Saturday, August 23, 2014

उभय-लिंगी चोला

आज के इस दौर में लड़कियों और स्त्रियों के प्रति बढ़ती असुरक्षा और हमारे कथित खैरख्वाहों की बयानबाजी को देखते हुए मेरे मन को एक तरकीब सूझ गयी है। लड़कियों की छेड़छाड़ से लेकर उनका यौन उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार का कारण उनके पहनावे को बताया जा रहा है। सूरज उगने से पहले और डूबने के बाद इस औरत जात को घर से बाहर निकलने की बीमारी भी एक बड़ी समस्या है जो समाज के ठेकेदारों से सम्हाले नहीं सम्हल रही है। मैं जो सोच रही हूँ उसे आप इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान भी कह सकते हैं -

सरकार को चहिए कि स्त्री और पुरुष दोनो को घर से बाहर निकलने पर एक ही जैसा वस्त्र यानी ‘उभय-लिंगी चोला’ पहनना अनिवार्य कर दे; ठीक वैसे ही जैसे स्कूली बच्चों के लिए यूनिफार्म में होना जरूरी होता है। इस चोले की बनावट ऐसी होनी चाहिए जिससे वह पूरे ‘बदन’ को अच्छी तरह से ऊपर से नीचे तक ढक लें…इस प्रकार कि घर से बाहर निकलने वाला वह मनुष्य स्त्री है या पुरुष, लड़की है या लड़का इसकी पहचान करना मुश्किल हो जाय… और बाहर निकलने वाला प्रत्येक व्यक्ति “पादरी” लगने लगे। इस चोले को पहनने के बाद किसी के मन में असमानता की भावना या हीनता ग्रन्थि नहीं पनपने पाएगी… अमीर- गरीब सभी एक समान दिखेंगे...घर से बाहर जाने वाले वाले सभी लोग यूनीफार्म में एक ही जैसे नजर आने लगे तो सड़क पर आवारा घूमते जानवरों, सॉरी शोहदों के द्वारा स्त्रियों की पहचान करना मुश्किल हो जायेगा। जिससे लड़कियों के साथ बलात्कार और एसिड अटैक जैसी घटनाओं की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाएगी।

दूसरी तरफ हमारे खैरख्वाह भी लड़कियों और माताओं-बहनों के वस्त्र पर बेवजह टिप्पणी करने की तकलीफ से बचे रहेंगे… स्त्री-पुरुष के अंदर एक दूसरे को देख आकर्षण बल में भी कमी आएगी; स्त्री का बदन ढका रहेगा तो उसे देखकर उसी की तरह ढके बदन वाले पुरुष को कोई उत्तेजना नहीं पैदा होगी और स्त्री देह पर यौन हमले की घटनाओं में भारी गिरावट आ जाएगी…। इस तरह सामाजिक वातावरण भी स्वस्थ बना रहेगा। काम वसना से प्रेरित पुरुष अगर किसी स्त्री से दुराचार करने का दुस्साहस करेगा भी तो उसकी सफलता का प्रतिशत बहुत ही कम रहेगा क्योंकि ऐसा करने में उसे बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा... पकड़े जाने के डर से  उसके पास छोड़कर भाग निकलना ही एक मात्र विकल्प बचेगा और पादरी के परिधान में सरपट भागना भी आसान नहीं होगा। फिर कोई मूर्ख ही ऐसा रिस्क लेगा अपनी फजीहत कराने के लिए।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, August 13, 2014

राखी की परंपरा और आधुनिक परिवेश

तीन दिन हो गया रक्षाबंधन का त्यौहार बीते हुए…लेकिन मै आज भी उस पर्व की महत्ता पर अटकी हुई हूँ...रोज यही सोचती हूँ कि इस पर्व को मनाने की आखिर क्या वजह रही होगी… सुरक्षा तो सबके लिए जरूरी है, वह स्त्री हो या पुरुष…लेकिन यह विशेषतौर पर स्त्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से ही क्यों मनाया जाता है… यह भाई-बहनों के बीच एक विश्वास की डोर है… प्यार का बंधन है… मगर इस त्यौहार को रक्षाबंधन के नाम से मनाते है… इस पर्व के उपलक्ष्य में हर एक स्त्री अपने भाई को वह चाहे उससे उम्र मे दस साल छोटा हो या बड़ा… रक्षासूत्र बांधती है और उससे यह संकल्प लेती है कि वह उसकी रक्षा करे… ऐसा क्यों है…? एक बेटी या लड़की के मन में जन्म से ही असुरक्षा का बोध कराना और फिर उस घर का लड़का/ भाई की कलाई में एक लड़की/ बहन के द्वारा राखी बंधवाना, यह प्रथा क्यों बनायी गई…?

सोशल मीडिया पर ऐसी बहस चल रही है कि क्या आज के दौर में यह पर्व एक स्त्री के मन में असुरक्षा का भाव उत्पन्न नहीं करता…! जहां एक तरफ स्त्रियां अपने को पुरुष से किसी भी मामले में कम न होने का दावा करती हैं… दूसरी तरफ इस पर्व के माध्यम से राखी बांधकर भाई; पिता; चाचा या भतीजा के आगे अपनी सुरक्षा का वादा मांगती हैं…कहीं न कहीं उनके अंदर यह बात बचपन से ही बैठायी जा रही है कि वह इन सभी से कमजोर है…। सवाल है कि अगर कमजोर हैं भी तो किस मामले में- शारीरिक, आर्थिक या मानसिक या बौद्धिक…?

मुझे तो रक्षाबंधन का पर्व स्त्री सुरक्षा के प्रश्न का एक मनोवैज्ञानिक समाधान लगता है… वो इसलिए कि भाई-बहन दोनों लम्बें समय तक अपना जीवन एक दूसरे के संपर्क में रहकर बिताते हैं… उनके जीवन काल में ऐसे मौके भी कई बार आते हैं, जहां उन्हें एकांत समय भी व्यतीत करने को मिलता हैं… ऐसे में दो विपरित लिंगों के प्रति उनके अंदर भी आकर्षण होना स्वाभाविक है… मगर ऐसा नही होता… यह इसी संस्कृति की देन है…जिसके बहाने एक परिवार में रहने वालों बच्चों को यह संस्कार दिया जाता है कि भाई-बहन का रिश्ता बहुत पवित्र होता है… हर भाई का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी बहन को प्यार देने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा का भी ख्याल रखे… उसके साथ किसी तरह की अभद्रता न करे…

याद है मुझे जब मै छोटी थी तो राखी वाले दिन अपने भाइयों को राखी तो बांधती ही थी…साथ में अपने आस-पड़ोस में रहने वाले अपने से छोटे-बड़े लड़को को भी बांधती थी…तो कहीं न कहीं रक्षाबंधन का त्यौहार एक मनोवैज्ञानिक अनुकूलन की प्रक्रिया है, जिससे एक घर ही नहीं बल्कि पूरे समाज को लाभ मिलता है। यह कहना कि इससे लड़की के मन में जन्म से ही कमजोर होने और लड़कों की तुलना में हीनता का भाव पैदा होता है कोरी सैद्धान्तिक बात है। बल्कि हमारी सामाजिक वस्तुस्थिति को नकारने का प्रयास है।

यह तो एक आदर्श स्थिति होगी जब प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा उसकी लैंगिकता से निरपेक्ष होगी; जहाँ लड़की और लड़के को कहीं भी आने-जाने, कोई भी काम कर लेने और किसी भी प्रकार की जीवन चर्या चुन लेने का समान अवसर और अधिकार हो तथा उसमें लिंग के आधार पर कोई विभेद न हो। लेकिन दुर्भाग्यवश वास्तविक समाज अभी ऐसा नहीं हो पाया है। इस समाज में केवल आदर्श पुरुष नहीं रहते कि लड़कियाँ उनकी ओर से निश्चिन्त होकर अपनी स्वतंत्रता का पूरा लाभ उठा सकें। समाज में ऐसे तत्वों की कमी नहीं जो एक लड़की को कमजोर करने और उसकी कमजोरी का फायदा उठाने की ताक में रहते हैं। हमारे समाज के लिए तो यह जुमला मुफीद है- सावधानी हटी- दुर्घटना घटी।

जब तक हम एक आदर्श समाज की स्थापना नहीं कर लेते तबतक ऐसे तत्वों के प्रति सावधान रहने, उन्हें ऐसा मौका हाथ न लगने देने के लिए यदि कुछ व्यावहारिक उपाय करना पड़े तो करना ही चाहिए। इसे स्त्री स्वातंत्र्य और आधुनिकता के नाम पर खारिज कर देना उचित नहीं होगा।

(रचना त्रिपाठी)

Monday, August 11, 2014

किरपा के काबिल तो बनिए

साधारण परिवार में जन्मीं एक बेटी जो आगे चलकर “डेली सोप” की बहू बनी और बहू से फिर ‘मंत्री’ तो कोई खास योग्यता तो जरूर रही होगी। ऐसे में बार-बार इनकी पात्रता पर सवाल खड़ा कर इनके मन को बेवजह तकलीफ दी जा रही है… योग्यता या पात्रता के लिए किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का प्रामाणपत्र हो यह जरूरी तो नहीं। विद्या अथवा ज्ञान तो कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसका स्रोत निर्मल बाबा की ‘किरपा’ हो या ‘डेली सोप’।

यदि कुछ खास लोगों की कृपा बनी रहे तो पात्रता के बगैर भी पद और प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सकती है। अब अपनी स्मृति को ही ले लीजिए जिनपर साक्षात्‌ “मोदी” की माया है। नहीं तो क्या इस देश में टीवी की बहुओं अथवा साधारण परिवार की स्त्रियों की कमी है? क्रिकेट के भगवान सचिन तेन्दुलकर की डिग्री भी तो किसी से छुपी नहीं है जो आज राज्यसभा में सांसद के पद पर आसीन हैं। यह बात अलग है कि राज्य सभा में वह गाहे-बगाहे भी नजर नहीं आते हैं। जब भगवान ही हैं तो संसद में उनके फोटो से भी काम चलाया जा सकता है। रेखा का सिलसिला तो बहुत पुराना हो गया है। लोगों को इसपर इतना बावेला मचाने की क्या जरूरत है? बस किरपा बरसाने वाले बने रहें... इस देश को और क्या चाहिए...?

जब किरपा से सब कुछ उपलब्ध हो जाता है तो डिग्री के लिए इतनी माथा-पच्ची क्यों...? इन मंत्रियों और सांसदो के नीचे काम करने वाले उन अधिकारियों की हालत तो देखिए...। बेचारे..., ये सभी स्नातक, परास्नातक करने के बाद भी तमाम किताबें घोटकर वहां तक पहुँचने में अपनी एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। इतने पढ़े –लिखे होने के बावजूद ये अधिकारी उन्हीं मंत्रियों और नेताओं के अधीन काम करते है। क्या गरज थी इन्हें इतनी डिग्री बटोरने की…? किसी की किरपा मांग लेते...।

शास्त्रों में कहा गया है कि- “विद्या से विनय की प्राप्ति होती है और विनय से व्यक्ति सुपात्र बनता है।” यहां राजनीति में क्या इस श्लोक की आवश्यकता है…? नहीं न…? अरे जब फूलन देवी सांसद बन सकती हैं और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हाल सकती हैं तो आप ही बताइए कि “किरपा” में ज्यादा ताकत है या डिग्री में?

अपात्र तो धरती पर बहुत पड़े हैं लेकिन सभी पर किसी महापुरुष की किरपा नहीं बरसती। उसको पाने के लिए ज्ञान और कर्म की थाती हो ना हो, अच्छे भाग्य, राजकुल वंशावली, उससे वैवाहिक संबंध अथवा कलियुगी कला जैसे चाटुकारिता, असाधारण सेवा धर्मिता जैसे उपायों की जरूरत पड़ती है। इसमें कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। ये मार्ग अपनाकर छुटभइए भी बहुत उच्च पदों पर विराजमान हो सकते हैं। इसके मूल में बस वही है- किसी व्यक्ति विशेष की “किरपा”।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, August 8, 2014

जादू है जादू …

किसी भी कार्य को देखने का अपना-अपना नजरिया होता है। मुलायम-पुत्र-अखिलेश सरकार के बारे में रोज छप रही खबरों को देखते हुए आज अचानक मैने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया। थोड़ी उदारता से देखें तो ‘थोड़ी सी’ कमी के साथ बहुत सी खूबियां भी नजर आयेंगी। बस एक पारखी नजर की जरूरत है। कुछ उसी तरह की पारखी नजर का इस्तेमाल करते हुए मैंने  अपने खोजी दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो मुझे अपने यूपी के लोकशाह और नौकरशाह बहुत सी ऐसी खूबियों से भरे नजर आये जिन्हें अबतक मै देख नहीं पा रही थी। सरकार चलाने वाले ये दोनो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप शायद यूं भी कहेंगे कि एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। एक योजना बनाता है तो दूसरा उसका क्रियान्यवन करता है। दोनों में ताल-मेल ऐसा है कि जो चाहें कर सकते हैं। अगर चाह लें तो किसी भी योजना को अंजाम तक पहुंचाना इनके बायें हाथ का खेल है। अगर न चाहें तो एक तिनका भी नहीं हिल सकता। इनके इस हुनर की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।

सरकारी महकमें में किसी नियुक्ति का विज्ञापन निकलने से पहले ही अगर रिजल्ट तैयार हो जाय; कोई दुर्घटना होने से पहले या चोरी, डैकैती, लूट-मार, हत्या की घटना घटित होने से पहले उस अपराधी की ‘बेल’ हो जाय; किसी ‘शव’ के अस्पताल पहुँचने से पहले ही अगर पोस्टमार्टम-रिपोर्ट तैयार मिले; तो हम इसे क्या कहेंगे...? हाईटेक्‍नालॉजी का कमाल या वैज्ञानिक चमत्कार…? सरकारी महकमा हो, पुलिस तंत्र या मेडिको-लीगल प्रोफेशन सबकी कार्य करने की शैली से इस बात का पता चलता है कि ये सभी विभाग इस युग से कहीं बहुत ज्यादा आगे चल रहे हैं। मतलब सबकुछ ‘सुपर हाईटेक’ हो गया है। अब आप इसे “थेंथरोलॉजी” कहना चाहें तो आप की बला से। जिस लैपटॉप ने अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापनों में स्थान पाया, चुनाव जिताया और घर-घर पहुँचकर ढिबरी की रोशनी में रातें गुजारी, भाई-बहनों के बीच रार मचायी, जिसने लम्बे समय तक सबकी जुबान पर राज किया उसी को इस सरकार ने जिस कुशलता से रद्दी के भाव कर दिया उसे क्या कहेंगे? मैं तो इसे ‘थेंथरई’ नहीं कहने वाली…!

‘सुपर हाईटेक्‍नालॉजी’ के मामले में आजकल हमारा यूपी शिखर पर चल रहा है। यह कला किसी और प्रदेश या विदेशों से हाईजैक नहीं की गई है बल्कि यह तो यहीं ईजाद की गई है। कोई यह मत कह दे कि बिहार में पहले से है। हमारे प्रदेश में पेट और किडनी का ऑपरेशन किसी मेडिकल कॉलेज में नहीं बल्कि मदरसे में ही हो जाता है। उसमें सर्विस इतनी अच्छी है कि भी महिला के घर वालों को कोई देखभाल भी नहीं करनी पड़ती। उन्हें तो बहुत बाद में पता  चलता है जब महिला खुद घर लौटकर बताती है कि उसका क्या कुछ बदल दिया गया है। इसपर जिसे संदेह हो वह किसी कम्पनी से सर्वे करा कर देख ले। पक्का अब्बल नम्बर पर हमारा यूपी और हमारे यूपी के जाँबाज पुलिसकर्मी और नौकरशाह ही होंगे; और इनके सिर पर ताज पहनाने वाले हमारे द्वारा चु्ने गये लोकप्रिय नेता जिनके हाथ में सत्ता की चाभी है।

हमारे प्रदेश में ‘सत्ता की चाभी’ बिल्कुल उस जादू की छड़ी  की तरह है जिसे घुमाने मात्र से ही असंभव कार्य भी संभव हो जाय। सात ताले में बंद किसी भी तिजोरी का माल बाहर आ सकता है और बाहर का माल सात ताले के भीतर जा सकता है। आपके पास सत्ता की चाभी हो तो आपको अलादीन के चिराग की भी जरूरत नहीं। कुछ भी कर गुजरने के लिए यही काफी है। इस चाभी से यहां कि इस अद्‍भुत तकनीकी को बढ़ावा देने में लेशमात्र भी देर नहीं लगती। मिनटों का कार्य सेकण्डों में पूरा हो जाता है। है ना कुछ विशेष !

(रचना त्रिपाठी)

Monday, July 21, 2014

लखनऊ की मुलायम जनता

राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके में गुरुवार को एक महिला के साथ दुस्साहसिक कांड ने रोंगटे खड़े दिए। जिस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के आगमन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी उसी समय  उसी थानाक्षेत्र के बलसिंह खेड़ा गांव के बाहर स्थित प्राथमिक बिद्यालय के परिसर में एक महिला के साथ दरिंदगी की हर हद पार कर इस प्रदेश के साथ देश की इज्जत भी तार-तार हो रही थी।

एक साल पहले की बात है दिल्ली में “निर्भया काण्ड” के दामिनी को इसी तरह से दरिंदगी का शिकार बनाया गया; जिसकी पीड़ा को पूरे देश ने महसूस किया। इस घटना से उद्वेलित दिल्ली के लोगों की संवेदनाएं ज्वालामुखी बन कर सड़क पर उतर आयीं; जिसकी लपटों ने सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के कोनें-कोनें को प्रभावित किया। उसका परिणाम यह हुआ कि उस घटना को अंजाम देने वाले सभी अपराधी पकड़े गये, और सबको “फास्ट ट्रैक कोर्ट” द्वारा त्वरित कार्यवाही कर सजा भी सुना दी गयी।

एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मानवता की सारी हदें पार कर उसी तरह की घटना दुहराई गई है। उस निर्वस्त्र महिला की लाश के साथ जिस तरीके से पुलिस पेश आयी है वह और भी शर्मसार कर देने वाली हरकत है। घंटो उस लाश को पुलिस और मीडिया उलट–पलट कर अपनी आंखे सेकती रहीं; फोटो खींचती रही लेकिन उस लहूलुहान पड़ी लाश पर दो गज कपड़ा नहीं डाल सकी।

यह वही प्रदेश है जहाँ के युवा मुख्यमंत्री के सहयोगी एक नौजवान मंत्री ने बयान दिया था कि- “हर एक लड़की के पीछे पुलिस नहीं लगायी जा सकती।” राजनीति के शीर्ष पर बैठे प्रभु-वर्ग के लोग लड़कियों के चाल-चलन, पहनावे-ओढ़ावे को लेकर अजीब तरीके की बयानबाजी करते- फिरते हैं। मै पूछती हूँ कि हर एक लड़की के पीछे अगर पुलिस नहीं लगायी जा सकती, तो क्या एक लड़की के पीछे दस गुंडों को खुलेआम दुष्कर्म करने से रोका भी नहीं जा सकता है क्या…? उस समय पुलिस कहाँ रहती है जिस समय किसी के घर की बेटी, बहन, बहू लूटी जाती है…? हैरत है कि इस जघन्य घटना के बाद यहाँ के लोगों को साँप सूंघ गया या उनके दिल भी “मुलायम” हो गये हैं…?

जिस तरह से आये दिन यहाँ छेड़खानी, ब्लात्कार ,एसिड अटैक और हत्या जैसे जघन्य अपराध हो रहे हैं, उससे यहाँ पर रहने वाले लोगों के बारे में यही कहा जा सकता है कि सभी कमजोर, स्वार्थी, बुजदिल, कायर व डरपोक हैं; या इनकी संवेदनाएं कहीं किसी कोने में पड़े दम तोड़ रही हैं। इन्हें इन सभी न्यूनताओं से नवाजा जाय तो भी कम है।

यह सरकार लोकशाही के नाम पर मिले जनमत के उन्माद में रात–दिन अपनी काली करतूतों को अपने कुर्ते की तरह सफेद बताने में लगी रहती है। इसके अंदर संवेदनहीनता और निरंकुशता कूट-कूट कर भरी हुई है। यहाँ के लोगों पर इसके निक्कम्मेपन और गुंडई का प्रभाव इस कदर पड़ा है कि सबने मानो चूड़ियाँ पहन रखी हैं। जिसमें पुलिस भी जनता के प्रति अपनी कर्तब्य को ताख पर रख कर इनके हर गलत कार्यों पर पर्दा डालने का काम कर रही है। इस दुधमुँही सरकार को और क्या कहा जा सकता है…? जिसकी न तो अपने राज्य के लिए कोई प्रगतिशील सोच है और ना ही इस तरह के अपराध को रोकने के लिए कोई इच्छाशक्ति ही है।

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, July 15, 2014

उत्पीड़न का विरोध जरूरी है

एक साधारण परिवार में पैदा हुई, पली-बढ़ी, मात्र स्नातक की डिग्री प्राप्त तारा के अंदर अपने परिवार के विरुद्ध इतना बड़ा फैसला लेने की हिम्मत कहां से आयी...? पूरे गांव में चर्चा का विषय ही यही था–“तारा आज कितने बजे सो कर उठी; कहां गई; क्या खाया, क्या किया? ” उसकी माँ के ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। शादी को एक साल हो गए है। वह ससुराल में कुल आठ-दस दिन रहने के बाद अपने भाई को बुलाकर उसके साथ मायके वापस लौट आयी थी। उसके घरवालों से लेकर सगे संबंधियों को भी उसका इस तरह बिना शुभ मुहूर्त के ससुराल से लौट आना बहुत ही बेतुका और चिंताजनक लगने लगा था। गाँव वाले तरह-तरह की बाते करने लगे थे।

उसकी माँ तो उस दिन से लेकर आजतक उसे बिना नागा, कोसा करती - “चोटही! जाने कौन-कौन से दिन दिखाएगी मुझे! किस राजवाड़े के घर जाती, जहां तुझे सात बजे तक सोने को मिलता, ससुराल और नईहर में यही तो अंतर है !”

वह अपनी माँ को टन्न से जवाब देती- “तो तू ही चली जा मेरी जगह, लगी रहना नौकरानी की तरह सुबह चार बजे से लेकर रात को बारह बजे तक।

“जीवन भर यहीं पड़ेगी रहेगी, हमारी छाती पर मूंग दलने के लिए हरामजादी !!! जो जानती कि मुझे यह दिन दिखाएगी, तो पैदा होते ही गला घोंट देती।”

“तो अब से घोंट दे…! नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी.. नहीं जाउँगी! और कान खोलकर सुन लें जबतक “छोटकी” रहेगी तबतक तो किसी कीमत पर नहीं जाउँगी!”

छोटकी - उसके पति की छोटी बहन जो उसे सुबह जगाने से लेकर उठना, बैठना, चलना, घूंघट करना आदि तमाम बातों के लिए पल-पल टोकती और सिखाती रहती थी।

तारा को अपनी छोटी ननद के द्वारा अपने ऊपर किये जा रहे अनुशासन बिल्कुल पसंद नहीं थे। उसकी ननद सुबह चार बजे ही दरवाजा खटखटाकर उसे जगा देती और खुद तनकर सो जाती। तारा का कहना था कि-“ मेरी आदत नहीं है कि देर रात तक जगूं भी और सुबह जल्दी उठ जाऊँ। ...मुझपर इस तरह की हु्कूमत नहीं चलेगी उसकी। छोटी है छोटी की तरह रहे।”

उसके श्वसुर इस बीच कई बार आए और उसे बहुत समझाने की कोशिश की- “लौट चलो!” यहां तक कि उसे तलाक की धमकी भी मिली । लेकिन उसने किसी की एक न सुनी और अपनी जिद्द पर अड़ी रही। आज अपनी शर्तों पर ससुराल जाने के लिए तैयार हो गई। उसने अपने श्वसुर से कह दिया- “आप अपनी छोटी बेटी को यह समझाएं कि वह हमें सुबह जगने का आदेश न दिया करें..या पहले उनकी शादी करके उन्हें ससुराल भेज दें, उसके बाद मुझे बुलाए।” अंततः उन्होंने उसकी शर्त मंजूर कर ली और बोले- “ बेटी की शादी इतनी जल्दी तो नहीं कर पाउँगा; लेकिन तुम्हें जैसे अच्छा लगे वैसे रहना। मै छुटकी को समझाउँगा कि वह तुमपर शासन न चलाया करे।”

उस लड़की का आत्मविश्वास देखकर मै बहुत खुश हूं और आश्चर्यचकित भी। परिवर्तन के इस दौर को देखकर गाँव वालों को भी खुश होना चाहिए; लेकिन वे तो उल्टा उसे ‘कोसे’ जा रहे हैं- “बड़ी नकचढ़ी है ! आखिर अपनी वाली ही करके मानी।”

(रचना त्रिपाठी)                             

Saturday, July 12, 2014

गरीबों के अच्छे दिन

इस बार के बजट में सरकार द्वारा गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखाये गये रहमों-करम को देखकर यह कहा जा सकता है कि गरीब मजदूर, ठेले-खोमचे वाले, रिक्शा चालक, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के भी अच्छे दिन आ गए हैं। इन्हें टैक्स-वैक्स से तो कोई वास्ता है नहीं। वरना यह बीमारी इन गरीबों के लिए लाइलाज ही साबित होती। इसके बावजूद कुछ लोगों का कहना है- ‘बेचारे इनके तो अच्छे दिन अभी गच्चे में हैं !’ ये क्या जाने अर्थ व्यवस्था का विकास…? इन्हें तो पता है बस वही ‘माटी –कानों और रोटी-पानी !’

गरीबी तो खुद ही एक बीमारी है लेकिन सरकार ने सोचा कि इस बीमारी का एक बड़ा कारण है नशा ! जैसा कि कई बार सर्वेक्षणों में भी देखा गया है- गुटका, खैनी, तंबाकू इत्यादि का सेवन गरीब तबके के लोग ज्यादा करते हैं। कारण जो भी हो, मुझे तो लगता है ये वर्ग अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह से न कर पाने की वजह से इन नशीले पदार्थों का सेवन मजबूरी में करते हैं। अज्ञानता वश कहें या अपना ग़म गलत करने के लिए। यह भी सुना है कि इन पदार्थों का सेवन करने के बाद भूख कम हो जाती है। लेकिन इससे ये भयंकर बीमारी की चपेट में भी आ जाते हैं। अच्छा हुआ जो ये नशीले पदार्थ महंगे हो गए। पेट के वास्ते कुछ तो संयम इन्हें भी बरतना ही पड़ेगा। भले ही नशे की महंगाई की वजह से मजबूरी वश ही सही!

इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने जो कदम उठाएं हैं उसे अच्छा ही कहेंगे। ऐसे लोग जूते-चप्पल पहने ना पहने क्या फर्क पड़ता है इन पर। मगर अपने ‘पेट’ को कहां रखे बेचारे! जहां जाते है वहीं गले पड़ा रहता है। अगर पेट में कुछ नहीं गया तो इनका और इनके बच्चों का क्या होगा…? फिर तो ये कुपोषण के शिकार हो जाएंगे, ऐसे में इस सरकार का इनकी स्वास्थ्य की ‘चिंता’ करना बहुत बड़ी बात है। इस पर भी अगर लोग कहें कि इन बेचारों के अच्छे दिन तो अभी पिच्छे ही हैं तो यह सरकार के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी…

गरीब वर्ग जो दो वक्त की रोटी-प्याज का जुगाड़ न कर पाए तो उसे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में मिलने वाली ‘मल्टी-विटामिन्स’ की गोलियाँ किस दिन काम आएंगी? आखिर इसी दिन के लिए तो ये सुविधाएं उपलब्ध करायी गई हैं। जितना दिन मेहनत-मजदूरी करके मिले, रोटी-प्याज खाएं… न मिले तो सरकार द्वारा उपलब्ध मल्टी-विटामिन्स का सेवन करें…भूख से पेट में मरोड़ होने लगे, सिर चकराने लगे या गला सूखने जैसा कुछ लक्षण दिखने लगे तो सरकारी अस्पताल में उपलब्ध मुफ्त के बिस्तर पर लेट जाएँ और “बोतल” चढ़वाएं। बोतल यानि  “ग्लूकोज़ ड्रिप”। इससे भी बात न बने तो तेल और माचिस भी तो सस्ते हो गये…! “ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी”

(रचना त्रिपाठी)