Monday, July 21, 2014

लखनऊ की मुलायम जनता

राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके में गुरुवार को एक महिला के साथ दुस्साहसिक कांड ने रोंगटे खड़े दिए। जिस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के आगमन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी उसी समय  उसी थानाक्षेत्र के बलसिंह खेड़ा गांव के बाहर स्थित प्राथमिक बिद्यालय के परिसर में एक महिला के साथ दरिंदगी की हर हद पार कर इस प्रदेश के साथ देश की इज्जत भी तार-तार हो रही थी।

एक साल पहले की बात है दिल्ली में “निर्भया काण्ड” के दामिनी को इसी तरह से दरिंदगी का शिकार बनाया गया; जिसकी पीड़ा को पूरे देश ने महसूस किया। इस घटना से उद्वेलित दिल्ली के लोगों की संवेदनाएं ज्वालामुखी बन कर सड़क पर उतर आयीं; जिसकी लपटों ने सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के कोनें-कोनें को प्रभावित किया। उसका परिणाम यह हुआ कि उस घटना को अंजाम देने वाले सभी अपराधी पकड़े गये, और सबको “फास्ट ट्रैक कोर्ट” द्वारा त्वरित कार्यवाही कर सजा भी सुना दी गयी।

एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मानवता की सारी हदें पार कर उसी तरह की घटना दुहराई गई है। उस निर्वस्त्र महिला की लाश के साथ जिस तरीके से पुलिस पेश आयी है वह और भी शर्मसार कर देने वाली हरकत है। घंटो उस लाश को पुलिस और मीडिया उलट–पलट कर अपनी आंखे सेकती रहीं; फोटो खींचती रही लेकिन उस लहूलुहान पड़ी लाश पर दो गज कपड़ा नहीं डाल सकी।

यह वही प्रदेश है जहाँ के युवा मुख्यमंत्री के सहयोगी एक नौजवान मंत्री ने बयान दिया था कि- “हर एक लड़की के पीछे पुलिस नहीं लगायी जा सकती।” राजनीति के शीर्ष पर बैठे प्रभु-वर्ग के लोग लड़कियों के चाल-चलन, पहनावे-ओढ़ावे को लेकर अजीब तरीके की बयानबाजी करते- फिरते हैं। मै पूछती हूँ कि हर एक लड़की के पीछे अगर पुलिस नहीं लगायी जा सकती, तो क्या एक लड़की के पीछे दस गुंडों को खुलेआम दुष्कर्म करने से रोका भी नहीं जा सकता है क्या…? उस समय पुलिस कहाँ रहती है जिस समय किसी के घर की बेटी, बहन, बहू लूटी जाती है…? हैरत है कि इस जघन्य घटना के बाद यहाँ के लोगों को साँप सूंघ गया या उनके दिल भी “मुलायम” हो गये हैं…?

जिस तरह से आये दिन यहाँ छेड़खानी, ब्लात्कार ,एसिड अटैक और हत्या जैसे जघन्य अपराध हो रहे हैं, उससे यहाँ पर रहने वाले लोगों के बारे में यही कहा जा सकता है कि सभी कमजोर, स्वार्थी, बुजदिल, कायर व डरपोक हैं; या इनकी संवेदनाएं कहीं किसी कोने में पड़े दम तोड़ रही हैं। इन्हें इन सभी न्यूनताओं से नवाजा जाय तो भी कम है।

यह सरकार लोकशाही के नाम पर मिले जनमत के उन्माद में रात–दिन अपनी काली करतूतों को अपने कुर्ते की तरह सफेद बताने में लगी रहती है। इसके अंदर संवेदनहीनता और निरंकुशता कूट-कूट कर भरी हुई है। यहाँ के लोगों पर इसके निक्कम्मेपन और गुंडई का प्रभाव इस कदर पड़ा है कि सबने मानो चूड़ियाँ पहन रखी हैं। जिसमें पुलिस भी जनता के प्रति अपनी कर्तब्य को ताख पर रख कर इनके हर गलत कार्यों पर पर्दा डालने का काम कर रही है। इस दुधमुँही सरकार को और क्या कहा जा सकता है…? जिसकी न तो अपने राज्य के लिए कोई प्रगतिशील सोच है और ना ही इस तरह के अपराध को रोकने के लिए कोई इच्छाशक्ति ही है।

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, July 15, 2014

उत्पीड़न का विरोध जरूरी है

एक साधारण परिवार में पैदा हुई, पली-बढ़ी, मात्र स्नातक की डिग्री प्राप्त तारा के अंदर अपने परिवार के विरुद्ध इतना बड़ा फैसला लेने की हिम्मत कहां से आयी...? पूरे गांव में चर्चा का विषय ही यही था–“तारा आज कितने बजे सो कर उठी; कहां गई; क्या खाया, क्या किया? ” उसकी माँ के ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। शादी को एक साल हो गए है। वह ससुराल में कुल आठ-दस दिन रहने के बाद अपने भाई को बुलाकर उसके साथ मायके वापस लौट आयी थी। उसके घरवालों से लेकर सगे संबंधियों को भी उसका इस तरह बिना शुभ मुहूर्त के ससुराल से लौट आना बहुत ही बेतुका और चिंताजनक लगने लगा था। गाँव वाले तरह-तरह की बाते करने लगे थे।

उसकी माँ तो उस दिन से लेकर आजतक उसे बिना नागा, कोसा करती - “चोटही! जाने कौन-कौन से दिन दिखाएगी मुझे! किस राजवाड़े के घर जाती, जहां तुझे सात बजे तक सोने को मिलता, ससुराल और नईहर में यही तो अंतर है !”

वह अपनी माँ को टन्न से जवाब देती- “तो तू ही चली जा मेरी जगह, लगी रहना नौकरानी की तरह सुबह चार बजे से लेकर रात को बारह बजे तक।

“जीवन भर यहीं पड़ेगी रहेगी, हमारी छाती पर मूंग दलने के लिए हरामजादी !!! जो जानती कि मुझे यह दिन दिखाएगी, तो पैदा होते ही गला घोंट देती।”

“तो अब से घोंट दे…! नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी! और कान खोलकर सुन लें जबतक “छोटकी” रहेगी तबतक तो किसी कीमत पर नहीं जाउँगी!”

छोटकी - उसके पति की छोटी बहन जो उसे सुबह जगाने से लेकर उठना, बैठना, चलना, घूंघट करना आदि तमाम बातों के लिए पल-पल टोकती और सिखाती रहती थी।

तारा को अपनी छोटी ननद के द्वारा अपने ऊपर किये जा रहे अनुशासन बिल्कुल पसंद नहीं थे। उसकी ननद सुबह चार बजे ही दरवाजा खटखटाकर उसे जगा देती और खुद तनकर सो जाती। तारा का कहना था कि-“ मेरी आदत नहीं है कि देर रात तक जगूं भी और सुबह जल्दी उठ जाऊँ। ...मुझपर इस तरह की हु्कूमत नहीं चलेगी उसकी। छोटी है छोटी की तरह रहे।”

उसके श्वसुर इस बीच कई बार आए और उसे बहुत समझाने की कोशिश की- “लौट चलो!” यहां तक कि उसे तलाक की धमकी भी मिली । लेकिन उसने किसी की एक न सुनी और अपनी जिद्द पर अड़ी रही। आज अपनी शर्तों पर ससुराल जाने के लिए तैयार हो गई। उसने अपने श्वसुर से कह दिया- “आप अपनी छोटी बेटी को यह समझाएं कि वह हमें सुबह जगने का आदेश न दिया करें..या पहले उनकी शादी करके उन्हें ससुराल भेज दें, उसके बाद मुझे बुलाए।” अंततः उन्होंने उसकी शर्त मंजूर कर ली और बोले- “ बेटी की शादी इतनी जल्दी तो नहीं कर पाउँगा; लेकिन तुम्हें जैसे अच्छा लगे वैसे रहना। मै छुटकी को समझाउँगा कि वह तुमपर शासन न चलाया करे।”

उस लड़की का आत्मविश्वास देखकर मै बहुत खुश हूं और आश्चर्यचकित भी। परिवर्तन के इस दौर को देखकर गाँव वालों को भी खुश होना चाहिए; लेकिन वे तो उल्टा उसे ‘कोसे’ जा रहे हैं- “बड़ी नकचढ़ी है ! आखिर अपनी वाली ही करके मानी।”

(रचना त्रिपाठी)                             

Saturday, July 12, 2014

गरीबों के अच्छे दिन

इस बार के बजट में सरकार द्वारा गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखाये गये रहमों-करम को देखकर यह कहा जा सकता है कि गरीब मजदूर, ठेले-खोमचे वाले, रिक्शा चालक, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के भी अच्छे दिन आ गए हैं। इन्हें टैक्स-वैक्स से तो कोई वास्ता है नहीं। वरना यह बीमारी इन गरीबों के लिए लाइलाज ही साबित होती। इसके बावजूद कुछ लोगों का कहना है- ‘बेचारे इनके तो अच्छे दिन अभी गच्चे में हैं !’ ये क्या जाने अर्थ व्यवस्था का विकास…? इन्हें तो पता है बस वही ‘माटी –कानों और रोटी-पानी !’

गरीबी तो खुद ही एक बीमारी है लेकिन सरकार ने सोचा कि इस बीमारी का एक बड़ा कारण है नशा ! जैसा कि कई बार सर्वेक्षणों में भी देखा गया है- गुटका, खैनी, तंबाकू इत्यादि का सेवन गरीब तबके के लोग ज्यादा करते हैं। कारण जो भी हो, मुझे तो लगता है ये वर्ग अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह से न कर पाने की वजह से इन नशीले पदार्थों का सेवन मजबूरी में करते हैं। अज्ञानता वश कहें या अपना ग़म गलत करने के लिए। यह भी सुना है कि इन पदार्थों का सेवन करने के बाद भूख कम हो जाती है। लेकिन इससे ये भयंकर बीमारी की चपेट में भी आ जाते हैं। अच्छा हुआ जो ये नशीले पदार्थ महंगे हो गए। पेट के वास्ते कुछ तो संयम इन्हें भी बरतना ही पड़ेगा। भले ही नशे की महंगाई की वजह से मजबूरी वश ही सही!

इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने जो कदम उठाएं हैं उसे अच्छा ही कहेंगे। ऐसे लोग जूते-चप्पल पहने ना पहने क्या फर्क पड़ता है इन पर। मगर अपने ‘पेट’ को कहां रखे बेचारे! जहां जाते है वहीं गले पड़ा रहता है। अगर पेट में कुछ नहीं गया तो इनका और इनके बच्चों का क्या होगा…? फिर तो ये कुपोषण के शिकार हो जाएंगे, ऐसे में इस सरकार का इनकी स्वास्थ्य की ‘चिंता’ करना बहुत बड़ी बात है। इस पर भी अगर लोग कहें कि इन बेचारों के अच्छे दिन तो अभी पिच्छे ही हैं तो यह सरकार के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी…

गरीब वर्ग जो दो वक्त की रोटी-प्याज का जुगाड़ न कर पाए तो उसे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में मिलने वाली ‘मल्टी-विटामिन्स’ की गोलियाँ किस दिन काम आएंगी? आखिर इसी दिन के लिए तो ये सुविधाएं उपलब्ध करायी गई हैं। जितना दिन मेहनत-मजदूरी करके मिले, रोटी-प्याज खाएं… न मिले तो सरकार द्वारा उपलब्ध मल्टी-विटामिन्स का सेवन करें…भूख से पेट में मरोड़ होने लगे, सिर चकराने लगे या गला सूखने जैसा कुछ लक्षण दिखने लगे तो सरकारी अस्पताल में उपलब्ध मुफ्त के बिस्तर पर लेट जाएँ और “बोतल” चढ़वाएं। बोतल यानि  “ग्लूकोज़ ड्रिप”। इससे भी बात न बने तो तेल और माचिस भी तो सस्ते हो गये…! “ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी”

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, June 25, 2014

रक्षक ही बने भक्षक

काश हमारे पास भी इतनी हिम्मत होती कि हम उस पुलिस वाले के नाजायज तरीके से बाइक उठा ले जाने पर पुलिस चौकी के सामने धरना ही दे सकते! लेकिन हमें केजरीवाल बनने के लिए अभी कई जनम लेने पड़ेंगे। ऐसे धरने का हश्र देखकर तो कोई समर्थक भी नहीं मिलेगा।

हमारे घर आए हुए एक संबंधी ने अपनी बाइक ऍपार्टमेन्ट बिल्डिंग के नीचे खड़ी की थी जिसे एक पुलिस वाला रात में करीब दस से ग्यारह बजे के बीच उठा ले गया। सुबह बाइक गायब देखकर सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड से हमने पूछा - “बाइक कहां गई..?”

उसने बताया- “पुलिस वाले आए थे, ले गये।”

“तुमने रोका नहीं?” मैंने व्यग्र होकर पूछा।

“हमने रोका,  मगर वे बोले… पूछेंगे तब बताना कि पुलिस चौकी पर आकर ले जाएं।”

“लेकिन वे बाइक को ले कैसे गये? चाभी तो हमारे पास है!” मेरे संबंधी ने आश्चर्य व्यक्त किया।

“उनके पास एक चाभी थी उसी से स्टार्ट हो गयी तो लेकर चले गये” - गार्ड ने बताया।

“क्या बाइक गलत तरीके से पार्क की गई थी?” मैंने गार्ड से पूछा।

“नहीं तो, सड़क के इसी किनारे खड़ी थी जहां रोज बहुत सी गाडि़याँ खड़ी होती हैं। यहाँ और भी गाडियां पहले से खड़ी थीं जिसमें कुछ फोर-व्हीलर्स भी थीं।”

वह तो हम भी रोज देखते हैं। जिन गाड़ियों ब्लैक फिल्म भी लगी रहती हैं वह उन्हें नहीं दिखाई देता; “लेकिन सिर्फ हमारी बाइक ही क्यों ले गये, वह भी बिना कसूर बताए?”

गॉर्ड ने बताया कि उस सिपाही ने और भी गाड़ियों में अपनी चाभी लगाने की कोशिश की लेकिन लगी नहीं। उसी बाइक में चाभी लग गयी तो लेकर चले गये।

इसका मतलब तो यह हुआ कि सिपाही के रूप में वह कोई बाइक चोर था जो टोक दिये जाने पर सिपाही की भूमिका निभाने लगा। फिलहाल इस बार तो गॉर्ड ने देख लिया था। अगर उस गाड़ी को ले जाते किसी ने नहीं देखा होता तो हम यही समझते कि गाड़ी चोरी हो गयी। उसके बाद हम पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते रहते। एफ़.आई.आर. दर्ज कराने में भी पसीने छूट जाते।

ऐसे में क्या उस पुलिस वाले के ऊपर एफ.आई.आर. नहीं दर्ज होनी चाहिए?

मै तो पुलिस की इस हरकत पर आग-बबूला थी। मगर जिनकी बाइक थी उन्होंने कहा- “हम चाह कर भी इस समय कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि वे हमारे खिलाफ कोई भी चार्ज लगा देंगे, फिर हमें महंगा पड़ जाएगा इनसे बहस करना”

वे अपनी गाड़ी लेने पुलिस चौकी पर गये तो उस सिपाही ने उनसे गाड़ी का कागज मांगा जो उनके पास मौजूद था। जब कागज में कोई कमी नहीं मिली तो उसने देर रात तक वहां गाड़ी नहीं खड़ी करने की हिदायत देते हुए वापस ले जाने की अनुमति दे दी। लेकिन जब इन्होंने बाइक स्टार्ट किया तो पता चला कि उसी शाम फुल करायी गयी टंकी का सारा पेट्रोल गायब था। वे सिपाही से तेल निकाल लेने की बात पूछ बैठे। इसपर पुलिस वाला भड़क गया।

“आप हम पर तेल चुराने का इल्जाम लगा रहें हैं! एक तो आप लोग रात-भर गाड़ी लावारिस छोड़ देते हैं। अब सुबह आ रहे हैं.. मैं रातभर बाइक की रखवाली के चक्कर में सोया नहीं।” उसने तैश में जेब से रूपये निकाले, “आज रात छ: सौ कमाया था; ये लीजिए दो सौ रुपए अपने पेट्रोल का दाम। लेकिन बाइक यहीं छोड़ जाइए। अब चालान करूंगा। आप इसे कोर्ट से छुड़ा लीजिएगा। जब कोर्ट के चक्कर काटेंगे तब सारी अकड़ हवा हो जाएगी।”

इसके बाद बाइक छुड़ाने के लिए इन्होंने कितनी मिन्नते की और कैसे सफल हुए इसकी कल्पना ही की जा सकती है। यह सब एक आम आदमी को दहशत में डालने के लिए काफी है।

अभी करीब दो महीने पहले की बात है। हमारी बिल्डिंग के गेट के सामने एक नयी चमचाती हुई बड़ी और महंगी गाड़ी खड़ी हुई तो घंटो लावारिस हालत में पड़ी रही। बिल्डिंग के लोगों को पार्किंग बेसमेन्ट से गाड़ियाँ निकालने में परेशानी होती रही। तंग आकर बिल्डिंग के ही एक सदस्य ने गेट पर से वह गाड़ी हटवाने की कोशिश की तो अचानक शराब के नशे में धुत्त चार-पांच लड़के प्रकट हो गये और उन्हें बुरी तरह मार-पीट कर उनकी जेब से रुपए और उनकी चेन भी छीन ले गये। बिल्डिंग का गार्ड जब बीच-बचाव को दौड़ा तो उसे भी मार खानी पड़ी। वह क्रूरता का यह खेल बेचारगी में देखता रहा। जबतक दूसरे लोग आवाज सुनकर नीचे आये तबतक वे सभी भाग निकले, लेकिन उनकी गाड़ी को कुछ लोगों ने घेर कर पंचर कर दिया। इसके बाद सौ मीटर दूर स्थित पुलिस चौकी से पुलिस वाले भी मौके पर पहुँच गये।

हम लोगों ने उम्मीद तो यही किया था कि शायद अब वे गुंडे-लुटेरे पकड़ लिए जाएंगे क्योंकि उनकी गाड़ी पुलिस के हाथ में थी। लेकिन अगले दिन पुलिसवालों ने उन अपराधियों से इस पीड़ित व्यक्ति का समझौता करा दिया। निर्मम पिटायी की भरपाई कुछ हजार रूपयों से करा दी गयी। पुलिस ने लेन-देन करके उसकी गाड़ी भी सुरक्षित उसके घर तक पहुंचवा दिया। उन अपराधियों की गाड़ी हमारी आंखों के सामने ही पुलिसवालों ने यह कहकर जाने दिया कि पीड़ित द्वारा एफ.आइ.आर. वापस ले लिया गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह गाड़ी किसी बड़े नेता की थी और वे गुंडे उनके चमचे थे।

इस पुलिस चौकी की नाक के नीचे अंग्रेजी शराब की दुकानें चलती हैं जिसके आसपास सड़कों पर बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ घंटो खड़ी रहती हैं। काले शीशे चढ़े हुए। दूसरे पीने वाले अपनी बाइक की सीट पर ही चियर्स करते रहते हैं। पुलिस को और चाहिए ही क्या? कुछ महीनों पहले नुक्कड़ पर एक ‘बार’ भी खुल गया है। यहाँ पुलिस हमेशा गश्त पर रहती है लेकिन सबकुछ बदस्तूर जारी है। वे खाली हाथ राउंड पर आते हैं और अपनी ‘जेबें’ हरी-भरी करते चले जाते हैं। यह बात तब स्पष्ट हो गई जब हमारे संबंधी अपनी बाइक लेने पुलिस चौकी पहुँचे।

अब कहाँ गुहार लगाये बेचारा आम आदमी?

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, June 17, 2014

उत्पीड़न विपर्यय

मेरे अपार्टमेन्ट की फ़्लैट ओनर्स सोसायटी ने जबसे मुझे इसकी जिम्मेदारी दी है तबसे मुझे एक उलझन ने आ घेरा है। महीनों हो गया बिल्डिंग के स्वीपर से यह कहते कि- सफाई अच्छे से करो; चारों तरफ गदंगी फैली रहती है; झाड़ू लगाते हो मगर कूड़ा उठाकर फेंकते नहीं; वहीं कोने में छोड़कर चले जाते हो; तेज हवाएं चलने पर फिर से कूड़ा इधर-उधर बिखर जाता है; लेकिन कोई सुधार नहीं है। वह एक तरफ से झाड़ू लगाता और दूसरी तरफ मुंह में दबाए तंबाकू और सुपारी की ‘पीक’ बिल्डिंग की दीवार पर थूक देता। एक दिन ऊपर वाले फ्लैट में रहने वाली भाभीजी ने उसे दीवार पर थूकते हुए देख लिया। उन्होंने जब इस हरकत पर आपत्ति जताई तो वह तुनक कर झाडू-पोछा फेंक कर काम छोड़ने की धमकी देने लगा। कहने लगा- “हम काम ऐसे ही करेंगे आपको हमारा काम पसंद नहीं आता तो किसी और को रख लीजिए।”

उसने यह हरकत मेरे सामने भी की। मैने उससे कहा- पहले तो दीवार की सफाई करो उसके बाद अगर काम छोड़कर जाना चाहो तो जा सकते हो। इतना सुनते ही उसने दीवार की सफाई तो किया ही मगर काम छोड़कर नहीं गया। फिर भी उसके काम करने का अंदाज वही है जिसमें कोई सुधार नहीं आ रहा है। कभी झाड़ू लगाता है तो पोछा नहीं और अगर पोछा लगा देता है तो उसके बाद दो-चार दिन तक झाडू नहीं लगाना चाहता। अभी इसे आये हुए तीन महीना हुआ है। पहले वाले स्वीपर को इसलिए निकाला था कि वह रेग्युलर काम पर नहीं आता था।

एक दिन हमने इससे बिल्डिंग की ठीक से सफाई करने की बात गंभीर होकर कहा तो वह फिर से भड़क गया और बोला- “आप मेरा हिसाब कर दीजिए। मैं आपके अनुसार काम नहीं करुंगा।” हमने भी कह दिया- ठीक है, काम छोड़ ही दो। तब वह इस बिल्डिंग के एक वरिष्ठ सदस्य के पास फरियाद लेकर पहुँच गया। मैं भी बुलायी गयी। यह उनसे कहने लगा – “हम तो रोज-रोज आते हैं और जब भी आते हैं इनको नमस्कार भी करते हैं और ये हैं कि जब देखो तब ‘यहां नहीं झाड़ू लगा’ तो ‘वहां नहीं पोछा लगा’ करती रहती हैं।”

हमने मुस्कराते हुए कहा कि- “हमने तुम्हें सैल्यूट मारने के नहीं रखा है; तुम्हें सफाई के लिए रखा है तो सफाई की बात ही करेंगे। तुमसे पूजा-पाठ कि बात तो करेंगे नहीं।” इतना सुनते ही उसने तपाक से मेरी जुबान से निकले हुए शब्द को पकड़ लिया और बड़े तैश में बोला- “हमको हमारी जाति मत बताइए हम भी जानते हैं कि हम किस जाति के हैं; लेकिन हर समय हमारी जाति उघटी जाय यह सही नहीं है।” इतना सुनते ही मैं हतप्रभ रह गयी। लगभग डरते हुए बोली- “देखो तुम अपना महीने का हिसाब करवा लो, न तो तुम यहाँ की सफाई का कार्य करने के लिए मजबूर हो और ना ही मै तुमसे ही काम लेने के लिए प्रतिबद्ध हूं।” इतना कहकर मैं वहाँ से तत्काल लौट आयी।

इसके बाद भी वह आज बहुत अच्छे से काम करके गया; लौट कर अपनी तनख्वाह लेने भी नहीं आया है। सोचती हूँ क्या उसके इस अंदाज से हमें सतर्क नहीं हो जाना चाहिए। उसे पुन: काम पर रखना अपने साथ जोखिम उठाना नहीं है? जाने कब किस बात पर वह हम पर केस ठोक दे? वैसे उसने किसी केस-वेस की बात तो नहीं की लेकिन मेरा मन फिर भी इस बात से अशांत है कि अगर मैं उसे काम से निकाल देती हूं तो वह कोई ऐसा कदम उठा सकता है...।

दूसरी तरफ, क्या गारंटी है कि इसके बाद कोई दूसरा आयेगा तो वह इससे बेहतर ही होगा?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, May 31, 2014

यूपी सरकार का नायाब नुस्खा ‘मुहैया’

              

यूपी सरकार के पास तरक्की के उन नायाब नुस्खों में से एक नुस्खे का कोई जवाब नहीं है! गजब का है यह नुस्खा जिसका नाम है ‘मुहैया’। इसे यह सरकार आए दिन अपने राज्य के लोगों को उपलब्ध कराती रहती है। अखिलेश यादव ने हाईस्कूल-इण्टर पास बच्चों को टैबलेट और लैपटॉप ‘मुहैया’ कराया। बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता, किसी बिजली के खंभे से लटके हुए मनुष्य को हजार से लेकर लाख रुपए तक नगद ‘मुहैया’ कराया है।

लात्कार जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार उन लड़को को क्षमा-दान जैसा महादान तक भी ‘मुहैया’ कराने पर लगे हुए हैं। एक युवा मुख्यमंत्री से आप और क्या उम्मीद कर रहे हैं.. अभी इन्हें जुम्मा-जुम्मा ढाई साल ही तो हुए मुख्यमंत्री बने…। अभी तो ढाई साल और बचे है… देखिए अभी कितने बड़े-बड़े कारनामें ‘मुहैया’ करते हैं…।

यहां हमारी बेटियों के लिए तो नाना-प्रकार की उपलब्धियाँ ‘मुहैया’ है। एसिड अटैक में घायल लड़कियों के लिए मुफ्त इलाज और उनके घर वालों के लिए नगद रुपए; छेड़खानी और बलात्कार के बाद पीड़िता की हालत अगर नाजुक हो गई, तो यह ‘मुहैया’ पचास हजार से एक लाख तक कर दिया जाता है।

हमारी सरकार द्वारा प्रदत्त ये सारे तोहफे जो हमने ‘मुहैया’ के नमूने के तौर पर पेश किया है वह उपहार तब और कीमती हो जाता है जब यहां हमारी बेटियों के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या करके किसी नदी-नाले में बहा दिया जाय या किसी पेड़ पर टांग दिया जाय। तब ‘मुहैया’ की कीमत जानना चाहेंगे आप..? पांच लाख तक..! यहां एक माँ की कोंख और आंसू की कीमत तक ‘मुहैया’ कराया जाता है।

हम माताओं के सीने में तो सिर्फ जलन है! जिसका उपचार न तो यह सरकार मुफ्त में करा पाएगी और ना ही ‘मुहैया’ से ठंडा कर पाएगी। क्योंकि हम तो अपनी जुबान पर ताला मारे बैठे हैं कि कहीं कोई ‘यादव’ डॉक्टर या किसी ‘यादव’ सिपाही के भेंट चढ़ गये, तो बाकी बच्चियों का क्या होगा..?  सरकार का नजरिया भी हमारी बेटियों के लिए यही है कि वे तो सिर्फ हाड़-मांस की बनी भोग की वस्तुएँ है। अलबत्ता भैंसो की सुरक्षा के लिए तो यहां पुलिस और प्रशासन दोनों ही बड़े काबिल हैं..।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, May 22, 2014

समाज में असुरक्षित स्त्री

अपार्टमेन्ट में रात को करीब बारह बजे एक पुरुष दूसरी महिला के साथ अपने फ्लैट में घुसता है… अंदर से चीखने चिल्लाने; घर के दरवाजों की धड़-धड़ और बर्तन पटकने की आवाज आती है… कुछ देर बाद खिड़की में लगे पल्ले का शीशा टूटकर ग्राउंड फ्लोर पर गिर जाता है… आधे घंटे तक घर के अंदर शोर-शराबे के बाद अचानक सन्नाटा छा जाता है… घर का मेन दरवाजा अंदर से बंद हो जाता है… रात को एक बजे उस घर की महिला और उसका दस साल का बेटा बिल्डिंग के सामने बने पार्क में टहलते हुए नजर आते हैं… दोनो मां-बेटे देर रात तक सड़क से पार्क और फिर पार्क से सड़क पर बेचैनी की हालत में दिखाई देते है…। बिल्डिंग के लगभग सभी सदस्यों की नजर उसके फ्लैट पर रहती है…सबकी नजर इस तलाश में रहती है की वह महिला अपनी तकलीफ बताए तो  उसकी कुछ मदद की जाय… लेकिन किसी को उससे पूछने की हिम्मत नहीं होती… क्योंकि वह सबको देखकर बनावटी मुस्कान से यह जताने का प्रयास करती कि उनके साथ सबकुछ ठीक है… और वे मां-बेटे टहलते हुए स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं..।

उसकी इस बेबसी को देखकर मेरा मन उद्विग्न हो उठा। एक बार को मन में आया कि उसकी मदद के लिए आगे बढ़ूँ; शायद उसको हमारी बात से मनोबल मिले और वह अपने पति के खिलाफ आवाज उठा पाए। लेकिन पता चला कि वह किसी के पूछने पर बुरा मान जाती है और अपने परिवार के मामले में किसी दूसरे की दखलअंदाजी बिल्कुल भी पसंद नहीं करती। लेकिन इस बात पर विश्वास कैसे किया जाय…? उसके घर में तो पहले से ही दूसरी स्त्री की दखलअंदाजी हो चुकी है जिसकी वजह से  आज इतनी रात को वह अपने घर के अंदर होने के बजाय सड़क पर है। लेकिन इस बात को उसे कौन समझाए… यह उसका सिद्धान्त नहीं हो सकता… जरूर उसकी मजबूरी रही होगी…।

समाज में अपना और अपने  परिवार की इज्जत बनाए रखने के लिए वह अपने अंदर कितना दर्द लेकर जी रही है। उसके चेहरे से स्पष्ट हो रहा था कि वह अपनी हालत पर लाचार है; लेकिन उसकी इस लाचारी के बारे में लोग न जानने पाए इस प्रयास में वह अपने-आप को ही धोखा दे रही थी। यह कैसी मजबूरी है उस स्त्री कि जो उसे समाज के सामने अपने साथ हो रहे अन्याय को स्वीकार करने में भी असहज बना देती है...?

नारी को सशक्त बनाने के लिए अबतक जितनी भी योजनाएं लायी गयी हैं और कानून बनाये गये हैं उनका उपयोग करने में अभी भी हमारे समाज की अनेक स्त्रियां इसे लज्जा की बात समझती हैं। कदाचित् उनका मानना है कि अपने पति की ‘उपेक्षा’ अगर दुनिया के सामने स्वीकार कर लेंगी तो उस समाज में उन्हें सम्मान की नजर से नहीं देखा जाएगा। इस वजह से वह अपने पति के द्वारा हो रहे सभी जुल्मों को सहने के लिए तैयार रहती हैं ताकि घर की बात घर में ही रहे, बाहर न जाए; जिससे उनका और उनके परिवार का सम्मान समाज में बना रहे।

उसका यह व्यवहार हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। अगर वह अपने पति के खिलाफ कोई कदम उठाना चाहे तो उसका अंजाम क्या-क्या हो सकता है? जिसकी अपनी सम्पत्ति सिर्फ एक चारदीवारी हो, जिसकी चौकीदारी में अबतक का उसका सारा समय व्यतीत हुआ हो, जहां से बाहर निकलने में उसे पग-पग पर अपने पति के सहारे की जरूरत पड़ती रही हो; वह स्त्री आज अचानक कहां से इतनी हिम्मत जुटा पाएगी? इसमें बड़े मनोबल के साथ आर्थिक मजबूती की भी आवश्यकता होगी। ऐसे में एक स्त्री को जिसका अपना कोई आर्थिक श्रोत न हो कानूनी तौर पर कितना मजबूत बनाया जा सकता है..? फिर उसके सामने एक और सवाल खड़ा होगा – इज्जत की रोटी का।

ऐसे में यदि  स्त्री आर्थिक रूप से इतना सशक्त बने और देश का कानून उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे तो शायद आज उसके सामने इस तरह का कोई संकट न पैदा हो। एक पुरुष होने के नाते एक पिता या भाई पुरुष की मानसिकता से और अच्छी तरह से परिचित होते हैं। इसलिए घर की लड़की को शैक्षिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना उनकी जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि उनका कर्तब्य भी बनता है।

(रचना त्रिपाठी)