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Thursday, August 8, 2019

गुलाम हो या आजाद?

तू आजाद बताता खुद को
नबी गुलाम ये बात बता।
कश्मीरी को कहे बिकाऊ
पर खुद की औकात बता।।

किया गुलामी खानदान का
जो नेहरू ने छोड़ा था।
घाटी से ना जीत सका
तू सबसे बड़ा भगोड़ा था।।

बेच दिया तूने जमीर जब
पाकिस्तानी हाथों में।
देशद्रोह की झलक दिखी है
तेरी ठरकी बातों में।।

कितनी कीमत में तूने
बेची है अपनी आजादी
ऐ गुलाम पाकी पिठ्ठू
कितने में पार्टी बिकवा दी

राजनीति के व्यापारी
तेरी कुछ ऐसी संगत है।
क्रय-विक्रय की राजनीति में
तू सबसे पारंगत है।।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। अरे, अभी इस समय कौन हो सकता है...! दुपट्टा सम्हालते हुए दरवाजा खोला तो शौहर खड़े थे, आज कुछ अलग मुस्कान लिए हुए। चकित होकर पूछा– क्या हुआ, आज इतनी जल्दी?

शौहर ने उसे हौले से पकड़कर अंदर आने का रास्ता बनाया। वह अचकचा कर पीछे हट गयी। सामने वाली भाभी जी एकटक जो देख रही थी। चट दरवाजा बंद कर अंदर की ओर मुड़ी तो इरफान मियां गुनगुना रहे थे– "आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है"

ऑफिस बैग सोफे पर पटका जा चुका था। उसकी दोनों बाहें फैली हुई शायरा की ओर बढ़ीं और इरफान ने उसे नजदीक खींच के उसकी कमर को दोनों ओर से जकड़ लिया– "जी करता है आज तुम्हारी आंखों में आँखे डाले यूँ ही देखता रहूँ।"

शायरा– माजरा क्या है? आज अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे। तबियत तो ठीक है?

इरफान– नहीं रे पगली, अब मैंने सोच लिया है। जो भी जिंदगी अल्लाह ने बख्शी है उसे प्यार से जीकर ही गुजारना है। सच्चे दिल से कह रहा हूँ।

जी-न्यूज पर शोर-शराबे वाली बहस चल रही थी। एक मौलाना जी चीख रहे थे– आप लोग तो ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे कोर्ट ने तलाक का अख्तियार एकदम से खत्म कर दिया है। असल बात कुछ और ही है...

शायरा ने रिमोट उठाकर टीवी बन्द कर दिया और इरफान के सीने से लग गयी– सच में प्यार करोगे मुझे? ऊपर की जेब मे रखी कलम उसके गाल पर चुभ रही थी। इरफान मौन होकर कुछ सोच रहा था।

शायरा ने जेब से कलम निकालकर किनारे रख दी,  "दो दिलों के बीच में इस पेन का क्या काम? सुना नहीं है, फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए"
"अरे यार, वो मौलाना जी क्या कह रहे थे? टीवी क्यों बन्द कर दिया? जरा रिमोट देना..."

"ओहो, तो ये बात है..!" अपनी कमर से उनका हाथ झटकते हुए मुंह बिचकाकर बोली– "बड़े आये, आज फिर जीने की तमन्ना है ...हुँह! कल तक क्या घास छील रहे थे... अभी काहें मरने का इरादा बना रहे हो? अभी तो सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगी है। बाकी द्वार तो खुल्ले ही पड़े हैं, ...वो भी आजमा लो तो मरिहो"

टीवी पर बहस जारी थी– तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-अहसन, निकाह-ए-हलाला, तलाक-उल-सुन्नत...

शायरा ने चुपचाप सोफे से बैग उठाया, कलम को शर्ट की जेब में वापस रखा और बोली– "कपड़े बदल लो चाय लेकर आती हूँ।"

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, May 13, 2015

आस्तीन में मुंहनोचवा

सन् 2002-03 की बात है, जब हम लोग नेपाल से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिला मुख्यालय की सरकारी कालोनी में रहते थे। उस समय पूरा शहर 'मुंहनोचवा' की मार से आजिज था।

आये-दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता था, आज यहाँ देखा गया तो कल वहाँ। कोई कहता कि पंजो वाला बड़ा जंतु है, नाखूनों से वार करता है। तो कोई उसे बड़ी टांगों और लंबी पूछ वाला कीड़ा बताता था। अखबार का एक पूरा पेज मुंहनोचवा से प्रताड़ित लोगों की तस्वीरों से भरा रहता था। इस विचित्र हमलावर का प्रहार अक्सर शरीर के खुले हिस्से में होता था। जैसे- हाथ, पैर और गर्दन का ऊपरी हिस्सा... घाव देखकर ऐसा लगता था मानों कोई  किसी साजिश के तहत रात में लोगों के ऊपर तेज़ाब फ़ेंक कर भाग जाता हो। ऐसा अखबारों में पढ़ा था। मुंहनोचवा की खोज का सिलसिला भी महीनों अख़बारों में जारी रहा। पर ठीक से किसी को मालूम नहीं चला कि वह देखने में कैसा था...?

उस दिन सुबह से शाम हो गई थी पर हमारी पड़ोसन मिसेज शर्मा नीचे नहीं उतरीं। दिन में करीब एक से दो बार बड़े करीने से पतली प्लेट्स में साड़ी पहने... कभी अपने दाहिने हाथ की तर्जनी में घर के दरवाजे की चाभी की रिंग डाले, उसे गोल गोल घुमाते हुए तो कभी ऊन-सलाई के साथ अपनी बुनाई का काम लिए वे नीचे सड़क पर निकल पड़ती थी। अक्सर सिर ऊपर उठाकर मेरी बालकनी की तरफ देखतीं और मुझे भी आवाज लगातीं- " जुनजुन की मम्मी नीचे आइये, चौकड़ी जमाते हैं।"

मेरी भी आदत सी बन गई थी - साहब लोगों के ऑफिस या कहीं बाहर जाने के बाद मुहल्ले की सभी गृहिणियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाते हुये ठहाके मारने की। मिसेज शर्मा के हाथों स्वेटर की बुनाई की चर्चा तो पूरी कालोनी में थी। अक्सर कोई न कोई स्वेटर की डिजाइन सीखने के बहाने हमारी चौकड़ी में साथ देने पहुंच ही आता था। फिर तो दो-तीन घण्टे कैसे बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता।

उस दिन उनके घर का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन वे दिख नहीं रहीँ थीं। मुझसे भी रहा नहीं गया। मैं जायजा लेने अंदर चल पड़ी। भाभीजी...! आवाज लगाते उनके ड्राइंग रूम से होकर भीतर वाले कमरे  की तरफ बढ़ी।

"आप भी यहीं आ जाइये" किचेन की तरफ से आवाज आई। देखा तो पकौड़ियाँ बनाने के लिए प्याज काट रही थीं। मैंने पूछा- "कोई आने वाला है?"
"नहीं तो!"
"फिर इतनी सारी तैयारी किसके लिए?"
"आज चुन्नी के पापा ऑफिस से घर जल्दी आ गये थे। चाय के साथ पकौड़ियाँ भी बनाने को बोले हैं।"
"ओय-होय... तो ये बात है... तभी मैं कहूँ आज आप इतनी व्यस्त क्यूँ है जो नीचे नहीं उतरीं?"
" ऐसी कोई बात नहीं... सुबह से मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी"
"ओहो, इसीलिए भाई साहब घर जल्दी आ गये होंगे...? पर यह भी क्या खूब रही! जब तबियत ठीक नहीं थी तो आपको आराम करना चाहिए था और आप हैं की पकौड़ियों में लगीं हैं...? इससे तो अच्छा था कि वो ऑफिस में ही रहते"

मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह भावुक होकर अप्रत्याशित आवेश में आ गई। मेरी तरफ पलटकर बड़ी तेजी से बोली- " उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है...?" बुदबुदाते हुये... उनकी आवाज फिर कुछ ऐसी आई- "मरती रहो पर करती रहो"

मेरी नजर  उनके चेहरे पर टिक गयी थी। जो गोरा-चिट्टा, चमकदार और गुलाबी नाजुक चेहरा देखकर बहुतों को रश्क हो जाता था उसकी हालत देखकर  मैं चौक पड़ी।
"अरे, ये क्या! आज फिर वही काला धब्बा...हो न हो भाभी जी, आपके घर में भी मुंहनोचवा है!"
अब मुंहनोचवा को लेकर मेरी उत्सुकता और चिंता बढ़ गई थी। मैं पूरी तरह विश्वास कर चुकी थी कि यह प्राणी काल्पनिक नहीं है। उनका बिगड़ा चेहरा देखकर मैंने मन में सोचा शायद इसीलिए लोगों ने उसका नाम मुंहनोचवा रख दिया हो।

मैं उनसे ठिठोली करने पर उतर आई- "अब पता चला इस मुएं मुंहनोचवा का राज... इसका टारगेट भी ख़ूबसूरत चेहरे ही हैं।" लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अनमनी सी थी। सच में दुःखी लग रही थीं।

तत्काल हमने भाव बदला और उन्हें अलर्ट किया- "देखिये, आप सावधान हो जाइए! रोज रात में मच्छरदानी लगाकर सोया करिये। मैं कुछ दिनों से देख रही हूँ कि आपके चेहरे का एक दाग अभी ठीक नहीं होता तबतक दूसरा धब्बा फिर उग आता है। हो न हो यह मुंहनोचवा का ही प्रकोप है! और सुनिये, अगर आपको कहीं दिख जाय तो मुझे भी बताइयेगा। मैं भी उसे देखना चाहती हूँ। फिर हम दोनों अखबार वालों को जीते-जागते सबूत के साथ उस मुंहनोचवा के बारे में बताएँगे। सच में भाभी, फिर बड़ा मजा आएगा!"

हमेशा की तरह उनके चेहरे की चमक और बिंदास ठहाके वाली हंसी आज गायब थी। अचानक मेरे सामने एक अदद मुस्कान बनाये रखने की उनकी कोशिश भी नाकामयाब हो रही थी।
मेरे प्रश्नवाचक चेहरे की ओर आँख उठाकर उन्होंने देखा तो भीतर दबाया हुआ दर्द जुबान पर आ ही गया।
पीड़ा से भरी मुस्कान को सहेजकर धीरे से बोली-  "...और मुंहनोचवा जब मच्छरदानी के भीतर ही मौजूद हो तब क्या करेंगे...?"
इतना सुनकर कुछ देर तक मैं सन्न रह गई...! सोच नहीं पा रही थी की क्या बोलूँ। उनकी पीड़ा पर मुझे अबतक मजाक सूझ रहा था। अब ग्लानि ने घेर लिया।
मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा-
"यह तो बलात्कार है...?"
"नहीं-नहीं, यही उनका प्यार है...!" उनके चेहरे की वितृष्णा साफ़ झलक रही थी।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, April 15, 2015

बुरा होना अच्छा है

आपको नहीं लगता कि एक स्त्री को पूर्ण बनाने में जितना जरूरी उन प्राकृतिक गुणों जैसे- ममता; प्यार; धैर्य, सहनशीलता, त्याग और साहस का होना है, उतना ही जरुरी उन्हें खुद को सुरक्षित रखने के लिये अपने अंदर कुछ सांसारिक गुणों का भी समावेश करना है...? थोड़ी नफरत, थोड़ा क्रोध, थोड़ी लालच, थोड़ी चालाकी, कुछ क्रूरता और ढेर सारी ताकत! यह सब उन्हें इसी जमाने से सीखना होगा !!!

याद करिये, जब प्यार करने और अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करने के जुर्म में पंचायत के ग्यारह सदस्यों ने बारी-बारी से उसकी आबरू लूटी थी तो कहाँ थी उसकी ये अनमोल निधियां जो कथित रूप से एक बेहतर संसार की रचना करती हैं। ये जो सद्गुण एक अच्छी स्त्री में रचे-बसे हैं... इनमें से कोई भी तो उसका साथ देकर उसकी रक्षा के लिये सामने नहीं आये। उसका धैर्य; उसकी लज्जा; उसकी शाहनशक्ति; उसका प्रेम; उसकी ममता और वह करुणा भी; जो इस समाज के ढांचे को मजबूत बनाये रखने के लिये कथित तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्या प्रकृति प्रदत्त जन्मजात उसके ये सभी गुण इस समाजिक बर्बरता के आगे निरुत्तर नहीं हैं…?

जब यहाँ स्त्रियों को उनके पति की मृत्यु के पश्चात् उनकी चिता के साथ ही सती बनाने के लिए जबरदस्ती जलाया गया तब क्या वहां उसका यह ईश्वरीय गुण "साहस" उसकी सुरक्षा में ढाल बनकर खड़ा हुआ... काश उस समय उनके अंदर हिम्मत के अलावा हथियार उठाने की शक्ति भी होती तो उस समय यह प्रथा जन्म ही न लेने पायी होती।

16 दिसंबर की रात जब निर्भया उन दरिंदो द्वारा नोची जा रही तो क्या कर रही थी उसकी 'सहनशक्ति'... जो उसे टूटकर बिखर जाने से रोक न सकी? अगर इस सहनशक्ति के साथ उसके पास आर्थिक क्षमता भी होती तो उतनी रात में उसके पास खुद की गाड़ी; अपना ड्राइवर और अपनी सुरक्षा के लिये बॉडीगार्ड भी होता तब क्या उसके सामने यह नौबत आती...अगर आई भी होती तो क्या वे दरिंदे वहीं के वहीं ढेर न हो गये होते...?

जब कानपुर की ज्योति अपने पति की साजिश के तहत चाकुओं से गोद-गोद कर छलनी की जा रही थी उस समय भी तो उसका "धैर्य" जवाब दे गया... आपको नहीं लगता कि उसने भी समय रहते पहले ही थोड़ा अधीर होना सीखा होता तो उस दिन अपने पति के छलावे में नहीं आयी होती... और उसके जीवन की रौशनी भी आज हमारे बीच ही कहीं दीप्तिमान होती...!

और तो और, हमारी न जाने कितनी बहू-बेटियां माँ बनने के बाद भी जब दहेज के लोभ में जलायी जा रही थीं उस समय यह "ममता" और "त्याग" की निधियाँ किस कोने में दुबकी पड़ी हुईं थीं… जो उनको जलता देख थोड़ी भी पिघल न सकीं... अपनी सुरक्षा के लिये अगर इन्हें थोड़ी नफरत; थोड़ा क्रोध और थोड़ी लालच भी सीखनी पड़े तो क्या बुरा है...?

लखनऊ के निकट मोहनलाल गंज में जब एक महिला के साथ दुष्कर्म कर हत्या के बाद उसका लहू-लुहान नंगा बदन पूरी मीडिया में घण्टों तमाशा बनाया गया तब क्या  इस प्रकृति की "लज्जा" भी तार-तार न हुई...? ऐसे में अगर स्त्री थोड़ी बेहयाई ही सीख ले तो कम से कम इस "लज्जा" के लुटने के भय से कुछ पल मुक्त होकर जी तो सकेंगी...!

जहां कई दशकों से एक माँ की कोंख में इस दुनियां से बेखबर एक लड़की को ख़त्म करने की साजिश रची जाती रही हो और न जाने कितने तरह के औंजारों से उसके मोम से नाजुक बदन पर लगातार प्रहार किये गए हों उस समय क्या उसे "करुणा" की भीख भी मिलती है...? ऐसे में हम स्त्रियों को क्या सिर्फ भगवान् के भरोसे ही बैठे रहना काफी है...? उन्हें थोड़ा सा ज्ञान और गुण इस दुनिया और समाज से सीखकर अपनी सुरक्षा खुद से कर सकने के लिये अपना हथियार भी पहले से तैयार नहीं रखना चाहिये...?

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 10, 2014

नरभक्षी को फाँसी देने में विलंब ठीक नहीं

                                                                    नरभक्षी                                                                                           नरभक्षी डेली न्यूज

निठारी नरभक्षी कांड में अपराधी सुरेंद्र कोली को आखिरकार फांसी की सजा देने का समय आ गया मगर सालों बाद; जब इस समय तक अधिकांश लोगों के दिलों-दिमाग में इस जघन्यतम अपराध की परछाईं मात्र ही शेष बची होगी। इसे इस देश की लचर कानून व्यस्था की लेटलतीफी कही जाय या उस नरपिशाच की क्रूर हिंसा के शिकार बने बच्चों के परिवार वालों के प्रति विलंबित न्याय जो वंचित न्याय के समान है। उनकी आंखे तो अभी तक अपने मासूमों की बोटी-बोटी काटकर खा जाने वाले राक्षस को सजा दिलाने के इंतजार में पथरा ही गयी होंगी।

बीते सालों में हमारे समाज में जितने भी अपराध हुए उनकी सुनवाई भी कुछ इसी रफ्तार से होती रही है। यही कारण है कि समाज में आपराधिक प्रवृतियां बढ़ रही हैं। अपराध तो हर एक दिन, हर घंटे, हर मिनट पर हो रहा है। लेकिन दोषियों के पकड़े जाने के बाद उनपर कानूनी कार्यवाही की लेटलतीफी का नतीजा है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए समाज को सही संदेश नहीं मिल रहा है। आज भी इस तरह की घटनाओं से अनजान बहुत से निर्दोष और भोले-भाले बच्चे सामाजिक अपराध के शिकार हो रहे हैं।

माना न्याय का अपना सिद्धान्त है कि- सौ अपराधी सजा पाने से भले ही छूट जाँय मगर एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। यह बिल्कुल सही है। लेकिन जब सजा के पात्र अपराधियों को कोर्ट से तारीख पर तारीख मिलने लगे तो कहीं न कहीं वे अपने को उतना कसूरवार नहीं मानते जितना कि वे वास्तव में होते हैं। यह तंत्र ऐसे काम करता है कि अपने को निर्दोष साबित कर लेने की या कम से कम अंतिम फैसला दशकों तक टाले रखने की उनकी आशा बनी रहती है और वे इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। कभी-कभी तो उन्हें महंगे वकीलों की दलीलों से सफलता भी मिल जाती है। अपनी सफलता पर वे खुलेआम इसी समाज में अपनी बेहयाई का गुणगान भी करते रहते है।

आर्थिक अपराधों के मामले में तो इसके ऐसे उदाहरण हैं कि अपराधी ने भारी अपराध करने के बाद लगभग पूरी जिन्दगी सत्ता के शीर्ष पदों का मजा लिया और दोषसिद्ध हो जाने के बाद जेल चले जाने के बावजूद राजनैतिक अखाड़े में विधिवत्‌ दाँव लगाता रहा और अपने उम्मीदवारों को जीत भी दिलाता रहा। जाहिर है कि जनता की स्मृति का लोप बहुत आसानी से हो जाता है।

इतने सालों बाद अगर इस अपराधी को जघन्य अपराध में फांसी की सजा मिली है तो कहीं न कहीं वो ऐसे लोगों के सामने जो इस प्रकरण से पूरी तरह से परिचित न हो, दया का पात्र भी बन सकता है। खासतौर पर ऐसे युवाओं के सामने जिनकी उम्र उस घटना के समय सिर्फ आठ से दस वर्ष रही होगी। आज की तारीख में वे सोलह से अठारह की उम्र में होंगे। इन्हें उन दिनों की खबरें याद नहीं होंगी जो कठोर से कठोर व्यक्ति का खून जमा देने वाली थी। उन्हें पता नहीं होगा कि कितने मासूमों के शरीर से काटे गये अंगों के टुकड़े उस आदमखोर के किचेन की खिड़की के पीछे बहने वाले नाले से बरामद किये गये थे।

आज तो सुरक्षाकर्मियों से घिरा हुआ फाँसी की सजा से भयाक्रान्त दिखता सुरेन्द्र कोली ही अखबारों के मुखपृष्ठ पर दिख रहा है। दीन-हीन और कातर। मुझे डर है कि उसकी रक्षा के लिए चन्द वकीलों के साथ-साथ मानवाधिकारवादी धंधेबाज दस्ता भी न कूद पड़े। काश सुप्रीम कोर्ट द्वारा बढ़ायी गयी फाँसी की मियाद एक सप्ताह से आगे न बढ़े।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, June 25, 2014

रक्षक ही बने भक्षक

काश हमारे पास भी इतनी हिम्मत होती कि हम उस पुलिस वाले के नाजायज तरीके से बाइक उठा ले जाने पर पुलिस चौकी के सामने धरना ही दे सकते! लेकिन हमें केजरीवाल बनने के लिए अभी कई जनम लेने पड़ेंगे। ऐसे धरने का हश्र देखकर तो कोई समर्थक भी नहीं मिलेगा।

हमारे घर आए हुए एक संबंधी ने अपनी बाइक ऍपार्टमेन्ट बिल्डिंग के नीचे खड़ी की थी जिसे एक पुलिस वाला रात में करीब दस से ग्यारह बजे के बीच उठा ले गया। सुबह बाइक गायब देखकर सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड से हमने पूछा - “बाइक कहां गई..?”

उसने बताया- “पुलिस वाले आए थे, ले गये।”

“तुमने रोका नहीं?” मैंने व्यग्र होकर पूछा।

“हमने रोका,  मगर वे बोले… पूछेंगे तब बताना कि पुलिस चौकी पर आकर ले जाएं।”

“लेकिन वे बाइक को ले कैसे गये? चाभी तो हमारे पास है!” मेरे संबंधी ने आश्चर्य व्यक्त किया।

“उनके पास एक चाभी थी उसी से स्टार्ट हो गयी तो लेकर चले गये” - गार्ड ने बताया।

“क्या बाइक गलत तरीके से पार्क की गई थी?” मैंने गार्ड से पूछा।

“नहीं तो, सड़क के इसी किनारे खड़ी थी जहां रोज बहुत सी गाडि़याँ खड़ी होती हैं। यहाँ और भी गाडियां पहले से खड़ी थीं जिसमें कुछ फोर-व्हीलर्स भी थीं।”

वह तो हम भी रोज देखते हैं। जिन गाड़ियों ब्लैक फिल्म भी लगी रहती हैं वह उन्हें नहीं दिखाई देता; “लेकिन सिर्फ हमारी बाइक ही क्यों ले गये, वह भी बिना कसूर बताए?”

गॉर्ड ने बताया कि उस सिपाही ने और भी गाड़ियों में अपनी चाभी लगाने की कोशिश की लेकिन लगी नहीं। उसी बाइक में चाभी लग गयी तो लेकर चले गये।

इसका मतलब तो यह हुआ कि सिपाही के रूप में वह कोई बाइक चोर था जो टोक दिये जाने पर सिपाही की भूमिका निभाने लगा। फिलहाल इस बार तो गॉर्ड ने देख लिया था। अगर उस गाड़ी को ले जाते किसी ने नहीं देखा होता तो हम यही समझते कि गाड़ी चोरी हो गयी। उसके बाद हम पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते रहते। एफ़.आई.आर. दर्ज कराने में भी पसीने छूट जाते।

ऐसे में क्या उस पुलिस वाले के ऊपर एफ.आई.आर. नहीं दर्ज होनी चाहिए?

मै तो पुलिस की इस हरकत पर आग-बबूला थी। मगर जिनकी बाइक थी उन्होंने कहा- “हम चाह कर भी इस समय कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि वे हमारे खिलाफ कोई भी चार्ज लगा देंगे, फिर हमें महंगा पड़ जाएगा इनसे बहस करना”

वे अपनी गाड़ी लेने पुलिस चौकी पर गये तो उस सिपाही ने उनसे गाड़ी का कागज मांगा जो उनके पास मौजूद था। जब कागज में कोई कमी नहीं मिली तो उसने देर रात तक वहां गाड़ी नहीं खड़ी करने की हिदायत देते हुए वापस ले जाने की अनुमति दे दी। लेकिन जब इन्होंने बाइक स्टार्ट किया तो पता चला कि उसी शाम फुल करायी गयी टंकी का सारा पेट्रोल गायब था। वे सिपाही से तेल निकाल लेने की बात पूछ बैठे। इसपर पुलिस वाला भड़क गया।

“आप हम पर तेल चुराने का इल्जाम लगा रहें हैं! एक तो आप लोग रात-भर गाड़ी लावारिस छोड़ देते हैं। अब सुबह आ रहे हैं.. मैं रातभर बाइक की रखवाली के चक्कर में सोया नहीं।” उसने तैश में जेब से रूपये निकाले, “आज रात छ: सौ कमाया था; ये लीजिए दो सौ रुपए अपने पेट्रोल का दाम। लेकिन बाइक यहीं छोड़ जाइए। अब चालान करूंगा। आप इसे कोर्ट से छुड़ा लीजिएगा। जब कोर्ट के चक्कर काटेंगे तब सारी अकड़ हवा हो जाएगी।”

इसके बाद बाइक छुड़ाने के लिए इन्होंने कितनी मिन्नते की और कैसे सफल हुए इसकी कल्पना ही की जा सकती है। यह सब एक आम आदमी को दहशत में डालने के लिए काफी है।

अभी करीब दो महीने पहले की बात है। हमारी बिल्डिंग के गेट के सामने एक नयी चमचाती हुई बड़ी और महंगी गाड़ी खड़ी हुई तो घंटो लावारिस हालत में पड़ी रही। बिल्डिंग के लोगों को पार्किंग बेसमेन्ट से गाड़ियाँ निकालने में परेशानी होती रही। तंग आकर बिल्डिंग के ही एक सदस्य ने गेट पर से वह गाड़ी हटवाने की कोशिश की तो अचानक शराब के नशे में धुत्त चार-पांच लड़के प्रकट हो गये और उन्हें बुरी तरह मार-पीट कर उनकी जेब से रुपए और उनकी चेन भी छीन ले गये। बिल्डिंग का गार्ड जब बीच-बचाव को दौड़ा तो उसे भी मार खानी पड़ी। वह क्रूरता का यह खेल बेचारगी में देखता रहा। जबतक दूसरे लोग आवाज सुनकर नीचे आये तबतक वे सभी भाग निकले, लेकिन उनकी गाड़ी को कुछ लोगों ने घेर कर पंचर कर दिया। इसके बाद सौ मीटर दूर स्थित पुलिस चौकी से पुलिस वाले भी मौके पर पहुँच गये।

हम लोगों ने उम्मीद तो यही किया था कि शायद अब वे गुंडे-लुटेरे पकड़ लिए जाएंगे क्योंकि उनकी गाड़ी पुलिस के हाथ में थी। लेकिन अगले दिन पुलिसवालों ने उन अपराधियों से इस पीड़ित व्यक्ति का समझौता करा दिया। निर्मम पिटायी की भरपाई कुछ हजार रूपयों से करा दी गयी। पुलिस ने लेन-देन करके उसकी गाड़ी भी सुरक्षित उसके घर तक पहुंचवा दिया। उन अपराधियों की गाड़ी हमारी आंखों के सामने ही पुलिसवालों ने यह कहकर जाने दिया कि पीड़ित द्वारा एफ.आइ.आर. वापस ले लिया गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह गाड़ी किसी बड़े नेता की थी और वे गुंडे उनके चमचे थे।

इस पुलिस चौकी की नाक के नीचे अंग्रेजी शराब की दुकानें चलती हैं जिसके आसपास सड़कों पर बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ घंटो खड़ी रहती हैं। काले शीशे चढ़े हुए। दूसरे पीने वाले अपनी बाइक की सीट पर ही चियर्स करते रहते हैं। पुलिस को और चाहिए ही क्या? कुछ महीनों पहले नुक्कड़ पर एक ‘बार’ भी खुल गया है। यहाँ पुलिस हमेशा गश्त पर रहती है लेकिन सबकुछ बदस्तूर जारी है। वे खाली हाथ राउंड पर आते हैं और अपनी ‘जेबें’ हरी-भरी करते चले जाते हैं। यह बात तब स्पष्ट हो गई जब हमारे संबंधी अपनी बाइक लेने पुलिस चौकी पहुँचे।

अब कहाँ गुहार लगाये बेचारा आम आदमी?

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, June 17, 2014

उत्पीड़न विपर्यय

मेरे अपार्टमेन्ट की फ़्लैट ओनर्स सोसायटी ने जबसे मुझे इसकी जिम्मेदारी दी है तबसे मुझे एक उलझन ने आ घेरा है। महीनों हो गया बिल्डिंग के स्वीपर से यह कहते कि- सफाई अच्छे से करो; चारों तरफ गदंगी फैली रहती है; झाड़ू लगाते हो मगर कूड़ा उठाकर फेंकते नहीं; वहीं कोने में छोड़कर चले जाते हो; तेज हवाएं चलने पर फिर से कूड़ा इधर-उधर बिखर जाता है; लेकिन कोई सुधार नहीं है। वह एक तरफ से झाड़ू लगाता और दूसरी तरफ मुंह में दबाए तंबाकू और सुपारी की ‘पीक’ बिल्डिंग की दीवार पर थूक देता। एक दिन ऊपर वाले फ्लैट में रहने वाली भाभीजी ने उसे दीवार पर थूकते हुए देख लिया। उन्होंने जब इस हरकत पर आपत्ति जताई तो वह तुनक कर झाडू-पोछा फेंक कर काम छोड़ने की धमकी देने लगा। कहने लगा- “हम काम ऐसे ही करेंगे आपको हमारा काम पसंद नहीं आता तो किसी और को रख लीजिए।”

उसने यह हरकत मेरे सामने भी की। मैने उससे कहा- पहले तो दीवार की सफाई करो उसके बाद अगर काम छोड़कर जाना चाहो तो जा सकते हो। इतना सुनते ही उसने दीवार की सफाई तो किया ही मगर काम छोड़कर नहीं गया। फिर भी उसके काम करने का अंदाज वही है जिसमें कोई सुधार नहीं आ रहा है। कभी झाड़ू लगाता है तो पोछा नहीं और अगर पोछा लगा देता है तो उसके बाद दो-चार दिन तक झाडू नहीं लगाना चाहता। अभी इसे आये हुए तीन महीना हुआ है। पहले वाले स्वीपर को इसलिए निकाला था कि वह रेग्युलर काम पर नहीं आता था।

एक दिन हमने इससे बिल्डिंग की ठीक से सफाई करने की बात गंभीर होकर कहा तो वह फिर से भड़क गया और बोला- “आप मेरा हिसाब कर दीजिए। मैं आपके अनुसार काम नहीं करुंगा।” हमने भी कह दिया- ठीक है, काम छोड़ ही दो। तब वह इस बिल्डिंग के एक वरिष्ठ सदस्य के पास फरियाद लेकर पहुँच गया। मैं भी बुलायी गयी। यह उनसे कहने लगा – “हम तो रोज-रोज आते हैं और जब भी आते हैं इनको नमस्कार भी करते हैं और ये हैं कि जब देखो तब ‘यहां नहीं झाड़ू लगा’ तो ‘वहां नहीं पोछा लगा’ करती रहती हैं।”

हमने मुस्कराते हुए कहा कि- “हमने तुम्हें सैल्यूट मारने के नहीं रखा है; तुम्हें सफाई के लिए रखा है तो सफाई की बात ही करेंगे। तुमसे पूजा-पाठ कि बात तो करेंगे नहीं।” इतना सुनते ही उसने तपाक से मेरी जुबान से निकले हुए शब्द को पकड़ लिया और बड़े तैश में बोला- “हमको हमारी जाति मत बताइए हम भी जानते हैं कि हम किस जाति के हैं; लेकिन हर समय हमारी जाति उघटी जाय यह सही नहीं है।” इतना सुनते ही मैं हतप्रभ रह गयी। लगभग डरते हुए बोली- “देखो तुम अपना महीने का हिसाब करवा लो, न तो तुम यहाँ की सफाई का कार्य करने के लिए मजबूर हो और ना ही मै तुमसे ही काम लेने के लिए प्रतिबद्ध हूं।” इतना कहकर मैं वहाँ से तत्काल लौट आयी।

इसके बाद भी वह आज बहुत अच्छे से काम करके गया; लौट कर अपनी तनख्वाह लेने भी नहीं आया है। सोचती हूँ क्या उसके इस अंदाज से हमें सतर्क नहीं हो जाना चाहिए। उसे पुन: काम पर रखना अपने साथ जोखिम उठाना नहीं है? जाने कब किस बात पर वह हम पर केस ठोक दे? वैसे उसने किसी केस-वेस की बात तो नहीं की लेकिन मेरा मन फिर भी इस बात से अशांत है कि अगर मैं उसे काम से निकाल देती हूं तो वह कोई ऐसा कदम उठा सकता है...।

दूसरी तरफ, क्या गारंटी है कि इसके बाद कोई दूसरा आयेगा तो वह इससे बेहतर ही होगा?

(रचना त्रिपाठी)

Monday, February 3, 2014

आजम से आजिज..

आम आदमी को तो इसका एहसास होता ही रहता है लेकिन शायद अब जानवरों को भी यह लगने लगा है कि इस देश में सेक्युलर चोला ओढ़कर साम्प्रदायिकता को भड़काने वाले नेता अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति करते हुए राष्ट्र की मूलभूत नीतियों के विरुद्ध कार्य करने में जुटे हुए हैं। यूपी के कद्दावर नेता आजमखाँ, जो मुज्जफरनगर में सांप्रदायिक दंगों के बाद अपनी सेकुलर छवि सिद्ध करने में लहूलुहान हो रहे हैं उन्हें उनकी भैंस ने भी नोटिस थमा दी है। इनकी जुबान सेकुलरिज़्म की बात करते-करते महज ‘सांप्रदायिक दुकान’ बनकर रह गयी है। इसे एक ‘तबेला’ कह लें तो गलत नहीं होगा, जहां सिर्फ मिलावटी धंधे की बात होती है।

कभी किसी ने सोचा कि आखिर उनकी भैंस गयी कहां? उस भैंस की जाति क्या थी? वह मुस्लिम थी या हिन्दू? मै बताती हूँ। हम लोगों की तरह ही भैस ने भी मंत्री जी का वह महान वक्तव्य कहीं सुन लिया था  जिसमें उन्होंने अलीगढ़ के मुस्लिमों के बीच एक मशहूर दन्तकथा के माध्यम से एक खास संदेश दिया था। तीन ठगों ने कैसे एक आदमी का बकरा ठग लिया था, अलग-अलग स्थानों पर यह बताकर कि वह बकरा नहीं गधा है। उन्होंने कहा कि संघियों ने  मुस्लिमों को यह कहकर बदनाम करना शुरू किया कि वे बच्चे ज्यादा पैदा करते हैं। देश की जनसंख्या बढ़ाने में मुसलमानों का रोल ज्यादा है। इस लांछन से बचने के लिए ये बेवकूफ़ मुसलमान बच्चों की संख्या कम करने लगे। सिर्फ दो बच्चे पैदा करने की सलाह देकर अल्पसंख्यकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है और यह वर्ग उनकी बातों में आकर बच्चे कम पैदा करने लगे हैं जिससे इस वर्ग को बहुत बड़ी हानि पहुचने वाली है। यह बात यहीं पर जाकर खत्म नहीं होती है। उन्होंने परिवार छोटा रखने की सलाह देने वालों को ‘ठग’ तक करार दिया।

वोट की राजनीति से प्रेरित इस संदेश का अर्थ अल्पसंख्यकों को समझ में आए या न आये लेकिन उनकी भैंस को यह बात समझ में आ गयी होगी कि मंत्रीजी ने अपने धन्धे को चंगा बनाये रखने के लिए भैसों के साथ भी राजनीति कर सकते हैं। दुग्ध उत्पादन में कोई कमी न आए इसके लिए वह डाक्टरों की सलाह लेकर भैसों को जल्दी-जल्दी बच्चा देने के लिए जबरिया मजबूर कर सकते हैं। एक भैंस मुर्गी तो बन नहीं सकती कि थोक के भाव से अन्डे देगी। नेता जी की इच्छा से आजिज होकर भैसों ने सोचा होगा कि अब उनके तबेले में निबाह नहीं है, जरूर वह रात में खूंटा उखाड़ भाग निकली होगी। शायद वह  मंत्रीजी के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करा देती; लेकिन उसको क्या पता था- जिसकी लाठी उसकी भैंस; कि पुलिसवाले भी उन्हीं के इशारे पर कार्य करते हैं, आखिर मनुष्य और जानवर में यही तो फर्क है। यह तो हमने भी सोचा था कि मंत्रीजी के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए लेकिन यूपी पुलिस कि हकीकत क्या है, यह तो सब जानते हैं।  मंत्रीजी  के सलाहकार अब शायद उन्हें सूअर पालने के धन्धे के बारे में बतायें। वह भी एक बार में चार से छ: बच्चे पैदा करती है।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, July 25, 2013

लोक सेवकों की आपराधिक लापरवाही

राज्य सरकार को कहें या संबंन्धित विभागीय अधिकारियों को सभी गान्धीजी के बन्दर हो गये हैं। नाक, कान और आँख सब बंद कर के बैठे हुए है। इनके दिमाग की बत्ती तब जलती है जब कोई दुर्घटना घटित हो जाती है।

poleइन्दिरा नगर लखनऊ के सेक्टर-१६ में पार्वती पैलेस अपार्टमेन्ट के ठीक सामने एक बिजली का खम्भा जो लोहे का बना हुआ है, उसका निचला हिस्सा लगभग २ फिट तक जंग लगकर पूरी तरह से जर्जर हो चुका है; और कभी भी गिर सकता है। यह खम्भा इसके आगे पीछे लगे हुए खंभों और ऊपर तने हुए तारों के मकड़्जाल के सहारे टिका हुआ है। इसकी शिकायत बिजली विभाग को हमने करीब दो हफ्ते पहले टेलीफोन के माध्यम से किया था। एसडीओ साहब ने इसे फौरन ठीक कराने का आश्वासन भी दिया। एक-दो दिन इंतजार करने के बाद हमने फिर से फोन किया। उन्होंने फिर कहा, “बस आज हर हाल में ठीक हो जायेगा”, लेकिन वह ‘आज’ आज तक नहीं आया।

pole1फिलहाल अब तो एसडीओ साहब का फोन भी नही लगता, अगर गलती से लग भी गया तो वह भूलकर भी नहीं उठाते। थक-हार कर हमने एक शिकायती पत्र सोसाइटी के  सेक्रेट्री की ओर से लिखवाकर प्रबन्ध निदेशक मध्यान्चल विद्युत वितरण निगम को भेजवा दिया है।

अब तो जब भी बाहर निकलती हूँ तो मेरा ध्यान उस खम्भे पर ही टिक जाता है। जहाँ दो-तीन गाड़िया खड़ी रहती है और रोज सुबह स्कूली रिक्शावाला वही खड़ा करके बच्चों को बैठाता है। उस खंभे को ठीक करवाने की लागत कुछ हजार होनी चाहिये। कितना बड़ा कलेजा है इन लोक सेवकों का जो कार्य हजारों में हो सकता है उसके लिए ये लाखों खर्च करने की तैयारी करके बैठे हुए है।

pole2आये दिन अखबारों में खबर छपती है कि बिजली हादसे में अमुक की जान गयी। पोल में करंट उतरा। आदि-आदि। अब शायद यहाँ से यह खबर छपने वाली है कि बिजली का तार पोल तोड़कर नीचे गिरा। जाने कितने और इस हादसे के शिकार होंगे? देखना है उसके बाद प्रदेश सरकार जान-माल के हानि की कितनी कीमत लगाती है?

कल यानी २३ ता.के अख़बार में पढ़ा कि करंट लगने से दिल्ली में एक फिल्ममेकर ‘आनन्द भास्कर मोर्ले’ जिसकी उम्र महज ३३ साल थी, कि मॄत्यु हो गयी। मॄत्यु का कारण एक दुकानदार की लापरवाही जिसने अपने दुकान में लगे ए.सी. के कम्प्रेशर का नंगा तार ही बाहर छोड़ दिया था जिसके संपर्क में लोहे का गेट आ गया। गेट खोलने के लिए छूते ही बेचारे वहीं ढेर हो गये।

यह छोटी-छोटी असावधानियाँ कितनी बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बन जाती है जिसका खामियाजा आम पब्लिक और कितने बेकसूर लोगों को अपनी जान गवाँ कर भरना पड़ता है।

क्या जनता के ये कथित सेवक नौकरशाह इस प्रकार की खतरनाक स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं जहाँ राह चलता कोई भी व्यक्ति अचानक काल के गाल में समा सकता है? क्या वास्तव में दुर्घटना घट जाने के पहले ही ऐसे लापरवाह कृत्य के लिए उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए?

(रचना)

Friday, July 10, 2009

चींटी की खटिया खड़ी, टिड्डा करता मौज... कहानी में ट्विस्ट है...!

हिन्दी भारत समूह से आने वाला एक सन्देश मिला। प्रेषक थे श्री भगवान दास त्यागी जी। इस अंग्रेजी सन्देश में The Ant and the Grasshopper नामक कहानी को आधार बनाकर भारतीय राजनैतिक समाज की एक विडम्बना को दर्शाया गया है। मुझे यह आख्यान अच्छा और सच्चा लगा। मैने यहाँ इसका भावानुवाद करने की कोशिश की है। आदरणीय त्यागी जी से क्षमा याचना के साथ मैने इसमें कुछ नयी बातें जोड़ भी दी हैं।

कथा – १

चींटी और टिड्डा एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता।

जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहकर पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह। वह खुले आकाश के नीचे ठ्ण्ड से ठिठुरता रहा और अन्ततः मर गया।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल मीठा होता है

कथा – २

एक थी चींटी और एक था टिड्डा। गर्मियों का मौसम था।  तेज गर्मी व कड़ी धूप में भी चींटी मेहनत करती, अपना घर बनाती और जाड़े के लिये भोजन जमा करती।

टिड्डा सोचता कि चींटी बेवकूफ है। वह हँसता, नाचता सारी गर्मी मजे से खेलकर-कूदकर बिता देता। जाड़े का मौसम आया। कड़ी ठण्ड में चींटी अपने सुरक्षित घर की गर्माहट में रहते हुये पहले से जमा किया हुआ भोजन का आनन्द लेती हुई सुख चैन से रहती। टिड्डे के पास न भोजन था और न ही सिर छिपाने की जगह।

ठण्ड से काँपते टिड्डे ने एक प्रेस कान्फ़रेन्स बुलाई। मास मीडिया के समक्ष इस बात की जाँच कराने की माँग उठा दिया कि आखिर चींटी को क्यों गर्म घर में रहने और पर्याप्त भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है जब कि उसके जैसे दूसरे जीव ठण्ड से ठिठुर रहे हैं और भूखों मर रहे हैं।

आपतक, ऐण्टीटीवी, एबीसी, सीएमएन, हण्डिया टीवी,  और दूसरे तमाम चैनल ठ्ण्ड से काँपते ठिठुरते टिड्डे की तस्वीरें दिखाने लगते हैं। वही बगल के फ्रेम में आरामदेह और प्रचुर भोजन से लदी मेज के साथ चींटी का वीडियो प्रसारित हो रहा है। दुनिया इस विरोधाभास को देखकर आहत है। बेचारा गरीब टिड्डा इतने कष्ट में जीने को मजबूर है? उफ़्फ़्‌ ये कैसी विडम्बना है? उसके प्रति संवेदना की लहर दौड़ जाती है।

चींटी और टिड्डा (२) चींटी के घर के सामने अन्धमति राय एक जोरदार प्रदर्शन आयोजित करती हैं।

बाधा डालेकर अन्य बहुत से टिड्डों को इकठ्ठा करके उनके साथ अनशन पर बैठ जाती हैं। उनकी माँग है कि जाड़े के मौसम में सभी टिड्डों का गर्म जलवायु के स्थान पर पुनर्वास करवाया जाय।

मायाजटी बयान देती हैं कि यह गरीब अल्पसंख्यकों व दलित टिड्डों के साथ घोर अन्याय है। मनुवादी चींटियों द्वारा किए गये अन्याय के विरुद्ध टिड्डासमाज को एकजुट रहने का नारा देती हैं।

एम-नास्टी(aim-nasty) इण्टरनेशनल, संयुक्तराष्ट्र संघ(UN- unnecessary nuiscence) , यूनीसेफ़, वर्डबैंक (bird bank) और दूसरी मानवाधिकारवादी संस्थाओं द्वारा भारत सरकार के विरुद्ध बयान जारी किए जाते हैं। एक अन्तर्राष्ट्रीय शिष्टमण्डल भारत की यात्रा पर आता है। विपक्षी सांसदों ने संसद की कार्यवाही से वाकआउट कर दिया है। वामपन्थी दलों ने मामले की न्यायिक जाँच की माँग करते हुये ‘बंगाल बन्द’ और ‘केरल बन्द’ का अह्वाहन किया। केरल में सीपीएम की सरकार ने कानून बनाकर चीटियों को गर्मी में कड़ी मेहनत करने पर पाबन्दी लगा दी जिससे चींटियों और टिड्डों में ‘गरीबी की समानता’ (equality of poverty)  लायी जा सके।

‘आलू पर स्वाद जादो’ सभी रेलगाडियों में टिड्डों के लिए निःशुल्क कोच जोड़े जाने की मांग करते है। ‘कम था एलर्जी’ दबाव के आगे झुकते हुए संसद में इस फैसले की घोषणा करती हैं कि सभी गाड़ियों में एक स्पेशल टिड्डा कोच जोड़ने के साथ ही विशेष गाड़ी भी चलायी जाएगी जिसका नाम “टिड्डा रथ”  होगा।

अन्ततः सरकार द्वारा एक न्यायिक जाँच समिति गठित की जाती है जो आनन-फानन में ‘टिड्डा विरोधी आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटागा)’ का एक प्रारूप तैयार करती है जो संसद द्वारा ध्वनिमत से पारित होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षरोपरान्त कानून बनकर जाड़ा प्रारम्भ होने से पूर्व ही लागू कर दिया जाता है।

राष्ट्र के शिक्षा मन्त्री ‘कपि से अव्वल’ ने शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में विशेष टिड्डा आरक्षण की घोषणा कर दी है।

पोटागा के प्राविधानों का उल्लंघन करने के आरोप में चींटी गिरफ़्तार कर ली गयी है। उसपर लगे आरोप सिद्ध हो जाने के फलस्वरुप अर्थदण्ड लगा दिया गया है। अपने अपकृत्य के लिए जुर्माना अदा न कर पाने पर चींटी का घर सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता है तथा उसे गरीब बेसहारा टिड्डों को आबंटित कर दिया जाता है। इस गृह वितरण समारोह के सीधे प्रसारण के लिए देश और विदेश के न्यूज चैनल जमा होते हैं।

अन्धमति राय इसे न्याय की जीत बताती हैं। आलू पर स्वाद जादो इसे समाजवाद की जीत बताते हैं। सीपीएम सरकार इसे ‘गिरे हुओं के क्रान्तिकारी उदभव’ की संज्ञा देती है।

उस क्रान्तिकारी टिड्डे को संयुक्त राष्ट्र महासभा को सम्बोधित करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया उसका सीधा प्रसारण करता है। नाटो देशों के राष्ट्राध्यक्ष धनदोहन सिंह की पीठ थपथपाते हैं:

बहुत वर्षों बाद-

चींटी ने अमेरिका प्रवास करके वहाँ सिलिकॉन घाटी में अरबों डालर की कम्पनी स्थापित कर ली है। दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल होने लगी है। जब कि भारत में सैकड़ों टिड्डे आरक्षण के बावजूद भूख से आज भी मर रहे हैं।

कड़ी मेहनत करने वाली असंख्य चींटियों के देश छोड़कर बाहर चले जाने तथा मूढ़, आलसी व अकर्मण्य  टिड्डों को सरकारी खर्च पर पालने-पोसने के परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था प्रतिगामी होती गयी है जिससे विकसित देशों का पिछलग्गू भारत आज भी एक विकासशील देश बना हुआ है।

निष्कर्ष: परिश्रम का फल अपने देश में नीचा देखना होता है।

(निवेदन: यदि यहाँ किसी कॉपी राइट का उल्लंघन निहित हो तो कृपया सूचित करें। इसे सहर्ष हटा लिया जाएगा।)

रचना त्रिपाठी

Monday, July 6, 2009

कानून की मदद करना मूर्खता है…।

चलती ट्रेन में सामान चोरी चले जाने की घटना सुनी तो बहुत थी। मेरे श्रीमान्‌ जी मुझे बार-बार सावधान रहने की हिदायत भी दिया करते थे। कभी जनरल या स्लीपर क्लास में यात्रा नहीं करने देते। हमेशा अपने साथ ही ले जाते और ले आते। लेकिन इस बार भाग्य का लिखा कुछ और ही था। image

सारी हिदायतों का अक्षरशः पालन करते हुए मैने यात्रा प्रारम्भ की थी। चेन स्नैचर्स से बचने के लिए गले में दुपट्टा लपेट कर रखा। हैण्डपर्स में सारा कीमती सामान नहीं रखा। स्टेशन पहुँचने से पहले ही टिकट ऊपर निकालकर पर्स को बड़े वाले एयरबैग के भीतर डाल दिया, नगदी और जेवर को अलग-अलग स्थान पर रख दिया और चेन बन्द करके छोटा ताला जड़ दिया। बोगी में पहुँचते ही अपनी बर्थ के नीचे लगे कड़ों से एयरबैग को बाँध दिया। इस प्रकार इलाहाबाद से पापा के घर तक की यात्रा पूरी तरह सुरक्षित रही। लेकिन वापसी यात्रा में गड़बड़ हो ही गयी।

जाते समय जो उपहार आदि मैं ले गयी थी वो तो वापसी में कम हो गये लेकिन मायके से भतीजे के मुण्डन में जो कुछ मिला वह कुछ ज्यादा ही था। कुछ कपड़ों के डिब्बे एयरबैग से बाहर ही रखने पड़े थे। एक झोले में तीन-चार गिफ़्ट पैक डालकर अलग से लटका लिया था। डिब्बे झोले से बाहर झाँक रहे थे। एयरबैग भी कुछ ज्यादा ही कस गया था। फिर भी मैने अपना हैण्डबैग यत्नपूर्वक उसी एयरबैग में डालकर चेन बन्द कर लिया था। बाकी सबकुछ वैसे ही किया था जैसे इधर से जाते हुए। लेकिन जब बनारस के आगे मोबाइल की रिंग सुनकर मेरी आँखें खुलीं और इनकी गुडमॉर्निंग का जवाब देने के बाद मैंने बेटे के बिस्कुट के लिए नीचे से एयरबैग खींचा तो आवाक्‌ रह गयी। किसी सिद्धहस्त चोर ने बड़ी सफाई से एयर बैग की चेन के बगल में बैग का कपड़ा काटकर भीतर रखा हैण्डबैग निकाल लिया था।

यह देखकर मेरे होश उड़ गये। अकेले यात्रा कर लेने का आत्मविश्वास मुझे ले डूबा। मैने कोच कंडक्टर को ढूँढा तो वह बगल के कोच में खर्राटे लेते पाया गया। कोच अटेण्डेण्ट भी कहीं सो रहा था। आरपीएफ और जीआरपी के जवानों का कोई पता नहीं था। मैने शोर मचाया तो एक-एक करके सब इकठ्ठा हो गये। सबने मुझे ढाढस बँधाया। अपनी-अपनी कहानी सुनाने लगे। लेकिन चोर तो अपना काम करके जा चुका था। सबने यही कहा कि अब उसे पकड़ पाना नामुमकिन है।

मुझे भी इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी। फिर भी मैने इलाहाबाद उतरकर जीआरपी थाने में एफ़आईआर कराया। थानेदार ने पहले ही रिजल्ट सुना दिया। कुछ उम्मीद नहीं है। इसे मैं भली भाँति जानती थी, क्योंकि इस विभाग ने रंगे हाथ पकड़े गये चोर के साथ भी जब कुछ नहीं किया तो आँख से ओझल चोर का क्या बिगाड़ लेंगे। जी हाँ, मेरे साथ यह दूसरी दुर्घटना है। पहली बार मैने उस चोरनी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था।

अबसे छः साल पहले इसी ट्रेन से मैं बनारस कैण्ट स्टेशन पर सुबह साढ़े चार बजे अपने पति और ढाई साल की पुत्री के साथ उतरी थी। श्रीमान जी बड़ा एयरबैग टाँगे आगे-आगे बढ़े जा रहे थे। मैं एक कन्धे पर सो रही बेटी को लादे और दूसरे कन्धें में अपना बैग लटकाए पीछे-पीछे चल रही थी। निकासद्वार के ठीक पहले मुझे कुछ खुरखुराहट की आवाज सुनायी दी जैसे कोई कागज फट रहा हो। मैने अपने बैग की ऊपरी जेब को टटोला तो चैन खुली हुई थी। अन्दर हाथ डाला तो सौ-सौ के नोट गायब थे। मैने एक झटके में पास से हल्का धक्का देकर गुजरी हुई महिला को धर दबोचा। उसकी कलाई मेरे हाथ में थी। मैने उसे जोर से दबाया। उस शातिर जेबकतरी ने अपने हाथ में रखे नोट जमीन पर गिरा दिए। मैने गेट पर खड़े टिकट कलेक्टर से सहायता मांगी लेकिन उसके कान पर जूँ नहीं रेंग रही थी। मैने जोर की आवाज लगाकर इन्हें बुलाया जो गेट पार करके ऑटो तलाश रहे थे। इनके वापस आने तक मैने उसका हाथ नहीं छोड़ा। उसके गिराये नोट मैने पैर से दबा लिए थे।

इन्होंने वापस आकर उसको पकड़ा, मैने बेटी को सम्हाला, बैग की ऊपरी जेब चेक किया। वहीं रखे नोट जमीन पर गिरे थे। करीब पचास की उम्र पार कर चुकी उस मोटी औरत के हाथ में एक प्लास्टिक का खाली झोला भर था। कोई अन्य सामान नहीं था। झोले में झाँक कर देखा गया तो पाँच-छः नोट और मिले। यानि वह पहले भी एक-दो शिकार निपटा चुकी थी।

हम लोगों ने टीटीआई और वहाँ तैनात सिपाही के हवाले करने की कोशिश की तो उन्होंने पल्ला झाड़ दिया। बोले- आप इसे जीआरपी थाने ले जाइए। हमने उसकी उम्र और मनोदशा देखकर उसपर हाथ उठाना उचित नहीं समझा। बेटी के साथ अपना सामान ढोते हुए हम इस महिला का हाथ पकड़कर थाने ले जाने लगे। उसने गिड़गिड़ाने का अभिनय किया। अपनी साड़ी उठाकर जाँघ पर हुए बड़े से घाव को दिखाने लगी। हम नहीं माने तो उसने चलते-चलते ही प्लेटफ़ॉर्म पर टट्टी कर दी। घिन्न और बदबू से हमारी हिम्मत जवाब दे गयी। लेकिन तबतक थाना आ गया था।

थाने पर उपस्थित इन्स्पेक्टर मुस्कराते रहे। वह घाघ चोरनी भी संयत भाव से बैठी रही। वहाँ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का बड़ा सा बोर्ड लगा था। जिसपर लिखी गयी हिदायतों का लब्बो-लुआब यह था कि किसी व्यक्ति को केवल कोर्ट ही दोषी पाये जाने पर दण्ड दे सकता है। अन्य कोई भी व्यक्ति किसी मुजरिम को कष्ट पहुँचाने वाला व्यवहार नहीं कर सकता है। यानि उस महिला के मानवाधिकारों की रक्षा का पूरा प्रबन्ध था वहाँ।

बस हमारे अधिकार के बारे में पूछने वाला कोई नहीं था

। जबकि जेब हमारी काटी गयी थी। हमारे लिए तो दरोगा जी ने बार-बार यही समझाने की कोशिश किया कि एफ़आईआर में बहुत लफ़ड़ा है। पूरी घटना की तहरीर दीजिए। गवाह लाइए। और सबूत के तौर पर इन चोरी गये रुपयों को सीलबन्द लिफ़ाफे में जमा कराइए। इन सबके बाद यदि दो सौ रुपये चुराने का दोष सिद्ध हो गया तो इसे कुछ दिनों की ही सजा हो पाएगी।

इतनी टेढ़ी खीर होने के बावजूद हमने निर्णय लिया कि इसके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराएंगे ही। इसके बाद की ना-नुकुर मिटाने के लिए इन्हें अपने सरकारी अधिकारी होने का परिचय भी देना पड़ा। आखिर रिपोर्ट लिख ली गयी। हम अपने कर्तव्य की पूर्ति का भाव लिए वापस आ गये।

लेकिन आज सोच रही हूँ कि इस बार की चोरी में यदि चोर पकड़ा गया होता तो मैं रिपोर्ट दर्ज कराने की मूर्खता करती क्या? क्या मैं अपना हैण्डबैग सारे सामान सहित सीलबन्द कराकर पुलिस के हवाले कर पाती? जिन दो सौ रुपयों को मैने कानून को अपना काम करने देने के लिए त्याग दिये थे वे मुझे तबसे अभी वापस नहीं मिले। अभी तक मुकदमें की सुनवायी होने की कोई नोटिस ही नहीं मिली। तो फिर मैं इस बार कानून की मदद कैसे करती?

इस अनुभव के कारण यही सोच रही हूँ कि चलो अच्छा हुआ, वह चोर पकड़ा नहीं गया। नहीं तो एक कर्तव्यपरायण नागरिक होने के नाते मुझे फिर चोरी गया सामान सबूत के तौर पर पुलिस के हवाले करना पड़ता। और तब भी शायद इतना ही कष्ट होता।

आज मेरा मन इस उधेड़ बुन में लगा हुआ है। आखिर वह कौन था जिसने मुझे यह लिखने पर मजबूर कर दिया। आज मुझे ठीक-ठीक पता चल गया । शायद यह भी एक मानसिक हलचल है जो रेलवे से शुरू होती है और ब्लॉगजगत पर छाना चाहती है।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, May 14, 2009

मुकदमेंबाज की दवा

हमारे गाँव के उत्तर-पश्चिम कोने पर एक ब्राह्मण परिवार रहता है। जो वर्षों पहले कहीं बाहर से आये थे और इन्हें गाँव के बड़कवा१ ‘बाबा’ के परिवार ने थोड़ी जमीन दे दी थी तबसे वहीं ये लोग घर बनाकर रहने लगे थे। इस परिवार में माँ-बाप के अलावा, दो बेटे और एक बेटी थी। बेटे बड़े हुए तो बड़े बेटे की शादी हो गई। वह पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की खेती-बाड़ी कराने लगा। दूसरा बेटा वकालत की पढ़ाई करके वकील बन गया। लोकल कचहरी में चौकी लगा कर बैठने लगा।

उमेस उपधिआ२ वकील क्या बन गये गाँव में ही बवाल काटने लगे। कोई ऐसा बचा नहीं जिसके ऊपर उन्होंने मुकदमें का दाँव लगाने का प्रयास न किया हो। अब गाँव में लोगो के चेहरे पर आए दिन उदासी छायी रहती। हर एक दिन हो-हो हल्ला मचता कि आज किसी की बकरी इनके दरवाजे पर बंधी है तो किसी की भैंस। लोग गुहार लगाने ‘बाबा’ के घर आते और गिड़गिड़ाना शुरु करते-

“…बाबा हमार भँइसिया ढांठर लेके जात बाटें”

“…क्यों और कौन?”

...बाबा, मोहन उपधिया; …हमार भँइसिया उनके दुअरिया पर जवन बेलवा के पेड़वा बा, ओही में से पत्ता खात रहे त मोहन खिसिया गईलें। …अउरी रोज-रोज धमकी देत बाटें कि उमेसवा वकील बन गईल बा। अब तहनी के बतावऽता… आपन चउआ-चापर३, आ आपन लइका-संभार के राखऽजा। ...मालिक, आफ़त बसा देहनीं गांव में …जीयल काल कऽ देले बाने सों।…”

अब भला बाबा क्या कर पाते, शिकायत एक वकील के खिलाफ़ जो की जा रही थी। बड़े-बड़े गँवई विवाद की पंचायत चुटकी मे निपटा देने वाले बाबा यहाँ बेबस हो जाते। बाबा को क्या पता कि ये गाज उनके घर भी गिरने वाली है।

गाँव के वकील साहब अब रोज सबेरे-सबेरे अपने दरवाजे पर खड़े होकर किसी न किसी को मुकदमे की धमकी देते रहते। धीरे-धीरे बच्चों के झगड़े भी सामने आने लगे। गाँव वालों ने अपने-अपने बच्चों को हिदायत दे रखी थी कि वकील साहब के घर के बच्चों के साथ नही खेलना है। उनके साथ खेलने का मतलब होता झगड़ा और फिर मुकदमें को दावत।

वकील साहब की शादी अभी नही हुई थी । वे अपने बड़े भाई के बच्चों के लिए तो ‘सुपरमैन’ बन गये थे। बच्चे भी उन्हें चाचा के बजाय ‘छोटका पापा’ कह कर बुलाते थे। जो काम बड़का-पापा नही कर पाते, वो सारे काम छोटका-पापा पूरा करते। इनके घर के बच्चे किसी से भी बेहिचक लड़ाई कर सकते थे। इनको तो कोर्ट ने जैसे इजाजत दे रखी थी। खेल-खेल मे खुद तो बच्चों के साथ मार-पीट करते ही, अगर भूल कर भी किसी बच्चे ने इनके ऊपर हाथ उठा दिया, तब तो उसकी शामत आ जाती।…

कुछ ही देर में सारा गाँव वकील साहब के दरवाजे पर तमाशा देखने के लिए मौजूद रहता। उन बच्चों की माता जी और बड़का-पापा जोर-जोर से दहाड़ते,

“…तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बच्चों को छूने की, …आने दो वकील साहब को, तुम लोगो का दिमाग ठिकाने आ जायेगा।”

जो-जो बच्चे उस खेल मे शामिल होते उनके घर वाले बड़का-पापा की घंटो मनौनी करते। …शाम होते ही बच्चे छोटका-पापा का बेसब्री से इंतजार करते। आज के नये शिकार की सूचना देने के लिए बेचैन रहते। …स्कूटर की आवाज सुनते ही घर वालों के चेहरे पर ऐसी खुशी झलकती, जैसे मानों वकील साहब के बरदेखउवा४ आये हों, और उन्हें कोई उपहार देकर गये हों। उनमें छोटका-पापा को झगड़े की बात सबसे पहले बताने की होड़ होती।

वकील साहब की मुकदमेबाजी की चपेट मे धीरे-धीरे ‘बाबा’ का घर भी आने लगा। छोटी-छोटी बात पर उनके घर के बच्चों को भी हाथ पकड़ कर उनके घर ले जाकर शिकायत करते। ये बच्चे भी कभी-कभार अपने ही घर वालों से मार खा जाते। …यह कार्यक्रम लम्बे समय तक चलता रहा। वकील साहब का आतंक दिन पर दिन बढ़ता रहा। धीरे-धीरे बाबा के नाती-पोते भी सयाने हो गये।

एक दिन बाबा के घर कुछ मेहमान आये थे। वकील साहब की भतीजियों का बाबा के घर आना-जाना लगा रहता था, बाबा के घर आयी हुई कुछ लड़कियों और वकील साहब की भतीजियों में कहा-सुनी हो गई, यह बात वकील साहब को रास नही आयी। सबेरे-सबेरे चले आये शिकायत लेकर। यह सारी बातें, बाबा का छोटा वाला नाती जो बचपन से यह सब देखते हुए बड़ा हुआ था उसको यह बात नागवार लगी। वह अचानक उठा और सांड़ की तरह वकील साहब की ओर झपट पड़ा। उसने वकील साहब का एक हाथ पकड़कर पीछे की ओर ऐंठ दिया और दहाड़ उठा,

“ …मुकदमा करना है तुम्हें, …चल, …मेरे उपर मुकदमा कर, …वर्षों से देख रहा हूँ तुझे,” वकील साहब अचानक हुए इस हमले के लिए तैयार न थे। सिट्टी-पिट्टी गुम थी। रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचा था।

बाबा के घर के बड़े लोगों ने किसी तरह वकील साहब को छुड़ाकर वहां से भगाया। तबसे कोई नया मुकदमा नहीं हुआ। गाँव वाले अब राहत में हैं, …और बाबा के नाती को लाख-लाख दुआएं देते हैं। अब वकील साहब का गाँव में आना और जाना पता ही नही चलता। …लगता है उन्होंने स्कूटर बेच दिया।

१.बड़कवा- गाँव का सर्वाधिक प्रतिष्ठित और प्रभावशाली परिवार

२.उमेस उपधिआ- उमेश उपाध्याय

३. चउआ-चापर- पालतू जानवर, गाय-भैंस-बैल आदि चौपाये

४.बरदेखउआ- लड़के से शादी के रिश्ते के लिए उसे (वर को) देखने आने वाले

(रचना त्रिपाठी)