Sunday, August 23, 2020

दहिजरा कोरोना


बड़की माई के घर में भितरे-भीतर रोज कुछ न कुछ खटर-पटर लगा हुआ है। वर्षों से बूढ़ा-बूढ़ी का जीवन गाँव में अपनी छोटकी पतोह के साथ बड़े मजे में कट रहा था। कोरोना के बहुत पहिले से उनके बड़का बेटा अपने मेहरारू-लइका लेके बहरवांसू हो गए थे। लइकन-फ़इकन के संगे साल में एक से दू बार दू-चार दिन के लिए इहाँ आते रहते। अहमक-दहमक तीज-त्यौहार मनाकर मीठा-मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू करके परदेस लउट लेते। एक वो दिन था जब बड़की माई इन्हें देखकर फूले न समाती थीं और एक आज का दिन है, बाहर से सब कोई हंसता-खेलता दिखता है फिर पता नहीं क्यों ये फूल के कुप्पा हुए बैठी हैं? जिस बड़कू के इंतजार में वो अपने पलक-पावड़े बिछाए उनकी राह तकती रहती थीं, आज सभी इकट्ठे हैं तब्बो मूड बिगड़ा हुआ है। अब अंदर की बात कौन जाने! शायद घर में बच्चों के उत्पात से बहुते परेशान हैं। लेकिन सुना है उनके दूनों बहुरिया लोग में अब खूब तोर-मोर होने लगी है।

बच्चे जब भी मुंह खोलते हैं, कुछ न कुछ ऐसा कर देते हैं कि दूनों पतोह आपस में बक्क-झक्क कर के अपने-अपने कोठरी में कोहना के बइठि जाती हैं। इनके साथ ही रसोई का कुंडा भी अकड़ जाता है। पहले तो वह छोटकी बहुरिया के इशारे पर चलता था लेकिन आजकल वो भी इन दुन्नो जनी के मूड के हिसाब से खुलता और बन्द होता है।

लइका-फइका तो ओहू पर मस्त हैं। जिस दिन दुन्नो कोहनाती हैं उस दिन दरवाजे पर मर्दाना लोग गोइठे की आग पर भउरी और आलू का चोखा लगा लेते हैं और बच्चों की मौज हो जाती है। बड़की बहुरिया शुरू-शुरू में जब आयीं तो दूनों जनी आपस में मिलकर अपनी-अपनी पाक-कला का ख़ूब प्रदर्शन करती थीं। उनके रसोई में बनते पकवान की खुशबू खेत-खलिहान तक जाती रही। महीनों हो गया है कोरोना का कहर हटने का नाम नहीं ले रहा है। इनका उत्साह अब धीरे-धीरे ठंडा हो गया है। अक्सर दूनों जनी का मूड अब गरम रहने लगा है...  चूल्हे की आग ठंडी पड़ने लगी है... और रसोई में कुकर की सिटी शांत रहने लगी है। शायद अब जी ऊब गया है उनका। वो भी क्या करें बेचारी! यहाँ घर का तिल से ताड़ तक सबकुछ अपने हाथ से ही उन्हें करना पड़ता है। चौका-बर्तन के लिए इसके पहिले एक लौड़िन आती रही।बूढ़ा-बूढ़ी ने उसे भी मना कर दिया कि ''कोरोना गरेस देगा मत आना।''

बड़की बहुरिया तो बम्बई से लौटी थीं। वहाँ रसोई घर से लेकर स्नानघर सब एक्कै कोठरी में सना हुआ था। जियादा उठने-बइठने की आदत तो रही नहीं और गाँव में घर के पिछवाड़े तक उठके जाना उनके लिए पहाड़ हो गया है। कुंटल भर के देह का सारा भार उनके ओहि ठेहुने पर पड़ता है। अउर तो अउर, इहाँ के देसी संडास... में निपटना भी एक सांसत है। अब ऊ करें त का करें! मजबूरन उनके कोठरी में ही एक गुसलखाना बनवाना पड़ा है। 

अब जहां दो-चार बर्तन एक्के साथ रही उहाँ खटर-पटर तो लगी ही रहेगी। और ये तो आपहूँ सुने हैं कि कोरोना की यही ख़ूबी रही कि उसने सबको बराबर माना। अब उनके इहाँ भी दूनों जनी में बराबरी का होड़ लग गया है। भितरे-भीतर उनके घर भी अब दूसर 'पूआ' पकने लगा है। तभी भरी दोपहरी में बड़की माई अंगना छोड़ के बाहर के ओसारे में कपार पर हाथ धरे बुढऊ के साथ बैठी हैं। सत्तर पार कर गईं लेकिन इसके पहिले दिन के अजोरे में किसी ने उनकी झिरखिरी नहीं देखी थी। 

उनकी छोटकी बहुरिया आजकल कोप भवन में चली गई हैं। छोटका बबुआ और उनके बाल-गोपाल मनुहार में लगे हैं। बड़की माईं बुढऊ से कह रही थीं कि लॉकडाउन में काम धंधा बन्द हैं और सबका खर्चा-पानी आसमान पर है। "जेकर जिनगी एहि खेत-खलिहान में बीत गइल, अब का... त उनहूँ के अपने कोठरी में अलगे संडास चाहीं!" 

(रचना त्रिपाठी)







2 comments:

  1. और आगे बढ़ाइए। कोरोना उपन्यास बन जाएगा। वैसे भी अंदर की बात महिलाएँ पुरुषों से बेहतर लिख सकती हैं। यह तो जबरदस्त है लेकिन अधूरा लग रहा। अगले अंक की प्रतीक्षा में। 😊

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