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Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। अरे, अभी इस समय कौन हो सकता है...! दुपट्टा सम्हालते हुए दरवाजा खोला तो शौहर खड़े थे, आज कुछ अलग मुस्कान लिए हुए। चकित होकर पूछा– क्या हुआ, आज इतनी जल्दी?

शौहर ने उसे हौले से पकड़कर अंदर आने का रास्ता बनाया। वह अचकचा कर पीछे हट गयी। सामने वाली भाभी जी एकटक जो देख रही थी। चट दरवाजा बंद कर अंदर की ओर मुड़ी तो इरफान मियां गुनगुना रहे थे– "आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है"

ऑफिस बैग सोफे पर पटका जा चुका था। उसकी दोनों बाहें फैली हुई शायरा की ओर बढ़ीं और इरफान ने उसे नजदीक खींच के उसकी कमर को दोनों ओर से जकड़ लिया– "जी करता है आज तुम्हारी आंखों में आँखे डाले यूँ ही देखता रहूँ।"

शायरा– माजरा क्या है? आज अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे। तबियत तो ठीक है?

इरफान– नहीं रे पगली, अब मैंने सोच लिया है। जो भी जिंदगी अल्लाह ने बख्शी है उसे प्यार से जीकर ही गुजारना है। सच्चे दिल से कह रहा हूँ।

जी-न्यूज पर शोर-शराबे वाली बहस चल रही थी। एक मौलाना जी चीख रहे थे– आप लोग तो ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे कोर्ट ने तलाक का अख्तियार एकदम से खत्म कर दिया है। असल बात कुछ और ही है...

शायरा ने रिमोट उठाकर टीवी बन्द कर दिया और इरफान के सीने से लग गयी– सच में प्यार करोगे मुझे? ऊपर की जेब मे रखी कलम उसके गाल पर चुभ रही थी। इरफान मौन होकर कुछ सोच रहा था।

शायरा ने जेब से कलम निकालकर किनारे रख दी,  "दो दिलों के बीच में इस पेन का क्या काम? सुना नहीं है, फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए"
"अरे यार, वो मौलाना जी क्या कह रहे थे? टीवी क्यों बन्द कर दिया? जरा रिमोट देना..."

"ओहो, तो ये बात है..!" अपनी कमर से उनका हाथ झटकते हुए मुंह बिचकाकर बोली– "बड़े आये, आज फिर जीने की तमन्ना है ...हुँह! कल तक क्या घास छील रहे थे... अभी काहें मरने का इरादा बना रहे हो? अभी तो सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगी है। बाकी द्वार तो खुल्ले ही पड़े हैं, ...वो भी आजमा लो तो मरिहो"

टीवी पर बहस जारी थी– तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-अहसन, निकाह-ए-हलाला, तलाक-उल-सुन्नत...

शायरा ने चुपचाप सोफे से बैग उठाया, कलम को शर्ट की जेब में वापस रखा और बोली– "कपड़े बदल लो चाय लेकर आती हूँ।"

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, June 10, 2017

किसान आंदोलन में हिंसा ?

किसान वास्तव में क्या होता है और उसका मर्म क्या है? यह वही समझ सकता जिसका पूरा जीवन किसानी पर निर्भर हो। "हरियाली लाये खुशहाली" का मंत्र हम सभी को सुनने में बहुत अच्छा लगता है। पर इस स्लोगन के पीछे एक किसान के माथे पर खिंची सिकुड़न, होठों पर पड़ी पपड़ी, और उसके पैरों में फटी बिवाई चीख-चीख कर बताती हैं कि उनके जीवन में कैसी हरियाली और कितनी खुशहाली है।

क्या किसी अर्थशास्त्री या मनोचिकित्सक ने कभी यह जानने अथवा इसपर शोध करने की कोशिश की है कि वास्तव में किसानों की मनोदशा क्या है? खेती में उनकी लागत और आमदनी कितनी है? है कोई झंडाबरदार पार्टी जो इनकी बेटियों से पूछे कि वे कितनी खुशहाल रहती हैं? इनके बच्चों की शिक्षा  का फल किस पेड़ में लगता है? घर में पड़ी बीमार माँ की दवा किस खेत में उगायी जाती है?

मैंने जिन किसानों को देखा है उन्हें नहीं मालूम कि अच्छा स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा क्या होती है? ऐशो-आराम की जिंदगी क्या होती है? वे जिंदगी भर इसकी झूठी आस में मारे-मारे फिरते हैं। अगर किसान का दर्द जानना है तो पूछो कर्ज में लदे उस किसान से जो अपनी जवान बेटी की शादी के लिए दर-दर ठोकरें खाता फिरता है। उसकी बेटी से पूछो जो अपने अवसाद ग्रस्त पिता की नींद से सोती है और जागती है। इस परिस्थिति में उनके बच्चों को किस प्रकार के विकास की आशा होगी?

वह या यह चाहे जो सरकार हो, वे ऐसे ही हमारे किसान भाइयों के कंधे पर अपने क्षुद्र स्वार्थ का बोझ टिका कर राजनीतिक सत्ता के झूले में सवार हो चुनावी जीत के रिमझिम सावन में कजरी गाती और घपले-घोटालों की पेंगे मारती आती-जाती रहेंगी।

अभी कुछ वर्ष पहले सत्ता की मलाई पर दूर से लार टपका रहे कुछ शातिर शिकारियों ने जंतर-मंतर पर एक तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी वैचारिक आंदोलन का नारा बुलंद किया था। वे आम आदमी की आशा भरी भावनाओं और समर्थन की सवारी गांठकर बाजे-गाजे के साथ सत्ता के स्वर्ण-महल में प्रवेश कर गये और अब वहाँ बैठकर चांदी काट रहे हैं। अब समझ में नहीं आता कि आम आदमी देखने मे कैसा होता है? आज वो खुद अपने बारे में कन्फ्यूज हो गया है कि वह वास्तव में है क्या? क्या वह वाकई आम है या फिर एक मुँह चिढ़ाती टोपी लगाकर सत्ता के नशे में चूर धूर्त राजनैतिक रोटियाँ सेकने वाला खास वीआईपी बन चुका है? 

इस कृषि-प्रधान देश में हरित क्रांति लाने का दावा करने वाले लोग आज किसानों को उकसाकर दंगा कराने और कत्लेआम मचाने का नंगा-नाच करने पर उतारू हैं तो उनका उद्देश्य भी किसानों का दुःख दूर करना नहीं लगता। वे तो अपनी छिन चुकी जमीन को हासिल करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तत्पर हैं। उनकी आशा का केंद्र आज किसान बना है जिसकी बलि लेने में न इनकी रूह कांपती है और न ये विचलित होते हैं। किसान तो होता ही इसीलिए है।

हमारे किसान भाइयों को इस जीते-जागते फरेब से सीखने और समय से पहले सावधान हो जाने की जरूरत है। इस हिंसक आंदोलन में किसका कितना भला होगा इसपर उन्हें एकजुट होकर चिंतन करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ये फ़रेबी आपके कंधे पर बंदूक रखकर सत्ता का शिकार करने के चक्कर में आपकी थाली से दो जून की रोटी भी छीन लें।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, August 11, 2014

किरपा के काबिल तो बनिए

साधारण परिवार में जन्मीं एक बेटी जो आगे चलकर “डेली सोप” की बहू बनी और बहू से फिर ‘मंत्री’ तो कोई खास योग्यता तो जरूर रही होगी। ऐसे में बार-बार इनकी पात्रता पर सवाल खड़ा कर इनके मन को बेवजह तकलीफ दी जा रही है… योग्यता या पात्रता के लिए किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का प्रामाणपत्र हो यह जरूरी तो नहीं। विद्या अथवा ज्ञान तो कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसका स्रोत निर्मल बाबा की ‘किरपा’ हो या ‘डेली सोप’।

यदि कुछ खास लोगों की कृपा बनी रहे तो पात्रता के बगैर भी पद और प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सकती है। अब अपनी स्मृति को ही ले लीजिए जिनपर साक्षात्‌ “मोदी” की माया है। नहीं तो क्या इस देश में टीवी की बहुओं अथवा साधारण परिवार की स्त्रियों की कमी है? क्रिकेट के भगवान सचिन तेन्दुलकर की डिग्री भी तो किसी से छुपी नहीं है जो आज राज्यसभा में सांसद के पद पर आसीन हैं। यह बात अलग है कि राज्य सभा में वह गाहे-बगाहे भी नजर नहीं आते हैं। जब भगवान ही हैं तो संसद में उनके फोटो से भी काम चलाया जा सकता है। रेखा का सिलसिला तो बहुत पुराना हो गया है। लोगों को इसपर इतना बावेला मचाने की क्या जरूरत है? बस किरपा बरसाने वाले बने रहें... इस देश को और क्या चाहिए...?

जब किरपा से सब कुछ उपलब्ध हो जाता है तो डिग्री के लिए इतनी माथा-पच्ची क्यों...? इन मंत्रियों और सांसदो के नीचे काम करने वाले उन अधिकारियों की हालत तो देखिए...। बेचारे..., ये सभी स्नातक, परास्नातक करने के बाद भी तमाम किताबें घोटकर वहां तक पहुँचने में अपनी एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। इतने पढ़े –लिखे होने के बावजूद ये अधिकारी उन्हीं मंत्रियों और नेताओं के अधीन काम करते है। क्या गरज थी इन्हें इतनी डिग्री बटोरने की…? किसी की किरपा मांग लेते...।

शास्त्रों में कहा गया है कि- “विद्या से विनय की प्राप्ति होती है और विनय से व्यक्ति सुपात्र बनता है।” यहां राजनीति में क्या इस श्लोक की आवश्यकता है…? नहीं न…? अरे जब फूलन देवी सांसद बन सकती हैं और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हाल सकती हैं तो आप ही बताइए कि “किरपा” में ज्यादा ताकत है या डिग्री में?

अपात्र तो धरती पर बहुत पड़े हैं लेकिन सभी पर किसी महापुरुष की किरपा नहीं बरसती। उसको पाने के लिए ज्ञान और कर्म की थाती हो ना हो, अच्छे भाग्य, राजकुल वंशावली, उससे वैवाहिक संबंध अथवा कलियुगी कला जैसे चाटुकारिता, असाधारण सेवा धर्मिता जैसे उपायों की जरूरत पड़ती है। इसमें कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। ये मार्ग अपनाकर छुटभइए भी बहुत उच्च पदों पर विराजमान हो सकते हैं। इसके मूल में बस वही है- किसी व्यक्ति विशेष की “किरपा”।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 30, 2014

क्या होगा पॉलिटिक्स का..?

आज जाके हमें यह बात समझ में आ रही है कि सभी दल ‘वादे’ की बात क्यों करते हैं..? असल में वे सभी ‘वादे’ के मतलब को सिद्ध करने पर तुले हुए है- वादा तो टूट जाता है! उसके बाद पुन: शुरु होती है- क्या..? पॉलिटिक्स। इस देश में आज के दौर के नेताओं का यही मानना है कि अगर देश में पॉलिटिक्स को जिंदा रखना हैं तो सिर्फ ‘वादे’ करते रहो। अगर ये ऐसे ही झूठे वादे करते रहे तो इनकी गोटी चम रहेगी, और देश का बंटाधार।

प्यार में, फिल्म हो या राजनीति अगर वादा टूटेगा नहीं तो कहानी में ट्‍विस्ट कैसे आएगा..! कहीं ऐसा न हो कि मोदी के आने के बाद अगर देश विकास के रास्ते चल पड़ा तो क्या होगा पॉलिटिक्स का..? फिर तो इसकी लुटिया डूबी समझिए! देश का उत्थान तो तभी संभव है जब धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर और सम्प्रदाय के नाम पर सियासत छोड़ कर सिर्फ विकास के नाम पर की जाय। लेकिन अगर वास्तव में ऐसा ही हुआ तो क्या होगा बाकी दलों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं का; उनकी उड़ान का जहां विदेशों से देश चलाने की कोचिंग ली जाती है। जहां से ये अपनी सफलता , ईमानदारी और प्रभावशाली होने के सर्टिफिकेट्स लाते हैं।

देश में मोदी की भूमिका कुछ इसी तरह की बनायी जा रही है जैसे वास्तव में अब विकास के लिए यज्ञ शुरु हो गया हो.. नमो-नमो की जाप के बाद बाकी सभी दल ‘स्वाहा’ होने जा रहे हों। ऐसे में क्या अन्य राजनैतिक दल इस यज्ञ को सफल होने देंगे..? हमें तो नहीं लगता।

सुना है भ्रष्टाचार ने भी देश छोड़कर जाने की तैयारी कर रखा है। क्योंकि मोदीजी आ रहे हैं। अगर भ्रष्टाचार वाकई समाप्त हो गया फिर तो सियासी चालबाजों की चलुवई धरी की धरी रह जाएगी। अभी-अभी पैदा हुए सियासी दल, जो भ्रष्टाचार के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं उनके पराभव की तो उलटी गिनती शुरु हो गयी है। ऐसे में क्या आप लोगों को लगता है कि देश विकास के रास्ते पर चल पाएगा? अभी जाने कितने छुटभैये लोमड़ी की तरह नजर गड़ाए इस फिराक में लगे हैं कि विकास में लगातार गिरावट बनी रहे ताकि राजनीति में ये भी अपनी किस्मत चमका सकें। इसलिए आजकल सब अपना-अपना ‘लक’ पहन कर चल रहे हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 23, 2014

सत्ता का स्वयंवर

मेरे घर के सामने वाले पार्क की चार दीवारी जिसपर बर्षो से ‘काई’ जमीं पड़ी थी, एक दिन मैने उसकी रंगाई-पुताई के बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि पिछले पांच साल पहले भी इसकी पुताई हुई थी। आज दीवार फिर से चमचमा उठी है। उसके अंदर गिने-चुने पेड़-पौधे जिसकी कटाई-छ्टाई हुए बर्षों बीत गए थे। वह भी आज अपनी हजामत बनवाकर चकाचक हो गये हैं। पार्क से सटे सड़क जिसकी छ: महीने पहले ही मरम्मत हुई थी, पर  कूड़े का अंबार लगा रहता था। जिसपर आते-जाते यात्री मूत्र-विसर्जन भी किया करते थे। इधर  से गुजरते समय सहसा मेरी उंगलियां नाक पकड़ लिया करती थी। उफ! कितनी घुटन होती थी कल-तक यहां। आज वह भी नदारद है। सोच रही थी अचानक आज ऐसा क्या हो गया जिससे हमारे मोहल्ले की रौनक ही बदल गई।

अपने चारों तरफ नजर दौड़ाया तो पता चला कि सिर्फ यही नहीं, हमारे पीछे  वाले पार्क का हुलिया भी बदल गया है। शहर की सभी टूटी-फूटी सड़के एवं पार्को की मरम्मत हो रहीं है।  मुझे ये बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। अचानक याद आया कि ‘सत्ता देवी’ का ‘स्वयंवर’ जो रचने वाला है..! कितनी चंचला है ये! हर पांच साल पर तलाक ले लेती हैं और पुनर्विवाह के लिए तैयार हो जाती हैं। उन्हीं की रश्म की तैयारियां शुरु हो गई हैं। हमें तो अभी से ढोल-नगाड़े और शहनाई की धुन भी सुनायी पड़ने लगी हैं। लगता है मेरे अपने ही कान बजने लगे हैं..! अभी तो स्वयंवर में कुछ दिन और बाकी है। बहुत उत्सुकता है मुझे, यह जानने के लिए कि सत्ता देवी किसके गले में ‘जयमाला’ डालेंगी..? आखिर कौन है वह भाग्यशाली जिसको पांच साल के लिए फिर से वरण करने जा रहीं है..?

पंडितों की भी बहार आयी है। बड़े-बड़े दिग्गजों के घर में  ज्योतिषाचार्य आजकल  ‘कंचन’ चर रहे हैं जो इस स्वयंवर के प्रत्याशी हैं। ये दिग्गज अपनी-अपनी कुण्डली दिखा रहे हैं सत्ता रानी के चाह में। बिना मुहूरत दिखाए और पूजा-पाठ किए कोई काम ही नहीं करते। हर विधा वे उन्हें पाना चाहते हैं।  हाल कुछ ऐसा ही है- एक अनार सौ बीमार!

गांव में महिलाएं भी इस उत्सव पर साज-श्रृंगार करके समूह में गीत  गाते हुए सत्ता देवी के ‘दुल्हे’ के चुनाव में अपना-अपना मत देने जाती हैं। वे इस अवसर पर एक खास किस्म का गीत भी गाती है- ‘चल सखी वोट देवे..फुलवा/पंजा निशानी।’ निर्भर करता है कि महिलाएं किस पार्टी की ‘दुल्हे’ के पक्ष में हैं, पंजा अथवा फूल या कोई अन्य पार्टी। देखना यह है कि इनके विवाह की हल्दी किसको लगती है.. और यह किसके गले ‘हार’ पहनाती हैं..?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, April 5, 2014

चुनाव खतम, वोट हजम

आया है मुझे फिर याद वो बचपन के दिनों का जादुई बाइस्कोप; जो बच्चों को लुभाने के लिए एक बंद बक्से में कुछ भारतीय संस्कृति की धरोहर और परम्पराओं से जुड़ी अच्छी तस्वीरों को इकठ्ठा कर बहुत खूबसूरत और सुसज्जित ढंग से माला की तरह पिरोये हुए रहता था। बाइस्कोप वाला आता था और रंगीन बक्से को अपनी पीठ से उतार कर गाँव के बीचो-बीच एक स्टैंड पर लगाकर भोंपू बजाना शुरु कर देता था। जिससे गाँव के सभी बच्चे उसके इर्द-गिर्द एकत्रित हो जाते।

बाइस्कोप वाला बक्से के भीतर झांकने के लिए बने झरोखों का ढक्कन खोल देता था और हम सभी अपनी आँखों को उन झरोखों से सटाकर बैठ जाया करते थे। उस बंद बक्से के अंदर तस्वीरों की एक लड़ी चलती जिनके नजारों को हम बच्चे कौतूहल से देखते और अपने कानों से बाइस्कोपवाले की रोचक आवाज में उनका वर्णन सुनते- ‘दिल्ली का कुतुबमिनार देखो.. और बम्बई का मीनाबाजार देखो..ये आगरे का ताजमहल... घर बैठे सारा संसार देखो।’ घुटनों के बल बैठकर उस जादुई बक्से में घूमती पूरी दुनिया की सैर बस कुछ ही मिनटों में करके हम बहुत खुश होते थे। इसी खुशी में अपने-अपने घरों से रूपये/ अनाज इत्यादि लाकर उस जादूगर को दे जाते थे जो उन्हें कुछ पल के लिए सुनहरे सपने दिखा जाया करता था। उसके बाद वह बोलता- बच्चों, तमाशा खतम पैसा हजम अब अपने अपने घर जाओ।

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जब चुनाव नजदीक आता है तो देश में कुछ इसी तरह के दृश्य नजर आने लगते हैं। एक बार फिर चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है और सभी राजनैतिक दल अपना-अपना घोषणा पत्र बाइस्कोप के रूप में तैयार कर लिए हैं। जगह-जगह रैलियां होने लगीं हैं। सियासी दलों में जनता को लुभाने की होड़ मची हुई है। वोट पाने की लोलुपता में राजनैतिक मूल्यों का स्तर गिरने लगा है। कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इनके आँख का पानी मर चुका है। लोग भी जानते है कि कौआ चला हंस की चाल फिर भी उमड़े जा रहे हैं। विकल्प भी क्या है? सोचते होंगे कि एक बार इन्हें सुनने और देखने में क्या जाता है..।

आम आदमी बच्चों की तरह सभी दलों का चुनावी बाइस्कोप देखने के लिए कौतूहल से भरा हुआ है। नयी उमर के नये मतदाता तो और भी उत्साहित हैं। चुनावी अभियान तो रोचक होता ही है; जिसमें किस्म-किस्म के नारे लगाकर; डायलॉग बोलकर; और गाना-गाकर विकास और जनहित का मॉडल प्रस्तुत किया जाता हैं। जनता जानती है कि सियासी बाइस्कोप की खुमारी सिर्फ चुनाव होने तक है, आगे वही ढाक के तीन पात रहेंगे। चुनाव खत्म होने पर सियासी चालबाज यही कहने वाले हैं कि चुनाव खतम और वोट हजम। फिर मिलेंगे अगले पांच साल बाद। तबतक के लिए सायोनारा।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, March 27, 2014

नक्‍कारों की नेतागीरी का करियर

सोच रही हूँ नेता बन जाऊँ। घर परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के बड़ा हो जाने के बाद थोड़ी कम ही हो जाएगी। उसके बाद कोई ऐसा काम करना ठीक रहेगा जिसमें हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा हो जाय। इस हिसाब से राजनीति से अच्छा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। उम्र के हिसाब से भी दूसरी नौकरियों या धन्धों के बजाय चालीस पार करने के बाद राजनीति का करियर ही सबसे लाभदायक हो सकता है। आज-कल नेता बनना बाकी नौकरियों से बहुत आसान है।

मेरी निगाह में एक जबर्दस्त मुद्दा भी है - हमारे समाज में चारो ओर फैली बाल-मजदूरी का। यह जानते सभी हैं कि ‘बच्चों से काम कराना जुर्म होता है’; लेकिन इस जुर्म का लाभ उठाने के लिए सभी तैयार होते हैं। मैं अपनी राजनीति के लिए यही मुद्दा उठाउंगी। सड़क, गली-चौराहे पर जहां देखो वहां चार साल से लेकर चौदह साल तक के बच्चे कूड़े की ढेर से जूते, चप्पल, प्लास्टिक बटोरने का काम करते हैं। खाते-पीते घरों में भी गरीब घरों के बच्चे-बच्चियाँ छोटी-मोटी सेवा के लिए लगा दिये जाते हैं; जब कि इनके लिए सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था के साथ- साथ पका-पकाया गरम भोजन (हाट कुक्ड फूड) देने की योजनाएं भी चला रखी हैं। सरकार द्वारा मुफ़्त में दी गयी यूनीफ़ॉर्म पहने हुए कुछ बच्चों को भी मैंने कूड़ा उटकेरते देखा है। सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में जिन बच्चों का नामांकन भारी-भरकम अभियान चलाकर कराया जाता है ताकि “एक भी बच्चा छूटने न पाये”, उन बच्चों को इन स्कूलों में जो शिक्षा मिल रही है उसे देखकर ही मेरे मन में यह विश्वास पनप रहा है कि इनको सुनहरे सपने दिखाकर एक सॉलिड वोट-बैंक जरूर बना लूंगी और अपनी नेतागीरी चमका लूँगी।

मुफ़्त का भोजन, मुफ़्त का कपड़ा और कॉपी-किताबें व बैग, और भोजन के बाद मुफ़्त की छुट्टी; पढ़ाई के नाम पर यह पक्का आश्वासन की कक्षा पाँच और आठ तक कोई माई का लाल फेल कर ही नहीं सकता। अनपढ़ और नकारा बने रहने के लिए और क्या चाहिए?इन स्कूलों में गुरूजी लोग की बात न की जाय तो ही अच्छा। अव्वल तो स्कूलों में जरूरत के मुताबिक इनकी संख्या है ही नहीं; दूसरे,जो लोग तैनात हैं भी वे दूसरी तमाम चिन्ताओं में घुले जाते हैं। बच्चों की ओर ताकने की भी फुरसत उन्हें नहीं है। शिक्षामित्र अपनी मजदूरी के हिसाब से जितना पढ़ाना चाहिए उतना पढ़ाते हैं जो ऊँट के मुंह में जीरा के समान ही है।

इस प्रकार सरकार द्वारा अरबो रूपये खर्च करके जो अनपढ़ और मुफ़्तखोरी की आदत पाल चुके नक्कारों की फौज तैयार की जा रही है उनके आगे के जीवन में भी सरकारी कृपा की (मैं भीख क्यों कहूँ?) व्यवस्था जारी रखने का मिशन चलाने का काम तो करना ही पड़ेगा। मनमोहन सिंह की सरकार ने जाते-जाते इस टाइप की कुछ नीतियाँ घोषित कर दी हैं और कांग्रेस के मैनीफेस्टो में भी इस थीम पर काम किया गया है। अब इन बच्चों को न तो घर के काम सीखने की जरूरत है और न ही किसी और कौशल की। अगर ऐसे बच्चे सरकार की इस योजना का लाभ नहीं उठा पाएंगे तो युवा होकर करेंगे क्या..और किसके काम आएंगे? नेताओं का वोट बैंक बनने के अलांवा?

हमें विश्वास है कि थोड़ी मेहनत कर देने पर ये हमें बड़का नेता तो बना ही सकते हैं। उसके बाद हम इन्हें ‘अनपढ़ बेरोजगारी भत्ता’ या ‘बिना काम वेतन’ वाला रोजगार दिलाएंगे, जैसे मनरेगा में। सफाई कर्मचारियों की संविदा पर नियुक्ति दिलाएंगे। नगर निगमों में निकलने वाले जितने कूड़े है उनकी छँटाई और सफाई का जिम्मा इन्हें ही सौपेंगे। यानि ऐसे काम जो करने नहीं पड़ते। इनकी कार्य कुशलता तो इन्हीं सब कार्यों में है। नेता और एक बार मंत्री बन जाने के बाद तो सबकुछ मैनेज ही हो जाएगा। हम चाहे बाल-मजदूर रखे या वृद्ध सेवक, क्या फर्क पड़ता है?

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 1, 2014

खबरों पर लगाइए दिमाग की छननी

तथा-कथित सर्वे कंपनियां और मीडिया वाले सबका हाल बताते-बताते खुद की चाल बिगाड़ बैठे है। याद आ रहा है वो दिन जब हम पूरे दिन इंतजार करने के बाद रात को साढ़े आठ बजे दूरदर्शन पर सारी दुनिया का हाल-चाल जानने के लिए बैठे रहते थे। दूरदर्शन पर आधे घंटे के समाचार में किसी भी पार्टी या प्रोडक्ट का प्रचार नाम की कोई चीज नहीं दिखाई जाती थी। लेकिन अब क्या है..रंग-बिरंगे न्यूज चैनल और रंग बिरंगी चटपटी खबरें! इन चैनलों पर समाचार के नाम पर आचार-विचार की कोई चीज देखने को नहीं मिलती हैं। दस से पंद्रह सालों में जो विकास का उदाहरण देखने को मिल रहा है क्या उसमें से एक विकास का मॉडल यह पेड न्यूज और धंधेबाज सर्वे कंपनियां भी हैं?

चौथे स्तंभ का रवैया तो ऐसे ही ढुल-मुल लग रहा था। बाकी बची-खुची कसर अब आइटम गर्ल की तरह सर्वे कम्पनियां अपना- अपना ओपीनियन पोल पब्लिक को दिखाकर पूरा कर दे रही हैं। क्या होगा भला इस जनतंत्र का? जिस पार्टी ने अपने दस साल के कार्य-काल में देश में सिर्फ गड्ढा खोदने का कार्य किया हो कुछ न्यूज चैनल्स तो उनका गुणगान गा-गा कर फिचकूर फेंक देते हैं। देखने वाले को घिन्न आने लगती है ऐसे न्यूज चैनलों को। एक चैनल से मन ऊबने लगता है तो दूसरे पर रिमोट घुमाते ही पता चलता है कि यहां पर भी उसी पार्टी का गाना-बजाना चल रहा है। अब देखे भी तो कोई क्या? और रही बात सर्वे कंपनियों की तो पब्लिक को चाहिए कि इनका भरोसा हरगिज न करें।

अगर आम जनता को जरूरत है तो सिर्फ अपने विवेक का इस्तेमाल करने की। क्योंकि सुना है आजकल चुनावी मार्केट में गंजो को भी कंघी बेची जा रही है। अपने आस-पास के विकास को देखकर अपने दिमाग की बत्ती जलाने की; जो सिर्फ मिंटोफ्रेश खाने से नहीं जलेगा। चुनावी खबरों की चाय की चुस्की लेने से पहले अपने दिमाग की छननी से छान लेना बहुत जरूरी है।

Thursday, February 13, 2014

संविधान की ठकुरसुहाती

अरविन्द केजरीवाल ने अपनी दिल्ली सरकार को जिस तरह भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए खतरे में डाल दिया है उसपर दूसरी राजनीतिक पार्टियों से लेकर अखबारों ने और न्यूज चैनेल के स्वयंभू विद्वान संपादकों से लेकर सोशल मीडिया के सूरमाओं ने हाय तौबा-मचा रखी है। संविधान की दुहाई से लेकर राजनैतिक मर्यादा और अनुशासन की तमाम बातें लगातार घोंटी जा रहीं है। केजरीवाल का हल्ला-बोल इनके गले नहीं उतर रहा है।

करप्शन मिटाओं आन्दोलन को आगे बढ़ाने वाली यह राजनीति किसी भी पार्टी को रास नहीं आ रही है। देश से करप्शन मिटाने के लिए ईमानदार राजनीति की दिशा में अगर किसी ने पहला कदम बढ़ाया है तो वह हैं केजरीवाल। लेकिन स्वनामधन्य संपादकों से लेकर पूरा मीडिया क्‍लास उनकी टांग खिंचाई करने में चीटियों की तरह झोंझ लगाकर जुटा हुआ है। बचपन में जब देखती थी कि दो-तीन इंच लंबे एक जिन्दा गोंजर पर सैकड़ों चीटियाँ एक साथ हमला कर देती और उसे बेहोश करने के बाद अपने बिल तक खींच ले जाती थी तो कौतूहल के साथ-साथ उस जीव की मजबूरी पर दया भी आती थी। “केजरीवाल को राजनीति नहीं आती” यह कहते मीडिया वालों की जुबान नहीं थक रही। इधर बहुत से संपादकों ने संविधान और शासन-प्रशासन की परिपाटी के उल्‍लंघन की बात लिखने में कलम तोड़ दी है।

जिस संविधान ने ऐसी निर्लज्ज और भ्रष्ट सरकारों का निर्माण कराया हो, जिस कानून ने तमाम प्रत्यक्ष भ्रष्टाचारियों को बेखौफ़ घूमने का अवसर दिया हो, जिस राजनीतिक परिपाटी ने योग्यता के बजाय वंशवाद और चाटुकारिता को बड़ा मूल्य बना दिया हो, जिस मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लालच, ब्लैकमेलिंग और लामबन्दी की क्षुद्र मानसिकता से विषाक्त बना दिया हो उसे धता बताकर और उसपर हमला बोलकर केजरीवाल क्या गुनाह कर रहे हैं? संविधान की ठकुरसुहाती गाने वालों की भीड़ में यदि कोई भ्रष्टतंत्र की कड़वी सच्चाई के बारे में खरी-खरी कहना और एक सार्थक परिणाम लाने के लिए कुछ करना चाहता है तो इतना कोहराम क्यों?

केजरीवाल से पहले भी बहुत सी नामी-गिरामी पार्टियाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का नारा देकर सत्ता में आयीं लेकिन किसी भी पार्टी ने अपने देश की जनता के साथ हो रहे छल को उजागर नहीं किया; क्यों? उल्टा, भ्रष्टाचारियों की पीठ ठोकती रही और प्रकारान्तर से भ्रष्टाचारियों का बचाव भी किया। सत्ता में आने के बाद सबके सुर बदल जाते रहे हैं। लेकिन पहली बार यह हुआ है कि सत्ताधारी होने का कोई गुमान इस आम आदमी में नहीं है। केजरीवाल को अगर सत्ता का लोभ होता तो वह भी इन बड़े-बड़े कारोबारियों से हाथ मिलाकर कुर्सी तोड़ते। किसी घपले-घोटाले की जांच करवाने की राह नहीं चुनते।

मुकेश अंबानी एक ही गैस के लिए बंगलादेश से 2.35 डालर और अपने देश की जनता से 4 डालर लेते हैं। अप्रेल से गैस कीमत और बढने जा रही हैं, आखिर क्यों? सरकार का कहना है कि वह जनता को सब्सिडी पर गैस दे रही है, लेकिन देश के संसाधनों से निजी मुनाफ़ा कमाने वाले अंबानी से इतनी महंगी गैस खरीदने की क्या मजबूरी थी...? यहां सरकार की जवाबदेही  बनती है। आप को नहीं लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग बड़े-बड़े ठगों से मिलकर जनहित को परे रख जनता को ठगने की राजनीति पर उतर आए हैं। यह व्यवसायी वर्ग सरकारी खजाने पर डकैती डाल रहा है। दूसरी तरफ चैरिटी के नाम पर दिये जाने वाले अनुदान में“दानदाता” बनकर गरीबों के मसीहा बन जाते हैं। यह कैसा देश प्रेम हैं?

(रचना त्रिपाठी)

Monday, February 3, 2014

आजम से आजिज..

आम आदमी को तो इसका एहसास होता ही रहता है लेकिन शायद अब जानवरों को भी यह लगने लगा है कि इस देश में सेक्युलर चोला ओढ़कर साम्प्रदायिकता को भड़काने वाले नेता अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति करते हुए राष्ट्र की मूलभूत नीतियों के विरुद्ध कार्य करने में जुटे हुए हैं। यूपी के कद्दावर नेता आजमखाँ, जो मुज्जफरनगर में सांप्रदायिक दंगों के बाद अपनी सेकुलर छवि सिद्ध करने में लहूलुहान हो रहे हैं उन्हें उनकी भैंस ने भी नोटिस थमा दी है। इनकी जुबान सेकुलरिज़्म की बात करते-करते महज ‘सांप्रदायिक दुकान’ बनकर रह गयी है। इसे एक ‘तबेला’ कह लें तो गलत नहीं होगा, जहां सिर्फ मिलावटी धंधे की बात होती है।

कभी किसी ने सोचा कि आखिर उनकी भैंस गयी कहां? उस भैंस की जाति क्या थी? वह मुस्लिम थी या हिन्दू? मै बताती हूँ। हम लोगों की तरह ही भैस ने भी मंत्री जी का वह महान वक्तव्य कहीं सुन लिया था  जिसमें उन्होंने अलीगढ़ के मुस्लिमों के बीच एक मशहूर दन्तकथा के माध्यम से एक खास संदेश दिया था। तीन ठगों ने कैसे एक आदमी का बकरा ठग लिया था, अलग-अलग स्थानों पर यह बताकर कि वह बकरा नहीं गधा है। उन्होंने कहा कि संघियों ने  मुस्लिमों को यह कहकर बदनाम करना शुरू किया कि वे बच्चे ज्यादा पैदा करते हैं। देश की जनसंख्या बढ़ाने में मुसलमानों का रोल ज्यादा है। इस लांछन से बचने के लिए ये बेवकूफ़ मुसलमान बच्चों की संख्या कम करने लगे। सिर्फ दो बच्चे पैदा करने की सलाह देकर अल्पसंख्यकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है और यह वर्ग उनकी बातों में आकर बच्चे कम पैदा करने लगे हैं जिससे इस वर्ग को बहुत बड़ी हानि पहुचने वाली है। यह बात यहीं पर जाकर खत्म नहीं होती है। उन्होंने परिवार छोटा रखने की सलाह देने वालों को ‘ठग’ तक करार दिया।

वोट की राजनीति से प्रेरित इस संदेश का अर्थ अल्पसंख्यकों को समझ में आए या न आये लेकिन उनकी भैंस को यह बात समझ में आ गयी होगी कि मंत्रीजी ने अपने धन्धे को चंगा बनाये रखने के लिए भैसों के साथ भी राजनीति कर सकते हैं। दुग्ध उत्पादन में कोई कमी न आए इसके लिए वह डाक्टरों की सलाह लेकर भैसों को जल्दी-जल्दी बच्चा देने के लिए जबरिया मजबूर कर सकते हैं। एक भैंस मुर्गी तो बन नहीं सकती कि थोक के भाव से अन्डे देगी। नेता जी की इच्छा से आजिज होकर भैसों ने सोचा होगा कि अब उनके तबेले में निबाह नहीं है, जरूर वह रात में खूंटा उखाड़ भाग निकली होगी। शायद वह  मंत्रीजी के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करा देती; लेकिन उसको क्या पता था- जिसकी लाठी उसकी भैंस; कि पुलिसवाले भी उन्हीं के इशारे पर कार्य करते हैं, आखिर मनुष्य और जानवर में यही तो फर्क है। यह तो हमने भी सोचा था कि मंत्रीजी के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए लेकिन यूपी पुलिस कि हकीकत क्या है, यह तो सब जानते हैं।  मंत्रीजी  के सलाहकार अब शायद उन्हें सूअर पालने के धन्धे के बारे में बतायें। वह भी एक बार में चार से छ: बच्चे पैदा करती है।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, January 11, 2014

झाड़ू के बाद चाहिए पोंछा

जबसे दिल्ली में एंटीकरप्शन दवा का छिड़काव हुआ है तबसे करप्शन वाली बैक्टिरिया ने अपनी सेफ्टी के लिए एंटीकरप्शनब्यूरों के अफसरों और पॉलिटिशियन्स के साथ सांठ-गांठ कर छिड़काव करने वाले डॉक्टर पर अपना दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पैरामेडिकल स्टाफ को पटाने की कोशिश में शुरुआती सफलता मिलती दिख रही है। डॉक्टर साहब यह भूल गये हैं कि हास्पिटल में पैरामेडिकल स्टाफ भी ट्रैंड होना चाहिए। इनकी हाइजीन गड़बड़ हुई तो सारा प्रयास बेकार हो जाएगा।

बीमारी कैंसर की हो या करप्शन की डॉक्टर को आधे-अधूरे उपचार से परहेज करना चाहिए। एंटीबायोटिक का पूरा कोर्स न दिया जाय तो बीमारी का संक्रमण खत्म होने के बजाय और तेजी से फैलता है। ऐसे में बीमारी का किटाणु उस दवा के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेता है।

कैंसर के उपचार में सर्जरी से लेकर कीमोथिरैपी तक की विधि में अलग-अलग प्रकार के स्पेशलिस्ट की जरूरत पड़ती है। अगर ऐसा होता कि सर्जन ही रेडियोलोजिस्ट और कीमोथिरैपिस्ट का कार्य भी कर लेता, तो क्या जरूरत थी सरकार को इतने बड़े-बड़े खर्चे करके अलग-अलग विशेषज्ञ तैयार करने की। जनरल फिजीशियन से साधारण बीमारियों का इलाज तो करा सकते हैं लेकिन जब कोई गम्भीर बीमारी हो जाय तो कई विशेषज्ञों को लगाना पड़ता है।

करप्शन का रोग तो कैंसर से भी ज्यादा विकराल रूप ले चुका है। मिस्टर केजरीवाल के इरादे देश से करप्शन मिटाने के तो नेक है लेकिन इनके आधे-अधूरे उपचार से बात नहीं बनने वाली। मि. केजरीवाल इस देश से जिस बीमारी को साफ करने की बात कर रहे हैं उस बीमारी के वायरस और बैक्टिरिया अब उनकी आम आदमी पार्टी से ही चिपकने की कोशिश करने लगे हैं। ये लोग भी जब उसी भ्रष्ट राजनीति के तेल-मसाले में सने पकौड़े खा रहे हैं, उसी अनहाइजेनिक नौकरशाही की धूल-मिट्टी में लोट-पोट हो रहे हैं और सबकी रातोरात धनवान और शक्तिशाली बनने की लालसा से भरी हुई प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं तो इस बीमारी से खुद को भला वे कैसे उबार पाएंगे? रोग से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए सिर्फ झाडू- खरहरा से काम नहीं चलने वाला; जबतक कि उस पर भरपूर मात्रा में फिनायल डालकर पोंछा न मारा जाय।

इस आम आदमी पार्टी के वश में करप्शन जैसी बीमारी से अकेले अपने दम पर पार पाना मुश्किल लग रहा है। मुझे लगता है कि इस बीमारी को जड़ से साफ करने के लिए एक और पार्टी का गठन करना पड़ेगा। ऐसी पार्टी जो झाड़ू की सफाई के बाद उड़ने वाली धूल को मिटाने के लिए धुलाई और पोंछा लगाने का काम भी पूरा कर सके। इस कार्य को आम औरतें ही पूरा कर सकती हैं, क्योंकि इसकी विशेषज्ञता उनके पास है और इसके लिए कमरतोड़ मेहनत करने में उन्हें महारथ हासिल है। आम औरत में एक प्रबल गुण यह भी होता है कि वह आम और खास के बीच कोई भेद नहीं करती। सबके प्रति एक सामान्य दृष्टि रखती है और अच्छे बुरे का भेद खूब पहचानती है।

मैं आज इस पार्टी के नाम की घोषणा करती हूँ- “आम औरत पार्टी” जिसका चुनाव चिन्ह होगा “पोछा”। इस पार्टी की सदस्यता नि:शुल्क दी जाएगी। जहाँ की सफाई झाड़ू से नहीं पूरी हो सकेगी वहाँ पहुँचकर यह पार्टी पोंछा लगाएगी। हमें विश्वास है कि इस पार्टी की मदद से करप्शन जैसी बीमारी को धो-पोंछ कर इस देश के बाहर फेंक दिया जाएगा।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, December 27, 2013

बड़े बोल की पोल

देश में सियासत का जुनून सभी सियासी दलों में सिर चढ़ कर बोल रहा है। बिल्कुल वालीवुड की फिल्मों में उस नायक की तरह जो नायिका को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए, उसके सामने अपनी बहादूरी के कारनामें दिखाने के लिए भांति-भांति प्रकार के तरीकों का प्रदर्शन करता हैं। इन तरीकों में सबसे नायाब तरीका यह होता है कि नायक नायिका के सामने पहले तो खुद गुंडे भेजता है और अपना प्रभाव जमाने के लिए अचानक सुपर मैन की तरह प्रकट होता है, फिर नायिका को उन गुंडों से बचाने का ढोंग करता है। नायिका उसे रक्षक मानकर अपना दिल दे बैठती है। सियासी दलों के बीच भी वोट पाने के लिए कुछ इसी प्रकार का नाटकीय अभिनय चल रहा है।

एक समय था जब सियासत होती थी इस देश के लिए। इस देश से गरीबी, भुखमरी, बीमारी दूर करने के लिए; राष्ट्र के लिए हर नागरिक में प्रेम भावना बनाए रखने के लिए; लेकिन अब सियासत होती है भ्रष्टाचार करके पांच सालों तक भ्रष्टाचार मिटाने की ‘बात करने’ के लिए। ठीक उसी फिल्मी शो की तरह जो सिर्फ तीन घंटे में पूरी हो जाते है; और फिल्म मेकर मालामाल हो जाता है।

यूपी में भी सियासत की सरगर्मी बढ़ कर बोल रही है। तरह-तरह के तोहफों से जनता को रिझाने की कोशिश की जा रही है। सपा मुखिया अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को नसीहत देने में जुट गये हैं। २०१४ के चुनाव को ध्यान में रखकर गुंडई न करने की बात कुछ इस तरह समझाते हैं। आइए उनकी बातों का अर्थ समझते है-

“अगर मंत्री के परिवार का लड़का गुंडई करेगा तो हमारी छवि खराब होगी। अगर खबर मिली की फला जगह गुंडई हुई तो मै पार्टी से निकाल दुंगा।” यानि चुनाव जीत जाने के बाद कुछ भी करें इन्हें आपत्ति नहीं होगी।

“मंत्रियों और कार्यकर्ताओं की छवि बेदाग रही तो पार्टी लंबे समय तक सत्ता में बनी रहेगी।” यानी लंबे समय तक लूट, हत्या, डकैती, छिनैती, दंगा, फसाद करते रहेंगे।

“यूपी में मंत्री आगे से इस तरह की घटनाओं को न दुहराएं। मंत्री अपने समर्थकों को संभालें।” यानि चुनाव होने तक उसी वालीवुड हीरो की तरह जनता को रिझाते रहो एक बार सत्ता अपनी मुट्ठी में आ जाय तो फिर खलनायक की तरह अपना असली चेहरा जनता को दिखाएंगे।

“मंत्रियों ने अगर खुद को नहीं सुधारा तो लाल बत्ती छिन सकती है।” ‘आप पार्टी’ को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका भी साइड इफेक्ट अच्छा ही होगा।

(रचना त्रिपाठी)