Thursday, January 16, 2014

हाउसवाइफ मतलब हरफ़नमौला

आज सबेरे –सबेरे फोन पर पति को न्यूज सुनाने लगी, “अब देवयानी के पिताजी भी लोक सभा चुनाव लड़ेंगे।” इन्होंने झट से जवाब दिया, “बिल्कुल लड़ना चाहिए।”  हमने पूछा- क्यों? देवयानी प्रकरण के बाद उनका चुनाव लड़ना जरूरी हो गया क्या? बोले, “अरे! क्या बात करती हो; रिटायर्ड आइ.ए.एस. हैं, पढ़े लिखे आदमी हैं, योग्यता रखते हैं; तो क्यों नहीं चुनाव लड़े?”
इसपर हमने भी हाउसवाइफ होने के अधार पर अपनी तरफ से चुनाव लड़ने की दावेदारी ठोंक दी, “तब तो मुझे भी चुनाव लड़ना चाहिए, आखिर मै हाउस वाइफ हूँ।” इन्होंने जवाब दिया, “हाउस वाइफ होना कौन सा क्वालिफिकेशन है? घूरा- गन्ह‍उरा टाइप महिलाएं भी हाउसवाइफ हो जाती हैं। यह ऑक्युपेशन तो बाई डिफाल्ट मिल जाता है।
बताइए भला! एक घर चलाने में जाने कितनी कलाओं का प्रयोग करना पड़ता है। इसके लिए गणित-विज्ञान की जरूरत तो पड़ती ही है, माहौल अच्छा रखने के लिए जितनी जरूरत संगीत- नृत्य और साहित्य की पड़ती है उतनी ही स्वास्थ्य और सफाई के लिए केमेस्ट्री-बॉयलोजी की भी पड़ती है। घर का बजट बनाने और लागू करने में हम गृहिणियां जितनी चतुराई, दूरदर्शिता और अनुशासन का परिचय देती हैं उतना तो कोई सरकार भी नहीं करती। अचानक कहाँ कब किस ज्ञान का प्रयोग करना पड़े यह एक हाउसवाइफ ही बता सकती है। रही बात पॉलिटिक्स की, तो पहले एक संयुक्त परिवार में सास-ननद, देवरानी-जेठानी, चाची-बुआ, देवर-भसुर-ससुर और न जाने कितने चचेरे-ममेरे-फुफेरे रिश्तों के साथ निबाह कर और अब अपार्टमेंट की सोसायटी में रहकर थोड़ी-बहुत पॉलिटिक्स का अनुभव और ज्ञान भी रखने लगी हूँ। अपने परिवार में ही एक बार मुझे पॉलीटिशियन होने की उपाधि भी मिल चुकी है। (हालांकि उस समय मुझे यह उपाधि बहुत अच्छी नहीं लगी थी।) मैंने यह सीखा कि एक संयुक्त परिवार रहते हुए यदि आपका बटुआ भारी है तो परिवार के जितने सदस्य बेरोजगार रहते हैं वे हर समय आपकी दरियादिली और अपनी वफादारी की दुहाई दे-देकर तब-तक सटे रहते हैं जब-तक की उनकी अपनी जड़ मजबूत न हो जाय। यही हाल तो बाहरी समाज और पॉलिटिक्स का भी है। इतने सारे अनुभव के बाद हमें लगता है कि एक संयुक्त परिवार में प्रभावशाली बने रहना किसी राजनीतिक सत्ता में बने रहने से कम नहीं होता है।
तो अब बताइए कौन सा क्षेत्र छूट रहा है जिसमें एक हाउसवाइफ अच्छा नहीं कर सकती। क्या चुनाव लड़ने के लिए किसी असली पॉलिटिकल बैकग्राउन्ड का होना जरूरी है? अथवा आइ.ए.एस. - आइ.पी.एस. या किसी दूसरी सेवा में होना?
(रचना त्रिपाठी)

10 comments:

  1. बहुत से कामकाजी स्त्री /पुरुषों को देख कर लगता है कि इनसे तो हम गृहिणियां लाख बेहतर/स्वतंत्र हैं।

    ReplyDelete
  2. वैसे तो आपने जो आधार गिनाए हैं वह योग्यता के लिहाज़ से काफ़ी नहीं, कुछ अधिक ही हैं, पर बुनियादी बात ये है कि योग्यता के आधार पर चुनाव लड़े कहां जाते हैं और योग्यता के आधार पर वोट ही कौन देता है?

    ReplyDelete
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मौसम है शायराना - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  4. "रही बात पॉलिटिक्स की, तो पहले एक संयुक्त परिवार में सास-ननद, देवरानी-जेठानी, चाची-बुआ, देवर-भसुर-ससुर और न जाने कितने चचेरे-ममेरे-फुफेरे रिश्तों के साथ निबाह कर और अब अपार्टमेंट की सोसायटी में रहकर थोड़ी-बहुत पॉलिटिक्स का अनुभव और ज्ञान भी रखने लगी हूँ।" sach me aanand aa gaya aapko padh kar ,ab follow karungi ,likhati rahiyega :)

    ReplyDelete
  5. bilkul sahi kaha...sateek prastuti....par fir bhi hum house wifes ko kam hi anka jata hai....

    ReplyDelete
  6. Excellent. My wife is also impressed with the contents of the article. Now it's time for Siddarth Babu to react on his comment.

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी टिप्पणी थी- “हाउस वाइफ होना कौन सा क्वालिफिकेशन है? घूरा- गन्ह‍उरा टाइप महिलाएं भी हाउसवाइफ हो जाती हैं। यह ऑक्युपेशन तो बाई डिफाल्ट मिल जाता है।”

      मैं अभी भी इसपर कायम हूँ। हाउसवाइफ होने के लिए कोई अलग से पढ़ाई नहीं करनी होती और न ही कोई परीक्षा लेकर प्रमाणपत्र दिया जाता है। प्रायः सभी लड़कियों की शादी हो ही जाती है। यदि वे खुद ही मना न कर दें। शादी होते ही हाउसवाइफ का जॉब मिल ही जाता है-बाई डिफाल्ट।
      हाँ, एक ‘सफल’ हाउसवाइफ बनने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं, उसके बावजूद यदि घर के दूसरे सदस्यों का सहयोग न मिले तो उसकी सफलता सदैव संदिग्ध बनी रहती है।
      मैं यह भी मानता हूँ कि एक सफल हाउसवाइफ़ होना राजनीति के क्षेत्र में भी सफल होने कॊ कोई गारंटी नहीं है। एक फिल्मी डायलॉग का सहारा लूँ तो कहूँगा कि एक हाउसवाइफ़ नेता बनने के लिए सारी काबिलियत तो ला सकती है लेकिन वह कमीनापन कहाँ से लाएगी।

      Delete
  7. सही कहा आपने। घर चलाना सरकार चलाने से कम कठिन नहीं होता।
    महिलाओं की सहज बुद्धि अच्छी होती है। वे चुनाव लड़ने की उपयुक्त पात्रा होती हैं।

    बढिया लेख।

    ReplyDelete
  8. भारतीय परिवारों -सामाजिक संरचना में हाऊस वाईफ के लिए किये गए योगदान को कभी भी गम्भीरता पूर्वक नहीं लिया गया है!
    आपकी पोस्ट सोचने पर विवश करती है !

    ReplyDelete
  9. सोचने पर विवश करती है पोस्ट

    ReplyDelete

आपकी शालीन और रचनात्मक प्रतिक्रिया हमारे लिए पथप्रदर्शक का काम करेगी। अग्रिम धन्यवाद।