Monday, June 22, 2009

घर में लगा कम्प्यूटर... क्या नीचे क्या ऊपर?

टूटी-फूटी शुरू करने के बाद एक सज्जन ने मेरे मेल पर सन्देश भेंजा कि उनको कम्प्यूटर के बारे में सरल भाषा में जानकारियाँ चाहिए जो उनके स्कूल में बच्चों के काम आ सके। कम्प्यूटर का ज्ञान देने के लिए उनको मुझसे बेहतर शायद और कोई नही दिखा। ऐसा उनकी पारखी नज़र के धोखे के कारण ही हुआ हो तो भी मुझे बहुत खुशी हुई यह जानकर कि किसी ने तो मुझे पहचाना।

मैने चटसे जवाब भेंज दिया, “भाई साहब, सबसे पहले तो आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आपने मुझे इस लायक समझा।”

अपने वादे के मुताबिक मैं कम्प्यूटर के बारे में अपने महान ज्ञान को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। जिस लायक समझा जाय उस रूप में प्रयोग की छूट है।एक ही रुटीन

कम्प्यूटर से हमें ढेर सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं, जो हमें देश-दुनिया के बारे में बताता है। इससे हमें अनेक प्रकार के रंग-बिरंगें ब्लॉग पढ़ने को मिलते है।

कम्प्यूटर से हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के लाभ मिलते हैं :-

१. जब हमारे घर में कम्प्यूटर होता है तो हमें बाहर घूमने जाने का मन नही होता जिससे पतिदेव तो प्रसन्न रहते हैं मगर बच्चे नाखुश।

२. घर में कम्प्यूटर के आ जाने से पतिदेव हर वक्त प्रसन्न दिखते हैं। भले ही आफिस से आने के बाद उन्हें चाय नाश्ते के लिये ना पूछो उन्हें कोई गिला नही होता। हाँ, अगर उन्हें अचानक याद आ भी गया कि मुझे आज चाय नही मिली है, तो उन्हें समझाया जा सकता है- यह कहकर कि “अरे!..अभी-अभी तो चाय पिलाये थे, भूल गये क्या?” इसपर वे इस बात को सहर्ष स्वीकार लेते हैं।

३. घर में कम्प्यूटर की वजह से टीवी का एक भी सीरियल डिस्टर्ब नहीं होता है। पतिदेव कम्प्यूटर पर और बीबी टीवी के पास, बच्चे भी मौज कर रहे होते हैं।

४. पतिदेव को कभी अपनी पत्नी से यह शिकायत का मौका नही मिलता कि “तुम मुझे समय नही देती हो।”

५. अगर पड़ोसी से बात करते समय बच्चे डिस्टर्ब कर रहे हों, तो उ्न्हें भी कम्प्यूटर पर बिठा दो। फिर देखो, है ना सबकी मस्ती!

कम्प्यूटर से थोड़े नुकसान भी उठाने पड़ते हैं:

१.पतिदेव के कम्प्यूटर पर देर तक बैठने से पेट का आकार गणेश जी का अनुसरण करता हुआ अन्ततः शिवजी के नन्दी बैल की बराबरी पर जाकर रुकता है।

२.कंप्यूटर पर देर तक बैठने से और भी तरह-तरह की शारीरिक बिमारियाँ दावत देने लगती है जिससे कम्प्यूटर पर बैठना भी दूभर हो जाता है।

३.यदि यहाँ एक बार ब्लॉगरी का चस्का लग गया तो इतनी व्यस्तता हो जाती है कि पीछे से एक बार की कही बात सुनायी ही नहीं देती है।…हाँ, अगर सुनायी दे भी गयी तो अचानक इतना जोर से जवाब मिलता है कि अगर कोई कमजोर दिल की गृहणी हो तो सीधा राम-नाम सत्य…।

४.अब बच्चों का क्या कहें? जब हम लोग छोटे थे तो कोई मेहमान आने वाला होता था, सबसे पहले तैयार होकर उसके आने का बेसब्री से इंतजार करते और बड़े उत्साह से स्वागत करते थे। लेकिन आज कल के बच्चे, इस कंम्प्यूटर के चक्कर में मेहमान कब आये और कब गये इनको पता ही नही चलता। अगर कोई बच्चों से मिलने की इच्छा जताता है तो इन्हें बड़े आग्रह के साथ बुलाना पड़ता है। तब भी इनका चेहरा ऐसे लटक जाता है जैसे मेहमान ने इनका सबसे प्रिय खिलौना तोड़ दिया हो, और यह एक ‘नमस्ते’ का डंडा मारकर चले जाते हैं।

क्रमश:

रचना त्रिपाठी

Tuesday, June 16, 2009

एक भिखारन को सरकारी सम्मान...!?!

आपने श्रीमती रागिनी शुक्ला की लिखी दो कहानियाँ दुलारी और कर्ज शीर्षक से सत्यार्थमित्र पर पढ़ी और सराही हैं। रागिनी दीदी की लिखी एक और मार्मिक कहानी यहाँ प्रस्तुत है। यह कहानी भी एक वास्तविक पात्र के दुखड़े को सच-सच बयान करती है:

हत्‌भाग्य

दादी के यहाँ आज सुबह से ही चहल-पहल थी। मुहल्ले में सभी उन्हें दादी ही तो कहते थे। यूँ तो वे यहाँ अब अकेले ही रहती थीं, लेकिन आज घर में बहू-बेटे से लेकर नाती-पोते तक सभी आए हुए थे और दादी को सजा-सवाँर कर तैयार करने में जुटे थे। दादी परिवार के सदस्यों का नया रूप और व्यवहार देखकर चकित थीं। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है?

बहूरानी दादी को नई, सफेद, स्वच्छ चाँदनी सी चमकती हुई साड़ी पहनाने लगी। महीनों से उलझे बालों को जल्दी-जल्दी सुलझाने का प्रयास करती। इतने में उसका बेटा दादी के पैरों में मोजे पहनाने लगा, बड़ी पोती ने अपनी नई चप्पल लाकर पहना दिया। उनके बेटे ने अपनी नई पैंट-शर्ट चढ़ा ली थी। किराये का टैंपो भी आकर दरवाजे पर खड़ा हो गया। दादी को खिला-पिला कर चलने को तैयार किया गया।

आखिरकार दादी ने पूछ ही लिया, “हमें जाना कहाँ है?”

बहू बड़े प्यार से बोल उठी, “अम्माजी आप जानती नहीं हैं, आज १५ अगस्त है। कलेक्टर साहब ने आपको सम्मानित करने के लिए बुलाया हैं। …इस गाँव-शहर में जितने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं या उनके परिवार में कोई बुजुर्ग हैं, उन लोगो को बुलाया गया है। आज सबका सम्मान किया जाएगा।”

“सम्मान!” यह शब्द तो दादी का साथ कबका छोड़ चुका था।

टैम्पो में बैठते हुए दादी की आँखों में अपना अतीत नाच उठा। बर्षों पहले गुजर चुके दादाजी की याद ही बची है अब। देश में आजादी की लड़ाई अपने अन्तिम दौर में थी। देश को आजाद कराने के लिये वे महीनों घर नही आते थे। कभी अचानक रात के अंधेरे में आते और मुँह-अंधेरे ही निकल जाते। उनके पास ढेरों पैतृक सम्पत्ति व जगह-जमीन होने के बावजूद उन्होंने अपने घर को सुखी बनाने की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।

दादी अकेले घर में बैठी उनकी राह देखती, लेकिन भारत माँ आजाद नहीं थी इसलिए दादा जी को घर की ओर देखने की फुरसत नहीं थी। देश आजाद होने से पहले ही वे भारत माता के चरणों में शहीद हो गये। उनके गुजरने के बाद विधवा का जीवन एकाकी हो गया। उस अकेलेपन को दूर करने के लिए दादी ने अपने भाई के बेटे को गोद लिया। उसकी बुआ से बुआ-माँ बन गयीं।

दादी ने बड़े ही प्यार से अपने भतीजे को दत्तक पुत्र बनाकर उसका पालन-पोषण किया। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पत्नी होने के नाते जो पेंशन मिलती थी उन पैसों से बेटे की हर फरमाइश पूरी करतीं। अपने सुखद भविष्य की आशा लिये उन्होंने उस बेटे को बड़ा किया। जिस तरह माली अपने पौधों को इस उम्मीद में सींचता है कि उनमें फूल आये तो उसे देखकर मन खुश हो जाये, घर-आँगन में रौनक आ जाए और चारों तरफ हरियाली और सुख का एहसास हो, दादी ने उसी उम्मीद में अपने बेटे को बड़ा किया।

लेकिन बेटे ने बड़ा होते ही अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये। सबसे पहले महीने मे जो पेंशन मिलती थी उसकी पासबुक उसने अपने हाथ में ले ली और हर महीने माँ से अंगूठा लगवाकर पैसे उड़ा लेता। जमीन-जायदाद की देख-भाल करना तो दूर उसे बेचने के लिए उसने माँ को मारना पीटना भी शुरू कर दिया। माँ ने हमेशा उसे समझाने की कोशिश की लेकिन बेटे को मुफ़्त के पैसे उड़ाने की आदत पड़ गयी थी।

बूढ़ी माँ ने सोचा कि अगर बेटे की शादी हो जाए और कन्धे पर परिवार की जिम्मेदारी आ जाए तो यह शायद सुधर जाए। उन्होंने रिश्तेदारों से कह-सुनकर उसकी शादी तय कर दी। बड़े ही अरमान से अपने बेटे को सजाकर, दुल्हा बनाकर बारात भेंजा। नई बहू का उत्सुकता और उत्साह से इंतजार करने लगी। उन्होंने अपनी बहू के लिए दरवाजे से लेकर अंदर तक पियरी (पीले रंग में रंगी हुई धोती) बिछायी, ताकी बहू के पैर जमीन पर न पड़े। उन्हें लगा शायद बहू बेटे को सम्भाल ले जायेगी, लेकिन किसे पता था वह उससे भी चार कदम आगे निकल जाएगी। बूढ़ी माँ का सहारा बनना तो दूर, उसने माँ का घर मे रहना भी मुश्किल कर दिया।

जिस भारत माँ को आजाद कराने के लिए एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसी की पत्नी आज अपने ही घर में आजाद नहीं थी। अब जमीन-जायदाद ज्यादा तेजी से बिकने शुरू हो गये और माँ ने जब-जब उसका विरोध किया, तब-तब उसे बेटे-बहू से मार खानी पड़ी। बूढ़ी दादी अब अपने ही घर में डरी-सहमी रहती। हार कर सब कुछ सहते रहना उन्होंने मन्जूर कर लिया था। जब-जब घर में बहू को बच्चे होते या दूसरा कोई कार्यक्रम होता दादी अपना सब दुख भूलकर ‘सोहर’ या ‘संझा-पराती’ गाना नहीं भूलती।

बेटे ने एक-एक करके जब यहाँ की सारी जमीनें बेच दी तो उसे अपने पैतृक गाँव की याद आने लगी और वह अपने भाई बंधुओं के साथ रहने का निर्णय लेकर चला गया। बेचारी बुढ़िया दर-दर भटकते हुए भिक्षा मांगकर अपना जीवन चलाने पर मजबूर हो गयी। बेटे-बहू ने जाते-जाते बूढ़ी माँ का घर तक बेच दिया। जब वह उनके साथ रहने के लिए मायके गयी तो उसे बार-बार एहसास दिलाया गया कि यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है। बेचारी वहाँ से लौट आयी थी। अपने पति के बिक चुके मकान के एक कोने में रहने लगी।

आज दादी जहाँ भी जाती उसके दुख से सब दुखी होते लेकिन उस बिगड़ैल बेटे से कोई नहीं पूछता कि उसकी बूढ़ी माँ दर-दर की ठोकर क्यों खा रही है? दिन भर तो वह घूम-घूम कर भिक्षा मांगती और शाम को यदि किसी के दरवाजे पर रूकती तो उसे वहाँ से जाने के लिए कह दिया जाता। सबको यह डर होता कि अगर वह मर गई तो कौन उसका क्रिया-कर्म करेगा?

लेकिन आज दादी को बेटे-बहू सुबह से ही बड़े प्यार से पुचकार रहे थे। बेटा तो महीने के अन्त में केवल एक बार उसकी पेंशन निकालने और उड़ाने के लिए आता था। आज महीने के बीच में ही सबको आया देखकर उसे हैरानी हो रही थी। आखिर ऐसा क्या होने वाला है आज? दादी इसी उधेड़-बुन में उलझी हुई थीं तभी टैपू की खड़खड़ बन्द हो गयी। बेटे ने बताया कि मन्जिल आ गयी है और उसने दादी की बाँह पकड़कर नीचे उतार लिया।

समारोह स्थल की भव्य सजावट देखकर दादी चकित रह गयीं। वहाँ कार्यक्रम की तैयारियाँ देख दादी फूली नही समा रहीं थीं। झक सफेद कपड़ों का बड़ा सा पाण्डाल लगा था। भारत माता के तिरंगे झण्डे चारो तरफ लहरा रहे थे। जिले के सभी बड़े अफसर और गणमान्य लोग जुटे हुए थे। जमीन पर लाल-हरी कालीन बिछी थी, लाल फोम की गद्दी लगे हुए सोफे पड़े थे, चारों तरफ खाकी वर्दी में पुलिस वाले खड़े थे। दादी को लगता सब उन्हें सलामी देने के लिए खड़े हैं। आज दादी बहुत प्रसन्न थीं।

कार्यक्रम पूरी भव्यता से प्रारम्भ हुआ। बुजुर्ग सेनानियों या उनकी विधवाओं में से एक-एक कर के सबको बुलाया गया। दादी की बारी भी आयी। कमर से झुक कर चलने वाली दादी कुछ सीधे चलने का प्रयास करती हुई मंच तक पहुँची। कलेक्टर साहब ने सम्मान स्वरूप पच्चीस सौ रूपये और एक शॉल भेंट करते हुए जब झुककर प्रणाम किया तो दादी के चेहरे पर गौरव का भाव चमक उठा। खुशी के आँसू छलक आए।

धीरे-धीरे समारोह समापन की ओर चल दिया। बेटे ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह माँ का हाथ पकड़कर टैम्पो में बिठा दिया और दादी वापस लौट पड़ीं। लेकिन यह क्या…? कुछ दूर चलने के बाद टैम्पो रोअक दिया गया। दादी को नीचे उतारा गया। टैम्पो का भाड़ा देने के लिए ‘सम्मान’ वाले पच्चीस सौ रूपये बेटे के हाथ में आ चुके थे। माँ को वहाँ से गाँव की ओर जा रहे एक ट्रैक्टर की ट्रॉली में बिठा दिया गया। बेटा उन रुपयों के साथ बाजार में गुम हो गया।

घर पहुँचने पर बहूरानी ने झटसे साड़ी उतरवा ली। व्यंग्य वाण चलाये जा रही थी- “क्यों माँ जी…! सम्हल कर नहीं बैठ पा रही थीं। …नई साड़ी में मिट्टी पोत आयीं।” पोती ने अपने चप्पल निकाल लिए और धोकर रखने लगी। पोते को अपने मोजे खराब लगने लगे। बेचारी बुढ़िया ने एक कोने में पड़ी कई जगह से फटी और गाँठ लगी धोती जमीन से उठकर पहना और घर के दूसरे कोने में जाकर टूटी चारपाई पर लेट गयी। अब उसकी ओर देखने वाला कोई नहीं था।

लेटे-लेटे उनकी आँखो में सम्मान समारोह का दृश्य नाच उठा। कितने बुजुर्ग सेनानी आए थे। काश वे भी उनमें एक होते। उनकी याद करते-करते आँख लग गयी…। किसी ने खाना खाने के लिए भी नहीं जगाया। सुबह होने पर घर वालों ने देखा कि दादी की चारपायी खाली है। उन्हें ढूँढने का प्रयास कम ही किया गया। उस दिन के बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा…।

शायद सम्मान पाने के बाद वह ‘उनके’ पास चली गयी। उन्हें बताने…

-(श्रीमती) रागिनी शुक्ला

प्रस्तुति: रचना त्रिपाठी

Saturday, June 6, 2009

हरा ही हरा… पर गाय ने नहीं चरा !? :(

सत्यार्थ के मुण्डन के उद्देश्य से गाँव जाना हुआ। करीब दस दिनों के बाद घर वापस आकर देख रही हूँ कि आस-पास काफी कुछ बदल गया है।

मुण्डन नहीं कर्तन हुआ जी.. बेटे के सिर पर उग आयी फसल तो परम्परा के अनुसार कटवा- छँटवा कर ‘कोट माई’ के स्थान पर चढ़वा दिया। लेकिन इस अवधि में यहाँ घर के चारो तरफ खूब हरियाली उग आयी है- खर पतवार की। अवांछित घास-पात की बढ़वार से सब्जियाँ तो उसमें खो ही गयी हैं। घर के अंदर से लेकर बाहर तक और लॉन से लेकर किचेन गार्डेन तक हरा ही हरा दिख रहा है। जिस लॉन की हरियाली बनाये रखने के लिए मई के महीने में पानी दे-देकर मैं थक गयी थी, आज उसी लॉन में एक फिट लम्बी घास आ गयी है।

किचेन गार्डेन की हालत तो देखने लायक है। इसको गाय से बचाने के लिये महीनों पहले मेरे श्रीमान जी ने क्या-क्या जतन नहीं किए थे। गेट की सॉकल ठीक कराने के लिए लोक निर्माण विभाग को पत्र लिखा। नहीं बन सका तो उसे तार से बांधा, ईंट का ओट लगाया ताकि गेट को धकियाकर वह ‘शहरी बदमाश’ गाय अंदर न आ सके। लेकिन आज मन होता है कि गेट को खोलकर गाय-भैंसों को दावत दे दूँ। शायद मेरा काम थोड़ा हल्का ही कर जाँय। लेकिन अब तो गाय भी आने से रही। बाहर की सड़क पर ही अघा रही है।

फूलों में घास या घासों में फूल फूलों में घास या घासों में फूलमैं तुलसी तेरे आँगन की मैं तुलसी तेरे आँगन कीभिण्डी का सत्यानाशभिण्डी का सत्यानाश 

गाँव से लौटकर कितना काम बढ़ गया है मेरे जिम्में- घर की सफाई, खेती की निराई और इससे भी बड़ा मेरा ब्लॉग जो लम्बा अन्तराल ले चुका है। कैसे होगा ये सब? इसी में हफ़्तों से मेरे कई सीरियल भी छूट गये हैं। बेटी के ग्रीष्मावकाश का लम्बा होमवर्क भी पूरा कराना है। :(

ये कह रहे हैं, “बहुत कुछ गिना दिया जी… अब रहने भी दो…!”

“अच्छा रहने देती हूँ… ”

अरे वाह! बातों-बातों में मेरा एक काम तो पूरा ही हो गया। नहीं समझे…? अरे वही, ब्लॉग पोस्ट लिखने का…। ये दबाया मैने पब्लिश बटन…॥smile_regular॥

(रचना त्रिपाठी)

Sunday, May 24, 2009

मेरा नाम अन्हरी नही, रीता है...!

 

उस दिन मेरे गाँव में बड़ा अजीब वाकया हो गया था। एक गरीब के घर बारात आयी थी। अपनी क्षमता के अनुसार स्वागत सत्कार किया था उसने। दूल्हे को विवाह मण्डप में ले जाकर बिटिया का पाणिग्रहण करा दिया। दोनो कोहबर में गये। फिर एक विशेष रस्म करने के लिए दूल्हे को आंगन के मणवा में दुबारा बैठाया गया। दूल्हन घूँघट डालकर दुबारा आँगन में आयी, दुबारा सिन्दूरदान कराया गया। कम उम्र का दूल्हा सबकुछ करता गया। काम से निवृत्त होकर ‘जनवासे’ में गया। अपने अभिभावकों से दुबारा सिन्दूरदान का किस्सा बताया तो शक के बादल घिरने लगे। पूछताछ शुरू हुई।

मामला तूल पकड़ता देखकर गरीब पिता को रहस्य पर से पर्दा हटाना पड़ा। दरअसल रामवृक्ष की तीन बेटियाँ थीं। गीता, रीता और राधिका। उनमें सबसे बड़ी गीता का विवाह तय हुआ था। उसके पाणिग्रहण के बाद जब वह कोहबर में चली गयी तो परिवार वालों ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार दूसरी बेटी रीता जो बचपन में चेचक के प्रकोप से अन्धी हो गयी थी, उसे विवाह मण्डप में बैठाकर उसकी मांग में भी सिन्दूर डलवा दिया। यह सोचकर कि इस अन्धी से तो कोई शादी करने से रहा। बड़े दामाद के हाथों सिन्दूर का सौभाग्य पाकर शायद आजीवन अनब्याही कहलाने का कलंक मिट जाय।

गरीबी के भी खेल निराले हैं। लड़के वालों ने इस योजना को मानने से इन्कार कर दिया और गीता को विदा करा ले गये। रीता अपनी मांग के सिन्दूर के साथ मायके में ही रह गयी। तब उसकी उम्र कोई ग्यारह-बारह साल की ही रही होगी। बीड़ी बनाकर गुजारा करने वाले परिवार की रीता को सारा गाँव ‘अन्हरी’ (अन्धी) ही पुकारता था। उसे भी अपना यही नाम पता था।

मेरी और रीता की उम्र लगभग एक ही थी। मै जब भी गाँव में घूमने निकलती तो देखती कि वह अपने घर के चबूतरे पर बैठे या तो कुछ खाती रहती या आते-जाते लोगों की आहट सुनती रहती। उसके शरीर पर हजारों मक्खियाँ भिनभिनाती रहतीं मानो जैसे उसके आस-पास मिठाई का शीरा गिरा हो। मै घंटो उसके क्रिया-कलाप देखती रहती।

रीता धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। उसके घर वाले दिन-प्रतिदिन उसकी चिन्ता में दुबले होते जा रहे थे। आये दिन उसकी माँ मेरे पापा के सामने आकर अपनी समस्या का समाधान पूछ्ती और घंटों रोती रहती। पापा उसको रोज एक ही बात समझाते कि उसे अंधों वाले स्कूल में डाल दो, पर उसकी माँ बार-बार पैसों का रोना रोती कि किसी तरह दो वक्त की रोटी मिल जाती है, यही बहुत है। …कहाँ से इतना पैसा लाउंगी।

पापा ने उसे समझाया कि उस स्कूल में सभी बच्चों के पढ़ाने का खर्च सरकार देती है। तुम्हें उसकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। बस तुम किराया जुटा लो। यह बात उसके भेजे में नही घुसती। इस सलाह पर उसके आँसू सूख जाते और वहाँ से बुदबुदाते हुए चली जाती……

“आन्हर बेटी कईसे पढ़ी?”।

उसकी माँ की रूढ़िवादी सोच उसके दिमाग पर ऐसी हावी हो गयी थी कि बड़ी बेटी के साथ ही इस अन्धी बेटी का हाथ पीला कर उससे निजात पाने की साजिश रचने में भी उसे संकोच नहीं हुआ। लेकिन होनी तो कुछ और लिखी थी।

बर्षों बीत गये,…ससुराल वालों ने रीता की कोई खबर नही ली। इधर रीता के घर वाले जब काम पर बाहर चले जाते तब गाँव के कुछ शरारती लड़के रीता के साथ छेड़खानी करते रहते। …कभी उसके सिर में ठोंकते तो कभी उसका दुपट्टा खींचते। …रीता एक साथ माँ बहन की सौ-सौ गालियाँ देती। ऐसी गालियाँ कि सुनने वालों के दाँत रंग जाते। रोज-रोज एक ही पंचायत “आज अन्हरी फिर गरियवलस…” (आज अन्धी ने फिर गाली दी)

अन्ततः रीता की माँ के पास मेरे पापा की सलाह मानने के अलावाँ कोई चारा नही बचा। एक दिन उसकी माँ रोती-बिलखती पापा के पास आयी और कहने लगी-

“बाबू! कुछ पैसों का प्रबन्ध करके अन्हरी को गाँव से हटा ही दीजिए तो अच्छा है, नहीं तो गाँव के लड़के उसको जीने नही देंगे।”

पापा को तो मानो उसकी माँ की इज़ाजत का बर्षों से इंतजार था। उन्हें देहरादून के एक ‘ब्लाइंड स्कूल’ के बारे में जानकारी थी। उन्होने थोड़ा प्रयास किया और वहाँ उसका दाखिला हो गया। तेरह-चौदह साल की उम्र में कक्षा-एक की छात्रा बनी।

दाखिले के छ: महीने बाद रीता जाड़े की छुट्टियाँ मनाने गाँव आयी। पूरे गाँव में शोर मचा…

“अन्हरी आ गइल…!”

यह आवाज रीता के कानों तक भी पहुँची। लेकिन इस बार कोई गाली नहीं दिया उसने। बड़ी ही सज्जनता से जबाब दिया-

“मेरा नाम अन्हरी नही, रीता है।”

गाँव वाले रीता के इस बदलाव को देखकर अचम्भित रह गये। पर कुत्ते की दुम कब सीधी होनी थी? ...दो-चार दिन बाद गाँव के वो शरारती बच्चे फिर रीता को रोज चिढ़ाने लगे। लेकिन रीता बदल चुकी थी। अब उसको गाँव के इस माहौल से ऊबन होने लगी थी। वह रोज सुबह उठती, अपना नित्यकर्म करने के बाद, अपनी माँ की उँगली पकड़े मेरे घर आ जाती। उसके पहनावे और रहन-सहन को देखकर, सबको हैरानी होती।

…क्या यह वही अन्हरी है…?

पापा को उसके बात करने का ढंग इतना अच्छा लगता कि वह मुझे बुलाते और कहते कि इसके पास बैठो और इससे बातें करो। रीता मेरे घर सुबह करीब आठ बजे आती और शाम को जब उसकी माँ अपने सारे काम निबटा लेती तब उसे ले जाती।

यह सिलसिला हर साल जाड़े की छुट्टियों में चलता रहा। बातों के सिलसिले में मैने पहली बार रीता के मुँह से ‘जीसस’ का नाम सुना।

मैने पूछा, “जीसस? …यह किस चिड़िया का नाम है?”

रीता ने बड़े प्यार से जबाब दिया, “मेरे भगवान। …वही तो हम सबके रखवाले हैं।”

वह मुझे घंटों प्रवचन सुनाती रहती। उसकी बातें खत्म होने का नाम नहीं लेती। मैं भी पापा के हटने का इंतजार करती। उनके हटते ही मै भी वहां से उड़न छू हो जाती।

रीता किसी के आने की आहट सुनती तो तुरंत पूछती ‘कौन’?...खाली समय में वह प्रायः स्वेटर बुनती रहती। कुछ भी खाने को दिया जाता तो पहले अपने हाथ अवश्य धोती।

रीता हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आती थी। उसकी लगन और प्रतिभा को देखकर उसकी उम्र के लिहाज से स्कूल में उसे एक साल में दो-दो कक्षाएं पास करायी गयीं। इस तरह उसने जल्द ही ग्रेजुएशन पूरा कर लिया।

उसके व्यक्तित्व के इस आकर्षण को देखकर, वह लड़का जो अनजाने ही ‘अन्हरी’ का दुल्हा बना दिया गया था, उसने रीता का पति होने का अधिकार जताते हुए उसे विदा कराने का दावा कर दिया। लेकिन गुणवन्ती रीता उस अन्हरी की तरह मजबूर और दया की पात्र नही रह गयी थी। उसने मना कर दिया। उसे तो अपनी नयी दुनिया में ही उसके मन का मीत मिलना था। संस्था ने उसके लिए नौकरी ढूँढ दी और नौकरी ने उसी के मेल का एक जीवनसाथी दिला दिया।image

दो साल पहले रीता ने अपने मिस्टर राइट के साथ घर बसा लिया। दोनों साथ ही नौकरी करते हैं। इधर गाँव में अन्हरी को छेड़ने वाले छिछोरे बेरोजगारी और लाचारी का अभिशप्त जीवन जी रहे हैं और अपनी दोनों आखों से रीता की ऋद्धि-सिद्धि देख रहे हैं।

शिक्षा का असर गाँव-गाँव, शहर-शहर में बड़ी ही तेजी से दिखाई दे रहा है। हम अंदाजा नही लगा सकते कि शिक्षा की वजह से हमारा समाज कितना तेजी से प्रगति कर रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण हमारे गाँव के इस किस्से में देखने को मिला।

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, May 19, 2009

घर में ब्लॉगेरिया का प्रकोप …भूल गये बालम!!!

मैने सुना था कि आइंस्टीन अपने घर का पता ही भूल जाया करते थे। आज मेरे घर भी कुछ ऐसा अजीबोगरीब हादसा हुआ। यहाँ कसूरवार भौतिकी की कोई उलझन नहीं थी। …शायद ब्लॉगरी रही हो इसके पीछे। पढ़कर आप भी पूछेंगे जैसे मैं पूछ रही हूँ-

“क्या ब्लॉगरी करते-करते ऐसा भी हो जाया करता है?”

भूल गये बालम आज श्रीमान जी सुबह अच्छे भले उठे। अपना दैनिक कार्य किया और स्टेडियम खेलने भी गये। अपने समय से ऑफिस को निकल पड़े। दोपहर में ऑफिस से फोन आया।

पूछने लगे, “वहाँ कम्प्यूटर टेबल पर मेरे चश्में का शीशा है क्या?”

मैं दोपहर की मीठी नींद से उठी, मेज पर टटोल कर देखा फिर जवाब दिया, “ यहाँ तो नहीं है? क्या हुआ?”

“देखो, शायद फ्रिज के ऊपर या उसके कवर वाली जेब में हो”

“अच्छा…!! …यहाँ भी नहीं है जी। …आखिर बात क्या है”

“ओफ़्फ़ो…! ठीक से ढूँढो न, ”

“कहाँ खोजूँ…? …एक ही शीशा है कि दोनो…?” “…और चश्मा कहाँ है?”

“वो तो मेरे पास है…” “ अच्छा देखो… बैडमिण्टन किट की ऊपरी जेब में तलाशो।”

अरे, वहाँ कहाँ पहुँच जाएगा…? ….लीजिए, यहीं है। लेकिन एक ही शीशा तो है?”

“चलो ठीक है…” उन्होंने फोन काट दिया। मैं बच्चों को लेकर फिरसे सुलाने चली गयी।

? ? ? ? ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ? ? ? ?

शाम को जब ये ऑफिस से लौटे तो कुछ देर बाद मैंने चश्में के शीशे के बारे में जानना चाहा। जब पूरी कहानी मालूम हुई तो हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो गये।

हुआ यूँ कि इन्होंने धूप की वजह से ऑफिस के लिए पैदल न निकल कर स्कूटर से जाने की सोची और हमेशा की तरह आँखों को गर्म हवा से बचाने के लिये फोटोक्रोमेटिक चश्मा भी चढ़ा लिया। वो चश्मा जिसका एक शीशा बेवफाई करके सुबह-सुबह मेयो हाल में ही फ्रेम से अलग हो बैडमिन्टन-किट की जेब में दुबक गया था। मेरे श्रीमान जी को स्टेडियम से शीशाविहीन चश्मा लगाकर घर आने और फिरसे तैयार होकर ऑफिस जाने के समय दुबारा लगाते वक्त भी इस बात का पता नहीं चल पाया था।

बता रहे थे कि इन्हें ऑफिस में जब एक दो घण्टे का शुरुआती काम पूरा करने के बाद फुरसत मिली तब अचानक मेज पर रखे चश्में पर निगाह डालने पर अपनी भूल का ज्ञान हुआ… लिखने पढ़ने का काम तो ये बिना चश्में के ही करते हैं। केवल स्कूटर पर धूल, हवा और धूप से बचने के लिए ही लगाते हैं।

उसके बाद चश्में का बाँया शीशा अपने कार्यालय कक्ष में कई राउण्ड खोजते रहे। सारी फाइलें उलट-पलट कर देख डालीं। मेज कुर्सी के नीचे भी झाड़ू लगवाया। बॉस के कमरे में भी गये। वहाँ सबने मिलकर ढूँढा। सभी दराजें और रैक भी चेक कर लिए गये। इसी बहाने कम्प्यू्टर टेबल के पिछवाड़े जमी धूल भी साफ हो गयी। तीन चार चपरासी लगाये गये। ...लेकिन सब बेकार। अन्ततः नया शीशा लगवाने का निर्णय हुआ।

अब एक के चक्कर में दोनो शीशे नये लेने पड़ेंगे...। अचानक इन्हें सूझा कि एक बार घर पर भी पता कर लेना चाहिए। फोन पर डायरेक्शन देकर मुझसे खोज करायी गयी तो शीशा ऐसी जगह मिला जहाँ सबसे कम सम्भावना थी।

“तो क्या दो-दो बार स्कूटर चलाने पर भी काना चश्मा आपका ध्यानाकर्षण नहीं कर सका?”

“वही तो..., मैं भी हैरत में हूँ। मुझे पता क्यों नहीं चल सका?”

हँसते-हँसते मेरी हालत खस्ती हुई जा रही थी। तभी इन्होंने आखिरी बात बतायी-

“जानती हो, इसी बात का पता लगाने के लिए मैं ऑफिस से वापस आते वक्त भी यही चश्मा लगा कर आया हूँ। …शहर में स्कूटर की स्पीड इतनी तेज होती ही नहीं कि आँख पर हवा का दबाव महसूस हो। बिना नम्बर का सादा चश्मा ऐसी बेवकूफ़ी भी करा गया…”

“तो क्या बिलकुल अन्तर नहीं था दोनो आँखों में…?”

मुझे सबसे ज्यादा मजा तब आया जब इन्होंने बताया कि ध्यान देने पर एक आँख मे हवा लगती महसूस हो रही थी।

क्या आप इसे ब्लॉगेरिया नहीं कहेंगे?

दरअसल गलती मेरी ही थी। आज ऑफिस निकलते समय मैनें इन्हें ‘सी-ऑफ़’ नहीं किया था। शायद ‘किचेन गार्डेन’ में पानी लगा रही थी।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, May 14, 2009

मुकदमेंबाज की दवा

हमारे गाँव के उत्तर-पश्चिम कोने पर एक ब्राह्मण परिवार रहता है। जो वर्षों पहले कहीं बाहर से आये थे और इन्हें गाँव के बड़कवा१ ‘बाबा’ के परिवार ने थोड़ी जमीन दे दी थी तबसे वहीं ये लोग घर बनाकर रहने लगे थे। इस परिवार में माँ-बाप के अलावा, दो बेटे और एक बेटी थी। बेटे बड़े हुए तो बड़े बेटे की शादी हो गई। वह पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की खेती-बाड़ी कराने लगा। दूसरा बेटा वकालत की पढ़ाई करके वकील बन गया। लोकल कचहरी में चौकी लगा कर बैठने लगा।

उमेस उपधिआ२ वकील क्या बन गये गाँव में ही बवाल काटने लगे। कोई ऐसा बचा नहीं जिसके ऊपर उन्होंने मुकदमें का दाँव लगाने का प्रयास न किया हो। अब गाँव में लोगो के चेहरे पर आए दिन उदासी छायी रहती। हर एक दिन हो-हो हल्ला मचता कि आज किसी की बकरी इनके दरवाजे पर बंधी है तो किसी की भैंस। लोग गुहार लगाने ‘बाबा’ के घर आते और गिड़गिड़ाना शुरु करते-

“…बाबा हमार भँइसिया ढांठर लेके जात बाटें”

“…क्यों और कौन?”

...बाबा, मोहन उपधिया; …हमार भँइसिया उनके दुअरिया पर जवन बेलवा के पेड़वा बा, ओही में से पत्ता खात रहे त मोहन खिसिया गईलें। …अउरी रोज-रोज धमकी देत बाटें कि उमेसवा वकील बन गईल बा। अब तहनी के बतावऽता… आपन चउआ-चापर३, आ आपन लइका-संभार के राखऽजा। ...मालिक, आफ़त बसा देहनीं गांव में …जीयल काल कऽ देले बाने सों।…”

अब भला बाबा क्या कर पाते, शिकायत एक वकील के खिलाफ़ जो की जा रही थी। बड़े-बड़े गँवई विवाद की पंचायत चुटकी मे निपटा देने वाले बाबा यहाँ बेबस हो जाते। बाबा को क्या पता कि ये गाज उनके घर भी गिरने वाली है।

गाँव के वकील साहब अब रोज सबेरे-सबेरे अपने दरवाजे पर खड़े होकर किसी न किसी को मुकदमे की धमकी देते रहते। धीरे-धीरे बच्चों के झगड़े भी सामने आने लगे। गाँव वालों ने अपने-अपने बच्चों को हिदायत दे रखी थी कि वकील साहब के घर के बच्चों के साथ नही खेलना है। उनके साथ खेलने का मतलब होता झगड़ा और फिर मुकदमें को दावत।

वकील साहब की शादी अभी नही हुई थी । वे अपने बड़े भाई के बच्चों के लिए तो ‘सुपरमैन’ बन गये थे। बच्चे भी उन्हें चाचा के बजाय ‘छोटका पापा’ कह कर बुलाते थे। जो काम बड़का-पापा नही कर पाते, वो सारे काम छोटका-पापा पूरा करते। इनके घर के बच्चे किसी से भी बेहिचक लड़ाई कर सकते थे। इनको तो कोर्ट ने जैसे इजाजत दे रखी थी। खेल-खेल मे खुद तो बच्चों के साथ मार-पीट करते ही, अगर भूल कर भी किसी बच्चे ने इनके ऊपर हाथ उठा दिया, तब तो उसकी शामत आ जाती।…

कुछ ही देर में सारा गाँव वकील साहब के दरवाजे पर तमाशा देखने के लिए मौजूद रहता। उन बच्चों की माता जी और बड़का-पापा जोर-जोर से दहाड़ते,

“…तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बच्चों को छूने की, …आने दो वकील साहब को, तुम लोगो का दिमाग ठिकाने आ जायेगा।”

जो-जो बच्चे उस खेल मे शामिल होते उनके घर वाले बड़का-पापा की घंटो मनौनी करते। …शाम होते ही बच्चे छोटका-पापा का बेसब्री से इंतजार करते। आज के नये शिकार की सूचना देने के लिए बेचैन रहते। …स्कूटर की आवाज सुनते ही घर वालों के चेहरे पर ऐसी खुशी झलकती, जैसे मानों वकील साहब के बरदेखउवा४ आये हों, और उन्हें कोई उपहार देकर गये हों। उनमें छोटका-पापा को झगड़े की बात सबसे पहले बताने की होड़ होती।

वकील साहब की मुकदमेबाजी की चपेट मे धीरे-धीरे ‘बाबा’ का घर भी आने लगा। छोटी-छोटी बात पर उनके घर के बच्चों को भी हाथ पकड़ कर उनके घर ले जाकर शिकायत करते। ये बच्चे भी कभी-कभार अपने ही घर वालों से मार खा जाते। …यह कार्यक्रम लम्बे समय तक चलता रहा। वकील साहब का आतंक दिन पर दिन बढ़ता रहा। धीरे-धीरे बाबा के नाती-पोते भी सयाने हो गये।

एक दिन बाबा के घर कुछ मेहमान आये थे। वकील साहब की भतीजियों का बाबा के घर आना-जाना लगा रहता था, बाबा के घर आयी हुई कुछ लड़कियों और वकील साहब की भतीजियों में कहा-सुनी हो गई, यह बात वकील साहब को रास नही आयी। सबेरे-सबेरे चले आये शिकायत लेकर। यह सारी बातें, बाबा का छोटा वाला नाती जो बचपन से यह सब देखते हुए बड़ा हुआ था उसको यह बात नागवार लगी। वह अचानक उठा और सांड़ की तरह वकील साहब की ओर झपट पड़ा। उसने वकील साहब का एक हाथ पकड़कर पीछे की ओर ऐंठ दिया और दहाड़ उठा,

“ …मुकदमा करना है तुम्हें, …चल, …मेरे उपर मुकदमा कर, …वर्षों से देख रहा हूँ तुझे,” वकील साहब अचानक हुए इस हमले के लिए तैयार न थे। सिट्टी-पिट्टी गुम थी। रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचा था।

बाबा के घर के बड़े लोगों ने किसी तरह वकील साहब को छुड़ाकर वहां से भगाया। तबसे कोई नया मुकदमा नहीं हुआ। गाँव वाले अब राहत में हैं, …और बाबा के नाती को लाख-लाख दुआएं देते हैं। अब वकील साहब का गाँव में आना और जाना पता ही नही चलता। …लगता है उन्होंने स्कूटर बेच दिया।

१.बड़कवा- गाँव का सर्वाधिक प्रतिष्ठित और प्रभावशाली परिवार

२.उमेस उपधिआ- उमेश उपाध्याय

३. चउआ-चापर- पालतू जानवर, गाय-भैंस-बैल आदि चौपाये

४.बरदेखउआ- लड़के से शादी के रिश्ते के लिए उसे (वर को) देखने आने वाले

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, May 9, 2009

कानून के रक्षक या भक्षक... मानव या दानव?

पिछले दिनों शहर में डॉक्टर्स और वकीलों के बीच भिड़न्त हो गई। कारण ये कि दो महीने से एक वकील साहब अस्पताल में भर्ती थे, दुर्भाग्यवश ना जाने किस कारण से ये भगवान को प्यारे हो गये। वकीलों में डॉक्टरों के खिलाफ़ रोष पैदा हो गया और ये उस डॉक्टर के विरुद्ध धारा ३०२ में एफ़.आई.आर. कर डाले। यानि हत्या का मुकदमा।

दंगाई वकील

जगह- जगह नारेबाजी शुरू हो गई। …डॉक्टर भी भड़क गये। वकीलों के खिलाफ़ शहर के सारे डॉक्टर इकठ्ठे हो गये और धरना प्रदर्शन शुरु कर दिया। करीब तीन-चार सौ चिकित्सा कर्मी जिसमें कुछ पैरा-मेडिकल स्टॉफ़ भी मौजूद थे, सड़क पर निकल आए। डॉक्टर साहब लोग अपने तो पीछे खड़े रहे और सामने अपने स्टॉफ़ को लगाये रहे। दोनों पक्षों की तरफ़ से धुँआधार नारेबाजी के पटाखे छूटने लगे। धीरे धीरे इन पटाखों से आग लगनी शुरु हो गई। नतीजा ये हुआ दोनों पार्टियों के बीच हाथा-पाई और जूता-चप्पल का लेन-देन शुरु हो गया।

कुछ बौराए वकीलों के हत्थे चढ़ी एक नर्स। उनका झुंड उस महिला के उपर ऐसे टूट पड़ा मानों किसी मरी हुई बिल्ली पर चील-कौए झपट रहे हों। मानवता तार-तार हो गई। उस गरीब की कमजोर काया पर लात-घूसों की झड़ी लग गयी। शुक्र है कि उसकी प्राणरक्षा की गुहार कुछ सरकारी कर्मचारियों के कान तक पहुंच गयी और उसे बचा लिया गया।

ये इंसान थे या जानवर? ये भूल चुके थे कि इनका जीवन एक माँ का कर्ज है। मै पूछती हूँ, जिस वकील ने इस नर्स के पेट में लात मारी क्या उस समय उसे, उसकी माँ याद नही आयी? जिस वकील ने उसके सीने पर लात मारी क्या उसे अपनी बहन याद नही आयी? जिसने उसके बाल पकड़ कर घसीटा उसे अपनी बेटी याद नही आयी? ये वही कानून के पेशेवर है जो खुद कानून की इज्जत नही करते, जिनके आँख का पानी मर चुका है।

ऐसे दरिन्दों से कानून की रक्षा की उम्मीद क्या की जाय?

(रचना त्रिपाठी)