Saturday, September 17, 2016

छोटा नुस्खा बड़ा फायदा

यदि आपके हृदय में अपनी हिंदी के लिए तनिक भी प्रेम और सम्मान है तो हिंदी दिवस के प्रति सच्ची श्रद्धा दिखाते हुए अपने ग़ुस्से पर थोड़ा क़ाबू पाना सीख लीजिए! वो इसलिए कि ग़ुस्से में आदमी अक्सर अंग्रेज़ी में बोलने लगता है। ऐसा माना जाता है कि अंग्रेज़ी में ख़राब से ख़राब बात भी उतनी बुरी नहीं लगती जितनी हिंदी में कहने पर लगती है। तो इधर गुस्से पर लगाम का सीधा मतलब होगा उधर हिंदी की संभावना में तेज उछाल।

हाँ, ग़ुस्से पर क़ाबू पाने के लिए थोड़ी सी प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। किसी खास तरकीब की ज़रूरत भी पड़ सकती है। उसके लिए आप गूगल पर सर्च न मारे। मेरी बात पर थोड़ा गौर फ़रमाए। जब भी आपको महसूस हो कि अब गुस्सा आने वाला है तो उसे हलक में रोक लें, फिर मुँह में अपने ग़ुस्से को पान की तरह थोड़ी देर चबाए जैसे च्युइंग गम चबाते हैं, उसके बाद अपने बायें-दाएँ देखे बिना और पच्च की आवाज किये बिना उसे थूक डालें। इससे किसी का कुछ भी नुक़सान नहीं होने वाला। 

आप सोच रहे होंगे कि इस नुस्खे में कौन सा रॉकेट-साइंस मने बड़ा विज्ञान है जो हिंदी दिवस बीत जाने के बाद अब शक्तिवर्द्धक विज्ञापनों की तरह फ़ेसबुक पर चस्पा किया जा रहा है? तो जान लीजिए, इसमें सच में ऐसा कुछ भी नहीं है। बस आप ये समझिए कि ये बाबा रामदेव का पतंजलि नुस्ख़ा है। केमिकल और जहरीले रसायनों से दूर , एकदम प्राकृतिक गुणों से भरपूर जिसमें सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है। इसका प्रयोग यदि आपने पूरे साल बिना नागा कर लिया तो पक्का मानिए अगले हिंदी दिवस की सूरत एकदम फ़ेयर एंड लवली वाली त्वचा की तरह खिली-खिली और निखरी नज़र आयेगी।

मान लीजिए आपको देर हो रही हो और आपको जल्दबाजी में हिंदी दिवस के किसी कार्यक्रम में जाना है। रास्ते में कहीं ट्रैफिक जाम मिल जाय और आपकी गाड़ी में पीछे से कोई टक्कर मार दे। ऐसे में यदि आप गुस्सा थूकने की आदत डाल चुके होंगे तो आप उस समय हिंदी का सम्मान करने लगेंगे। आपके मुँह से ग़ुस्से वाली उल्टी-पुल्टी अंग्रेज़ी के बजाय सीधी सरल हिंदीे के बोल फूट पड़ेंगे और आपको ऐसा करते देख आसपास के लोग पहले हैरत से और बाद में सम्मान से देखने लगेंगे। संभव है आपकी महानता के दर्शन के लिए कुछ लोग दूसरी गाड़ियों से निकलने शुरू हो जाएं। 

संयोग से ऐसा भी हो सकता है कि सामने वाला भी आप पर अंग्रेजी में पलटवार करने के बजाय हिंदी को सम्मान दे बैठे। अगर उसने भी पूरे साल बिना नागा इस नुस्ख़े का प्रयोग किया होगा तो ऐसे में दोनों तरफ से हिंदी ही हिंदी शुरू हो जाएगी। फिर क्या पूछना, हिंदी-हिंदी भाई-भाई मतलब पूरा साहित्य दर्शन। 

इस नुस्ख़े को अपना कर आप कहीं भी हिंदी दिवस की शुरुआत कर सकते हैं। हिंदी में अच्छी-बुरी सारी बातें लगभग सभी के समझ में आती हैं। ऐसे में दोनों पक्ष ख़ूब ज़बरदस्त तरीके से एक-दूसरे की भावनाओं को उसकी हैसियत के हिसाब से उचित सम्मान देने लगेंगे। हिंदी में व्यक्त भावनाओं के इस मधुर आदान-प्रदान का आनंद बिना टिकट पब्लिक भी ले सकती है। ऐसे में फिर हिंदी की तो चाँदी कटने लगेगी।

(रचना त्रिपाठी)

3 comments:

  1. गुस्सा आने पर जो भोजपुरी में शब्द निकालते हैं वे का करें? आखिर भोजपुरी भी तो अपनी आंचलिक भाषा है.

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  2. वैसे हम ने सुना था अक्सर गुस्से मे आदमी अपनी मातृभाषा मे बोलता है ... पर आजकल के हिसाब से आपने सही कहा कि आजकल गुस्से मे अँग्रेजी ही बोली जाती है |

    बढ़िया लिखा आपने |



    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "विवादित पर जानदार चित्रकार - मक़बूल फ़िदा हुसैन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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