Tuesday, June 17, 2014

उत्पीड़न विपर्यय

मेरे अपार्टमेन्ट की फ़्लैट ओनर्स सोसायटी ने जबसे मुझे इसकी जिम्मेदारी दी है तबसे मुझे एक उलझन ने आ घेरा है। महीनों हो गया बिल्डिंग के स्वीपर से यह कहते कि- सफाई अच्छे से करो; चारों तरफ गदंगी फैली रहती है; झाड़ू लगाते हो मगर कूड़ा उठाकर फेंकते नहीं; वहीं कोने में छोड़कर चले जाते हो; तेज हवाएं चलने पर फिर से कूड़ा इधर-उधर बिखर जाता है; लेकिन कोई सुधार नहीं है। वह एक तरफ से झाड़ू लगाता और दूसरी तरफ मुंह में दबाए तंबाकू और सुपारी की ‘पीक’ बिल्डिंग की दीवार पर थूक देता। एक दिन ऊपर वाले फ्लैट में रहने वाली भाभीजी ने उसे दीवार पर थूकते हुए देख लिया। उन्होंने जब इस हरकत पर आपत्ति जताई तो वह तुनक कर झाडू-पोछा फेंक कर काम छोड़ने की धमकी देने लगा। कहने लगा- “हम काम ऐसे ही करेंगे आपको हमारा काम पसंद नहीं आता तो किसी और को रख लीजिए।”

उसने यह हरकत मेरे सामने भी की। मैने उससे कहा- पहले तो दीवार की सफाई करो उसके बाद अगर काम छोड़कर जाना चाहो तो जा सकते हो। इतना सुनते ही उसने दीवार की सफाई तो किया ही मगर काम छोड़कर नहीं गया। फिर भी उसके काम करने का अंदाज वही है जिसमें कोई सुधार नहीं आ रहा है। कभी झाड़ू लगाता है तो पोछा नहीं और अगर पोछा लगा देता है तो उसके बाद दो-चार दिन तक झाडू नहीं लगाना चाहता। अभी इसे आये हुए तीन महीना हुआ है। पहले वाले स्वीपर को इसलिए निकाला था कि वह रेग्युलर काम पर नहीं आता था।

एक दिन हमने इससे बिल्डिंग की ठीक से सफाई करने की बात गंभीर होकर कहा तो वह फिर से भड़क गया और बोला- “आप मेरा हिसाब कर दीजिए। मैं आपके अनुसार काम नहीं करुंगा।” हमने भी कह दिया- ठीक है, काम छोड़ ही दो। तब वह इस बिल्डिंग के एक वरिष्ठ सदस्य के पास फरियाद लेकर पहुँच गया। मैं भी बुलायी गयी। यह उनसे कहने लगा – “हम तो रोज-रोज आते हैं और जब भी आते हैं इनको नमस्कार भी करते हैं और ये हैं कि जब देखो तब ‘यहां नहीं झाड़ू लगा’ तो ‘वहां नहीं पोछा लगा’ करती रहती हैं।”

हमने मुस्कराते हुए कहा कि- “हमने तुम्हें सैल्यूट मारने के नहीं रखा है; तुम्हें सफाई के लिए रखा है तो सफाई की बात ही करेंगे। तुमसे पूजा-पाठ कि बात तो करेंगे नहीं।” इतना सुनते ही उसने तपाक से मेरी जुबान से निकले हुए शब्द को पकड़ लिया और बड़े तैश में बोला- “हमको हमारी जाति मत बताइए हम भी जानते हैं कि हम किस जाति के हैं; लेकिन हर समय हमारी जाति उघटी जाय यह सही नहीं है।” इतना सुनते ही मैं हतप्रभ रह गयी। लगभग डरते हुए बोली- “देखो तुम अपना महीने का हिसाब करवा लो, न तो तुम यहाँ की सफाई का कार्य करने के लिए मजबूर हो और ना ही मै तुमसे ही काम लेने के लिए प्रतिबद्ध हूं।” इतना कहकर मैं वहाँ से तत्काल लौट आयी।

इसके बाद भी वह आज बहुत अच्छे से काम करके गया; लौट कर अपनी तनख्वाह लेने भी नहीं आया है। सोचती हूँ क्या उसके इस अंदाज से हमें सतर्क नहीं हो जाना चाहिए। उसे पुन: काम पर रखना अपने साथ जोखिम उठाना नहीं है? जाने कब किस बात पर वह हम पर केस ठोक दे? वैसे उसने किसी केस-वेस की बात तो नहीं की लेकिन मेरा मन फिर भी इस बात से अशांत है कि अगर मैं उसे काम से निकाल देती हूं तो वह कोई ऐसा कदम उठा सकता है...।

दूसरी तरफ, क्या गारंटी है कि इसके बाद कोई दूसरा आयेगा तो वह इससे बेहतर ही होगा?

(रचना त्रिपाठी)

5 comments:

  1. रचनाजी ,इनका बात और काम करने का तरीका ऐसा ही होता है हमारे यहाँ रो हाउस है कोई सोसायटी नहीं है है पहले थी किंतु इतनी अड़चनों के बाद सब स्वतंत्र रूप से ही सफाई का पैसा देते है जो ढर्रा आप बता रही है वैसा ही है पर पिछले आठ साल से काम कर रहे है दोनों पति पत्नी। दीवाली का इनाम सिर्फ नगद चाहिए ?

    कई बार छुड़वाने की कोशिश की किन्तु इनके इलाके बंटे है कुछ नही कर सकते और ऐसे ही धोबी के हल है . और तो और हमारे घर के पारिजात के पेड़ के निचे पान की पिक थूकता है और उस पर ही सरे फूल झरते है क्योकि वह सुबह ६ बजे के पहले ही आ जाता है ।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बच्चे और हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. जटिल समस्या है। अच्छे से लिखा।

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  4. शोभना जी की बात ही कहूँगी कि यदि आप एक को हटाकर दूसरे को लगाना चाहो तो यह संभव ही नहीं होगा .

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  5. पढ़ तो पहले ही लिया था -उसे छुट्टी कीजिये - दुष्ट लगता है!

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