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Wednesday, September 5, 2018

लोभ और भय के बीच बेवक्त ऊँघना

स्कूल की क्लास में तीसरी घंटी के बाद बड़े-बड़े तुर्रमखां पढ़ाकुओं की अकड़ भी ढीली पड़ जाती थी। गुरुजी चाहे जितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, और उनके वचनों से साक्षात् सरस्वती ही क्यों न प्रवाहित हो रही हों उस पीरियड में बहुत कस के उँघाई आती थी। दन्न-दन्न  प्रश्नों का हल दागते देख गुरुजी लोग प्रसन्न होकर अपने चहेते चेलों को अक्सर अपने ठीक सामने की बेंच पर बिठा लिए करते थे। इससे बैक बेंचर्स को मिलने वाली आड़ की सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती थी।

उस पीरियड ने बड़े- बड़ों की पोल खोल कर रख दिया था। जबरदस्ती आँख फैलाये रहने के बावजूद नींद का झोंका सिर को धोबीपाट के कपडों की भांति उठा-उठा कर आगे-पीछे तो कभी अगल-बगल में बैठे सहपाठी के कंधे पर पटकता रहता। स्कूल के दौरान कई बार इस बेमुरौवत लफड़े में मैं भी फंस चुकी हूँ। लेकिन जो भी हो, यस सर, जी सर कहकर मैं अपनी पूरी जुगत लगा लेती थी उनको इस भ्रम में रखने के लिए कि 'गुरुजी, आप जो पढ़ा रहे हैं वो मेरे समझ में ख़ूब आ रहा है।'

ऐसा करना विद्यार्थी धर्म के विपरीत और नैतिकता के विरुद्ध होने से अपराधबोध को भी जन्म देता था। पर गुरुजी के विश्वास को बनाये रखने का लोभ और उसके साथ उनके बगल में रखी बेत की छड़ी जिसे गुरूजी दुखहरण कहा करते थे उसका भय इतना अधिक था कि हमारा ऐसा करना हमारी मजबूरी थी।

बचपन के उस अकिंचन अपराध के लिए क्षमायाचना सहित अपने सभी गुरुओं को शिक्षक-दिवस की ढेरों बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। अरे, अभी इस समय कौन हो सकता है...! दुपट्टा सम्हालते हुए दरवाजा खोला तो शौहर खड़े थे, आज कुछ अलग मुस्कान लिए हुए। चकित होकर पूछा– क्या हुआ, आज इतनी जल्दी?

शौहर ने उसे हौले से पकड़कर अंदर आने का रास्ता बनाया। वह अचकचा कर पीछे हट गयी। सामने वाली भाभी जी एकटक जो देख रही थी। चट दरवाजा बंद कर अंदर की ओर मुड़ी तो इरफान मियां गुनगुना रहे थे– "आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है"

ऑफिस बैग सोफे पर पटका जा चुका था। उसकी दोनों बाहें फैली हुई शायरा की ओर बढ़ीं और इरफान ने उसे नजदीक खींच के उसकी कमर को दोनों ओर से जकड़ लिया– "जी करता है आज तुम्हारी आंखों में आँखे डाले यूँ ही देखता रहूँ।"

शायरा– माजरा क्या है? आज अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे। तबियत तो ठीक है?

इरफान– नहीं रे पगली, अब मैंने सोच लिया है। जो भी जिंदगी अल्लाह ने बख्शी है उसे प्यार से जीकर ही गुजारना है। सच्चे दिल से कह रहा हूँ।

जी-न्यूज पर शोर-शराबे वाली बहस चल रही थी। एक मौलाना जी चीख रहे थे– आप लोग तो ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे कोर्ट ने तलाक का अख्तियार एकदम से खत्म कर दिया है। असल बात कुछ और ही है...

शायरा ने रिमोट उठाकर टीवी बन्द कर दिया और इरफान के सीने से लग गयी– सच में प्यार करोगे मुझे? ऊपर की जेब मे रखी कलम उसके गाल पर चुभ रही थी। इरफान मौन होकर कुछ सोच रहा था।

शायरा ने जेब से कलम निकालकर किनारे रख दी,  "दो दिलों के बीच में इस पेन का क्या काम? सुना नहीं है, फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए"
"अरे यार, वो मौलाना जी क्या कह रहे थे? टीवी क्यों बन्द कर दिया? जरा रिमोट देना..."

"ओहो, तो ये बात है..!" अपनी कमर से उनका हाथ झटकते हुए मुंह बिचकाकर बोली– "बड़े आये, आज फिर जीने की तमन्ना है ...हुँह! कल तक क्या घास छील रहे थे... अभी काहें मरने का इरादा बना रहे हो? अभी तो सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगी है। बाकी द्वार तो खुल्ले ही पड़े हैं, ...वो भी आजमा लो तो मरिहो"

टीवी पर बहस जारी थी– तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-अहसन, निकाह-ए-हलाला, तलाक-उल-सुन्नत...

शायरा ने चुपचाप सोफे से बैग उठाया, कलम को शर्ट की जेब में वापस रखा और बोली– "कपड़े बदल लो चाय लेकर आती हूँ।"

(रचना त्रिपाठी)

Monday, July 24, 2017

चक दे छोरियों

आज मैं लड़कियों को विश्व स्तर पर क्रिकेट खेलते हुए  देखकर अभिभूत हूँ। ऐसा लग रहा है मानो मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है। इन्हें देखकर स्कूल का अपना दिन याद आ गया जब लड़कियों के लिए खेलकूद प्रायः वर्जित क्षेत्र हुआ करता था।

अस्सी के दशक की बात है। बचपन से ही मुझे भाइयों के साथ क्रिकेट खेलने की छूट मिली हुई थी। बल्कि भाग-दौड़ वाले सभी खेल खेलने की आदत सी पड़ गई थी। जब मैं स्कूल में जाती थी तो वहाँ हम लड़कियों को गेम के नाम पर उछलने वाली रस्सी और रिंग-बॉल खेलने को मिलती थी। यह मुझे शारीरिक व्यायाम से ज्यादा कुछ नहीं लगता था। स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर से मैं अक्सर क्रिकेट अथवा बैडमिंटन की डिमांड किया करती थी। इसके लिए कई बार अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों को लेकर अक्सर स्पोर्ट्स ऑफिस के सामने धरने पर बैठ जाया करती थी। कुछ देर तक स्पोर्ट्स टीचर जो वहाँ पी टी मास्टर कहलाते थे, उनसे मेरी क्रिकेट पर बहस हो जाया करती थी। उनका कहना था - ''लड़कियां क्रिकेट नहीं खेलती है, आजतक कभी किसी लड़की को क्रिकेट खेलते देखा है?'' मुझे उनका यह वक्तव्य और भी उद्वेलित कर देता था। चूंकि मैंने भी अपने अलावा वहाँ किसी और लड़की को क्रिकेट खेलते नहीं देखा था इसलिए मुझे उनके इस सवाल का सही जवाब नहीं सूझता। फिर मन में पीटी मास्टर साहब को कोसते और बुदबुदाते हुए झक मार कर अपने क्लास की ओर चल पड़ती थी।

हमारे मन को चुभने वाली बात यही तक नहीं थी। उसी वक्त वे डांटते हुए यह कहकर हमें भगा दिया करते थे कि ''तुम सब जाओ, गृहविज्ञान पढ़ो।'' जिस पीरियड में लड़के फुटबॉल और क्रिकेट खेला करते थे वही हम लड़कियों के लिए गृहविज्ञान पढ़ने का पीरियड हुआ करता था। उस वक्त हम सबका ध्यान अपने विषय पर कम और स्कूल प्रांगण में ज्यादा रहा करता था।

काश मेरी मुलाकात उस पी टी मास्टर साहब से होती, तो मैं उनको साक्ष्य के साथ बताती कि लड़कियां भी कितना उम्दा क्रिकेट खेलती हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, February 20, 2016

स्वच्छता अभियान की जय हो

कूड़े वाली गाड़ी आयी 
रम पम पम... पों पों पों
कूड़ा हम उठायेंगे, लखनऊ स्वच्छ बनायेंगे...
रम पम पम... पों पों पों
तेज आवाज में यह गाना गाती और भोंपू बजाती हुई यह गाड़ी सुबह 8.30 से 9 बजे के बीच मोहल्ले में आती तो सभी घरों से लोग कूड़े के थैले लेकर बाहर आ जाते। घरों के बच्चे तो कौतूहल से गाड़ी देखने और उसका संगीत सुनने ही निकल पड़ते थे। बच्चों के साथ बड़े भी कुछ देर के लिए इस नज़ारे को देखने बालकनी में निकल आया करते थे। इस पूरे खेल में कुल 10-15 मिनट लगते थे।
कूड़े-कचरे के उन्मूलन के लिये नगर निगम द्वारा की गयी यह पहल बहुत ही सराहनीय है, और कामयाब होते भी दिख रही है।

पर पिछले दो चार दिनों से यह रोचक संगीत सुनने को नहीं मिल रहा है। पता चला कि एक दिन हमारी ही बिल्डिंग के एक महोदय ने गाड़ी वाले को ज़ोर से डाँट कर भोंपू बजाने से मना कर दिया। उसके भोंपू बजाने से उनकी सुबह की नींद में खलल पड़ रहा था। तबसे वह नहीं बजाता। नाइट ड्यूटी करने वालों की सुबह की नींद भी जरुरी है। ऐसे में कूड़े वाले का शोर मचाकर घर घर से कूड़ा इकठ्ठा करने का अभियान इनकी नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा था। सुविधा संपन्न लोगों को तो कमरे में विंडो ए.सी. की आवाज भी डिस्टर्ब कर देती है; भला इसके भोंपू की आवाज कैसे बर्दाश्त हो सकती है? अब गाड़ी रोज़ आती तो है पर चुपचाप। बच्चे दौड़कर बालकनी में उसे देखने नहीं जा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि कूड़े वाली ट्राली कब आयी और चली गई।

आज मैंने तय समय पर बालकनी से नीचे झाँककर देखा तो ट्राली नीचे खड़ी थी। घरों से कूड़े के थैले आ रहे थे। सड़क पर ट्रैफिक की आवाजाही के शोर-शराबे के बीच ट्रॉली में कूड़े के ढेर से सटकर गहरी नींद में सोता हुआ कर्मचारी दिखा। यह किसी भी आवाज से बिल्कुल बेखबर, बेसुध सा पड़ा था। कोई शोर उसे डिस्टर्ब नहीं कर पा रहा था।

मेरे मोहल्ले की सड़कें और पार्क जिसपर कचरे का ढेर लगा रहता था अब ज़्यादा साफ़-सुथरी दिखने लगीं हैं। जिसने बच्चों  के अंदर भी सफ़ाई के प्रति नई जागरूकता पैदा कर डाली है। स्वच्छता के प्रति बड़ों से ज़्यादा बच्चों में उत्साह, उमंग और प्रतिबद्धता देखने को मिल रही है। घर में वे अब सफ़ाई के प्रति सजग तो रहते ही हैं बाहर भी इस अभियान को सफल बनाने में उनका बहुत ज़्यादा सपोर्ट मिल रहा है। राह चलते सड़क पर हम बड़ों से यदि ग़लती से भी कोई अवांछित पदार्थ गिर जाय तो वे फ़ौरन हमारी भी क्लास लगा देते हैं। बाहर कार की खिड़की से खरीदी हुई आइसक्रीम का रैपर वे संभाल कर घर तक लाते हैं और डस्टबिन में ही डालते हैं। अब टोके जाने के डर से बड़े-बूढ़े भी ऐसा करने को मजबूर हैं। यह सकारात्मक बदलाव मन में आशा जगाता है कि शायद अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, March 21, 2015

नकलची समाज के हाशिए पर लड़कियाँ-

ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के बारे में उनके अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक की यह सोच कि ज्यादा पढ़ा-लिखा कर इनसे भला कौन सी नौकरी करानी है, इनको और बेचारगी की तरफ ढकेलती है। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ने वाली बच्चियों के प्रति उनके घर, गाँव, समाज ही नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स का भी यही नजरिया देखकर निराशा होती है। उनकी नजर में पढ़ाई का उद्देश्य कमाई करना और कमाई के मायने सिर्फ 'अर्थ' यानी रूपया-पैसा कमाने से ही है जो सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। लड़कियों के हिस्से में तो सिर्फ घर में रहकर चूल्हा-चौका सम्हालना और बच्चे पैदा करके उन्हें पालना ही होता है।

यही वजह है कि परीक्षा के दौरान गुरुजनों की दृष्टि उन बच्चियों के ऊपर और उदार हो जाती है। आज-कल बिहार और यूपी में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल महायज्ञ जोरों पर है। वैसे तो इस बार फ्री फॉर आल का नज़ारा है लेकिन लड़कियों को विशेष सुविधा एक परम्परा बन चुकी है। परीक्षा-केंद्र पर गुरुजन उन्हें नकल करने-कराने की सामग्री सहित हर तरह की सुविधाओं की पूरी छूट मुहैया करा डालते हैं। इस नकल से प्राप्त डिग्री और उससे प्राप्त कन्या विद्याधन का लाभ उनके आगे की पढ़ाई में मिले या न मिले, इससे न तो उन बच्चियों के अभिभावक का कोई सरोकार होता और न ही उस स्कूल के टीचर्स का। वहाँ से उनको शिक्षा-दीक्षा में अपने अधिकारों और हितों के प्रति जाहिली और अनभिज्ञता के सिवा कुछ भी नहीं मिला होता।

ऐसे में उन बच्चियों को अगर नक़ल न कराया जाय तो बोर्ड परीक्षा में सफल बिद्यार्थियों का प्रतिशत बिगड़ने से 'स्कूल की इज्जत' मटिया-मेट होने का भय रहता है। बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए उसके प्रबंधकों को नक़ल की सुविधा उपलब्ध कराने के सभी उपाय कराने पड़ते हैं। वहाँ स्कूल की इज्जत का विकट सवाल खड़ा हो जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं जिनको अपने स्कूल का मुँह भी परीक्षा के दौरान पहली बार दिखाया जाता है। स्कूल की चारदीवारी का कोना-कोना उनसे इस कदर अपरिचित होता है कि वे अकेले अपने क्लास-रूम तक जाने में असमर्थ रहती हैं। उनकी शकल-सूरत भी दया की पात्र दिखाई देती है। पर दस-पन्द्रह दिन की जद्दोजहद से मिली मार्कशीट के आधार पर सरकारी कृपा वाली कन्या विद्याधन योजना उनके जीवन में थोड़ा सा 'अर्थ' तो जरूर प्रदान करती है। ऐसा तात्कालिक लाभ उनके परिवार वालों को उनकी वैवाहिक योजनाओं को सफल बनाने में जरूर मदद करता है। परन्तु इस तरह की शिक्षा-दीक्षा से यह जरुरी नहीं है कि वैवाहिक योजानाओं की सफलता की तरह उनकी भावी जिंदगी को भी कोई सम्मानजनक अर्थ मिल सके।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, November 28, 2014

ज्योतिष पर बहस के साइड-इफेक्ट्स

आजकल मैं बड़ी दुविधा में हूँ। जबसे स्मृति ईरानी ने एक ज्योतिषी से अपना हाथ दिखा लिया है, बल्कि जबसे उनके द्वारा ज्योतिषी से हाथ दिखाने का प्रचार इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ने कर दिया है तबसे तमाम प्रगतिशील और वैज्ञानिक टाइप लोग इसपर तमाम लानत-मलानत करने पर उतर आये हैं। रोज-ब-रोज देश की छवि मटियामेट हो जाने से चिन्तित लोगों को देखकर मेरा मन भी धुकधुका रहा है। इस बहस में कहाँ रखूँ अपने आप को? हमने जन्तु विज्ञान में परास्नातक किया है। मतलब हाईस्कूल, इंटर, बी.एस-सी. और एम.एस.सी. सबकुछ `साइंस-साइड' से। लेकिन मेरी सभी परीक्षाओं का फार्म भरवाने से पहले अपने खानदानी पंडितजी जो ज्योतिष के प्रकांड विद्वान माने जाते हैं उनसे पापा ने शुभ-मुहूर्त जरूर दिखवाया है। यह बात भी सत्य है कि हम बिना फेल हुए हर साल अच्छे नंबर से पास भी होते रहे हैं। ऐसे में क्या आप एक विज्ञान के विद्यार्थी से यह उम्मीद करते हैं कि वह इतना अंधविश्वासी होगा…?

जन्म से लेकर आजतक हमारा कोई महत्वपूर्ण कार्य पंडितजी की राय या अनुपस्थिति में नहीं हुआ है। हम तो यही देखते आये हैं कि घर में कोई शुभ-कार्य करना है, यहाँ तक कि कहीं दूर की यात्रा पर भी जाना है तो बिना पंडितजी से शुभमुहूर्त दिखाये नहीं जाते है। शिक्षा- दीक्षा रही हो या विवाह का योग; दूल्हे की दिशा-दशा का अनुमान लगाना हो या शारीरिक सौष्ठव जानना हो; वह नौकरी-शुदाहोगा, बेरोजगार होगा या किसी व्यावसायिक या उद्योगपति घराने से संबन्धित होगा; यह सब ज्योतिषी जी से ही पूछा जाता था। मेरा दाम्पत्य-सुख निम्न, मध्यम या उत्तम कोटि का होगा; इन सब बातों की जानकारी के लिए हम ज्योतिष का ही सहारा लेते रहे।

विवाह हुआ नहीं कि घरवाले संतान-योग की जानकारी के लिए और होने वाली संतान सर्वगुण-संपन्न और योग्य ही हो इसके लिए ‘पंडीजी’ के बताये अनुसार अनुष्ठान, स्नान–दान, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन आदि हम बिना विज्ञान-गणित लगाये निरंन्तर करते रहे हैं। सच पूछिये तो हमें अपना वर्तमान और भूत-भविष्य जानने की उत्कंठा आजतक रहती है। मैं यह सब करते-धरते बेटी से बहू भी बन गई लेकिन अपना भी कोई चान्स राजनिति में है कि नहीं यह जानने की ललक आज भी है। घर पर आने-जाने वाला कोई व्यक्ति जो यह बता दे कि उसे ज्योतिष की कुछ भी जानकारी है तो उसे पानी पिलाने से पहले अपनी हथेली दिखाने बैठ जाती हूँ। कई बार तो अपनी इस हरकत के लिए डाँट भी खा चुकी हूँ। मगर क्या करूँ मन के आगे मजबूर हूँ। यह मन बहुत महत्वाकांक्षी होता है जो उसे कभी- कभी अंधविश्वासी होने पर भी मजबूर कर देता है। इस अंधविश्वास में कालांतर सुख हो ना हो मगर तात्कालिक आनंद बहुत होता है। कभी मौका मिले तो आजमाकर देखिए।

हमारे ज्योतिषी के कहे अनुसार तो अबतक की प्रायः सभी भविष्यवाणी सही साबित हुई है। ज्योतिषशास्त्र द्वारा जो चाँद और सूरज की चाल की गणना करके ग्रहण आदि का समय बताया जाता है वह भी बिल्कुल सटीक बैठता है। जब हमने कंप्यूटर का नाम भी नहीं सुना था तब भी ग्रहण लगने पर कब नहाना है और कब दान-पुन्न करना है यह पंचांग देखकर पापा बता देते थे; और हम लोग मनाही के बावजूद छत पर जाकर राहु-केतु के मुंह में समाते और निकलते चाँद मामा और सूरज देवता को देख भी लेते थे। सदियों से चली आ रही हमारी परम्पराएं भी तो जन्म से लेकर शादी-ब्याह और मृत्युपर्यन्त कर्मकांड तक बिना पंचांग देखे पूरी नहीं होती है। इसके बिना मन को संतोष और हृदय को आश्वस्ति कहाँ मिलती है?

अब हम तो आजतक यही जानते है कि पंडितजी ने बताया है कि विवाह से पूर्व “हल्दी” का लेप लगाने की रस्म है, तो  है। हमें हर हाल में यह रस्म अदा करनी है। नहीं किया तो अशुभ हो जायेगा। इस प्रक्रिया में कितना विज्ञान है, कितना ज्योतिष है और कितनी चिकित्सा यह कभी नहीं सोचा। उस समय हम तो शुभ-अशुभ मानते हैं। विज्ञान तो यही कहता है कि किसी तरह की बीमारी या साइड इफेक्ट से बचने के लिए हल्दी का प्रयोग अनिवार्य है। क्योंकि हल्दी बेस्ट एन्टीसेप्टिक होता है। विज्ञान को समझने में हमें थोड़ी देर लगेगी लेकिन पंडितजी की बात हम तत्काल समझ जाते हैं। इसका कारण यह है कि  हमारे तो छठी के दूध में ही ज्योतिष शास्त्र मिला हुआ है।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, August 11, 2014

किरपा के काबिल तो बनिए

साधारण परिवार में जन्मीं एक बेटी जो आगे चलकर “डेली सोप” की बहू बनी और बहू से फिर ‘मंत्री’ तो कोई खास योग्यता तो जरूर रही होगी। ऐसे में बार-बार इनकी पात्रता पर सवाल खड़ा कर इनके मन को बेवजह तकलीफ दी जा रही है… योग्यता या पात्रता के लिए किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का प्रामाणपत्र हो यह जरूरी तो नहीं। विद्या अथवा ज्ञान तो कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसका स्रोत निर्मल बाबा की ‘किरपा’ हो या ‘डेली सोप’।

यदि कुछ खास लोगों की कृपा बनी रहे तो पात्रता के बगैर भी पद और प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सकती है। अब अपनी स्मृति को ही ले लीजिए जिनपर साक्षात्‌ “मोदी” की माया है। नहीं तो क्या इस देश में टीवी की बहुओं अथवा साधारण परिवार की स्त्रियों की कमी है? क्रिकेट के भगवान सचिन तेन्दुलकर की डिग्री भी तो किसी से छुपी नहीं है जो आज राज्यसभा में सांसद के पद पर आसीन हैं। यह बात अलग है कि राज्य सभा में वह गाहे-बगाहे भी नजर नहीं आते हैं। जब भगवान ही हैं तो संसद में उनके फोटो से भी काम चलाया जा सकता है। रेखा का सिलसिला तो बहुत पुराना हो गया है। लोगों को इसपर इतना बावेला मचाने की क्या जरूरत है? बस किरपा बरसाने वाले बने रहें... इस देश को और क्या चाहिए...?

जब किरपा से सब कुछ उपलब्ध हो जाता है तो डिग्री के लिए इतनी माथा-पच्ची क्यों...? इन मंत्रियों और सांसदो के नीचे काम करने वाले उन अधिकारियों की हालत तो देखिए...। बेचारे..., ये सभी स्नातक, परास्नातक करने के बाद भी तमाम किताबें घोटकर वहां तक पहुँचने में अपनी एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। इतने पढ़े –लिखे होने के बावजूद ये अधिकारी उन्हीं मंत्रियों और नेताओं के अधीन काम करते है। क्या गरज थी इन्हें इतनी डिग्री बटोरने की…? किसी की किरपा मांग लेते...।

शास्त्रों में कहा गया है कि- “विद्या से विनय की प्राप्ति होती है और विनय से व्यक्ति सुपात्र बनता है।” यहां राजनीति में क्या इस श्लोक की आवश्यकता है…? नहीं न…? अरे जब फूलन देवी सांसद बन सकती हैं और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हाल सकती हैं तो आप ही बताइए कि “किरपा” में ज्यादा ताकत है या डिग्री में?

अपात्र तो धरती पर बहुत पड़े हैं लेकिन सभी पर किसी महापुरुष की किरपा नहीं बरसती। उसको पाने के लिए ज्ञान और कर्म की थाती हो ना हो, अच्छे भाग्य, राजकुल वंशावली, उससे वैवाहिक संबंध अथवा कलियुगी कला जैसे चाटुकारिता, असाधारण सेवा धर्मिता जैसे उपायों की जरूरत पड़ती है। इसमें कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। ये मार्ग अपनाकर छुटभइए भी बहुत उच्च पदों पर विराजमान हो सकते हैं। इसके मूल में बस वही है- किसी व्यक्ति विशेष की “किरपा”।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, January 29, 2014

कमाऊ बीबी - बवाले जान

लखनऊ से दिल्ली की यात्रा के दौरान स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस में मेरे ठीक पीछे वाली सीट पर बैठा युवक अपनी मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था। ए.सी. चेयरकार  में अपेक्षाकृत शांति थी और उसकी आवाज थोड़ी ऊँची जो बरबस ध्यान खींच लेने भर को काफी थी। उसकी बात से यह अनुमान लगा कि दूसरी ओर भी कोई पुरुष ही था । बात-चीत के दौरान उसने एक ऐसा वाक्य प्रयोग किया कि मेरी सोच वहीं जाकर अटक गयी। एक अपरिचित द्वारा मोबाइल पर किसी और से की जा रही बात पर कोई हस्तक्षेप तो किया नहीं जा सकता था; लेकिन मेरे मन में बार-बार यह वाक्य कौंधता रहा। उसने कहा था- “मेहरारुन के कमाइल बड़ा घातक बा।” इस वाक्य को सुनकर मेरे कान खड़े हो गये और दिमाग ने अपना काम करना शुरु कर दिया।

इस बात का अर्थ मुझे खूब अच्छी तरह से पता था। इसका मतलब होता है कि स्त्रियों का नौकरी करना बहुत नुकसानदेह है। मै लगातार इस बात पर मंथन करने लगी कि स्त्रियों का नौकरी करना आखिर घातक कैसे हुआ? पुरुष जब नौकरी करता है, कमाकर घर में पैसे लाता है तो कोई बात नहीं; लेकिन यदि औरत ने कमाना शुरू कर दिया तो कुछ गड़बड़ हो गयी। उस युवक की इस सोचपर मुझे तरस आती है और खींझ भी। आखिर इस बात की व्याख्या कैसे की जाय?

मुझे लगता है कि यह बात उस सोच का परिणाम हो सकती है जिसके अनुसार घर का कमाऊ व्यक्ति ही असली शक्ति का केन्द्र होता है। परिवार के लगभग सारे निर्णय या तो उसके द्वारा लिये जाते हैं या उसकी सहमति के बाद ही लागू हो पाते हैं। सामान्यतः घर का मुखिया भी वही होता है जिसके हाथ में अर्थोपार्जन का श्रोत है। एक पुरुष-प्रधान समाज में इस आर्थिक शक्ति पर पहला हक पुरुष का होता है, इसीलिए घर से बाहर निकलकर नौकरी या व्यापार करने का अवसर पहले लड़के को मिलता रहा है। घर की स्त्री बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करने, रसोई संभालने और साफ-सफाई के काम में लगती रही है और घर के मालिक की इच्छाओं की पूर्ति कर लेने में ही अपने जीवन का श्रेय-प्रेय मान लेती रही है। उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही न हो।

आजादी के साठ से अधिक साल बीत जाने के बाद अब इस स्थिति में परिवर्तन आ गया है। स्त्री ने समाज में अपनी भूमिका लगभग सभी क्षेत्रों में बढ़ायी है। अब वह नौकरी करके अर्थोपार्जन भी करने लगी है। जाहिर है कि नारी सशक्तिकरण के इस दौर की आँच ऐसे कूढ़मगज पुरुषों को लगने लगी है जो पुरानी सामन्ती व्यवस्था से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। उन्हें स्त्री का नौकरी करना इसलिए घातक लगता है कि अब उन्हें उसके ऊपर रौब गाँठने और चेरी बनाकर रखने का अख्तियार नहीं रहा।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, October 28, 2013

नक्कारों की फौज भर्ती को तैयार…

प्रदेश सरकार की मेहरबानियों पर पलता-बढ़ता हमारा समाज और इस समाज के युवा वर्ग की हालत देखकर मन उद्विग्न है। यह प्रचार हो रहा है कि उनकी पढ़ाई के लिए कितने खर्चे अपने सिर पर ढो रही है उत्तर प्रदेश की सरकार। इन बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक बनी रहे इसके लिए इन्हें कितने तोहफे बांट चुकी है। लेकिन सच्चाई यह है कि नकल की खुली छूट देकर बोर्ड परीक्षाओं में सामान्यतः सत्तर प्रतिशत से ऊपर अंक देने के बाद एक-एक घर में चार-चार लैपटॉप और टैबलेट बाँटना कहीं से जायज नहीं कहा जा सकता। राजनीति के तोहफे इसी प्रकार लुटाये जाते है हमारे देश के बेरोजगार युवाओं पर। सरकार अब उन्हें आसान नौकरी का भी तोहफा देने की तैयारी कर चुकी है।

उत्तर-प्रदेश में ग्राम पंचायत अधिकारियों की भर्ती होने जा रही है। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा के अंको के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जायेगी और रिक्तियों के दस-बीस गुना अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए काल कर लिया जायेगा। जिले के सरकारी अधिकारी इनका इंटरव्यू लेंगे और उसमें प्राप्त अंकों के आधार पर नियुक्ति कर दी जाएगी। यानि कोई लिखित प्रतियोगी परीक्षा नहीं करायी जाएगी। एक अभ्यर्थी चाहे जितने जिलों से आवेदन कर सकेगा और अपना भाग्य आजमा सकेगा। इस भर्ती प्रक्रिया में बेरोजगार युवाओं से अधिक तैयारी और दौड़-धूप उनके अभिभावक कर रहे हैं। जिसकी जितनी ऊँची पहुँच और जितनी भारी जेब है वह उतना अधिक आश्वस्त है।

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के सबसे निचले स्तर की इकाई ग्राम पंचायत के सचिव की कुर्सी की शोभा बढ़ाने वाले इन ग्राम पंचायत अधिकारियों की सरकारी योजनाओं को ग्राम स्तर पर लागू करने में बहुत अहम भूमिका होती है। इसलिए इस पद के लिए एक से बढ़कर एक बोली लगायी जा रही है। सुना है एक कैन्डीडेट पर करीब बारह लाख रूपए तक की बोली लग चुकी है। देखना रोचक होगा कि तृतीय श्रेणी के इस पद के लिए बारह लाख देने वाले ‘बेरोजगार’ की हैसियत क्या होगी? जो बेरोजगार बारह लाख नहीं दे पायेगा वह अपने आप को जीवन भर कोसता रहेगा। अब इस बारह लाख के लिए उन्हें या उनके घर वालों को जाने कौन-कौन से कार्य करने पड़ेंगे- चोरी, डकैती लूट, हत्या और आत्महत्या जैसे अनेक प्रयासों के वे भागीदारी बनेंगे।

ऐसे युवाओं को शुरू से ही भ्रष्टाचार और निकम्मेपन की राह पर भटकाने के अलावा हमें उनके हित की कोई बात नही दिख रही। इन शर्तों पर भी यदि भर्ती प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है तो इन ग्राम पंचायत अधिकारियों के हाथों हमारा गांव और समाज किस तरह का विकास कार्य कर पाएगा?

प्रदेश सरकार ऐसे में बेरोजगारों को रोजगार देने जा रही है, या गोंवों के विकास के लिए एक प्रतिबद्ध कर्मचारी? बारह लाख देने के बाद वह बेरोजगार कैसे विकास का कार्य करेगा? इस पर जरा एक बार हम सबको विचार करना चाहिए और इस भर्ती प्रक्रिया की जड़ों को तलाशना चाहिए। जो सरकार अपने प्रशासनिक तंत्र में योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के निष्पक्ष चयन को प्राथमिकता देने के बजाय नकलची और जुगाड़ू लड़कों की नकारा फौज भर्ती करने पर उतारू हो उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है?

ऐसा कहा गया है कि मेहनत के फल मीठे होते हैं। लेकिन यह कैसा फल है? जिसमें हमें न तो मेहनत नजर आ रही है और ना ही ईमानदारी नाम की कोई चीज। यह सरकार तो बेरोजगार युवाओं के साथ खिलवाड़ करती नजर आ रही है। एक उच्च शिक्षा प्राप्त युवा मुख्यमंत्री के हाथों में चलती सरकार से क्या यही उम्मीद थी? उन्हें अपने प्रदेश के युवाओं के साथ इस तरह का भद्दा मजाक नहीं करना चाहिए। यह सस्ती लोकप्रियता का हथकंडा प्रदेश और इसके युवाओं को ले डूबेगा। तो क्या वह गद्दी बची रहेगी जिसे बनाये रखने के लिए यह आत्मघाती राह चुनी जा रही है।

क्या किसी न्यायालय की दृष्टि इस बड़ी धांधली की साजिश पर पड़ने का समय नहीं आ गया जो समय रहते इसको रोकने के लिए प्रभावी कदम उठा सके? नौकरशाही क्या इतनी कमजोर और डरपोक हो गयी है जो साफ-साफ दिख रही अंधेरगर्दी को आगे बढ़ाने में बिल्कुल संकोच नहीं कर रही है? एक एक साफ-सुथरी प्रतियोगी परीक्षा कराकर योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों का चयन करने में हमारा तंत्र क्या बिल्कुल अक्षम हो चुका है? पिछले चार-पाँच सालों में टी.ई.टी., बी.टी.सी., टी.जी.टी., और शिक्षकों की नियुक्ति सम्बंधी तमाम प्रकरणों को देखने से तो यही महसूस हो रहा है।

(रचना)

Thursday, September 26, 2013

वर्धा में जो हमने देखा…

विगत 20-21 सितम्बर को हिन्दी ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर एक राष्ट्रीय सेमीनार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में आयोजित हुआ। इस विचार गोष्ठी में एक से बढ़कर एक दिग्गज ब्लॉगर मौजूद थे। मुझे भी इनके साथ इस ब्लॉगरी पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया गया था। उद्‍घाटन सत्र में सोशल मीडिया के महत्व और उसकी विशेषताओं पर हुई चर्चा से काफी गहमा-गहमी बनी रही। इसी दौरान इस विश्वविद्यालय के कुलपति जी श्री विभूति नारायण राय ने हिंदी ब्लॉग जगत को एक शानदार सौगात देने की घोषणा की- विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर शुरू होगा  “चिट्ठा समय” ब्लॉग संकलक जो हिंन्दी ब्लॉगों को जोड़ने के लिए एग्रीगेटर का कार्य करेगा।

उद्‍घाटन सत्र से लेकर समापन समारोह तक चर्चा के लिए जितने भी विषय दिए गये थे उन सभी विषयों पर चर्चा हो चुकी थी; बस एक विषय छूटा जा रहा था जो मनीषा पान्डेय जी के द्वारा विशेष उल्लेख के अनुरोध से पूरा किया गया- ‘स्त्री और उनके अधिकार’। मनीषा जी ने बहुत सी आँखे खोलने वाली बातें कीं। लड़कों की ही तरह लड़कियों को मिलनी चाहिए घूमने की आजादी और पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी आदि।

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लेकिन हमें लगता है नारीवाद अपने आप में एक विवाद का विषय हो गया है। स्त्रियों के अधिकारों की बात सुनकर बहुत अच्छा लगता है। मिल जाए तो उससे भी कहीं ज्यादा अच्छा लगेगा। लेकिन नारीवादियों का भी एक आदर्श होना चाहिए जिससे इसके उद्देश्यों की प्राप्ति में तेजी आ सके। स्वतंत्रता और खुलेपन की अंधी दौड़ में शामिल होने की आतुरता हमें ऐसी दिशा में तो नहीं ले जा रही जहाँ जाकर हमें खुद ही लज्जित होना पड़े। अपनी मूल संस्कृति और संस्कारों को केवल प्रगतिशीलता के नाम पर तिलांजलि दे देने से हमें क्या कुछ बड़ा और महत्वपूर्ण हासिल होगा? इसका ठीक-ठीक  उत्तर मिलना अभी शेष है। एक नया मूल्य स्थापित करने की ललक में हमें अनेक पारंपरिक मूल्यों को नष्ट करने से पहले ठहरकर शांतचित्त हो कुछ सोच लेना चाहिए।

यदि हम सजग नहीं रहे तो इस देश की देवीस्वरूपा नारी और राष्ट्रभाषा हिन्दी की शायद एक ही प्रकार से दुर्गति होने वाली है। सेमिनार में एक छात्र तो हिंदी को बदलकर पूरी तरह हिंगलिश बनाने के लिए व्याकुल दिख रहा था। भला हो कि हमारे बीच से ही कुछ लोगों ने उसकी व्यग्रता कम करने की कोशिश की। देखते हैं कब गाड़ी पटरी पर आती है?

इन बड़े-बड़े ब्लॉगरों के बीच हम तो भिला (खो) से गये थे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा जहाँ पर मैं अपने परिवार के साथ जून-2010  में गयी थी, पूरे नौ महीने रहने के बाद उस जगह का रूखा वातावरण देखकर मेरा धैर्य जवाब दे गया था और हम पुन: यू.पी. वापस चले आये थे। लेकिन अब वहाँ जाकर इस ढाई साल में हुए अद्भुत परिवर्तन को देखकर हम दंग रह गये। बड़ा ही जीवंत माहौल था वहाँ का। चारों तरफ हरियाली और फूलों से सुसज्जित ‘नागार्जुन सराय’ नामक गेस्ट हाउस जिसका दो साल पहले लगभग कोई अस्तित्व नहीं था, हमारे लिए बिल्कुल नया था। इस विश्वविद्यालय की खुशनुमा शाम पूरे सुर-लय-ताल में बँधी वीणा की तरह बज रही थी। इसका सारा श्रेय कुलपति महोदय को जाता है। यह श्री विभूति नारायण राय की वीणा है। जब तक यह वीणा इस विश्वविद्यालय में रहेगी इसका स्वरूप और अनोखा होता जायेगा, यह मेरा मानना है।

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इन दो दिनों में सभी ब्लॉगर मित्रों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हिंदी ब्लॉग के प्रथम हस्ताक्षर/ निर्माणकर्ता आलोक कुमारजी से मिलना भी मेरे लिए इस सम्मेलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कुलपति जी द्वारा दिये गये रात्रिकालीन प्रीतिभोज के पहले अरविन्द मिश्र जी की सुरीली आवाज में गाये गीत ने इस आकर्षक माहौल में चार चाँद लगा दिये।

(रचना)

Saturday, February 13, 2010

न नारी स्वातंत्र्यमर्हति (नारी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है… )!!!

इस सूक्तिवाक्य को पढ़ने के बाद मैं सन्न रह गयी। मनुस्मृति में एक ओर कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ तो दूसरी ओर नारी को स्वतंत्रता के अयोग्य ही ठहरा दिया गया। आखिर ऐसा क्यों कहा गया ?

बर्षों पहले दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था जिसे मै  बहुत गौर से देखती  थी। उस विज्ञापन में एक गीत कुछ इस प्रकार था:-

हम और विरना खेले एक साथ,

खेले एक साथ अम्मा खायें एक साथ ।

विरना कलेवा अम्मा हँसी-हँसी देबो,

हमरा कलेवा तुम दीजो रिसियायी।

एक ही पेट से जन्में हुए भाई-बहन दोनों एक साथ खेलते-कूदते बड़े होते है लेकिन जब खाने का वक्त आता है तो माँ बेटे को बड़े प्यार से खाना खिलाती है और बेटी कि तरफ घूरते हुए खाने की थाली परोस देती है। इस गीत का भाव उसकी बेटी के चेहरे पर दिखायी तो पड़ता था, लेकिन वह खुल कर अपनी माँ से सवाल भी नही कर पाती। इसका असर मेरे उपर भी पड़ा। मैने बात-बात पर मम्मी के व्यवहार पर नज़र रखना शुरू कर दिया जिसका मुझे जगह-जगह पर लाभ भी मिला। भाइयों की तुलना में अपने साथ कोई पक्षपात होता देख मैं तत्काल पापा से शिकायत कर देती।

मैं देखती हूँ कि अशिक्षित महिलाओं के साथ साथ कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता मिली उनमें उसका दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति उजागर हो गयी। शायद स्त्री अभी भी बहुत कमजोर है। आत्मनियन्त्रण की शक्ति का अभाव दिखता है मुझे। उसे अपने आप को मजबूत बनाने में कोई कसर नही छोड़नी चाहिये। यह मजबूती उचित शिक्षा ही दिला सकती है, नारी को शिक्षा के प्रति जागरुक होना बहुत जरूरी है। मेरा मतलब यह है कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ निरर्थक स्वतंत्रता प्राप्त करना या नौकरी करने से नही है। यह जरूरी नही है कि जिस घर की स्त्रियाँ नौकरी करती हों या मंच  पर खड़े होकर कुछ भी कहने को  स्वतंत्र है उनके घर की बहू-बेटियों पर अत्याचार नहीं होता हो… यह जरूरी नहीं है कि पढ़ी-लिखी महिलाएं  कन्या भ्रूण हत्या का अपराध नहीं करती हो…

औरत ही औरत की दुश्मन होती है। जरा एक बार गहराई से सोचिये कि स्त्रियों के लिए ऐसा क्यों कहा गया ? समाज में इसके असंख्य उदाहरण क्यों देखने को मिलते हैं? सास-बहू या ननद- भाभी का रिश्ता दोनो पक्षों के स्त्री होते हुए भी क्यों एक दूसरे के प्रति बहुत अच्छा नहीं रह पाता? एक दूसरे में खोट निकालने को उद्यत क्यों रहती हैं ये नारियाँ? एक परिवार मे औसतन पुरुष और स्त्रियों की संख्या बराबर होती है; अपवाद स्वरूप कम या अधिक भी होती है, लेकिन वहाँ अगर जली तो स्त्री ही क्यों …?  पुरुष क्यों नही….. ? क्योंकि स्त्री या तो बहुत कमजोर है या अवसर पाकर स्वछंद हो गयी है। उस परिवार में कन्या भ्रूण हत्या क्यों? ससुर को या उस परिवार के मालिक को पोता ही चाहिये पोती क्यों नही? उस घर की मालकिन या सास यह प्रश्न क्यों नही उठाती? इस जघन्य कृत्य में घर की सभी नारियाँ शामिल कैसे हो जाती हैं? कबतक इसे पुरुष वर्ग की साजिश करार देकर अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ती रहेंगी ये नारियाँ?

इस हत्या की अपराधी एक महिला प्रसूति रोग विशेषज्ञ या फिर मिड्वाइफ भी होती है। इसे नारी शिक्षा और उससे मिली स्वतंत्रता का उत्थान कहें या पतन…. ?

नारी का स्वतंत्र होना बहुत जरूरी है!  इसलिये नही कि वह स्वछन्द होकर कुछ भी कर जाये बल्कि इसलिये कि वह एक स्वस्थ समाज का निर्माण करे। नारी तो ब्रह्मा का रूप होती है जो इस सृष्टि के रचयिता हैं। नारी ही नारी को मजबूत बना सकती है । अगर एक माँ ही अपनी बेटी को तबज्जो नही देगी तो पिता या समाज क्यों देगा? अगर एक बहू को उसकी सास ही सुरक्षा की दीवार नही बनेगी तो ससुर से उम्मीद क्यों करें?

(रचना त्रिपाठी)

Monday, November 2, 2009

संतोषी भला कि महत्वाकांक्षी...?

 

बचपन से यह सुनते आते हैं कि संतोष का फल मीठा होता है। अपने मन को हमेशा संतोष करने लिए तैयार करना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग यही सिखाते रहे। लेकिन मुझे लगता है कि किसी के भीतर यदि इस आत्म संतोष की अधिकता है तो इसका अर्थ है अपने आप को एक बीमारी की दावत देना।

प्राय: लोग एक-दूसरे को समझाते रहते है कि आप जितने में हो संतुष्ट रहो। संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है।

गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खान।

जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान॥

भला आप ही बतायें जरा....। यदि यूँ संतोष करके हर आदमी बैठ जाय तब तो विकास करने की बात हो चुकी? मेरा तो मानना है कि हर इंसान के अंदर कुछ न कुछ पाने की चाहत होनी ही चाहिए। उसकी नयी सोच उसके जीवन की अभिलाषा को बढ़ाने और उसे पूरा करने वाली होनी चाहिए।

आज दुनिया कहां से कहां पहुँच गयी है? क्या यह उसके संतोष का फल है? नहीं, सब कुछ संतोष कर लेने से नहीं बल्कि कुछ नया पा लेने की अधीरता ने ही हमें वह सब कुछ दिया है जिसे देख हमारी पीढ़ी को पहली बार आश्चर्य होता है।

अब एक नवजात शिशु को ही ले लिजिए। ज्यों-ज्यों उसकी भूख बढ़ती है वह हाथ-पैर मारना, रोना-चिल्लाना शुरु कर देता है। इससे उसका शारीरिक और मानसिक दोनों ही विकास होता है। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि उस बच्चे के अंदर संतोष नही होता कि वह चुप-चाप बैठ जाये। अगर बच्चा पालने में संतोष कर के बैठ जाता कि - मुझे कुछ नहीं करना है, मेरी माँ मुझे दूध पिला ही देती है तो मुझे क्या जरुरत है रोने और चिल्लाने की- तो शायद वह अपाहिज हो जाता!

हर इंसान के अंदर असंतोष का भाव होना चाहिए, यही असंतोष उसे उसके लक्ष्य की ओर धकेलता है।

आप किसी भी संतोषी व्यक्ति को देख लिजिए, उसके चेहेरे की निराशा और कब्जियत भरी मुस्कान ही बता देती है कि वह कितना खुश है!

इस तरह की संतोषी मुस्कान से तो अच्छा है चिल्लाते और चिघ्घाड़ते रहना। मन में महत्वाकांक्षा न हो, अधिक से अधिक सफल होने की कामना न हो, अर्जित करने कि लालसा न हो तो व्यक्ति कोई उद्यम क्यों करेगा? यही तो वह शक्ति है जो हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।

मानवता के विकास की कहानी में जो भी मील के पत्थर गाड़े गये वे किसी संतोषी ने नहीं बल्कि किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति की ही देन हैं| जय असंतोष।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, September 14, 2009

ब‍उका की तो बन आयी...!

मेरे गाँव में एक लड़का था- ब‍उका। ‘ब‍उका’ मतलब अक्ल से कमजोर, मन्द बुद्धि और किस्मत का मारा। यह नाम उसे गाँव वालों ने उसकी दशा देखकर दे रखा था।

उसके पैदा होने के कुछ दिनो बाद ही उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी थी। बच्चे को किसी तरह उसकी चाची-काकी ने शहद-चीनी चटाकर  जिला तो दिया लेकिन कोई उसकी माँ नही बन सकी। वह बचपन में अनाथ ही बना रहा।

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हम देखते थे- गांव के एक कोने में पड़ी उसकी झोपड़ी, जिसमें झांकने पर एक-दो टिन के बर्तन, कलछी-पलटा, चिलम और एक-दो बोतलें ही दिखतीं। नहीं दिखता तो सिर्फ उस घर का वारिस- ब‍उका। जाने कहाँ-कहाँ  दिन भर घूमता रहता... कभी किसी के चौखट पर बैठा रोटियां मांगता, तो कभी किसी मालिक का पैर दबाता या फिर किसी के घर के बर्तन साफ करते हुए दिखता, सिर्फ एक रोटी के लिए ताकि उसके पेट की आग बुझ सके। हमें हैरत होती कि अपने घर का इकलौता वारिस ऐसा क्यों करता है? ऐसा भी नही कि वह घर का दरिद्र था। कुल पांच-छ: बीघे का अकेला मालिक था।

कम उम्र में ही पत्नी के मर जाने के बावजूद उसके बाप दुक्खी ने दूसरी शादी नही की थी। पुत्रमोह में आकर, गरीबी में या यूँ ही... पता नहीं। उसकी नज़र में दूसरी माँ शायद उसके बेटे को वह प्यार नहीं देती, जो उसको अपनी माँ से मिलता। दुक्खी अपने कबाड़ के धंधे में गाँव-गाँव की फेरी लगाने सुबह सबेरे ही निकल जाता तो रात को नशे में गिरते-पड़ते दरवाजे पर आकर बच्चे को सौ-सौ गालियाँ देता। सुबह जब वो होश में आता तो अपने बच्चे का हाल-चाल दूसरे लोगों से जान लेता। धीरे-धीरे बेटा बड़ा होने लगा, और उसकी जरूरतें भी बढ़ती गयी। अच्छी परवरिश के अभाव में उसका व्यक्तित्व अविकसित सा रह गया।

वह जिसको देखता उसके सामने हाथ फैला देता। लोंगो से बात करने में अटकता था, डरने भी लगा, कुछ पूछने पर कम बोलता आवाज भी साफ नही निकलती। सब लोग उसे ‘ब‍उका’ कहने लगे।

ब‍उका को कभी याद भी नही होगा कि कब उसने नये कपड़े पहने होंगे। गांव के लोग ही उसे अधनंगा देखते तो फटा पुराना दे देते, उसी से उसका काम चल जाता। गाँव के बच्चे उसके साथ दुर्व्यवहार करते। झगड़े में जाने कितने कटने के निशान उसके हाथ-पैर और चेहरे पर पड़े रहते। जब कभी खून निकल जाता तो वह उसपर मिट्टी डालकर सुखा देता। उसको कभी किसी दवा की जरूरत नही पड़ी। जाने कितनी बार तो उसे कुत्ते ने काट लिया होगा लेकिन उसे कभी कोई इन्जेक्शन नही लगा।

मैंने अपनी आँखों से कभी दुक्खी को उसकी मलहम-पट्टी करते नही देखा। एक दिन तो वह बाप के डर से  अपने चाचा के छत पर सो गया, रात में न जाने कब नीचे गिर गया था और अन्धेरे में सुबकियां लेता रहा था। जब सुबह हो गयी तब लोंगो को यह बात पता चली।

जाको राखे साइयां मार सके न कोई...

दुक्खी तो गांजा और शराब पीकर अपनी जान का दुश्मन बन गया। आखिर में वही हुआ... दुक्खी मर गया। लेकिन मैने देखा बऊका की आँख में आंसू के नाम पर एक बूंद पानी तक नहीं था।

चूँकि उसके नाम कुछ बीघा जमीन थी इस नाते गांव वालो ने उसकी शादी एक गरीब लड़की से करा दी। इस लड़की के भी मां-बाप नही थे। घर में दुल्हन के आते ही बऊका ने रोज नहाना और टिप-टाप से रहना शुरू कर दिया। उसके घर में भी रोज चूल्हा जलना शुरू हो गया। उसने खुद भी कबाड़ का धंधा अपना लिया।

वह दिन पर दिन अपने घर को सवाँरने में लगा रहता... लेकिन उसकी बीबी को रोज-रोज एक बात सालती रहती थी कि आखिर उसके पति को लोग ‘ब‍उका’ कहकर क्यों बुलाते है? वह उसकी उधेड़-बुन में लग गयी और इस बात की जड़ तक जा पहुंची। उसे पता चल गया कि उसकी मां ने तो पैदा होते ही उसका नाम ओमप्रकाश रखा था लेकिन हालात के थपेड़ों ने उसे बऊका बना दिया। उसकी पत्नी ने इसका विरोध करना शूरू किया जब भी कोई उसे बऊका कह कर बुलाता तो वह उसे समझाती कि इनका नाम बऊका नही है, इनका नाम ओमप्रकाश है। आइंदा कोई इन्हें बऊका कह कर नही बुलाएगा।

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जब गांव में लोगो को इस बात का पता चला तो लोग मौज लेने के लिए उसे जानबूझ कर बऊका कहते। उसकी पत्नी पहले समझाती, फिर चिल्लाती और उसपर भी लोग नही मानते तो गालियाँ देती। गाली खाने के डर से लोगो को यह सम्बोधन छोड़ना ही पड़ा।

आज जब भी कोई उसके दरवाजे पर जाता है तो उसे ओमप्रकाश कहकर ही बुलाता है। अब वह बऊका से ओमप्रकाश हो गया है। लोग बताते हैं कि महीने में दस से पंद्रह हजार तक कमा लेता है। जब भी बेटियों को कहीं जाना होता है तो अपने हाथों से उन्हें नये-नये कपड़े पहनाता है। खुद तो अनपढ़ रह गया लेकिन अपनो बच्चों को स्कूल जरूर भेजता है। बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता जरूर करता है बच्चे स्वस्थ रहे इसके लिए अपने दरवाजे पर दूध देने वाली गाय भी पाल रखा है। बच्चों से जो दूध बच जाता उसे बेच कर उसकी बीबी घरेलू खर्च के लिए कुछ पैसे बना लेती है।

उसे पाँच बेटियां हो चुकी हैं और एक बेटा भी है। गांव के जिस कोने में निकल जाइए वहाँ ओमप्रकाश की एक बेटी जरूर दिखायी देती है। हाल ही में मुलाकात होने पर मैने उसकी पत्नी को नसबंदी कराने की सलाह दी तो उसने कहा कि एक बेटा और हो जाये तब। मैने नाराजगी दिखाते हुए कहा कि अगर फिर बेटी हो गयी तो क्या करोगी ?

उसने बहुत हँस कर जवाब दिया, “दीदी, अभी मैं दो बेटियों की परवरिश और कर सकती हूँ।”

मुझे उसकी यह बात सुनकर थोड़ी देर के लिए बहुत बुरा लगा लेकिन जब मैं ओमप्रकाश को अपनी बेटियों को फ्रॉक पहनाते और तैयार करते देखती तो बहुत खुशी भी होती कि घर में एक स्त्री के होने से उसकी जिंदगी बदल गयी। ओमप्रकाश को देखकर मुझे यह कहावत याद आ जाती है-

‘बिन घरनी घरनी घर भूत का डेरा।

 (रचना त्रिपाठी)

Friday, August 28, 2009

कौन सा दिन सुहाना है...? रविवार...???

सप्ताह में रविवार सबसे सुहाना होता है यह मेरा नही गणितज्ञों का मानना है। क्या आपने कभी विचार किया है कि यह दिन इतना सुहाना क्यों होता  है?

सप्ताह में ६ दिन काम करने के बाद रविवार की छुट्टी का इंतजार पूरी दुनिया करती है।

जहाँ तक रही गणितज्ञों की बात उनके विचार से मै भी सहमत हूँ जिन्होंने २० लाख ४० हजार ब्लॉगों का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला है  कि रविवार सप्ताह का सबसे खुशनुमा दिन होता है। एक समाचार एजेन्सी के अनुसार वेरमोन्ट विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह सामने आया है कि रविवार हर किसी का पसंदीदा दिन है जबकि बुधवार सबसे खराब।

गृहकार्य दक्ष लेकिन क्या आप ने उन कामकाजी महिलाओं के बारे में सोचा है जो सप्ताह के बाकी दिन दफ्तर में, और छुट्टी के दिन घर के बीच  अलग प्रकार का जीवन व्यतीत करती हैं। उनके लिए तो रविवार अतिरिक्त व्यस्तता का दिन होता है।

मैने किसी ब्लॉग पर शोध नही किया है, बल्कि अपने दायें-बायें, आस-पास,  बिल्कुल पड़ोस की बात कर रही हूँ। मेरे सामने वाले घर में एक महिला ऑफिसर रहती हैं। इन्हें एक साल का बेटा भी है। मेरे ठीक बगल वाले मकान में एक और महिला ऑफिसर रहती हैं जिनकी  करीब १० साल की एक बिटिया  है। जैसा कि मै रोज इनको आते-जाते देखती रहती हूँ इसलिए इनकी व्यस्तता का भी अंदाजा लगा सकती हूँ।

दोनों महिलाएं जिनमें एक आई.ए.एस. प्रोबेशनर और दूसरी एक पी.सी.एस. अधिकारी है उनकी दिनचर्या और कार्यशैली देखकर मेरे अंदर आश्चर्य का भाव पैदा हो जाता है। चूँकि एक अच्छी पड़ोसन का धर्म निभाते हुए मेरा इनके घर के भीतर आना जाना है इसलिए प्रायः इनकी सामान्य गतिविधियों की मुझे जानकारी रहती है।

आई.ए.एस. महिला प्रोबेशनर जो आंध्र प्रदेश की रहने वाली है और इनके पति स्वयं सीविल इन्जीनियर हैं एक अच्छी फेमिली से जुड़ी हुई है, मगर सर्विस में उत्तर प्रदेश कैडर मिलते ही वह अपनी बेटी को साथ-साथ लेकर ट्रेनिंग भी करती है। उनका यह कठिन परिश्रम देखकर मै तो दंग रह जाती हूँ। 

एक दिन मुझसे नही रहा गया। मै इनसे पूछ बैठी ...कैसे करती है आप यह सब अकेले? उन्होंने कहा, “...मत पूछो, ...मेरी ड्युटी तो सुबह के साढ़े चार बजे से लेकर रात को बारह बजे तक रहती है।” मैने उनको सलाह दिया जबतक आप ट्रेनिंग में हैं तबतक बेटी को उसके पापा के पास ही छोड़ देती। उन्होंने जवाब दिया, “नही... पुरूष यह काम अच्छे से नही कर सकता। रही बात महिलाओं की तो महिलाए हर तरह से सक्षम है। वह कुछ भी कर सकती है।” ...पुरूष के अंदर इतना धैर्य कहां?

मुझे भी यह बात सही लगी। अगर २४ घंटे के लिए बच्चों को उनके पापा के हवाले छोड़ दिया जाय तो इनकी हालत देखने लायक होती है। अगले दिन पता चलेगा ऑफिस से छुट्टी लेकर घर बैठ जाएंगे।

भारतीय गृहिणीजो महिला एस.डी.एम हैं उन्हें घर के काम का भी अच्छा अनुभव रहा है और इसमें रुचि भी लेती हैं। एक दिन मैं उनसे भी पूछ बैठी, “आप बतायें ...घर के काम और दफ्तर के काम में क्या अंतर है?”

उन्होंने जवाब दिया, “घर का काम बहुत कठिन है...।”

“मैं तो यही समझती थी कि घर का काम आसान होता है... आप लोग कितना मेहनत करते हैं, इतनी कड़ी धूप में बाहर का काम तो और भी कठिन हो जाता होगा।” मैने कहा था।

उन्होंने बड़ी तेजी से सिर हिलाते हुए कहा- “ना ना ना ना... घर का काम बहुत कठिन है। दिमाग भी लगाओ और मेहनत भी... तब भी घर का काम समाप्त नही होता।”

इसके पहले इसी कॉलोनी में बिल्कुल नयी उम्र की एक कुँआरी लड़की भी ट्रेनी ऑफिसर बनकर आयी थी। कितनी खुशमिजाज दिखती रही वह... उसके चेहरे पर किसी तरह की चिन्ता की लकीरे नही दिखाई देती। चेहरे से खुशी टपकी पड़ती थी। यह तेजतर्रार लड़की पहले उसी घर मे रहती थी जिसमें आजकल एक बेटी वाली आईएस महिला रहती है।

एक दिन वह अपने पुराने घर को देखने और उनसे मिलने चली आयी। संयोगवश मै भी पहुँच गयी थी। बहुत खुश लग रही थी। उसके चेहरे की मुस्कान साफ साफ बता रही थी कि उसको अब किसका इंतजार है? लेकिन बात-बात में विवाहिता अधिकारी ने उसे बताया कि अभी जितने मजे कर सकती हो कर लो... शादी के बाद तो यह मुस्कान गुम ही हो जाएगी। यह सुनकर मेरा माथा घूम गया।

किरन वेदी अपने पति के साथ आखिर ऐसा क्यों कहा उन्होंने? यह बात मेरे जैसी एक आम गृहिणी करती तो शायद मुझे भी यह वही घिसा-पिटा रिकार्ड लगता। लेकिन एक सक्षम, योग्य और सम्पन्न महिला अधिकारी के मुँह से ऐसा सुनकर मैं आज एक उधेड़बुन मे लगी हूँ।

स्त्री अपने कैरियर की सीढ़ी में चाहे जितनी ऊँचाइयाँ छू ले, लेकिन जब घर-परिवार को सजाने सँवारने और बच्चों के जन्म से लेकर उनकी  देखभाल करने का प्रश्न खड़ा होता है तो उसकी जिम्मेदारी बाँटने वाला कोई नहीं होता है। शायद इसीलिए वैवाहिक विज्ञापनों में लड़की के बायोडाटा में ‘गृहकार्य दक्ष’ लिखना अनिवार्य सा लगता है।

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, May 24, 2009

मेरा नाम अन्हरी नही, रीता है...!

 

उस दिन मेरे गाँव में बड़ा अजीब वाकया हो गया था। एक गरीब के घर बारात आयी थी। अपनी क्षमता के अनुसार स्वागत सत्कार किया था उसने। दूल्हे को विवाह मण्डप में ले जाकर बिटिया का पाणिग्रहण करा दिया। दोनो कोहबर में गये। फिर एक विशेष रस्म करने के लिए दूल्हे को आंगन के मणवा में दुबारा बैठाया गया। दूल्हन घूँघट डालकर दुबारा आँगन में आयी, दुबारा सिन्दूरदान कराया गया। कम उम्र का दूल्हा सबकुछ करता गया। काम से निवृत्त होकर ‘जनवासे’ में गया। अपने अभिभावकों से दुबारा सिन्दूरदान का किस्सा बताया तो शक के बादल घिरने लगे। पूछताछ शुरू हुई।

मामला तूल पकड़ता देखकर गरीब पिता को रहस्य पर से पर्दा हटाना पड़ा। दरअसल रामवृक्ष की तीन बेटियाँ थीं। गीता, रीता और राधिका। उनमें सबसे बड़ी गीता का विवाह तय हुआ था। उसके पाणिग्रहण के बाद जब वह कोहबर में चली गयी तो परिवार वालों ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार दूसरी बेटी रीता जो बचपन में चेचक के प्रकोप से अन्धी हो गयी थी, उसे विवाह मण्डप में बैठाकर उसकी मांग में भी सिन्दूर डलवा दिया। यह सोचकर कि इस अन्धी से तो कोई शादी करने से रहा। बड़े दामाद के हाथों सिन्दूर का सौभाग्य पाकर शायद आजीवन अनब्याही कहलाने का कलंक मिट जाय।

गरीबी के भी खेल निराले हैं। लड़के वालों ने इस योजना को मानने से इन्कार कर दिया और गीता को विदा करा ले गये। रीता अपनी मांग के सिन्दूर के साथ मायके में ही रह गयी। तब उसकी उम्र कोई ग्यारह-बारह साल की ही रही होगी। बीड़ी बनाकर गुजारा करने वाले परिवार की रीता को सारा गाँव ‘अन्हरी’ (अन्धी) ही पुकारता था। उसे भी अपना यही नाम पता था।

मेरी और रीता की उम्र लगभग एक ही थी। मै जब भी गाँव में घूमने निकलती तो देखती कि वह अपने घर के चबूतरे पर बैठे या तो कुछ खाती रहती या आते-जाते लोगों की आहट सुनती रहती। उसके शरीर पर हजारों मक्खियाँ भिनभिनाती रहतीं मानो जैसे उसके आस-पास मिठाई का शीरा गिरा हो। मै घंटो उसके क्रिया-कलाप देखती रहती।

रीता धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। उसके घर वाले दिन-प्रतिदिन उसकी चिन्ता में दुबले होते जा रहे थे। आये दिन उसकी माँ मेरे पापा के सामने आकर अपनी समस्या का समाधान पूछ्ती और घंटों रोती रहती। पापा उसको रोज एक ही बात समझाते कि उसे अंधों वाले स्कूल में डाल दो, पर उसकी माँ बार-बार पैसों का रोना रोती कि किसी तरह दो वक्त की रोटी मिल जाती है, यही बहुत है। …कहाँ से इतना पैसा लाउंगी।

पापा ने उसे समझाया कि उस स्कूल में सभी बच्चों के पढ़ाने का खर्च सरकार देती है। तुम्हें उसकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। बस तुम किराया जुटा लो। यह बात उसके भेजे में नही घुसती। इस सलाह पर उसके आँसू सूख जाते और वहाँ से बुदबुदाते हुए चली जाती……

“आन्हर बेटी कईसे पढ़ी?”।

उसकी माँ की रूढ़िवादी सोच उसके दिमाग पर ऐसी हावी हो गयी थी कि बड़ी बेटी के साथ ही इस अन्धी बेटी का हाथ पीला कर उससे निजात पाने की साजिश रचने में भी उसे संकोच नहीं हुआ। लेकिन होनी तो कुछ और लिखी थी।

बर्षों बीत गये,…ससुराल वालों ने रीता की कोई खबर नही ली। इधर रीता के घर वाले जब काम पर बाहर चले जाते तब गाँव के कुछ शरारती लड़के रीता के साथ छेड़खानी करते रहते। …कभी उसके सिर में ठोंकते तो कभी उसका दुपट्टा खींचते। …रीता एक साथ माँ बहन की सौ-सौ गालियाँ देती। ऐसी गालियाँ कि सुनने वालों के दाँत रंग जाते। रोज-रोज एक ही पंचायत “आज अन्हरी फिर गरियवलस…” (आज अन्धी ने फिर गाली दी)

अन्ततः रीता की माँ के पास मेरे पापा की सलाह मानने के अलावाँ कोई चारा नही बचा। एक दिन उसकी माँ रोती-बिलखती पापा के पास आयी और कहने लगी-

“बाबू! कुछ पैसों का प्रबन्ध करके अन्हरी को गाँव से हटा ही दीजिए तो अच्छा है, नहीं तो गाँव के लड़के उसको जीने नही देंगे।”

पापा को तो मानो उसकी माँ की इज़ाजत का बर्षों से इंतजार था। उन्हें देहरादून के एक ‘ब्लाइंड स्कूल’ के बारे में जानकारी थी। उन्होने थोड़ा प्रयास किया और वहाँ उसका दाखिला हो गया। तेरह-चौदह साल की उम्र में कक्षा-एक की छात्रा बनी।

दाखिले के छ: महीने बाद रीता जाड़े की छुट्टियाँ मनाने गाँव आयी। पूरे गाँव में शोर मचा…

“अन्हरी आ गइल…!”

यह आवाज रीता के कानों तक भी पहुँची। लेकिन इस बार कोई गाली नहीं दिया उसने। बड़ी ही सज्जनता से जबाब दिया-

“मेरा नाम अन्हरी नही, रीता है।”

गाँव वाले रीता के इस बदलाव को देखकर अचम्भित रह गये। पर कुत्ते की दुम कब सीधी होनी थी? ...दो-चार दिन बाद गाँव के वो शरारती बच्चे फिर रीता को रोज चिढ़ाने लगे। लेकिन रीता बदल चुकी थी। अब उसको गाँव के इस माहौल से ऊबन होने लगी थी। वह रोज सुबह उठती, अपना नित्यकर्म करने के बाद, अपनी माँ की उँगली पकड़े मेरे घर आ जाती। उसके पहनावे और रहन-सहन को देखकर, सबको हैरानी होती।

…क्या यह वही अन्हरी है…?

पापा को उसके बात करने का ढंग इतना अच्छा लगता कि वह मुझे बुलाते और कहते कि इसके पास बैठो और इससे बातें करो। रीता मेरे घर सुबह करीब आठ बजे आती और शाम को जब उसकी माँ अपने सारे काम निबटा लेती तब उसे ले जाती।

यह सिलसिला हर साल जाड़े की छुट्टियों में चलता रहा। बातों के सिलसिले में मैने पहली बार रीता के मुँह से ‘जीसस’ का नाम सुना।

मैने पूछा, “जीसस? …यह किस चिड़िया का नाम है?”

रीता ने बड़े प्यार से जबाब दिया, “मेरे भगवान। …वही तो हम सबके रखवाले हैं।”

वह मुझे घंटों प्रवचन सुनाती रहती। उसकी बातें खत्म होने का नाम नहीं लेती। मैं भी पापा के हटने का इंतजार करती। उनके हटते ही मै भी वहां से उड़न छू हो जाती।

रीता किसी के आने की आहट सुनती तो तुरंत पूछती ‘कौन’?...खाली समय में वह प्रायः स्वेटर बुनती रहती। कुछ भी खाने को दिया जाता तो पहले अपने हाथ अवश्य धोती।

रीता हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आती थी। उसकी लगन और प्रतिभा को देखकर उसकी उम्र के लिहाज से स्कूल में उसे एक साल में दो-दो कक्षाएं पास करायी गयीं। इस तरह उसने जल्द ही ग्रेजुएशन पूरा कर लिया।

उसके व्यक्तित्व के इस आकर्षण को देखकर, वह लड़का जो अनजाने ही ‘अन्हरी’ का दुल्हा बना दिया गया था, उसने रीता का पति होने का अधिकार जताते हुए उसे विदा कराने का दावा कर दिया। लेकिन गुणवन्ती रीता उस अन्हरी की तरह मजबूर और दया की पात्र नही रह गयी थी। उसने मना कर दिया। उसे तो अपनी नयी दुनिया में ही उसके मन का मीत मिलना था। संस्था ने उसके लिए नौकरी ढूँढ दी और नौकरी ने उसी के मेल का एक जीवनसाथी दिला दिया।image

दो साल पहले रीता ने अपने मिस्टर राइट के साथ घर बसा लिया। दोनों साथ ही नौकरी करते हैं। इधर गाँव में अन्हरी को छेड़ने वाले छिछोरे बेरोजगारी और लाचारी का अभिशप्त जीवन जी रहे हैं और अपनी दोनों आखों से रीता की ऋद्धि-सिद्धि देख रहे हैं।

शिक्षा का असर गाँव-गाँव, शहर-शहर में बड़ी ही तेजी से दिखाई दे रहा है। हम अंदाजा नही लगा सकते कि शिक्षा की वजह से हमारा समाज कितना तेजी से प्रगति कर रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण हमारे गाँव के इस किस्से में देखने को मिला।

(रचना त्रिपाठी)