Friday, February 7, 2014

नेटजनित असाध्य रोग

आजकल एक ऐसी बीमारी का प्रादुर्भाव हो गया है जो 13 साल के नवयुवक से लेकर 73 साल के बुजुर्गो में पायी जा रही है। इस बीमारी का प्रकोप फेसबुक के माध्यम से हुआ है जिसका हाल ही में नामकरण किया गया है  ‘लाइकेरिया’। इसका संबंध बनस्पति विज्ञान से संबंधित किसी पेड़-पौधे से नहीं है। इसे अंग्रेजी के ‘लाइक’ शब्द से लिया गया है। फेसबुक पर इस रोग की तीव्रता नापने का ‘लाइकोमीटर’ तो बना है, लेकिन इसका कोई इलाज नहीं ढूँढा जा सका है। डाक्टरों के मुताविक यह बीमारी छूआ-छूत से नहीं वरन्‌ मात्र देखा-देखी से उत्पन्न हो जाती है। पहले यह बीमारी मुख्य रूप से शहरों के उन कंप्यूटरधारक मनुष्यों के बीच फैली जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन होता था। तब इसे मधुमेह और रक्तचाप की तरह अमीरों की बीमारी कहा जा सकता था; लेकिन इस बीमारी के किटाणुओं ने मोबाइल फोन्स के जरिये अपना प्रसार तेजी से करना शुरू किया जिसमें एंड्रायड की भूमिका तगड़े उत्प्रेरक की हो गयी।

अब इस बीमारी ने शहरों के साथ-साथ गांवों में भी पैर पसार लिया है। यह महामारी बहुत तेजी से फैल रही है। इसकी चपेट में न सिर्फ़ विद्यार्थी और कामकाजी नौजवान आ रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में मध्यम वर्गीय गृहिणियाँ भी इसका शिकार हो रही हैं। इसकी रोक-थाम करने में सरकार भी फेल होती नजर आ रही है। बल्कि सरकार का ध्यान इस ओर गया ही नहीं है जो जाने-अनजाने इसके प्रसार में सहयोग प्रदान कर रही है। लोगों में इस बीमारी के प्रति जो आकर्षण है वह किसी नशे से कम नहीं है। इसे पकड़ लेने के लिए सबके बीच एक होड़ मची हुई है।

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते ही जिस बीमारी के पकड़ने का डर पहले हुआ करता था उसे नाम दिया गया - लवेरिया। इस बीमारी की चपेट में किशोर-किशोरी कब आ जाते हैं उन्हें खुद भी पता नहीं चल पाता। जब पता चलता है तो बहुत देर हो गयी रहती है। इस उम्र के बच्चों के सभी अभिभावको को यह चिंता सताती है कि कहीं उनका बच्चा लव-वब के चक्कर में न पड़ जाय। यह अकेली एक ऐसी बीमारी है जिस पर पूरे समाज का पहरा लगा रहता है; लेकिन फिर भी यह सेंध मार कर अपना असर छोड़ ही जाती है। लाख पहरे के बावजूद लवेरिया जैसी महामारी से कच्ची उम्र में पार-पाना मुश्किल ही रहता है। लेकिन अब लाइकेरिया नामक नयी बीमारी इस रोग को पीछे छोड़ती जा रही है। अब बच्चों को एक जगह अटकने का कोई स्कोप ही नहीं रहा। उनके मित्रों की संख्या अब एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों में होती है जो लगातार बढ़ती रहती है। बीच-बीच में कुछ लोग अमित्र भी कर दिये जाते हैं। इस तरह देखा जाय तो प्रेम-व्यवहार की दुनिया में बहुत तेजी से परिवर्तन आ गया है। यह लाइकेरिया का सकारात्मक पहलू माना जा सकता है।

हम पर ईश्वर की बड़ी कृपा रही कि हम भी इस बीमारी की चपेट में बहुत बार आते-आते बच गये। इस रोग की एकाध चिनगारी उठी भी तो अफसोस! उसे पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाया। इस दौर से गुजरने के बावजूद मुझे लाइकेरिया से ग्रसित नहीं होना पड़ा। लेकिन इसका कारण है एक दूसरी बीमारी जो है तो टुच्ची सी लेकिन मुझे लाइकेरिया से बचाये रखती है; और फिलहाल हल्के नशे की तरह आनन्द भी दे रही है। यह बीमारी कुछ साल पहले मेरे पतिदेव को लगी थी, उन्हीं से मुझे मिल गयी। इसका नाम है- ‘ब्लॉगेरिया’। एक जमाने में इसका जोर भी बहुत बढ़ गया था लेकिन इस मुए फेसबुक वाली लाइकेरिया ने इसे धकिया कर किनारे कर दिया है। अब मैं भी ब्लॉगेरिया से आए-दिन तौबा करती रहती हूं लेकिन यह छोड़ने का नाम ही नहीं लेती। जब देखो तब यह हमें ऊल-जुलुल लिखने को मजबूर करती रहती है।

सरकार ने मलेरिया और फाइलेरिया जैसे रोगों पर नियंत्रण के लिए तमाम अभियान चला रखे हैं और इसके सकारात्मक परिणाम भी आये हैं। इनका आक्रमण अब पढ़े-लिखे मध्यम वर्गीय युवाओं पर प्रायः मंद पड़ गया है। लेकिन इन नये रोगों की गिरफ़्त में आ गये लोगों पर कुढ़ रहे डाक्टर हाथ पर हाथ रखे मरीजो का इंतजार करते हैं कि वह कंप्यूटर और मोबाइल की फेसबुक से उठे तो कुछ बात बने।

(रचना त्रिपाठी)

6 comments:

  1. यह मर्ज़ लाइलाज़ है !

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  2. ‘ब्लॉगेरिया’ बरकरार रहे बाकी सब बीमारियां तो ऐं-वैं टाइप हैं।

    लिखना जारी रहे तो बाकी सब तो अपने आप होता रहता है। :)

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  3. आपको यह बीमारी नहीं है। हाँ, लेखनी में बीमार कर देने की क्षमता लगती है। सतर्क रहना पड़ेगा। :)

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  4. मौलिक उद्भावनाएँ! काश यह ब्लॉगेरिआ एपेडेमिक हो जाय आपके सौजन्य से ! :-)

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  5. खूब बीमारी पकड़ी है आपने :)

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  6. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (14.02.2014) को " "फूलों के रंग से" ( चर्चा -1523 )" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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