Wednesday, May 27, 2015
मैगी-कांड के साइड-इफ़ेक्ट्स
Thursday, August 20, 2009
चम्पा आई रे...!
आज मैं बहुत खुश हूँ। मालूम है क्यों?
इसलिए नहीं कि किचेन में व्यस्त हूँ बल्कि इसलिए कि आज मेरी चम्पा आ रही है। अब आप पूछेंगे चम्पा कौन है?
अरे!.. वही जिसके रहने से मेरी आँखों में खुशियां हमेशा बरकरार रहती है। जिसके चले जाने से मुझे ब्लॉग देखे कई सप्ताह बीत गये हैं। आजकल मुझे अपने बीतते समय का पता ही नहीं चल रहा है। मेरे लिए दिन और रात दोनों एक ही समान हो गये है। कब आराम करना है और कब काम करना है, यह निश्चित ही नहीं हो पा रहा है। मुझे अब पता चला है कि मेरे घर में खुशियों के पीछे चम्पा की भूमिका कितनी है?
एक दिन भी अगर मुझे घर में अकेले रहना पड़ जाता है तो घर मुझे काटने को दौड़ता है। असल में मेरी ससुराल एक संयुक्त परिवार में है। अपने पति और बेटी-बेटे के अलावा घर में कुल तीन जोड़ी सास-ससुर, दो जोड़ी जेठ-जेठानी एक देवरानी, पाँच देवर (चार कुँआरे), व छ: भतीजे हैं। तीन ननदें भी हैं और इनसे छः भान्जे-भान्जियाँ। इन सबके बीच रह कर जो मजा मुझे आता है उसका वर्णन कठिन है। शायद आप आसानी से इसका अंदाजा भी नही लगा सकते। अब तो श्रीमानजी की सरकारी नौकरी के कारण मुझे अपने भरे पूरे घर को छोड़कर बाहर रहना पड़ता है। यह सारी चहल-पहल घर से दूर रह कर मैं बहुत मिस करती हूँ, लेकिन इस बात कि खुशी है कि मेरे पास घर के लोगों का बराबर आना-जाना लगा रहता है। घर से दूर होने के बावजूद उन लोगों का प्यार बना रहता है।
आजकल संगम नगरी में होने की वजह से सास-ससुर के अलावा गाँव में रहने वाले दूसरे लोगों की सेवा के अवसर भी मिलते रहते है। इलाहाबाद तीर्थ-स्थल तो है ही, साथ ही शिक्षा के लिए भी यह पूर्वी उत्तर प्रदेश का सर्वोत्तम शहर माना जाता है। इस शहर में कंपटीशन की तैयारी करने वाले हमारे अपने नाते-रिश्तेदार भी बहुत है इसलिए मुझे जब भी किसी चीज की जरूरत होती मै इन्हें बुला लिया करती हूँ। यह तो रही ससुराल वालों की उपस्थिति, लेकिन मायके का सुख भी यदा-कदा मिलता रहता है। पापा, मम्मी, छोटा भाई, भैया, दोनो भाभियाँ और भतीजे यहाँ-वहाँ मिलते ही रहते हैं। कुल मिलाकर अपनों के सानिध्य का सुख मिलता ही रहता है। लेकिन पिछले पन्द्रह दिनों से इस सुख में खलल पड़ गया है। इसकी वजह वही चम्पा है जो पहाड़ पर अपने गाँव चली गयी है। मैं इस समय सारा ध्यान किचेन की साफ-सफाई और पाक-कला में लगा रही हूँ।
जब मेरी चम्पा रहती है तो मुझे कुछ अलग तरह की खुशी होती है। तन को सुख और मन को शांति मिलती है, दिल को करार आता है। अपने बच्चे प्यारे लगने लगते है। पति महोदय पर भी कुछ ज्यादा प्यार आता है। घर की खुशियों में चार-चाँद लग जाता है। सब कुछ कूल-कूल लगता है। लेकिन जब वो नहीं है तो मेरी दुनिया ही सिमट गयी है...।
बहुत दिनों से ये कह रहे हैं चलो तुम्हें पिक्चर दिखा लाऊँ। सिविल लाइन्स चलकर सॉफ़्टी कॉर्नर की आइसक्रीम खिला लाऊँ। अब तो ‘कमीने’ भी लग गयी है और ‘लव आजकल” भी। बच्चों को कृष्ण जन्माष्टमी की झाँकी भी दिखानी थी, लेकिन यह सब कुछ नहीं हो सका, क्योंकि मैं किचेन में काफी व्यस्त हूँ।
आज मेरा भी मन हो रहा है बिग बाजार, मैक्डॉवेल्स और सिनेप्लेक्स जाने का, पिक्चर देखने और मौज-मस्ती से इश्क लड़ाने का...! मालूम है क्यों ? क्योंकि मेरी चम्पा आ रही है। अरे वही चम्पा जिसे हमने किचेन सम्हालने के लिए काम पर लगा रखा है। हमारी मेड-कम-कूक। बस इससे ज्यादा और कुछ नहीं। केवल सुबह-शाम एक-दो घण्टे के लिए आती है, लेकिन वो है बड़े काम की। जब तक उसने ‘ब्रेक’ नहीं लिया था तबतक मुझे इसका अन्दाजा भी नहीं था।
कोई भी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा, सबका अपना एक अलग महत्व होता है। घर में बच्चा हो या बड़ा, सबका एक अपना व्यक्तित्व होता है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ खास बात जरूर होती है। कौन इंसान किसके लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।
आज मुझे भी इस बात एहसास हुआ कि चम्पा जो चंद पैसों के लिए हमारे घर में काम करती है उसका होना भी हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है।
(रचना त्रिपाठी)
Saturday, June 6, 2009
हरा ही हरा… पर गाय ने नहीं चरा !? :(
सत्यार्थ के मुण्डन के उद्देश्य से गाँव जाना हुआ। करीब दस दिनों के बाद घर वापस आकर देख रही हूँ कि आस-पास काफी कुछ बदल गया है।
बेटे के सिर पर उग आयी फसल तो परम्परा के अनुसार कटवा- छँटवा कर ‘कोट माई’ के स्थान पर चढ़वा दिया। लेकिन इस अवधि में यहाँ घर के चारो तरफ खूब हरियाली उग आयी है- खर पतवार की। अवांछित घास-पात की बढ़वार से सब्जियाँ तो उसमें खो ही गयी हैं। घर के अंदर से लेकर बाहर तक और लॉन से लेकर किचेन गार्डेन तक हरा ही हरा दिख रहा है। जिस लॉन की हरियाली बनाये रखने के लिए मई के महीने में पानी दे-देकर मैं थक गयी थी, आज उसी लॉन में एक फिट लम्बी घास आ गयी है।
किचेन गार्डेन की हालत तो देखने लायक है। इसको गाय से बचाने के लिये महीनों पहले मेरे श्रीमान जी ने क्या-क्या जतन नहीं किए थे। गेट की सॉकल ठीक कराने के लिए लोक निर्माण विभाग को पत्र लिखा। नहीं बन सका तो उसे तार से बांधा, ईंट का ओट लगाया ताकि गेट को धकियाकर वह ‘शहरी बदमाश’ गाय अंदर न आ सके। लेकिन आज मन होता है कि गेट को खोलकर गाय-भैंसों को दावत दे दूँ। शायद मेरा काम थोड़ा हल्का ही कर जाँय। लेकिन अब तो गाय भी आने से रही। बाहर की सड़क पर ही अघा रही है।
फूलों में घास या घासों में फूल
मैं तुलसी तेरे आँगन की
भिण्डी का सत्यानाश
गाँव से लौटकर कितना काम बढ़ गया है मेरे जिम्में- घर की सफाई, खेती की निराई और इससे भी बड़ा मेरा ब्लॉग जो लम्बा अन्तराल ले चुका है। कैसे होगा ये सब? इसी में हफ़्तों से मेरे कई सीरियल भी छूट गये हैं। बेटी के ग्रीष्मावकाश का लम्बा होमवर्क भी पूरा कराना है। :(
ये कह रहे हैं, “बहुत कुछ गिना दिया जी… अब रहने भी दो…!”
“अच्छा रहने देती हूँ… ”
अरे वाह! बातों-बातों में मेरा एक काम तो पूरा ही हो गया। नहीं समझे…? अरे वही, ब्लॉग पोस्ट लिखने का…। ये दबाया मैने पब्लिश बटन…॥
॥
(रचना त्रिपाठी)
Tuesday, May 19, 2009
घर में ब्लॉगेरिया का प्रकोप …भूल गये बालम!!!
मैने सुना था कि आइंस्टीन अपने घर का पता ही भूल जाया करते थे। आज मेरे घर भी कुछ ऐसा अजीबोगरीब हादसा हुआ। यहाँ कसूरवार भौतिकी की कोई उलझन नहीं थी। …शायद ब्लॉगरी रही हो इसके पीछे। पढ़कर आप भी पूछेंगे जैसे मैं पूछ रही हूँ-
“क्या ब्लॉगरी करते-करते ऐसा भी हो जाया करता है?”
आज श्रीमान जी सुबह अच्छे भले उठे। अपना दैनिक कार्य किया और स्टेडियम खेलने भी गये। अपने समय से ऑफिस को निकल पड़े। दोपहर में ऑफिस से फोन आया।
पूछने लगे, “वहाँ कम्प्यूटर टेबल पर मेरे चश्में का शीशा है क्या?”
मैं दोपहर की मीठी नींद से उठी, मेज पर टटोल कर देखा फिर जवाब दिया, “ यहाँ तो नहीं है? क्या हुआ?”
“देखो, शायद फ्रिज के ऊपर या उसके कवर वाली जेब में हो”
“अच्छा…!! …यहाँ भी नहीं है जी। …आखिर बात क्या है”
“ओफ़्फ़ो…! ठीक से ढूँढो न, ”
“कहाँ खोजूँ…? …एक ही शीशा है कि दोनो…?” “…और चश्मा कहाँ है?”
“वो तो मेरे पास है…” “ अच्छा देखो… बैडमिण्टन किट की ऊपरी जेब में तलाशो।”
अरे, वहाँ कहाँ पहुँच जाएगा…? ….लीजिए, यहीं है। लेकिन एक ही शीशा तो है?”
“चलो ठीक है…” उन्होंने फोन काट दिया। मैं बच्चों को लेकर फिरसे सुलाने चली गयी।
? ? ? ? ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ? ? ? ?
शाम को जब ये ऑफिस से लौटे तो कुछ देर बाद मैंने चश्में के शीशे के बारे में जानना चाहा। जब पूरी कहानी मालूम हुई तो हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो गये।
हुआ यूँ कि इन्होंने धूप की वजह से ऑफिस के लिए पैदल न निकल कर स्कूटर से जाने की सोची और हमेशा की तरह आँखों को गर्म हवा से बचाने के लिये फोटोक्रोमेटिक चश्मा भी चढ़ा लिया। वो चश्मा जिसका एक शीशा बेवफाई करके सुबह-सुबह मेयो हाल में ही फ्रेम से अलग हो बैडमिन्टन-किट की जेब में दुबक गया था। मेरे श्रीमान जी को स्टेडियम से शीशाविहीन चश्मा लगाकर घर आने और फिरसे तैयार होकर ऑफिस जाने के समय दुबारा लगाते वक्त भी इस बात का पता नहीं चल पाया था।
बता रहे थे कि इन्हें ऑफिस में जब एक दो घण्टे का शुरुआती काम पूरा करने के बाद फुरसत मिली तब अचानक मेज पर रखे चश्में पर निगाह डालने पर अपनी भूल का ज्ञान हुआ… लिखने पढ़ने का काम तो ये बिना चश्में के ही करते हैं। केवल स्कूटर पर धूल, हवा और धूप से बचने के लिए ही लगाते हैं।
उसके बाद चश्में का बाँया शीशा अपने कार्यालय कक्ष में कई राउण्ड खोजते रहे। सारी फाइलें उलट-पलट कर देख डालीं। मेज कुर्सी के नीचे भी झाड़ू लगवाया। बॉस के कमरे में भी गये। वहाँ सबने मिलकर ढूँढा। सभी दराजें और रैक भी चेक कर लिए गये। इसी बहाने कम्प्यू्टर टेबल के पिछवाड़े जमी धूल भी साफ हो गयी। तीन चार चपरासी लगाये गये। ...लेकिन सब बेकार। अन्ततः नया शीशा लगवाने का निर्णय हुआ।
अब एक के चक्कर में दोनो शीशे नये लेने पड़ेंगे...। अचानक इन्हें सूझा कि एक बार घर पर भी पता कर लेना चाहिए। फोन पर डायरेक्शन देकर मुझसे खोज करायी गयी तो शीशा ऐसी जगह मिला जहाँ सबसे कम सम्भावना थी।
“तो क्या दो-दो बार स्कूटर चलाने पर भी काना चश्मा आपका ध्यानाकर्षण नहीं कर सका?”
“वही तो..., मैं भी हैरत में हूँ। मुझे पता क्यों नहीं चल सका?”
हँसते-हँसते मेरी हालत खस्ती हुई जा रही थी। तभी इन्होंने आखिरी बात बतायी-
“जानती हो, इसी बात का पता लगाने के लिए मैं ऑफिस से वापस आते वक्त भी यही चश्मा लगा कर आया हूँ। …शहर में स्कूटर की स्पीड इतनी तेज होती ही नहीं कि आँख पर हवा का दबाव महसूस हो। बिना नम्बर का सादा चश्मा ऐसी बेवकूफ़ी भी करा गया…”
“तो क्या बिलकुल अन्तर नहीं था दोनो आँखों में…?”
मुझे सबसे ज्यादा मजा तब आया जब इन्होंने बताया कि ध्यान देने पर एक आँख मे हवा लगती महसूस हो रही थी।
क्या आप इसे ब्लॉगेरिया नहीं कहेंगे?
दरअसल गलती मेरी ही थी। आज ऑफिस निकलते समय मैनें इन्हें ‘सी-ऑफ़’ नहीं किया था। शायद ‘किचेन गार्डेन’ में पानी लगा रही थी।
(रचना त्रिपाठी)
Tuesday, May 5, 2009
सब कुछ उल्टा-पुल्टा… पर अच्छा ही रहा।
आज रात की भयंकर आँधी ने मेरे घर की चार दिवारी को ढहा दिया। तूफ़ान ने किचेन गार्डेन को क्षत-विक्षत कर दिया। आधी रात को सोते वक्त दिवाल गिरने की आवाज सुनकर ही मन चिन्ताग्रस्त हो गया। मेरी सब्जी कैसे बचेगी..? …सवेरा होने का इन्तजार करते रात गुजरी।
….श्रीमानजी हमसे पहले ही बिस्तर से उठ गये थे। ….मैं भी उठने के बाद तुरन्त किचेन गार्डेन में पहुँची। देखा तो ये लगातार फ़ोन पर फ़ोन किये जा रहे हैं। ….इनके चेहरे से दीवार गिरने का दु:ख और मेरे श्रम से उगायी गयी साग-सब्जी के नुकसान होने की चिन्ता साफ़-साफ़ जाहिर हो रही थी।
लेकिन मुझे देखते ही वहाँ से मुस्कराते हुए अन्दर चले आये…। रोज की तरह चेहरे पर वेपरवाही का स्वांग रचते हुए मिठाई का डब्बा खोलकर टपा-टप एक वर्फ़ी और एक-दो बेसन के लड्डू मुँह में भर लिए।
मैंने पूछा, “चार दिवारी गिर जाने की इतनी खुशी हुई कि आज मंगलवार व्रत भी तोड़ दिया?
गलती की याद आयी तो मुंह बाये खड़े हो गये। …चलो कोई बात नही इतना तो चलता रहता है। बड़े हनुमान जी के मन्दिर का प्रसाद ही तो था।
…लेकिन मुझे देर हो रही है मैं खेलने जा रहा हूँ।
….अरे चाय तो पीते जाईए
…नही जी आज बहुत मिठाई खा लिया हूँ। चलता हूँ।
….डाक्टर ने कहा था क्या, सुबह-सुबह मिठाई खाने को…?
शायद इन्हें इस बात की चिन्ता सताये जा रही थी कि कहीं मैं इन्हें आज खेत में डन्डा लेकर खड़ा न कर दूं। पिछले तीन दिन से एक गाय हमारा गेट खोलकर भीतर आ जा रही थी और बैगन, नेनुआ और भिण्डी का काफी नुकसान कर चुकी थी। कुछ चरकर तो कुछ रौंदकर। गेट की सॉकल खराब हो गयी थी। इसे ठीक कराने की योजना बनायी जा रही थी तभी रात की आँधी ने और चिन्तित कर दिया।
ढह गयी दीवार | चर गयी गाय |
बच गयी भिण्डी | दब गये पौधे |
इनके मन की चिंता साफ़- साफ़ नजर आ रही थी। शायद इससे पीछा छुड़ाने के लिए इन्होनें जल्दी-जल्दी शॉर्ट्स-टीशर्ट चढ़ाया, कन्धे पर बैडमिन्टन किट लटकाया और स्कूटर की चाभी लेकर बाहर निकल गये। ….चाय बन गयी थी ….दौड़ कर देखा तो श्रीमानजी स्कूटर पर जमी धूल पोंछकर जाने की तैयारी में थे। बिना कंघी किये और बिना जूता पहने देखकर मैं समझ गयी कि मन ठिकाने पर नहीं है।
मैने कहा, “कम से कम जूता तो पहन ही लीजिए।”
महाशय मान गये स्कूटर बंद किए और मुस्कुराते हुए अन्दर आ गये। बचे हुए काम को पूरा करते हुए चाय भी पी लिए। पी.डब्ल्यू.डी. के जे.ई. साहब का फोन नहीं उठ रहा था। एक्सियन का उठ गया उन्हें दीवार की मरम्मत कराने का अनुरोध करते हुए ये बताना नहीं भूले कि काम तत्काल जरूरी है क्योंकि देर हुई तो श्रीमती जी की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। अब बात हो जाने के बाद इन्हें थोड़ी राहत मिल गयी।
मुझे भी अच्छा लगा और मन मे बेहद खुशी भी हुई… और क्यों ना हो? मेरे श्रीमान जी मेरे बारे में इतना सोचते जो हैं…।
(रचना)




