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Thursday, August 27, 2020

दहिजरा कोरोना : भाग-2 (बारी में गारी)





(फोन पर सुनी लाइव कमेंट्री)
आज गांव के बगइचा में तमासा लगा है। इसके आगे बम्बइया सिनेमा और नौटंकी फेल है। थाने से हल्का वाले सिपाही भी पहुँच गए हैं। सोसल डिस्टेंसिंग गई तेल लेने। गाँव के लोग सरकारी फरमान को प्रशासन के मुँह पर फेंक कर उस तमासे का मजा लेने पहुँच गए हैं। घुरहुआ अपने मेहरारू के साथ जो कर रहा है उससे वहाँ बिना टिकट के ख़ूब बढ़िया डरामा देखने को मिल रहा है। उसकी बात सुनकर गाँव के लवंडे लहालोट हो रहे हैं। बड़े बुजुर्ग ठकुआ के देख रहे हैं और कुछ औरतें हैं जो अँचरा से मुँह तोपकर अपनी खीस निपोर रही हैं। कभी-कभी उसके दिल की पीड़ा सुनकर लोगों का कलेजा उमड़ पड़ रहा है। लंगड़ महतो तो कपार थाम के रोने भी लगे। उनकी अपनी मेहरारू की सूरत आंख में उतर आई जो इनका पैर तोड़ने के बाद इनके गुस्से का ऐसा शिकार हुई कि अब बिछौना पर ही सगरो करम कर रही है। इनकी एक ही लाठी में बेचारी का करिआँव छटक गया था। तबसे मर्द-मेहरारू का झगड़ा देखकर इनकी आँखे बढ़िया जाती हैं।

घुरहुआ जो बउराया है तो गलत नहीं है। बतिया तो सब सहिये बोल रहा है। वो सरकार के ऊपर इस बात से बहुते फिरन्ट है कि लॉकडाउन के बेरा नेता-परेता से लेकर सरकारी अफसर तक और पुलिस से लेकर सफाई कर्मचारी सभही उपदेस पर उपदेस झोंक रहे थे - "घर में रहिए, सुरच्छीत रहिए, नहीं तो कोरोना गरेस देगा।" सिपाही को देखकर उसकी आवाज और भी तेज हो गयी, "घण्टा रहिए घर में... इधर कुक्कुर-बिलार की तरह एक-दूसरे में लभेड़कर सब मजूरन को दिल्ली-बम्बई से ठेलकर उसके घरे गाँव में भेज दिया और कह रहा है कि दूर-दूर रहिए। हम इहाँ हंकासे-पियासे आये तो  ई हरामजादी हमें ज्ञान दे रही है कि मोदी कहें हैं दूरी बना के रहो। आज दस दिन से बगइचा में अकेले पड़े हैं। नेटुआ-नगारी बना के रख दी है।अरे हमको कुछ होना होता तो अबतक हो हवा गया होता!" 

यही बात वो अपनी मेहरी को कई दिन से समझा रहा था। आज पानी नाक के ऊपर हो गया तो आज उसने सब रीस निकाल के धर दिया। झोंटा पकड़ के घिरिया दिया और बड़ा बेदर्दी से मार रहा था। घुरहुआ-बहु का घिघियाना सुनकर लोग बगइचा में जुट गए। जब पुलिस आयी तो उल्टा उनसे इसी का ओरहन भी दे रहा है। कह रहा है – "कुत्ता बना के रख दी है हमको। दो-चार मिनट अगोर के ठाड़ तक नहीं रहती है। केरा के पत्ता पर रसोई फेंक के भाग जाती है।" इसपर बिग्गन का लौंडा  खेदना खिक्क से हँसकर भीड़ में लुका गया।

घुरहुआ अपनी रौ में कह रहा था, "एक दिन पानी पीने के लिए लोटा मांगे तो कहीं से खाली फेविकोल के डिब्बा काट के दूरे से धर दी, जैसे हम कोई पैखाना पोतकर बैठे हों। ...तभी से हम इसके ऊपर खून घोंट रहे थे, लेकिन तब्बो चुप रहे, कुछ न किए। हमरे साथ के बाकी लोग का कुँवरटीन का टैम बीत गया। वो अपने घर लोग-लइका के पास पहुंच गये और हम है कि इहाँ बइसाख-जेठ के दुपहरिया में अकेले पाक रहे हैं। इतना लंबा सफर पैदल चल के आए। इहाँ आये तो इकर नौटंकी चालू हो गयी।"

बात अब समझ में आई। हुआ ये था कि गाँव के   बाग में अकेले उसका मन नहीं लग रहा था। उसने शायद किसी दिन उससे बोला कि दोपहर में माई-बाबूजी को खिला-पिला के मेरे पास आ जाना लेकिन वो बहटिया दी, नहीं गई। तबसे वो गुस्से से भरा हुआ घात लगाकर लबदी सोहरा रहा था। यही गुन रहा था कि वो कहीं अकेले में भेंटा जाय तो बदला ले सके; और हुआ भी यही।

आज दुपहरिया में जब भूजा-भरी लेकर आई तो वह टूट ही पड़ा। बेचारी भाग ही नहीं पाई। मार के उसका भूभुन फोड़ दिया है। मुँहे राहे खून फेक रही है। ई मामा लोग लाठी-बंदूक लेके वहीं खड़े थे। घुरहुवा के आगे उनकी बुद्धि भिला गई थी। करें तो क्या करें? छउक-छउक के उन्हें ललकार रहा था - "आओ हमको पकड़ो और थाने ले चलो, नहीं तो अभी तो खाली इसका मुँह फोरे हैं, छोड़ के गए तो इसका गटइए दबा देंगे। भले से हमको जेल हो जाय बाकिर जिंनगी में अब कभी इसका मुँह नहीं देखेंगे। ए तरे जियले से तो निम्मन है कि हम मर ही जाएं। ए साहब, लगाओ हमको हतकड़ी और इहाँ से ले चलो।"

घुरहुआ गाँव भर के सामने पुलिस के आगे फेकर-फेकर के रो रहा है। पुलिस वाले भी उसको हाथ नहीं लगा रहे। अब घुरहुआ-बहु बड़ी सांसत में पड़ गई है। लामे-लामे रहे तो घुरहुआ मारे और उसके नियरे जाय तो कोरोना। बेचारी करे त का करे?

करिआँव=कमर, फिरन्ट=नाराज, लबदी=लाठी
डंडा, सोहराना= सहलाना, ओरहन=शिकायत, भुभून=जबड़ा, लामे- लामे=दूर-दूर, नियरे=नजदीक

(रचना त्रिपाठी)

Monday, May 18, 2020

सन्नाटा

आज दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में छपी लखुकथा 'सन्नाटा'
अपनी सामंती कुलीनता बोध से प्रेरित मालकिन जब भी झाड़ू-पोछा बर्तन करके निकल रही महरिन के हाथों में कुछ बचा हुआ खाना देतीं तो वे अपनी उंगलियों के छोर को जल से भिगोती और मन ही मन 'ओम पवित्राय नमः' बुदबुदाते हुए दोनों हथेलियों की पोछी कर लेती। उनके चेहरे की चमक बताती कि ऐसा करके मानो उन्होंने गंगा नहा लिया हो। ठकुराइन को कभी-कभार कुछ विशेष खाद्य पदार्थ ज्यादा मात्रा में देना होता तो वे उससे अपना बर्तन ले आने को कहतीं। अब वो बेचारी घर से सुबह की निकली हुई, चार-चार घरों में काम करने वाली अपना बर्तन कहाँ से लाती? इसलिए वह अपने बात-व्यवहार से दाएं-बाएं दूसरे घरों से कुछ डब्बा-डिब्बी का प्रबंध कर लेती और ठकुराइन के हाथों से वह खाना लेकर घर चली जाती। 

ठकुराइन अपने पड़ोसियों को अपने शुचिता-बोध और इस महान करनी का लेखा-जोखा भी प्रतिदिन उसी प्रकार परोसतीं जैसे उस कामवाली को खाना देती थीं। "आज थोड़ी दाल बची थी तो उसे दे दी...  फ्रिज में (कई दिनों से) मिठाइयां पड़ी थी, उसे दे दी।" यह सिलसिला लम्बे अरसे से चलता आ रहा था। ठकुराइन की हथेलियों ने अपनी महरिन चम्पा के हाथों में ऊपर से  कुछ न कुछ टपकाकर परोसने का और फिर खुद के शुद्धिकरण के लिए जल से 'वजू' कर लेने का शगल पाल रखा था। 

यह सब क्रिया-कलाप चम्पा के सामने ही होता था और वो यह सब देखते-समझते हुए भी कुछ कर नहीं पाती थी। तभी अचानक चीन से कॅरोना की खबरें आने लगीं और फिर स्वयं कॅरोना ने भी पदार्पण कर दिया। सरकार द्वारा लॉक डाउन लागू करने से पहले ही सोशल मीडिया ने काफी ज्ञान बांट दिया था।

उन्हीं दिनों दरवाजे पर कागज के ठोंगे में रखा सामान यूँ ही पड़ा देखकर ठाकुर साहब के सामने मालकिन बड़बड़ा रही थीं, "आजकल चंपा का बहुत मन बढ़ गया है... कुछ दिनों से देख रही हूँ... जब भी कुछ देती हूँ तो कहती है वहीं रख दीजिए, जाते वक्त ले लूंगी... और बिना लिए चली जाती है... मुझे कचरे में डालना पड़ता है... आने दीजिये आज, मैं भी ख़ूब ढंग से समझाती हूँ उसे... सड़क पर बहुत भूखे-नंगे पड़े हैं, उसे दे दिया होता तो वे इसे खाकर अघा जाते... और ये महारानी है कि... इनको अन्न की कीमत ही समझ में नहीं आती..." 

यह सब दरवाजे की घंटी बजाने से पहले चंपा ने लगभग सुन लिया था लेकिन चुप थी। मालकिन ने ओठ भींचे हुए दरवाजा खोला। चम्पा ने बिना नजर मिलाए अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और घर में रखे सामानों के छू जाने से खुद को बचाने के लिए दाएं-बायें लहराते हुए रसोई में पहुँच गयी। उसने सिंक में पड़े जूठे बर्तनों को हाथ लगाया ही था कि मालकिन बड़ी तेजी से आयीं और लगभग गरजते हुए बोलीं - "अपने-आप को तुमने क्या समझ रखा है... आजकल कुछ भी देती हूँ तो दरवाजे पर ही छोड़कर चली जाती हो... चार पैसा कमा क्या लिया बड़े नखरे हो गए है तेरे!"  

चम्पा कुछ देर तक चुपचाप सुनती रही। फिर जब अति हो गयी तो पलटकर बोली– "मालकिन, बुरा न मानो तो एक बात कहें...! आजकल हम हर वक्त जितना बर्तन नहीं माँजते उससे ज्यादा अपना हाथ माँजते है। एक  किरौना का बड़ा डर फैला हुआ है। बताते हैं कि यह बड़े और अमीर लोगों में ही ज्यादा पाया जा रहा है... हम छोटे-गरीब लोग अब अगर सावधान नहीं हुए तो यह हमको मार ही डालेगा। आपके बड़के बेटा भी तो बाहर से आए हैं...! फिर आपका छुआ हम कैसे घर ले जाएं? आजकल तो सब कोई अछूत हो गए हैं।"

घर में अचानक सन्नाटा पसर गया।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, May 15, 2020

नज़रबट्टू



दैनिक भास्कर के 'मधुरिमा' में छपी मेरी कहानी 'नजरबट्टू'
            
पिछले कितने ही वर्षों की घटनाएं, किसी फिल्म के फ्रेम्स सी, मानस पर तेजी से प्रक्षेपित हो रही  थीं - जैसे किसी ने फ़ास्ट फॉरवर्ड की बटन दबा दिया हो। यदि ट्रेन की गति उन बदलते मनोभावों की गति से साम्य रख रही थी, तो उसकी धड़-धड़ाहट उनके आपस में टकराहट की ।

कितनी ही बार तो उसने सुना था कि लक्ष्मी समान बेटी को जन्म देने के बाद परिवार में उसकी माँ शोभा का मान और बढ़ गया था। फूल सी कोमल और चाँद सी सुन्दर बिटिया के क़दम पड़ते ही परिवार की खुशियों में पंख लग गये। पिता जगदीश का व्यापार दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से आगे बढ़ने लगा। उसके चाचा विजय की वर्षों की तपस्या का फल मिल गया। उसे बहुप्रतीक्षित प्रतिष्ठित नौकरी मिल गई। भाइयों की पढ़ाई भी अब कस्बे से दूर शहर के एक अच्छे पब्लिक स्कूल में होने लगी। अपने दोनों भाइयों के लिये वह ईश्वर की अनमोल भेंट थी। सालों बाद उन्हें अपनी कलाइयों पर राखी बाँधने वाली सलोनी सी बहन जो मिली थी!  इसके पहले तो उन दोनों को अपनी बुआ की राखियों का ही इंतजार रहता था। कभी-कभी तो राखी वाली डाक भी उन्हें समय से नहीं मिल पाती थी तो पुरोहित जी आकर उन्हें रक्षासूत्र बाँध जाते थे।

जगदीश जी ने अपने पुराने घर की जगह एक नया घर बनवाया। गुलाबी रंग की दीवारों के बॉर्डर और छत के किनारों की रेलिंग को जब चटक पर्पल रंग की पट्टियों में रंग दिया गया तो घर की सुंदरता गजब खिल उठी। गाँव में दूर से ही यह घर लोगों को आकर्षित करता। जो देखता वह प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। शोभा ने एक मिट्टी का गोल बर्तन मंगाया, उसके पेंदे को कालिख से रंगकर, उसके ऊपर सफ़ेद चूने से आँख, नाक, मुँह और मूछ उकेरकर उसे घर के कंगूरे पर टंगवा दिया। इस प्रकार घर को बुरी नजर से बचाने के लिए तैनात कर दिया गया यह 'नजरबट्टू'। 

उसके पैदा होने के बाद के दिनों में उसके घर में अद्भुत खुशहाली छा गयी थी। सबका उत्साह अपने चरम पर था। घर का कोई भी नया कार्य अब बिना उससे 'शगुन' कराये आरम्भ नहीं होता। घर में शगुन की ऐसी गूँज उठी कि उसका नाम ही शगुन पड़ गया। चयनित होते ही चाचा विजय की शादी के लिये दरवाजे पर गाड़ियों की लाइन लगने लगी। एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे। तस्वीरों का ढेर लगने लगा। सब बड़ी दुविधा में थे कि शादी की बात कहाँ पक्की की जाय! दो-चार तस्वीरें ऐसी थीं जिसको विजय ने छाँट कर अलग कर ली थी। एक दिन विजय ने शगुन को अपनी गोद में उठाया। दुलारते हुए उससे हाथ में पकड़ी उन चार तस्वीरों में से किसी एक पर उंगली रखने को कहा। चार वर्ष की शगुन की एक उँगली के इशारे ने एक लड़की से उसके चाचा की शादी पक्की कर डाली।

विजय के तिलक की तैयारी हो रही थी। घर की साज-सज्जा की जा रही थी। इलेक्ट्रिशियन छत से नीचे बिजली की रोशनी फेंकते लट्टुओं की लड़ी लटका रहे थे। तभी अचानक धक्का खाकर वो नजरबट्टू नीचे गिरा और टूट गया। शोभा को यह बहुत बुरा लगा। उसने वहां काम करने वालों को खूब फटकार लगाई और फौरन दूसरी हाँड़ी मंगाकर उसे कालिख से टीक-फानकर छत की मुंडेर पर टांग दिया। शगुन उसका आँचल पकड़े सबकुछ कौतूहल से देख रही थी। उसने पूछा - माँ यह क्या होता है? शोभा ने उसे पूरी आस्था से समझाया - इसको लगाने से घर में सबकुछ अच्छा होता है और किसी की बुरी नजर नहीं लगती।

शगुन ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही थी उसका सौंदर्य और निखरता जा रहा था। माँ का पूरा ध्यान यौवन की दहलीज पर खड़ी बेटी के इर्द-गिर्द ही रहता था। गाँव में घर से रहकर मात्र इंटरमीडिएट तक पढ़ सकी थी वह। ईश्वर ने उसे अच्छे रूप के साथ अच्छा मस्तिष्क भी दिया था। अपने क्लास में ही नहीं, पूरे स्कूल के मेधावी बच्चों में उसकी गिनती होती थी। 

शगुन ने पिताजी से आगे की पढ़ाई शहर के हॉस्टल में रहकर जारी रखने की बात कही तो वे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने इस बारे में विजय से राय ली तो उसने कहा- ''उसे हॉस्टल ना ही भेजिये तो अच्छा है। हॉस्टल का माहौल बहुत खराब होता है, और उसपर अपनी शगुन तो कभी घर से दूर रही नहीं।"  जगदीश सोचने लगे कि विजय की बेटी तो हॉस्टल में ही रहती है फिर भी यह शगुन के लिए मना क्यों कर रहा है। लेकिन वे यह प्रश्न पूछ नही सके। फोन पर बड़े भाई की चुप्पी से विजय ने उनके मन के भाव पढ़ लिए तो सफाई देते हुए बोले- "इस नौकरी में मेरी भी मजबूरी है भइया, वरना मैं भी प्राची को कभी बोर्डिंग नहीं भेजता।" जगदीश अपने उच्चपदस्थ भाई की हाँ में हाँ मिलाते रहे। विजय ने शगुन को प्राइवेट ग्रेजुएशन कराने की सलाह दी - ''मैं उसकी किताबें वहीं भेजवा देता हूँ... उससे कहिये कि वह घर में रहकर आराम से पढ़ाई करे, सिर्फ इम्तिहान के समय ही कॉलेज जाना पड़ेगा... और कौन सी हमें अपनी शगुन से नौकरी करानी है।'' विजय की बात उन्हें बहुत आसानी से समझ में आ गयी। उन्होंने बिल्कुल वैसा ही किया जैसा छोटे भाई ने समझाया था।

पहले गर्मी की छुट्टियों में प्रायः उसके दोनों भाई और चाचा-चाची भी गाँव आ जाया करते थे, पर इस बार कोई नहीं आया। शगुन ने उदास होकर माँ से कहा- ''पहले तो चाची प्राची को लेकर छुट्टियों में यहीं आ जाती थीं। जबसे वो बोर्डिंग गई है तबसे तो वे लोग भी यहाँ आना कम कर दिए हैं। मेरा तो कॉलेज भी आना-जाना नहीं है माँ... इसलिए मेरी कोई सहेली भी नहीं है जिसके साथ कुछ समय बिताती। माँ, क्यों न हम लोग ही इस बार छुट्टियों में चाची के पास 
चले?'' 

सुबह-सुबह द्वार की घण्टी बजी। प्राची ने दरवाजा खोला। सामने अपनी दीदी शगुन को पाकर उससे लिपट गई। उसके चंचल अंदाज घर की भीतरी दीवारों को अपनी अठखेलियों से गुंजित कर रहे थे। शगुन ने अंदर घुसते ही अपनी चाची के साथ घर के सब कामकाज में अपना दखल जमा लिया। गुणवंती माँ ने बेटी को पाक-कला और सिलाई-बुनाई-कढ़ाई में आखिर निपुण जो  कर दिया था। पर हाँ, उसने अपनी बेटी को अरमानों के पर लगाकर उड़ने से जरूर रोक रखा था।

विजय के पड़ोस वाले बंगले में शर्मा जी रहते थे और दोनों घरों में खूब आना-जाना था। शर्मा दंपत्ति ने शगुन की गृहकार्य-दक्षता और सुन्दरता की चर्चा सुन रखी थी। जब सामने पाकर उसकी शालीनता के दर्शन हुए तो मन ही मन अपने बेटे  से उसकी जोड़ी मिलाने लगे और शादी के लड्डू फोड़ने लगे। उनका इकलौता बेटा विनीत सैनिक स्कूल से निकलकर ग्रेजुएशन करने के बाद सीडीएस की तैयारी में लगा था। अनेक बार एसएसबी का इंटरव्यू दे चुका था लेकिन अंतिम सफलता हाथ से फिसल जाती थी। शर्मा जी अब और इंतजार करने के बजाय सेवानिवृत्त होने से पहले उसकी शादी निपटा देना चाहते थे। 

शगुन के हाथो के बने नाना प्रकार के सुस्वादु व्यंजन शर्मा जी को भी चखने के लिए मिलते रहे। और भला चाहिये भी क्या था उन्हें अपनी होने वाली बहू में! घर-खानदान अच्छा था और जाति भी मेल खा ही रही थी। मौका देखकर शर्मा जी ने शादी की बात छेड़ डाली। देखने में सुन्दर और सुशील शगुन विनीत को भी सुघड़ लगी थी। नौकरी के बगैर इससे अच्छे रिश्ते की उम्मीद करना भी फ़िजूल था। तिसपर लड़की के चाचा और भाइयों के ऊँचे ओहदों का भी आकर्षण था ही। शादी की बात पक्की होते देर न लगी। आनन-फानन में सगाई की रस्म पूरी कर दी गयी। शगुन से किसी ने पूछा भी नहीं। वैसे उसके पास हाँ करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था।

इधर सगाई हुई और उधर विनीत के लिए अगला एसएसबी सफलता का परिणाम लेकर आया। अब तो सारा श्रेय शगुन के भाग्य को दिया जाने लगा। सास के लिए भी घर में शगुन का पैर बड़ा शुभ रहा। गुणवंती बहु के आते ही घर की रौनक बदल गयी थी। प्रायः बीमार रहने वाली सासू माँ उसकी सेवा पाकर बिस्तर से उठ खड़ी हुईं। शर्मा जी भी रिटायर होने से पहले पदोन्नति पाकर विभाग के निदेशक बन गये।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद विनीत लौटा तो शगुन को अपने साथ लेकर पोस्टिंग पर चला गया। शगुन के लिए वहाँ का माहौल एकदम अपरिचित था। डांस-पार्टी और क्लब संस्कृति से लेकर खान-पान तक, और सामाजिक संबंधों से लेकर उठने-बैठने के तौर-तरीकों तक, उसके लिए कुछ भी सहज नहीं था। विनीत मन ही मन अपने दोस्तों की पत्नियों से उसकी तुलना करता और उसे ले कर उनके सामने झेंपने सा लगा था। पाश्चात्य लिबास में चमकती-दमकती उन आधुनिकाओं के आगे शगुन आखिर  फीकी जो पड़ जाती थी। 
और फिर अकस्मात उसने सुन लिया उस रात एक्सटेंशन फोन पर वह वार्तालाप।

- मम्मी, शगुन मेरे लायक नहीं है।
- अरे, क्या हुआ बेटा। शगुन तो साक्षात् लक्ष्मी है हमारे घर की।
- तुम नहीं समझोगी मम्मी । मुझे अपने दोस्तों के सामने बहुत शर्म आती है।
- कैसी शर्म बेटा, इतनी सुन्दर और गुणवंती दुल्हन मिली है तुम्हें।
- तुम क्या जानो, मेरे ब्रदर ऑफिसर्स की पत्नियां बहुत पढ़ी-लिखी हैं। उनके सामने यह             मोम की गुड़िया गूंगी बनी खड़ी रहती है। 
- लेकिन उसकी अच्छाई भी तो देखो...
- नहीं माँ, मुझसे नहीं होगा। ... मैं उसे साथ नहीं रख सकता हूँ।
- नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं करते। इतनी संस्कारी बहू है हमारी, कितनी शुभ। जब से घर में  उसके कदम पड़े है सबकुछ कितना अच्छा होता गया। तुम्हे मनचाही नौकरी मिली, पापा को प्रोमोशन मिला, उनकी आमदनी कितनी बढ़ गयी, अपना घर बन गया,... और तो और मैं तो अब तक मर ही गयी होती। कोई दवा काम नहीं कर रही थी लेकिन इसका हाथ लगते ही वही दवा फायदा करने लगी।
- मम्मी, ये सब फालतू की बातें हैं। मैं यह सब नहीं मानता। मुझे उसके साथ नहीं रहना है अब, बस!
- अच्छा रुक । अपने पिताजी से तो बात कर ले।

श्रीमती शर्मा अपने बेटे की बात अपने पति को बतायी तो वे कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गये। 
फिर उनकी धीमी आवाज़ फोन पर सुनायी दी -‘तुम्हीं बात करो उस से । बोल दो कि कि चाहे जैसे रहना चाहे रहे लेकिन शगुन से तलाक की बात जबान पर मत लाये। उसे यहाँ छोड़ जाय... हमारे पास। उसके बाद वहाँ किसी को रख ले हम कुछ नही बोलेंगे। ...यहाँ हमारे साथ रहेगी हमारी शगुन। हमारी शुभंकर।’ 

फोन पर 'माँ की तबियत खराब होने का' सन्देश पाकर विनीत उसे अगली सुबह ही ट्रेन से ‘माँ की देखभाल के लिए' घर लेकर आ रहा था। ट्रेन कि गति कम होने लगी थी। गंतव्य शायद आ रहा था। वह समझ चुकी थी कि अब वह उसके घर की देहरी पर बैठायी गयी नजरबट्टू बन चुकी है।

( रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2020

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

कोरोना की महामारी में देश शाहीनबाग से उबरकर तब्लीगी मरकज़ में उलझा ही था कि अब बांद्रा स्टेशन पर जाकर फंस गया। यहाँ हजारों की संख्या में गुमराह मजदूर अपने घर जाने के जोश में भूल गए हैं कि जहाँ जाएंगे वहाँ जाकर उन्हें क्या हासिल होगा। साथ में अपने परिवार को भी कितनी बड़ी मुसीबत में डालने वाले हैं। जोश में होश गवां बैठे ये बेचारे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके खैरख्वाह उन्हें घर नहीं बल्कि सपरिवार उन्हें श्मशान भेजने की साजिश में लगे हैं। 

इन्हें नहीं मालूम कि इस लॉकडाउन के सहारे उनको तो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। इसके लिए उन्हें इन मूर्खों की जमात से बेहतर शिकार नहीं मिलेगा। अगर वे वास्तव में इनके सच्चे खैरख्वाह होते तो इस आपात स्थिति में इन मजदूरों को घर पहुंचाने की बात कर के गुमराह नहीं करते। यह समझने की जरूरत है कि वे सिर्फ उनके साथ ही नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ जनता के साथ भी बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर वे कहते कि जो जहाँ फंसा है वही रहे, उसके रहने खाने की व्यवस्था अगर सरकार नहीं कर पा रही है तो वे खुद करेंगे; तब उनकी दिलदारी समझ में आती। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। 

मजबूरी वश ही सही यहाँ इकठ्ठी भीड़ के लोग मजदूर हैं या किसी शातिर हाथ के खिलौने मात्र? ऐसा नहीं है तो, उनको घर पहुँचाने का ठेका लेने के बजाय वे सरकार से उनके रहने खाने की व्यवस्था की लड़ाई क्यों नहीं लड़ रहे? जो जहां है वहीं पर उनकी व्यवस्था कराने की बात क्यों नहीं की जा रही है? हे नियति के शिकार प्रवासियों, कम से कम अपनी नहीं तो अपने परिवार की चिंता करिये और अभी जो जहां है वहीं रहे, इसी में सबकी भलाई समझिए।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 1, 2019

जमाने की छुआ-छूत

अभी एक सज्जन जिन्होंने #zomato के अपने खाने का ऑर्डर इसलिए कैंसिल कर दिया क्योंकि डिलीवरी बॉय उनके पसंदीदा धर्म का नहीं था। इससे हमें एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। कई दशक पहले अपने बचपन की बात बता रही हूँ। मेरे घर में एक बड़की माई थीं, जो किसी का छुआ नहीं खाती थी, न ही किसी को अपनी रसोई में बिना नहाए घुसने की इजाजत देती थी। भोजन करने की घर में चाहे जितनी तेजी मची हो किन्तु वह किसी को अपनी बनाई रसोई छूने नहीं देती थीं। वे खाना खुद ही परोसती और सबको खिलाने के बाद अपने खाती थीं। रसोई की साफ-सफाई के मामले में उन्हें अपने सिवाय किसी पर भरोसा नहीं था। और तो और, भोजन बनाते वक्त बिना ब्लाउज के साड़ी लपेटे रहती थीं। पूछने पर कहती थी दर्जी मुसलमान होते हैं इसलिए वह उनका सिला कपड़ा नहीं पहनती हैं।

छुआ-छूत बहुत मानती थी। उनका धर्म भ्रष्ट न हो इसलिए वह पूरी जिंदगी इसी तरह रहीं। जब किसी सफर में होती थीं तो अपने पास थोड़ा चूड़ा-चीनी गठिया के रख लेती थीं। कहीं किसी आयोजन में जाने पर साड़ी की मैचिंग पेटीकोट का कपड़ा अपनी कमर में लपेट कर उसके दोनों छोरो को पकड़ कर आपस में गांठ बांध लेती थी, जिससे साड़ी पहनने में आसानी हो जाती थी। घर वालों के लाख समझाने के बावजूद उनका पूरा जीवन इसी प्रकार कटा। जिनको खाने की बड़ी तेजी मची रहती थी वे स्टोव पर रसोईघर से बाहर नमक डालकर गीलभात, खिचड़ी, अंडा, ऑमलेट बनाकर खा लिया करते और अपने काम पर निकल जाया करते थे। तब वहाँ #zomato या #swiggy जैसी सुविधाएं नहीं थी, नहीं तो शायद तब वे भी उसी से ऑर्डर कर के कुछ खाने का आइटम मंगवा लिया करते, जैसा कि अब वे भी अक्सर यही कर लिया करते हैं। घर के बाकी लोगों का इससे कोई लेना-लादना नहीं है कि zomato सर्विस कौन दे रहा है; उसके कर्मचारी हिंदू हैं या मुस्लिम; उसका रसोइया किस धर्म अथवा जाति का है? लेकिन बड़की माई के सिद्धांत के विरुद्ध कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ा। क्योंकि वह खुद बहुत बड़ी तपस्या कर रही थीं।

अपनी सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर जाड़ा-गर्मी-बरसात सब कुछ सहती रहीं लेकिन अपने सिद्धान्त से कभी कोई समझौता नहीं किया। बल्कि पूरा परिवार उनके इस त्याग के साथ सहानुभूति रखता रहा। क्योंकि जिस दिन वह भोजन स्वयं नहीं बनाती थी उस दिन वह दूध-दही फल-मूल खाकर पूरे दिन रह जाती थीं लेकिन सुविधानुसार प्राप्त किसी भी प्रकार का सुस्वाद भोजन करना उन्हें स्वीकार नहीं था। आप सोच रहे होंगे कि वह कितनी पाखण्डी थी! परन्तु मैं इसे उनका अपने धर्म और शुचिता के प्रति अंधविश्वास ही सही एक प्रकार का समर्पण मानती हूं। अपने इस व्यवहार से उन्हें खुद भी बहुत तकलीफ़ उठानी पड़ी थी। लेकिन उन्होंने परिवार के किसी भी सदस्य को किसी का छुआ खाने अथवा कुछ भी खाने से नहीं रोका। उनका मानना था कि 'उठाया' हुआ भोजन मतलब– जो चीज बनाई कहीं और जाय और उसे वहाँ से उठाकर कहीं दूर ले जाकर परोसा जाय तो वह भोजन अशुद्ध हो जाता है।

आजकल बने-बनाये खाने को ऑनलाइन ऑर्डर से मंगाकर खाने-खिलाने का चलन जोर पर है। उस खाने की तैयारी में कई तरह के लोग लगे रहते हैं। किसने देखा उन्हें नहाते जो लोग इसमें शामिल है? छुआ-छूत की बात अभी यहाँ छोड़ दीजिए, लेकिन जिस भोजन को अपनी आंखों के सामने बनते न देखा गया हो उसकी निरापद शुद्धता (हाइजीन) की क्या गारंटी है? इसलिए, जो लोग #zomato, #swiggy, या किसी रेस्तरां में जाकर खाना पसंद करते हैं उन्हें भोज्य पदार्थों की तैयारी से विभिन्न स्तरों पर जुड़े व्यक्तियों की जाति, धर्म या सामाजिक प्रास्थिति पर प्रश्न उठाने का कोई हक नहीं है। परहेज करना है तो बड़की माई की तरह करिये वर्ना ऐसी मूर्खता का परिचय मत दीजिये।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 13, 2019

जब तुम भागोगी

हम ताली बजायेंगे
तब, जब तुम
भागोगी!
तुम आजाद हो
भागो,
तेज भागो,
और तेज भागो,
हम गर्व करेंगे
तुम्हारे भागने पर,
शोर-शराबे भी करेंगे,
ताली भी खूब बजायेंगे,
जब तुम भागोगी,
पर ऐसे नहीं
हमारी, द्युतिचन्द की तरह।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, October 1, 2018

ईश्वर पुलिस को सद्बुद्धि दे

इस अर्थ-प्रधान युग में मनुष्य को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं। व्यापारी दिन-रात काम करता है। किसान खेतों में पसीना बहाता है। मजदूर दिहाड़ी की तलाश में दर-दर भटकता है। विद्यार्थी भी रोजी-रोटी कमाने लायक बन जाय इसी लक्ष्य का पीछा करते हुए रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है। कुछ नराधम इसी रोटी के लिए छोटे-मोटे अपराध शुरू कर देते हैं और रुपयों की हबस का शिकार होकर अपराध की नयी-नयी राहें तलाशते रहते हैं। धनोपार्जन के लिए शुरू किया गया छोटा भ्रष्टाचार शीघ्र ही एक आदत में बदल जाता है जिसका बड़ा नुकसान वृहत्तर समाज को उठाना पड़ता है।

एक सामान्य नौकरीशुदा व्यक्ति अपना समय व श्रम और अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता अपने नियोक्ता की इच्छाओं के अधीन कर देता है ताकि महीने के अंत में उसे वेतन के रूप में कुछ रुपये मिल सके जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। उसके पास नौकरी से बचे हुए अत्यल्प समय और क्षीण ऊर्जा पर पत्नी व बच्चों से लेकर माता-पिता तक और इष्ट-मित्रों से लेकर तमाम रिश्तेदारों तक की आस लगी होती है। इसी समय में वह अपने लिए भी सुख तलाशता है। जीविका की जद्दोजहद में एक सामान्य नागरिक का सामाजिक जीवन छीजता जा रहा है। अपराधी और भ्रष्टाचारी मिलकर इस साधारण मनुष्य के जीवन को बेहद असुरक्षित और कठिन बनाते जा रहे है।

प्रदेश की राजधानी में नौकरी करने वाले विवेक को देर रात तक काम करना पड़ता था। ऐसी ही एक काली रात आयी जब रात में घर लौटने से पहले उसे अपनी एक सहकर्मी को सुरक्षित उसके घर तक छोड़ते हुए आना था। लेकिन वह घर नहीं आ सका। रास्ते में गश्त पर निकले एक सिरफिरे और उद्दंड सिपाही ने उसे रोका और पता नहीं क्यों उसके सिर में गोली मार दी। एक निहत्था कामकाजी अकारण मारा गया और एक साथ कई जिंदगियां बर्बाद हो गयीं।

प्रश्न उठता है कि पुलिस विभाग ने उस सिपाही को  कैसी ट्रेनिंग दी थी। आखिर शहर के एक समृद्ध इलाके की गश्त करने वाले उस रंगरूट से उच्चाधिकारियों ने क्या अपेक्षा की थी जिसे पूरा करने के लिए उसे एक निरीह नागरिक की हत्या करनी पड़ी? जहाँ असली अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, रोज ब रोज हत्या, लूट, छिनैती व बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहाँ पुलिस प्रशासन प्रभुवर्ग की सेवा में लगा हुआ उनकी और अपनी झोली भरने में व्यस्त है।

बड़ी भयावह स्थिति है। सुबह घर से निकलने वाला परिवार का कमाऊ सदस्य शाम तक सकुशल वापस आ जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। घर की बेटी बाहर निकलकर अपना काम करते हुए अपनी गरिमा बचाकर घर लौट आएगी इसकी कोई गारंटी नहीं। घर में, बैंक में या जेब में रखा पैसा अचानक लूट नहीं लिया जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। देश के सभी नागरिकों के जान-माल की गारंटी देने वाला संविधान और इसी संविधान की शपथ लेकर शासन की बागडोर थामने वाले मंत्री और नौकरशाह इस गारंटी को नष्ट करने में लगे हुए है। न्यायालय भी लाचार हैं। ये अनेक गैर-जरूरी फैसले सुनाने में अपनी मेधा और समय खपा रहे हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सुरक्षा और न्याय पाने के लिए कौन सा दरवाजा खटखटाने जाय?

मुझे तो लगता है कि सबकुछ भगवान भरोसे ही रह गया है। केवल ईश्वर ही है जो आर्त्त की प्रार्थना सुन सकता है। सभी अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अपने-अपने भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, जीसस से प्रार्थना करेंगे कि वे हम अकिंचन प्राणियों के असुरक्षा बोध को कम करने के लिए तथा जीवन के प्रति सकारात्मक विश्वास बनाये रखने के लिए कोई चमत्कार करें। उन पुलिसकर्मियों को ऐसी सद्बुद्धि दें, उनके आचरण में ऐसा परिवर्तन कर दें कि उन्हें देखकर कोई शरीफ आदमी भयाक्रांत न हो, जान बचाकर भागने पर मजबूर न हो। उन्हें ऐसा कर्तव्यबोध करा दे कि कोई अपराधी उनसे दोस्ती गांठने और मेल-जोल बढ़ाकर अपराध की कमाई में हिस्सेदार बनाने की हिम्मत न करे।

ऐसी ही एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन हमारे मुहल्ले में किया गया है। सेक्टर-16 इंदिरानगर, लखनऊ के सांईंराम पार्क में शाम छः बजे सबलोग इकठ्ठा होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। सभी हाथों में मोमबत्तियां लेकर अपनी प्रार्थना के साथ मुंशीपुलिया पुलिस चौकी तक शांतिपूर्ण मार्च करेंगे और जलती हुई मोमबत्तियों को पुलिस चौकी के द्वार पर लगाएंगे ताकि ईश्वर की कृपा से उन पुलिसकर्मियों को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हो सके। ताकि उनके भीतर की मानवता का उदय हो सके। ताकि राक्षसी प्रवृतियों का अस्त हो सके। ताकि भविष्य में फिर कोई विवेक अकारण बीच सड़क पर इनकी गोलियों से न मार दिया जाय।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, September 27, 2018

लचीला रे...

प्रोमोशन में आरक्षण संबंधित 2006 का फैसला बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ते हुए भारतीय संविधान की जय बोल दी। इससे हमें इस देश की न्याय व्यवस्था और अपनी सासू माँ की पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुपालन के लिए लागू अनुशासन कुछ एक जैसा प्रतीत होता है।

घर में पूजा-पाठ, तीज-त्यौहार और मांगलिक कार्यों के विधि-विधान को लेकर वो बहुत कठोर हैं। लेकिन यदि ऐसे कार्यक्रम में परिस्थिति वश किसी पद्धति को पूरा करने में कोई बाधा आ जाती है तो वे उसका दूसरा विकल्प जरूर खोज लेती हैं। इससे स्थापित नीति का उलंघन भी नहीं होता और उनका इकबाल भी कायम रहता है।

कर्मकांड कराने वाले पुरोहित तो इस लचीलेपन के फन में इतने माहिर होते हैं कि भारतीय संविधान भी शर्मा जाय। इष्ट देवता के लिए यजमान जो वस्त्र नहीं ला सके तो देवता को वस्त्र के रूप में रक्षा-सूत्र पहना देते हैं।

पूजन सामग्री भी गरीब यजमान के लिए कुछ तो अमीर के लिए कुछ और हो जाती है। भोले शंकर को खुश करने के लिए घृत, शहद, दही, शर्करा और दूध से अभिषेक करते हुए घण्टों मंत्रोच्चार किया जाता है तो गरीब का एक लोटा जल भी उसके भक्तिभाव को प्रकट कर देता है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। अरे, अभी इस समय कौन हो सकता है...! दुपट्टा सम्हालते हुए दरवाजा खोला तो शौहर खड़े थे, आज कुछ अलग मुस्कान लिए हुए। चकित होकर पूछा– क्या हुआ, आज इतनी जल्दी?

शौहर ने उसे हौले से पकड़कर अंदर आने का रास्ता बनाया। वह अचकचा कर पीछे हट गयी। सामने वाली भाभी जी एकटक जो देख रही थी। चट दरवाजा बंद कर अंदर की ओर मुड़ी तो इरफान मियां गुनगुना रहे थे– "आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है"

ऑफिस बैग सोफे पर पटका जा चुका था। उसकी दोनों बाहें फैली हुई शायरा की ओर बढ़ीं और इरफान ने उसे नजदीक खींच के उसकी कमर को दोनों ओर से जकड़ लिया– "जी करता है आज तुम्हारी आंखों में आँखे डाले यूँ ही देखता रहूँ।"

शायरा– माजरा क्या है? आज अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे। तबियत तो ठीक है?

इरफान– नहीं रे पगली, अब मैंने सोच लिया है। जो भी जिंदगी अल्लाह ने बख्शी है उसे प्यार से जीकर ही गुजारना है। सच्चे दिल से कह रहा हूँ।

जी-न्यूज पर शोर-शराबे वाली बहस चल रही थी। एक मौलाना जी चीख रहे थे– आप लोग तो ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे कोर्ट ने तलाक का अख्तियार एकदम से खत्म कर दिया है। असल बात कुछ और ही है...

शायरा ने रिमोट उठाकर टीवी बन्द कर दिया और इरफान के सीने से लग गयी– सच में प्यार करोगे मुझे? ऊपर की जेब मे रखी कलम उसके गाल पर चुभ रही थी। इरफान मौन होकर कुछ सोच रहा था।

शायरा ने जेब से कलम निकालकर किनारे रख दी,  "दो दिलों के बीच में इस पेन का क्या काम? सुना नहीं है, फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए"
"अरे यार, वो मौलाना जी क्या कह रहे थे? टीवी क्यों बन्द कर दिया? जरा रिमोट देना..."

"ओहो, तो ये बात है..!" अपनी कमर से उनका हाथ झटकते हुए मुंह बिचकाकर बोली– "बड़े आये, आज फिर जीने की तमन्ना है ...हुँह! कल तक क्या घास छील रहे थे... अभी काहें मरने का इरादा बना रहे हो? अभी तो सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगी है। बाकी द्वार तो खुल्ले ही पड़े हैं, ...वो भी आजमा लो तो मरिहो"

टीवी पर बहस जारी थी– तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-अहसन, निकाह-ए-हलाला, तलाक-उल-सुन्नत...

शायरा ने चुपचाप सोफे से बैग उठाया, कलम को शर्ट की जेब में वापस रखा और बोली– "कपड़े बदल लो चाय लेकर आती हूँ।"

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 1, 2017

बहू-अधूरी

ससुराल में दो साल बीत गये। कमली की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही थी। पूर्वा के मुकाबले वह कहीं नहीं टिक पा रही थी। दोनों बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर रात में बिस्तर पर उन्हें सुलाते वक़्त लोरी की आवाज़ में भी अम्माजी पूर्वा को ही ढूँढती रहती। बच्चों की देखभाल में कहीं कोई कमी न आ जाए इसके लिए कमली भरसक कुछ भी उठा नहीं रखती। आज अधिक रक्तस्राव के कारण वह कमरदर्द से परेशान कमरे के भीतर पलंग पर लेटी पड़ी थी। उसकी आँखों के दोनों कोनों से झर-झर आँसू बह रहे थे।

अम्मा जी मोबाइल कानों पर लगाये  कमली की माँ से उसकी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ गयी थीं - "जबसे आयी है यह तीसरी बार है... आज चार दिन हो गया, बच्चों को न तो समय से नहलाया-धुलाया और न ही घर के किसी काम में हाथ बँटा रही है... पूछिए ज़रा, अपनी लाडली से कबतक मातम मनाएगी? जाने क्या सिखा-पढ़ा कर भेजा है आपने!"

-"ऐसी स्थिति में मन को दुःख तो होगा ही न समधिन जी! भला कौन स्त्री माँ बनना नहीं चाहती?  बिन बाप की बच्ची थी बेचारी... मैं भी अपनी परिस्थितियों के आगे मजबूर थी... इसमें उसका क्या दोष?" उसकी माँ ने विनती की।

"हाँ तो मैंने कब गिड़गिड़ाया था आपके सामने उसे अपनी बहू बनाने के लिए? ...और मेरे बेटे ने तो पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसे बीवी नहीं अपने बच्चों की माँ चाहिए। ....शील-संकोच तो मायक़े में ही छोड़कर आ गई थी। उसके कंठ ससुराल में आते ही खुल गए... और तो और सिर पर पल्लू आजतक नहीं ठहरता...  दुल्हन हमेशा पर्दे में ही शोभा देती है।" उनकी आवाज़ कमली के कानों में भाले की तरह चुभ रही थी। अम्माजी ने आज फिर उसकी माँ को कोसना शुरू कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। पलंग से धीरे से उठकर दीवाल का सहारा लिए वह बरामदे में आकर खड़ी हो गई।

"अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी जान गए कि बहू पेट से थी। ...हमारी पूर्वा हमें छोड़कर चली गई लेकिन ऊँची आवाज़ तो दूर गुन्नू पैदा हो गया तब तक किसी ने उसकी झिरखिरी तक नहीं देखी। ये महारानी तो किसी की परवाह किए बिना सारा दिन बच्चों के साथ चपड़-चपड़ करती रहती हैं..." अम्मा जी का गुबार बाहर आ रहा था।

- "तो फिर शिकायत किस बात की अम्माँ जी? पूर्वा दी आपके बेटे की दुल्हन बनकर आयी थी और मैं दो बच्चों की माँ, तो पहले बच्चों को संभालू या पल्लू... इतना अंतर तो होगा ना मुझमें और उनमें...?" आज पहली बार अधूरी बहू का कंठ अम्मा जी के सामने खुल गया था।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, May 28, 2016

नयी फ्रॉक

दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में छपी मेरी कहानी 'नई फ्रॉक'

ओसारे में बाँस की खाट पर पड़े-पड़े उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। दो महीने हो गये थे घर में बचिया के ऊपर ‘महरानी जी’ का आसन आये। उसके बालों में महीने भर से कंघी नहीं पड़ी थी। चट-चट करते बालों ने आपस में लट्ट बाँध लिये थे। खाट पर सिर्फ़ दरी बिछी थी और उसके सिरहाने नींम के पत्ते वाली छोटी-छोटी कुछ टहनियां रखी गयी थीं। वहीं बगल में गोंइठा की आग लगातार सुलगती रहती थी। उसका पूरा शरीर लाल पड़ गया था। ऐसे में उसके ऊपर चन्दन और पियरी माटी का लेप लगाने के अलावा और कोई दवा भी नहीं दी जा रही थी। ऐसी मान्यता थी कि दवा देने पर देवी माँ और कुपित हो जायेंगी और बचिया जल्दी ठीक नहीं होगी। उसके शरीर पर पड़े फफोले सूखते, फिर हरे हो जाते। चेचक के साथ उसे बुखार भी रहने लगा था। उसके होठ सूखे सन्तरे की फांक की तरह मुरझा गये थे। कई दिन हो गये थे। वह न कुछ खाती, न पीती। बस टुकुर-टुकुर आने जाने-वालों को बेबस निहारती रहती।

घर में महरानी जी के आसन को अब काफ़ी लम्बा समय हो गया था। ऐसे में ‘बाबू’ की अम्मा की चिंता और बढ़ती जा रही थी। घर में दवा-दारु, लहसुन-प्याज और दाल में तड़का लगाना सब वर्जित था। भुनी हुई कलेजी और बाजार का समोसा-जलेबी बन्द हो जाने से बाबू की जीभ सुन्न होने लगी थी। फीका और उबला खाना बिल्कुल नहीं सुहा रहा था। बाऊजी को भी महीनों से घर का बना भोजन बेस्वाद लगने लगा था। वे अक्सर भोजन का एक निवाला मुंह में डालते ही बेटी सोनल पर चिल्ला पड़ते थे- " एक़रे लगे कवनो ढंग-सहूर नइखे, भोजन बनवले बाड़े कि आपन कपार... ले तेही खो "। कभी-कभी नाराज़ होकर भोजन की थाली उसके आगे ही पटक दिया करते। 

अम्मा को महरानी जी की शक्ति में जो अदम्य आस्था थी उसमें भयतत्व की प्रधानता थी। उन्हें घर के नेम-धरम और पूजा-पाठ में जो विश्वास था वह अशिक्षा और कर्मकांडी परंपराओं का पोसा-पाला हुआ था। लेकिन यह आस्था न हिलने वाली थी और विश्वास न डिगने वाला था। इसके अलावा उनके अंदर एक ग़ज़ब की अभिनय कला भी विद्यमान थी। अपनी अदाकारी से वो गुस्से में लाल-पीले हुए अपने ‘हुकुम’ को चुटकियों में मना लिया करतीं। बड़ी सफाई से वे पानी-पीढ़ा लगाती; बेना डुलाने बैठ जाती और ‘बड़ी माता’ के समय की आचार संहिता समझाते हुए सोनल का बनाया वही खाना उन्हें जिमा देती जो उन्हें थोड़ी देर पहले बेस्वाद लग रहा था।

लेकिन आज तो घर में खाने -पीने का बिल्कुल ही महौल नहीं था। बचिया की हालत देखकर सबको उबकाई आ रही थी। नाक दबाकर ही आना-जाना हो रहा था। बाबू तो घर छोड़कर बाजार का ही चक्कर लगा रहे थे। अलबत्ता महरानी जी के डर से बाहर का कुछ खाने की हिम्मत उन्हें भी नहीं थी। अभी बाबू और उसके पापा के खाने की चिंता गृहस्वामिनी को सता ही रही थी कि ऐन वक्त पर बचिया ने फिर उल्टी कर दी! उफ्फ...

इस बार उसके मुंह से लंबे-लंबे लच्छेदार जाला बाँधे हुए पीले रंग का मैगीनूडल्स जैसा कुछ बाहर निकला। पर बचिया ने तो ऐसा कुछ खाया ही नहीं था। बल्कि खाया तो उसने कुछ भी नहीं था। फिर यह लच्छे कैसे? 

दरअसल वे केंचुए थे जो उसकी आंत में न जाने कितने वर्षों से पल रहे थे। बढ़ते-बढ़ते उनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई थी कि अब उन्हें आँत में रहने लिए जगह नहीं बची थी। शायद इसीलिए उनमें से कुछ अपने लिए किसी और ठिकाने का रास्ता तलाशते उसके मुँह और गले के बीच में ही फँस गये थे। वह अपने एक हाथ से केंचुओं को खींच-खींच कर बाहर की तरफ़ झटक रही थी। वह इतनी कमजोर हो गयी थी खुद से उठकर उल्टी करने के लिये अपना मुंह खाट से बाहर नहीं लटका सकती थी। उसने उठने की कई कोशिशें की थी पर शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था। उल्टी सूखी हुई थी। उसमें कोई तरल पदार्थ नहीं थे, बल्कि सिर्फ केंचुए थे। उन लच्छों का कुछ हिस्सा दरी पर भी गिर गया था। हरदम साथ ही रहने वाली उसकी बहन ‘छोटिया’ ने उसे खाट से उठाने की बहुत कोशिश की, पर वह अकेले उसके मान में नहीं आयी।

बचिया की उल्टी देखकर कहीं बाऊजी को भी खाते समय उबकाई न आ जाय इसलिये अम्मा ने पीढ़ा और पानी का लोटा उठाया और सोनल से 'बाऊजी का भोजन कोठरी में ही ले आ' कहकर भीतर चली गईं। हुकुम के लिए कमरे में पानी-पीढ़ा लगाकर हाथ में बेना लिये वे उनके सामने बैठ गयीं। सोनल ने हाँफ़ती-काँपती बचिया को इशारे से बताया कि अभी जल्दी ही आयेगी और भोजन की थाली हाथ में उठाये झट से ओसारे से कोठरी की तरफ चल पड़ी। जबतक बाऊजी खाना खाते रहे तबतक वह भी वहीँ दोहरावन पूछने के लिये खड़ी रही।

बचिया अपनी कातर नजरों से निरीह अपराध भाव से चारों तरफ निहार रही थी – इस आस में कि शायद कोई उसकी पीठ पर थोड़ी थपकी दे दे और उसकी सांस स्थिर हो जाय। पर अफसोस! सभी व्यस्त थे। 

कुछ देर बाद सोनल जूठी थाली के साथ बाहर निकली। थरिया नल की तरफ टरका कर बचिया के बिछावन की तरफ बढ़ी। एक हाथ से उसे सहारा देकर उठाते हुये छोटिया से दरी खींच लेने को कहा। दोनों ने मिलकर बचिया को पानी से धो-पोछकर साफ किया। उल्टी से खराब हो गयी दरी को धुल कर धूप में सूखने के लिये डाल दिया। बचिया दरी के सूखने तक निखहरे खाट पर लेटी रही। उल्टी हो जाने के बाद उसकी बेचैनी थोड़ी कम हो गई थी। लेकिन मूज की रस्सी से बुनी खाट के ताने-बाने उसके फफोलों को चुभने लगे। फिर भी वह असक्त लेटी रही। आँगन में तार पर टंगी दरी की तरफ टकटकी लगाकर देखती रही। कुछ ही देर में कमजोरी और थकान ने तकलीफ़ पर बढ़त बना ली और वह बेदम होकर ऊँघने लगी।


अगले दिन महरानी जी का आसन उठ गया। उनकी बिदाई की तैयारी हो रही थी। बड़े सबेरे ही बाऊजी स्नान के बाद सफेद मर्दानी लपेटे, काँधे पर जनेऊ पहने छोटिया-छोटिया हाँक लगाये जा रहे थे। उन्हें अपने बालों में कंघी करनी थी और कंघी थी कि मिल ही नहीं रही थी। 

अम्मा तो बिल्कुल भी खाली न थी। उन्होंने बचिया की पसन्द के बहुत से सामान मंगा रखे थे। शीशा-कंघी, तेल-साबुन, नहाने के वास्ते नया बाल्टी-मग्गा, तौलिया, चप्पल, लाल रिबन, मोतियों की माला, काजल, इस्नो-पाउडर, खाने के लिये उसकी पसन्द के फल, मेवे और मिठाइयां, चावल-दाल-आटे का इन्तजाम तो था ही। इतना ही नहीं, उसकी पसन्द के कपड़े भी मंगा रखी थीं। खासतौर पर नीले रंग की एक फ्रॉक जो बचिया को बहुत दिनों से पहनने का मन था। अम्मा का मन बचिया के लिए आज बड़ा भावुक हो रहा था। उसकी ज़रूरत और पसंद का कहीं कोई सामान छूट न जाय इसके लिए वह याद कर-करके एक-एक चीज मँगवा रही थी। अब वह सयानी जो हो गई थी। 

दूर खड़ी ‘छोटिया’ सारा तमाशा आँखे फैलाये देख रही थी। बचिया के लिए इतना सारा सामान देखकर वह उलझन में पड़ गयी थी। सोच रही थी- अम्मा आज ब‍उरा ग‍इलि बा का!  

छोटिया का मन आज घर के किसी भी काम में नहीं लग रहा था। वह आज अपनी अम्मा की कही कोई बात भी नहीं सुन रही थी। आज पहली बार उसके मन में बचिया के प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हआ था जो उसके चेहरे पर भी साफ-साफ झलक रहा था। भला क्यों न होती डाह? उसे भी अपने लिये नयी फ्रॉक और चप्पल चाहिये थी। वह अम्मा से कई बार बोल चुकी थी- "एक ठो फराक हमहूँ के मँगवा देतू त घटि ज‍इतू! हमरा के त हरदम दीदी लोग के छोड़ने-छाड़न पहिरे के मीलेला।"  इतनी मिन्नतों के बाद भी अम्मा ने उसके लिये कुछ नहीं मँगवाया था। उधर जिस कंचे को खेलने के लिये बचिया अक्सर पिट जाया करती थी आज वही कंचे भी उसके लिए अम्मा ने ख़ुद ही मँगवा लिए थे!

अपने साथ अम्मा का सौतेला व्यवहार देखकर छोटिया आख़िर कबतक  चुप रहती! उसका मन आज पक चुका था। उसने ठान लिया कि अब वह किसी की कोई बात नहीं सुनने वाली और ना ही किसी का कहा कुछ करने वाली है। अपनी बात मनवाने के लिये घर का सारा काम छोड़कर वह ठनगन करने लगी। अम्मा को उसकी इतनी बेरुख़ी बिल्क़ुल भी नहीं भा रही थी। वो भी इस मौक़े पर जब महरानी जी की पूजा पर घर में आस-पड़ोस की ढेरो महिलाएँ भी मौजूद थीं। वह उसके ऊपर दाँत पीसतीं, आँखें दिखातीं और उन महिलाओं से छुप-छुपाकर किसी बात पर उसकी पीठ पर एकाध चटाका भी लगा देतीं।

आज ओसारा और आँगन से लेकर घर का कोना-कोना गोबर से लीपा गया था। मानों घर की पूरी गंदगी आज साफ हो गई हो। सारी अल्लाय मिट गयी हो। बाँस की पुरानी खाट एक कोने में खड़ी कर दी गयी थी। चिलचिलाती धूप में आँगन के बीचो-बीच एक नई चारपाई बिछी हुई थी जिसपर नया गद्दा और चमचमाती चादर भी डाली गयी थी। अम्मा एक-एक कर सारा सामान उसके आस-पास सजा रही थीं। 

मौक़ा पाकर छोटिया ने उन सामानों में से वो नीला फ़्रॉक निकाल कर कहीं और छुपा दिया था। जब घर के सभी लोग आँगन में हो रही पूजा-पाठ में व्यस्त हो गये थे तो छोटिया ने उस फ़्रॉक को पहन लिया और ओसारे में पड़ोस की आयी महिलाओं के बीच दुबक कर बैठ गई। सहसा अम्मा की नज़र छोटिया पर पड़ गयी। उसके शरीर पर नया वाला फ्रॉक देखकर वो तमतमा उठीं। बाघिन की तरह उस पर झपट पड़ी-  "रे अभागिन...जल्दी निकालु इ फराक...  नाहीं त ओकर आतमा एहरे भटकी आ तोके चैन से ज़ीये नाइ दी"। यह कहते हुए उसके गाल पर तड़ातड़ तमाचा जड़ने लगीं।

छोटिया भी चोट खाकर चीत्कार कर उठी - अब हमहूँ नाइ जीअब... मुआ दे हमहूँ के... ए जियले से निम्मन बा अम्मा कि हमहूँ मरि ज‍इतीं... तब तऽ ते हमरो ख़ातिर नाया फराक मंगवते न...?

 (रचना त्रिपाठी)

Tuesday, September 22, 2015

अतिक्रमण पुलिसिया

आज मैंने अपनी आँखों से एक ऐसे अतिक्रमण का वाकया देखा जो किसी फुटपाथ पर जीविका कमाने वाले ठेले-खोमचे अथवा टाइपराइटर वाले ने नहीं किया। बल्कि उसी वर्दी वाले एक 'लोकसेवक' ने किया जिस वर्दी को पहनकर अभी हाल ही में एक दरोगा जी अतिक्रमण हटाने के अति उत्साह में टाइपिस्ट के साथ दुर्व्यवहार करने के जुर्म में निलंबित हुए हैं।

यह लोमहर्षक घटना मेरी आँखों के सामने हुई। बल्कि मैं खुद ही इस पुलिस वाले की ज्यादती का शिकार होने से बाल-बाल ही बची। मैं अपनी सहेली से मिलने स्कूटी से जा रही थी तभी 100 न. हेल्पलाइन की पीसीआर गाड़ी बगल से गुजरी। इसमें ड्राइविंग सीट पर एक खाकी वर्दी वाला सवार था जो घोषित रूप से जनता का मददगार था। उसने भरी ट्रैफिक में अपनी गाड़ी को पूरी स्पीड में मेरी गतिशील स्कूटी के ठीक सामने लाकर अचानक घुमाने की कोशिश की। मैंने झट से ब्रेक लगाकर अपनी स्कूटी को जैसे-तैसे बचा लिया। लेकिन अगले ही क्षण उसने बिना हार्न बजाये भीड़ को चीरते हुये यू-टर्न लेने की कोशिश की और अपने सामने  से गुजर रहे एक बाइक सवार को ठोक दिया। बाइक सवार गिर पड़े।

पीछे से आ रही एक दूसरी बाइक भी गिरते-गिरते चिचिया कर संभल गई। चूँकि बाइक वाले नयी उम्र के लड़के थे इसलिये मुझे लगा कि कुछ नोंक-झोंक होगी और मामला गंभीर हो जाएगा। बाइक वाले युवक ने अपनी बाइक को तेजी से उठाते हुये बहुत गुस्से में पीछे पलट कर देखा भी। लेकिन पुलिस की गाड़ी पाकर उसके चेहरे का पारा जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा था उससे दोगुनी रफ़्तार से नीचे गिर गया। पुलिसवाले को मैंने एक बार ऊँची आवाज में बताने की कोशिश भी की- ''आप सड़क और नियम के साथ जबरदस्ती कर रहे हो।" लेकिन वहाँ मेरी बात वह बन गयी जिसे नक्कारखाने में तूती की आवाज कहते हैं।

मुझे ऐसा लगा वो महाशय अपनी गाड़ी का हूटर बजाते और बाइक वालों को घूरते अपनी सीट पर बैठे ट्रैफिक नियम के साथ छेड़छाड़ का आनन्द उठा रहे थे। सड़क और उसके नियमों के साथ पुलिस द्वारा किया गया ऐसा बर्ताव क्या किसी अतिक्रमण से कम है? यह देखकर मैं तो सन्न रह गई कि इतना खतरनाक स्टंट करने और बाइक गिरा देने के बाद भी उस पुलिस वाले के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी और सहम कर अपराध बोध से ग्रस्त होना उन लड़कों के हिस्से में आया।

मुझे लगा था कि लड़को में अभी नया खून हैं; जरूर अपना हिसाब वर्दी वाले रंगबाज से चुकता कर ही लेंगे पर मैं गलत थी। मैंने देखा बाइक पर सवार नौजवान लोगों का गरम खून ऐसा ठंडा हुआ कि मानो उसे नार्मल करने के लिए सिंकाई करनी पड़ेगी। वे अपनी बाइक जल्दी से साइड में लगाकर काठ बन गये नजर आ रहे थे।

ऐसी दुर्घटना अगर किसी आम नागरिक की गाड़ी से हुई होती तो मामला इतना आसान न होता और यही पुलिस उसे अपने कायदे से निपटा भी रही होती। अतिक्रमण का मैंने कभी समर्थन नहीं किया। पर ऐसे अतिक्रमण का क्या किया जाना चाहिये जिसका संबंध दूसरों के जान-माल की हानि से हो, और नुकसान पहुँचाने वाले स्वयं कानून के रखवाले हो।

अभी बीते दो दिन पहले की बात है एक दरोगा साहब को अखिलेश सरकार ने इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि उन्होंने फुटपाथ पर बैठे किसी गरीब की टाइपराइटर अपने पैरों से मार-मार कर तोड़ दिया। अतिक्रमण के जुर्म में अगर दरोगा जी ने उसे वहाँ से हटाने के लिए साम-दाम दण्ड-भेद का फार्मूला अपनाया तो उन्हें कौन रोक सकता था? उन्हें तो ऐसे ही बहुत से अधिकार मिले हैं जो वे बिना किसी के इजाजत के खुद प्रयोग कर सकते हैं। यह तो भला हो खबरिया चैनेलों और सोशल मीडिया का जो सरकार के ऊपरी माले तक खबर पहुँच गयी और मुख्यमंत्री जी ने संवेदनशीलता का परिचय देकर उस आदमी की मज़बूरी, गरीबी और लाचारी पर तरस खाते हुये आनन-फानन में उसका टाइपराइटर नया कर दिया।

सुना है उसके उत्पीड़न की क्षतिपूर्ति के लिए एक लाख की आर्थिक सहायता भी दी गयी है। यह कदम आम जनमानस के लिये जरूर राहत भरा होगा।  पर मेरे लिये यह टोकेनबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है। फुटपाथ छेंककर बैठे दूसरे लोग सोच रहे होंगे की काश दरोगा की लात उनके ऊपर भी पड़ गयी होती तो मुख्यमंत्री की राहत आ जाती। सीएम साहब ने दरोगा जी को निलंबित कर उस गरीब को नये टाइपराइटर से उपकृत कर जनता के दिलों में अपनी जगह तो बना ली! पर बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि अतिक्रमण और विशेष तौर पर पुलिसिया अतिक्रमण से निजात पाने के लिये क्या यह सरकार कोई पुख्ता प्रबन्ध कर पाने में सक्षम भी है? क्या इसकी इच्छाशक्ति भी दिखायी देती है?

(रचना त्रिपाठी)