Sunday, April 13, 2014

पीढ़ी- भेद समझना होगा…!

गाँव के बड़कवा शुक्ला जी की सोच हमेशा उनके अपने ही इर्द- गिर्द घूमती रहती। अपने बनाए हुए सिद्धान्तों को किसी भी सिद्धान्त से ऊपर मानते। वह अपने जीवन में बहुत ही अनुशासित रहे। एक स्कूल में बच्चों को हिन्दी पढ़ाते थे। बचपन से लेकर एक बड़े संयुक्त परिवार का मुखिया होने तक उनका जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा। उन्हें शायद कोई अभिभावक नहीं मिला था और उन्हें बहुतों का अभिभावक बनना पड़ा था। इसलिए राह चलते मार्गदर्शन देते रहने की आदत पड़ गयी थी। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते उनमें एक संकोचहीन बेबाकीपन आ गया था। जो बात उन्हें पसंद नहीं आती उसका विरोध तो नहीं कर पाते लेकिन उसपर टीका-टिप्पणी किए बिना भी नहीं रह पाते। उन्हें समाज के सभी लोगों से मिलना-जुलना और भाँति-भाँति की बातें करना पसन्द था। रिटायरमेंट के बाद शुक्ला जी जहां भी जाते अपनी जान-पहचान के लोगों से जरूर मिलना चाहते।

शुक्ला जी के गाँव में उनके एक पड़ोसी थे ज्ञानप्रकाश। उनकी बेटी वृन्दा की शादी बनारस में हुई थी। जब भी शुक्ला जी बनारस अपने रिश्तेदारों के यहां जाने को होते तो वह भतीजे ज्ञानप्रकाश से पूछना नहीं भूलते थे कि ‘अपनी बेटी के पास कोई संदेश भेजना हो तो बता दो मैं बनारस जा रहा हूँ; बहुत दिन हो गया उसे देखे; इसी बहाने उससे मिल भी लूंगा और उसका हाल-चाल भी ले लूंगा।’ लेकिन ज्ञानप्रकाश इधर-उधर की बातों में शुक्ला जी को उलझा कर अपनी बेटी का पता देने से कन्नी काट लेता।

generation gap1ज्ञानप्रकाश शुक्ला जी का बहुत सम्मान करता था। आस-पास के गांव के लोग भी शुक्लाजी के परिवार की बहू-बेटियों के संस्कार से बहुत प्रभावित रहते। जबसे ज्ञानप्रकाश की बेटी की शादी हुई तबसे शुक्ला जी दसियों बार बनारस आये-गये होंगे। हर बार वे ज्ञानप्रकाश के पास जाते और वृन्दा का पता मांगते लेकिन हर बार उन्हें निराश होना पड़ता। धीरे-धीरे उन्हें इस बात का अंदाजा लग गया कि ज्ञानप्रकाश जानबूझकर वृन्दा का पता नहीं देता है।

एक दिन शुक्लाजी ने ज्ञानप्रकाश से पूछ ही लिया- ‘बहुत दिनों से मैं तुमसे वृन्दा का पता मांग रहा हूँ लेकिन तुम किसी न किसी बहाने उसका पता देने से इनकार कर देते हो। आखिर क्या बात है?’ ज्ञानप्रकाश ने कहा- ‘चच्चा, बुरा न मानें तो एक बात कहूं..मेरा दामाद बहुत शौकीन है..वृन्दा अपने ससुराल में बहू नहीं, बेटी की तरह रहती है .. कभी सलवार-सूट पहनती है तो कभी जिंस-टॉप.. उसके घर वाले भी उसकी पसंद का बहुत ख्याल रखते हैं..उसके ऊपर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं है। आपको उसका यह रूप देखकर शायद अच्छा न लगे.. और आप टीका-टिप्पणी करना शुरु कर दें, इसलिए मैं आपको उसके घर का पता नहीं देता।’ शुक्लाजी टका सा मुंह लेकर वहां से चले आये.. उन्होंने इस बात की चर्चा अपने घर वालों से भी की। लेकिन उनकी बातों से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि उनको भी अब अपनी सोच बदलने की जरूरत है..

शुक्ला जी का एक भरा-पूरा परिवार है उनके नाती-पोते भी अब शादी करने योग्य हो गये हैं। उनकी यह सोच जो बहुत ही पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं की जंजीरों से जकड़ी हुई है। जहां अभी भी स्त्रियों को घूँघट में रहना और इशारों में ही बात करना उचित माना जाता है वहां इस जेनरेशन गैप के साथ शुक्ला जी का कैसे निर्वाह होगा? क्या ऐसे बुजुर्ग अपनी आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा के शिकार नहीं होंगे? घर का बुजुर्ग होने के कारण किसी ने उन्हें टोका नहीं, पड़ोसी ज्ञानप्रकाश भी इनसे कन्नी काटता रहा; लेकिन जब पीछे ही पड़ गये तो सच्चाई का सामना हो गया। यह नौबत तो उनके घर में भी आ सकती है। शुक्ला जी को अपने इस व्यवहार पर चिंतित होना चाहिए न कि गौरवान्वित। समय के साथ उनको अपनी सोच में परिवर्तन लाने की जरूरत है।

(रचना त्रिपाठी)

4 comments:

  1. अच्छी पोस्ट। जरूरी पोस्ट।

    शुक्ला जी को यह पोस्ट पढवा देता कोई।

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  2. सचमुच...बहुत ज़रूरत है ऐसे शुक्ला जीओं को समय के साथ बदलने की..सुन्दर पोस्ट

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  3. समय के साथ परिवर्तन आवश्यक है , थोडा सामंजस्य दोनों ओर से भी !

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड की ९५ वीं बरसी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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