा को महरानी जी की शक्ति में जो अदम्य आस्था थी उसमें भयतत्व की प्रधानता थी। उन्हें घर के नेम-धरम और पूजा-पाठ में जो विश्वास था वह अशिक्षा और कर्मकांडी परंपराओं का पोसा-पाला हुआ था। लेकिन यह आस्था न हिलने वाली थी और विश्वास न डिगने वाला था। इसके अलावा उनके अंदर एक ग़ज़ब की अभिनय कला भी विद्यमान थी। अपनी अदाकारी से वो गुस्से में लाल-पीले हुए अपने ‘हुकुम’ को चुटकियों में मना लिया करतीं। बड़ी सफाई से वे पानी-पीढ़ा लगाती; बेना डुलाने बैठ जाती और ‘बड़ी माता’ के समय की आचार संहिता समझाते हुए सोनल का बनाया वही खाना उन्हें जिमा देती जो उन्हें थोड़ी देर पहले बेस्वाद लग रहा था।

लेकिन आज तो घर में खाने -पीने का बिल्कुल ही महौल नहीं था। बचिया की हालत देखकर सबको उबकाई आ रही थी। नाक दबाकर ही आना-जाना हो रहा था। बाबू तो घर छोड़कर बाजार का ही चक्कर लगा रहे थे। अलबत्ता महरानी जी के डर से बाहर का कुछ खाने की हिम्मत उन्हें भी नहीं थी। अभी बाबू और उसके पापा के खाने की चिंता गृहस्वामिनी को सता ही रही थी कि ऐन वक्त पर बचिया ने फिर उल्टी कर दी! उफ्फ...

इस बार उसके मुंह से लंबे-लंबे लच्छेदार जाला बाँधे हुए पीले रंग का मैगीनूडल्स जैसा कुछ बाहर निकला। पर बचिया ने तो ऐसा कुछ खाया ही नहीं था। बल्कि खाया तो उसने कुछ भी नहीं था। फिर यह लच्छे कैसे? 

दरअसल वे केंचुए थे जो उसकी आंत में न जाने कितने वर्षों से पल रहे थे। बढ़ते-बढ़ते उनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई थी कि अब उन्हें आँत में रहने लिए जगह नहीं बची थी। शायद इसीलिए उनमें से कुछ अपने लिए किसी और ठिकाने का रास्ता तलाशते उसके मुँह और गले के बीच में ही फँस गये थे। वह अपने एक हाथ से केंचुओं को खींच-खींच कर बाहर की तरफ़ झटक रही थी। वह इतनी कमजोर हो गयी थी खुद से उठकर उल्टी करने के लिये अपना मुंह खाट से बाहर नहीं लटका सकती थी। उसने उठने की कई कोशिशें की थी पर शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था। उल्टी सूखी हुई थी। उसमें कोई तरल पदार्थ नहीं थे, बल्कि सिर्फ केंचुए थे। उन लच्छों का कुछ हिस्सा दरी पर भी गिर गया था। हरदम साथ ही रहने वाली उसकी बहन ‘छोटिया’ ने उसे खाट से उठाने की बहुत कोशिश की, पर वह अकेले उसके मान में नहीं आयी।

बचिया की उल्टी देखकर कहीं बाऊजी को भी खाते समय उबकाई न आ जाय इसलिये अम्मा ने पीढ़ा और पानी का लोटा उठाया और सोनल से 'बाऊजी का भोजन कोठरी में ही ले आ' कहकर भीतर चली गईं। हुकुम के लिए कमरे में पानी-पीढ़ा लगाकर हाथ में बेना लिये वे उनके सामने बैठ गयीं। सोनल ने हाँफ़ती-काँपती बचिया को इशारे से बताया कि अभी जल्दी ही आयेगी और भोजन की थाली हाथ में उठाये झट से ओसारे से कोठरी की तरफ चल पड़ी। जबतक बाऊजी खाना खाते रहे तबतक वह भी वहीँ दोहरावन पूछने के लिये खड़ी रही।

बचिया अपनी कातर नजरों से निरीह अपराध भाव से चारों तरफ निहार रही थी – इस आस में कि शायद कोई उसकी पीठ पर थोड़ी थपकी दे दे और उसकी सांस स्थिर हो जाय। पर अफसोस! सभी व्यस्त थे। 

कुछ देर बाद सोनल जूठी थाली के साथ बाहर निकली। थरिया नल की तरफ टरका कर बचिया के बिछावन की तरफ बढ़ी। एक हाथ से उसे सहारा देकर उठाते हुये छोटिया से दरी खींच लेने को कहा। दोनों ने मिलकर बचिया को पानी से धो-पोछकर साफ किया। उल्टी से खराब हो गयी दरी को धुल कर धूप में सूखने के लिये डाल दिया। बचिया दरी के सूखने तक निखहरे खाट पर लेटी रही। उल्टी हो जाने के बाद उसकी बेचैनी थोड़ी कम हो गई थी। लेकिन मूज की रस्सी से बुनी खाट के ताने-बाने उसके फफोलों को चुभने लगे। फिर भी वह असक्त लेटी रही। आँगन में तार पर टंगी दरी की तरफ टकटकी लगाकर देखती रही। कुछ ही देर में कमजोरी और थकान ने तकलीफ़ पर बढ़त बना ली और वह बेदम होकर ऊँघने लगी।


अगले दिन महरानी जी का आसन उठ गया। उनकी बिदाई की तैयारी हो रही थी। बड़े सबेरे ही बाऊजी स्नान के बाद सफेद मर्दानी लपेटे, काँधे पर जनेऊ पहने छोटिया-छोटिया हाँक लगाये जा रहे थे। उन्हें अपने बालों में कंघी करनी थी और कंघी थी कि मिल ही नहीं रही थी। 

अम्मा तो बिल्कुल भी खाली न थी। उन्होंने बचिया की पसन्द के बहुत से सामान मंगा रखे थे। शीशा-कंघी, तेल-साबुन, नहाने के वास्ते नया बाल्टी-मग्गा, तौलिया, चप्पल, लाल रिबन, मोतियों की माला, काजल, इस्नो-पाउडर, खाने के लिये उसकी पसन्द के फल, मेवे और मिठाइयां, चावल-दाल-आटे का इन्तजाम तो था ही। इतना ही नहीं, उसकी पसन्द के कपड़े भी मंगा रखी थीं। खासतौर पर नीले रंग की एक फ्रॉक जो बचिया को बहुत दिनों से पहनने का मन था। अम्मा का मन बचिया के लिए आज बड़ा भावुक हो रहा था। उसकी ज़रूरत और पसंद का कहीं कोई सामान छूट न जाय इसके लिए वह याद कर-करके एक-एक चीज मँगवा रही थी। अब वह सयानी जो हो गई थी। 

दूर खड़ी ‘छोटिया’ सारा तमाशा आँखे फैलाये देख रही थी। बचिया के लिए इतना सारा सामान देखकर वह उलझन में पड़ गयी थी। सोच रही थी- अम्मा आज ब‍उरा ग‍इलि बा का!  

छोटिया का मन आज घर के किसी भी काम में नहीं लग रहा था। वह आज अपनी अम्मा की कही कोई बात भी नहीं सुन रही थी। आज पहली बार उसके मन में बचिया के प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हआ था जो उसके चेहरे पर भी साफ-साफ झलक रहा था। भला क्यों न होती डाह? उसे भी अपने लिये नयी फ्रॉक और चप्पल चाहिये थी। वह अम्मा से कई बार बोल चुकी थी- "एक ठो फराक हमहूँ के मँगवा देतू त घटि ज‍इतू! हमरा के त हरदम दीदी लोग के छोड़ने-छाड़न पहिरे के मीलेला।"  इतनी मिन्नतों के बाद भी अम्मा ने उसके लिये कुछ नहीं मँगवाया था। उधर जिस कंचे को खेलने के लिये बचिया अक्सर पिट जाया करती थी आज वही कंचे भी उसके लिए अम्मा ने ख़ुद ही मँगवा लिए थे!

अपने साथ अम्मा का सौतेला व्यवहार देखकर छोटिया आख़िर कबतक  चुप रहती! उसका मन आज पक चुका था। उसने ठान लिया कि अब वह किसी की कोई बात नहीं सुनने वाली और ना ही किसी का कहा कुछ करने वाली है। अपनी बात मनवाने के लिये घर का सारा काम छोड़कर वह ठनगन करने लगी। अम्मा को उसकी इतनी बेरुख़ी बिल्क़ुल भी नहीं भा रही थी। वो भी इस मौक़े पर जब महरानी जी की पूजा पर घर में आस-पड़ोस की ढेरो महिलाएँ भी मौजूद थीं। वह उसके ऊपर दाँत पीसतीं, आँखें दिखातीं और उन महिलाओं से छुप-छुपाकर किसी बात पर उसकी पीठ पर एकाध चटाका भी लगा देतीं।

आज ओसारा और आँगन से लेकर घर का कोना-कोना गोबर से लीपा गया था। मानों घर की पूरी गंदगी आज साफ हो गई हो। सारी अल्लाय मिट गयी हो। बाँस की पुरानी खाट एक कोने में खड़ी कर दी गयी थी। चिलचिलाती धूप में आँगन के बीचो-बीच एक नई चारपाई बिछी हुई थी जिसपर नया गद्दा और चमचमाती चादर भी डाली गयी थी। अम्मा एक-एक कर सारा सामान उसके आस-पास सजा रही थीं। 

मौक़ा पाकर छोटिया ने उन सामानों में से वो नीला फ़्रॉक निकाल कर कहीं और छुपा दिया था। जब घर के सभी लोग आँगन में हो रही पूजा-पाठ में व्यस्त हो गये थे तो छोटिया ने उस फ़्रॉक को पहन लिया और ओसारे में पड़ोस की आयी महिलाओं के बीच दुबक कर बैठ गई। सहसा अम्मा की नज़र छोटिया पर पड़ गयी। उसके शरीर पर नया वाला फ्रॉक देखकर वो तमतमा उठीं। बाघिन की तरह उस पर झपट पड़ी-  "रे अभागिन...जल्दी निकालु इ फराक...  नाहीं त ओकर आतमा एहरे भटकी आ तोके चैन से ज़ीये नाइ दी"। यह कहते हुए उसके गाल पर तड़ातड़ तमाचा जड़ने लगीं।

छोटिया भी चोट खाकर चीत्कार कर उठी - अब हमहूँ नाइ जीअब... मुआ दे हमहूँ के... ए जियले से निम्मन बा अम्मा कि हमहूँ मरि ज‍इतीं... तब तऽ ते हमरो ख़ातिर नाया फराक मंगवते न...?

 (रचना त्रिपाठी)

Saturday, February 20, 2016

स्वच्छता अभियान की जय हो

कूड़े वाली गाड़ी आयी 
रम पम पम... पों पों पों
कूड़ा हम उठायेंगे, लखनऊ स्वच्छ बनायेंगे...
रम पम पम... पों पों पों
तेज आवाज में यह गाना गाती और भोंपू बजाती हुई यह गाड़ी सुबह 8.30 से 9 बजे के बीच मोहल्ले में आती तो सभी घरों से लोग कूड़े के थैले लेकर बाहर आ जाते। घरों के बच्चे तो कौतूहल से गाड़ी देखने और उसका संगीत सुनने ही निकल पड़ते थे। बच्चों के साथ बड़े भी कुछ देर के लिए इस नज़ारे को देखने बालकनी में निकल आया करते थे। इस पूरे खेल में कुल 10-15 मिनट लगते थे।
कूड़े-कचरे के उन्मूलन के लिये नगर निगम द्वारा की गयी यह पहल बहुत ही सराहनीय है, और कामयाब होते भी दिख रही है।

पर पिछले दो चार दिनों से यह रोचक संगीत सुनने को नहीं मिल रहा है। पता चला कि एक दिन हमारी ही बिल्डिंग के एक महोदय ने गाड़ी वाले को ज़ोर से डाँट कर भोंपू बजाने से मना कर दिया। उसके भोंपू बजाने से उनकी सुबह की नींद में खलल पड़ रहा था। तबसे वह नहीं बजाता। नाइट ड्यूटी करने वालों की सुबह की नींद भी जरुरी है। ऐसे में कूड़े वाले का शोर मचाकर घर घर से कूड़ा इकठ्ठा करने का अभियान इनकी नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा था। सुविधा संपन्न लोगों को तो कमरे में विंडो ए.सी. की आवाज भी डिस्टर्ब कर देती है; भला इसके भोंपू की आवाज कैसे बर्दाश्त हो सकती है? अब गाड़ी रोज़ आती तो है पर चुपचाप। बच्चे दौड़कर बालकनी में उसे देखने नहीं जा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि कूड़े वाली ट्राली कब आयी और चली गई।

आज मैंने तय समय पर बालकनी से नीचे झाँककर देखा तो ट्राली नीचे खड़ी थी। घरों से कूड़े के थैले आ रहे थे। सड़क पर ट्रैफिक की आवाजाही के शोर-शराबे के बीच ट्रॉली में कूड़े के ढेर से सटकर गहरी नींद में सोता हुआ कर्मचारी दिखा। यह किसी भी आवाज से बिल्कुल बेखबर, बेसुध सा पड़ा था। कोई शोर उसे डिस्टर्ब नहीं कर पा रहा था।

मेरे मोहल्ले की सड़कें और पार्क जिसपर कचरे का ढेर लगा रहता था अब ज़्यादा साफ़-सुथरी दिखने लगीं हैं। जिसने बच्चों  के अंदर भी सफ़ाई के प्रति नई जागरूकता पैदा कर डाली है। स्वच्छता के प्रति बड़ों से ज़्यादा बच्चों में उत्साह, उमंग और प्रतिबद्धता देखने को मिल रही है। घर में वे अब सफ़ाई के प्रति सजग तो रहते ही हैं बाहर भी इस अभियान को सफल बनाने में उनका बहुत ज़्यादा सपोर्ट मिल रहा है। राह चलते सड़क पर हम बड़ों से यदि ग़लती से भी कोई अवांछित पदार्थ गिर जाय तो वे फ़ौरन हमारी भी क्लास लगा देते हैं। बाहर कार की खिड़की से खरीदी हुई आइसक्रीम का रैपर वे संभाल कर घर तक लाते हैं और डस्टबिन में ही डालते हैं। अब टोके जाने के डर से बड़े-बूढ़े भी ऐसा करने को मजबूर हैं। यह सकारात्मक बदलाव मन में आशा जगाता है कि शायद अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे।

(रचना त्रिपाठी)