Thursday, December 4, 2014

इज्जत बचाने की सहनशक्ति...?

आज सुबह बच्चों को स्कूल-बस तक छोड़ने के लिए बिल्डिंग के नीचे आकर बाहर सड़क पर निकली तो देखा एक भाईसाहब सामने की दुकान से आँख मलते हुए बाहर निकले और सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग की चारदीवारी की ओर बढ़े। उन्होंने आव देखा न ताव, मेरे सामने ही दीवार पर मूत्र विसर्जन की तैयारी करने लगे। पहले तो मैं थोड़े असमंजस में पड़ गयी, फिर मैंने सोचा कि इन्हें एक बार आवाज देकर जगा ही दूँ। शायद इनकी तमीज की नींद खुल जाय। हमने टोका - भाई साहब क्या कर रहे हैं आप..? वे अपना एक हाथ उठाकर अफसोस नुमा चेहरा बनाकर मेरी बात मान गये और उल्टे पांव वापस चले गये। तब तक उसी दुकान से दूसरे महाशय जो बहुत दबाव में दिखे उसी मुद्रा में कूदते हुए चले आ रहे थे। मुझे वहाँ खड़ा देखकर अचानक उनके कदम रुक गये और वे अपने एक हाथ से सिर का बाल सहलाते हुए वहीं खड़े हो गये।

दोनों शरीफ़ प्राणी करीब दस मिनट तक मेरे वहाँ से चले जाने का इंतजार करते रहे। मैं भी उनकी इस परेशानी को समझ रही थी मगर क्या करती; स्कूल-बस आज देर कर रही थी। सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी का तकाजा था कि जबतक बच्चे बस के भीतर न चले जाँय तबतक वहीं प्रतीक्षा करती रहूँ। इस प्रतीक्षा अवधि में मेरा मन सामने प्रकट हुए इस मुद्दे पर सोचता रहा। यह प्राकृतिक कार्य तो वे वहीं रोज करते हैं। उनके इस कृत्य से हम बिल्डिंग वाले परेशान भी रहते हैं। इनकी लघुशंका का समाधान करते-करते प्रायः बन्द रहने वाला हमारी बिल्डिंग का पिछला गेट तो खराब हो ही चुका है अब चार दीवारी की बारी है। हमने मजबूर होकर उस गेट को भी खोलने बन्द करने का सिलसिला शुरू कराया,  दो-तीन बार तो वहां चूना भी डलवाया ताकि गंदगी कट जाय और कहीं इनके आँख में थोड़ा सा भी पानी बचा हो तो स्वच्छता पर घिरे इनकी फूहड़ता के बादल छँट जाय।

खैर जो भी हो, उनकी आँखों में अपने लिये इतना लिहाज़ देखकर मैं खुश थी। तब मैने उन्हें वहां कभी भी पेशाब करने से मना किया। उन्हें ये बात रास नहीं आयी और बड़ी ही बेशर्मी से हमसे ही पूछ बैठे- तो आपही बता दें कि हम इसके लिये कहाँ जाएँ? मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी। हक्का- बक्का खड़ी थोड़ी देर तक अपने दायें-बायें झांककर मानो उनके लिए विकल्प तलाशती रही; लेकिन कुछ नजर नहीं आया। अब उस आदमी की बड़ी-बड़ी लाल आँखें और काला-कलूटा चेहरा देखकर मुझे थोड़ा डर भी लगने लगा। मगर इस डर को मैंने दूर झटक दिया और उन्हें अपनी दुकान वाली बिल्डिंग में ट्वाएलेट बनवाने की सलाह दे डाली।

उन्होंने यह कहते हुये साफ मना कर दिया कि हमारी बिल्डिंग में शौचालय के लिये जगह नहीं है। हम नहीं बनवा सकते। मतलब उनके पास बस यही एक विकल्प था। साफ था कि इनके अंदर सामाजिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। फिर मै अधिकारों की बात पर उतर आयी और उनसे साफ-साफ कह दिया कि आपको हमारी बिल्डिंग की दीवार और गेट को गंदा करने का कोई अधिकार नहीं है। क्या आप अपने दरवाजे पर; दुकान के सामने या दुकान के अंदर पेशाब कर सकते हैं..? यदि ऐसा कर सकते हैं तो बिल्कुल करें मैं मना नहीं करुंगी। यह आपकी समस्या है; पर सड़क पार करके मेरी बिल्डिंग पर मत करें। इस बात पर उनकी बोलती बंद हो गई। शायद सोच रहें होंगे कि शराफत का जमाना नहीं है थोड़ी सी तबज्जो दी तो सिर पर चढ़ गयी।

बिल्डिंग के अंदर कुछ शुभचिंतक टाइप महिलाएं मुझे इस तरह से मर्दों के साथ टोका-टाकी करने से मना करती हैं। उनका कहना भी सही है कि कौन जाने ये मर्द किस बात पर इगो पाल लें, घात लगाये बैठे रहें और कहीं मौका मिलने पर मेरे साथ कुछ उँच-नीच कर बैठें। फिर तो समाज में मेरी क्या ‘इज्जत’ रह जायेगी? लेकिन ये बात मेरी समझ में नहीं आती है कि कितनी नाजुक और भंगुर होती है स्त्रियों की इज्जत जो एक बार चली गई तो फिर लौट कर नहीं आती; यह भी कि कैसे-कैसे जघन्य अपराध सह लेने के बाद भी बनी रहती है और जरा सी बात हवा में फैल जाय तो चकनाचूर हो जाती है।

इज्जत के नाम पर एक अवांछित प्रेम-संबंध के लिए एक लड़की की हत्या करने में जब एक स्त्री भी शामिल हो जाती है तो उसकी इज्जत नहीं जाती, घर के भीतर तमाम तरह के शोषण और बलात्कार का शिकार होते हुए भी उफ़्फ़ तक न करने पर इज्जत बनी रहती है लेकिन अगर शिकायत की आवाज बाहर निकल गयी तो इज्जत मटियामेट हो जाती है। किसी धोखेबाज भेंड़िए की वासना का शिकार हुई मासूम बेटी का गर्भपात किसी महिला डॉक्टर को मोटी रकम देकर चुपके से करा देने पर इज्जत बची रह जाती है लेकिन उस अपराधी के खिलाफ आवाज उठाते ही इज्जत तार-तार हो जाती है। राह चलते हुए आगे-पीछे से सीटी मारते लफंगो और उनकी अश्लील टिप्पणियों के बीच सिर झुँकाए अपमान का घूँट पीते हुए घर लौट आने पर इज्जत बची रहती है लेकिन पलट कर मुँहतोड़ जवाब देते ही इज्जत में बट्टा लग जाता है।

उफ्फ..इन महिलाओं को  कैसे उबारा जाय इस इज्जत जाने की ‘फोबिया’ से जो उन्हें अपने लिए ही कुछ अच्छा करने से रोकता है और चैन से सोने भी नहीं देता।

(रचना त्रिपाठी)

Friday, November 28, 2014

ज्योतिष पर बहस के साइड-इफेक्ट्स

आजकल मैं बड़ी दुविधा में हूँ। जबसे स्मृति ईरानी ने एक ज्योतिषी से अपना हाथ दिखा लिया है, बल्कि जबसे उनके द्वारा ज्योतिषी से हाथ दिखाने का प्रचार इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ने कर दिया है तबसे तमाम प्रगतिशील और वैज्ञानिक टाइप लोग इसपर तमाम लानत-मलानत करने पर उतर आये हैं। रोज-ब-रोज देश की छवि मटियामेट हो जाने से चिन्तित लोगों को देखकर मेरा मन भी धुकधुका रहा है। इस बहस में कहाँ रखूँ अपने आप को? हमने जन्तु विज्ञान में परास्नातक किया है। मतलब हाईस्कूल, इंटर, बी.एस-सी. और एम.एस.सी. सबकुछ `साइंस-साइड' से। लेकिन मेरी सभी परीक्षाओं का फार्म भरवाने से पहले अपने खानदानी पंडितजी जो ज्योतिष के प्रकांड विद्वान माने जाते हैं उनसे पापा ने शुभ-मुहूर्त जरूर दिखवाया है। यह बात भी सत्य है कि हम बिना फेल हुए हर साल अच्छे नंबर से पास भी होते रहे हैं। ऐसे में क्या आप एक विज्ञान के विद्यार्थी से यह उम्मीद करते हैं कि वह इतना अंधविश्वासी होगा…?

जन्म से लेकर आजतक हमारा कोई महत्वपूर्ण कार्य पंडितजी की राय या अनुपस्थिति में नहीं हुआ है। हम तो यही देखते आये हैं कि घर में कोई शुभ-कार्य करना है, यहाँ तक कि कहीं दूर की यात्रा पर भी जाना है तो बिना पंडितजी से शुभमुहूर्त दिखाये नहीं जाते है। शिक्षा- दीक्षा रही हो या विवाह का योग; दूल्हे की दिशा-दशा का अनुमान लगाना हो या शारीरिक सौष्ठव जानना हो; वह नौकरी-शुदाहोगा, बेरोजगार होगा या किसी व्यावसायिक या उद्योगपति घराने से संबन्धित होगा; यह सब ज्योतिषी जी से ही पूछा जाता था। मेरा दाम्पत्य-सुख निम्न, मध्यम या उत्तम कोटि का होगा; इन सब बातों की जानकारी के लिए हम ज्योतिष का ही सहारा लेते रहे।

विवाह हुआ नहीं कि घरवाले संतान-योग की जानकारी के लिए और होने वाली संतान सर्वगुण-संपन्न और योग्य ही हो इसके लिए ‘पंडीजी’ के बताये अनुसार अनुष्ठान, स्नान–दान, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन आदि हम बिना विज्ञान-गणित लगाये निरंन्तर करते रहे हैं। सच पूछिये तो हमें अपना वर्तमान और भूत-भविष्य जानने की उत्कंठा आजतक रहती है। मैं यह सब करते-धरते बेटी से बहू भी बन गई लेकिन अपना भी कोई चान्स राजनिति में है कि नहीं यह जानने की ललक आज भी है। घर पर आने-जाने वाला कोई व्यक्ति जो यह बता दे कि उसे ज्योतिष की कुछ भी जानकारी है तो उसे पानी पिलाने से पहले अपनी हथेली दिखाने बैठ जाती हूँ। कई बार तो अपनी इस हरकत के लिए डाँट भी खा चुकी हूँ। मगर क्या करूँ मन के आगे मजबूर हूँ। यह मन बहुत महत्वाकांक्षी होता है जो उसे कभी- कभी अंधविश्वासी होने पर भी मजबूर कर देता है। इस अंधविश्वास में कालांतर सुख हो ना हो मगर तात्कालिक आनंद बहुत होता है। कभी मौका मिले तो आजमाकर देखिए।

हमारे ज्योतिषी के कहे अनुसार तो अबतक की प्रायः सभी भविष्यवाणी सही साबित हुई है। ज्योतिषशास्त्र द्वारा जो चाँद और सूरज की चाल की गणना करके ग्रहण आदि का समय बताया जाता है वह भी बिल्कुल सटीक बैठता है। जब हमने कंप्यूटर का नाम भी नहीं सुना था तब भी ग्रहण लगने पर कब नहाना है और कब दान-पुन्न करना है यह पंचांग देखकर पापा बता देते थे; और हम लोग मनाही के बावजूद छत पर जाकर राहु-केतु के मुंह में समाते और निकलते चाँद मामा और सूरज देवता को देख भी लेते थे। सदियों से चली आ रही हमारी परम्पराएं भी तो जन्म से लेकर शादी-ब्याह और मृत्युपर्यन्त कर्मकांड तक बिना पंचांग देखे पूरी नहीं होती है। इसके बिना मन को संतोष और हृदय को आश्वस्ति कहाँ मिलती है?

अब हम तो आजतक यही जानते है कि पंडितजी ने बताया है कि विवाह से पूर्व “हल्दी” का लेप लगाने की रस्म है, तो  है। हमें हर हाल में यह रस्म अदा करनी है। नहीं किया तो अशुभ हो जायेगा। इस प्रक्रिया में कितना विज्ञान है, कितना ज्योतिष है और कितनी चिकित्सा यह कभी नहीं सोचा। उस समय हम तो शुभ-अशुभ मानते हैं। विज्ञान तो यही कहता है कि किसी तरह की बीमारी या साइड इफेक्ट से बचने के लिए हल्दी का प्रयोग अनिवार्य है। क्योंकि हल्दी बेस्ट एन्टीसेप्टिक होता है। विज्ञान को समझने में हमें थोड़ी देर लगेगी लेकिन पंडितजी की बात हम तत्काल समझ जाते हैं। इसका कारण यह है कि  हमारे तो छठी के दूध में ही ज्योतिष शास्त्र मिला हुआ है।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, November 19, 2014

लैंगिक समानता की कठिन राह

एक पुरुष किसी स्त्री के साथ जब  प्रेम में होता है तो वह उसके साथ “संभोग” करता है और जब नफरत करता है तो उसका “बलात्कार” करता है..ऐसा क्यों? नफरत की स्थिति में भी वह एक स्त्री को देह से इतर क्यों नहीं सोच पाता? अगर समाज का बदलता स्वरूप आज भी वही है जो सदियों पहले था तो यह स्पष्ट है कि पुरुष की सोच आज भी प्रधान है। अगर कुछ बदला है तो वो स्त्रियों का मुखर होना। आज के दौर में स्त्रियां अपने शोषण/ बलात्कार के बाद चुप बैठकर सुबकती नहीं, बल्कि चिल्लाती हैं।

इस बदलते परिवेश में अधिकांश पुरुष आज भी स्त्री को पितृसत्ता की जागीर ही समझते हैं। उसे अपनी इज्जत का डर ना हो तो मौका मिलने पर आज भी वह अपने इर्द-गिर्द एक नहीं हजार स्त्रियों को नंगा ही देखना पसंद करे। मगर जब एक स्त्री स्वेच्छा से अपनी पसंद के वस्त्र पहनती; अपने पसंद के लड़के/पुरुष के साथ घूमने जाती; एकांत में अपने प्रेमी के साथ समय बिताना चाहती है तो इसी समाज के पुरुष वर्ग को आपत्ति होने लगती है। इसमें उन्हें अपनी संस्कृति का ह्रास दिखाई देने लगता है। ऐसे लोग एक स्त्री को लांछित करते हुए यह भी कहने से नहीं चूकते कि “जब लड़की/स्त्री एकांत में एक (अपने किसी प्रेमी)  के साथ प्रेमालाप कर सकती या सो सकती है तो चार और के साथ उसे सोने में क्यों आपत्ति है? ऐसे में उसके साथ बलात्कार होना तो स्वभाविक है” क्योंकि ‘‘मर्द तो मर्द होता है।’’ इस समाज की यह सोच आज भी बताती है कि- पुरुष ही प्रधान है!

बहुत दिनों से ऐसे कईं सवाल मेरे जेहन में खटकते हैं जिसका जवाब ढूंढने की कोशिश करती हूँ तो यही मिलता है- पुरुष की अपनी ‘सोच’ और उसका अपना ‘सुख’ ही आज भी सर्वोपरी है। भले से इसके लिए उसे एक नहीं सैकड़ों स्त्रियों की देह से होकर गुजरना पड़े।

किसी के साथ आपसी रंजिश हो तो इस समाज का एक पुरुष वर्ग ‘माँ-बहन’ की गालियां देने से नहीं चूकता; और जब दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली भी करता है तब भी माँ-बहन ही करता फिरता है। पुरुषों को इसकी स्वतंत्रता किसने दी.. क्या हमारी संस्कृति में कहीं भी यह लिखा है.. किसी ने कहीं पढा़ है तो जरा बताए.. ?  या फिर कानून इन्हें गाली देने  के इजाजत देता है…?

ऐसा लोग कहते हैं कि- “शारीरिक सबंध बनाने के बाद एक स्त्री के लिए पुरुष का प्रेम और प्रगाढ़ हो जाता है।” तो किसी  स्त्री के साथ बलात्कार करने के बाद एक पुरुष के अंदर प्रेम क्यों नहीं उपजता..? बलात्कार के बाद वह एक स्त्री को मार-काट देने अथवा हत्या कर देने जैसा जघन्य अपराध क्यों कर बैठता है..? जानवर भी एक पल के लिए इस तरह का दुष्कृत्य करने से पहले ठिठक जाए।

घर से दफ्तर तक महिलाओं की स्थिति में पहले से सुधार आया है। लड़कियों की शिक्षा में बराबरी का अधिकार; नौकरी में भी लड़कियों को उतना ही अधिकार दिया गया है जितना कि लड़कों को दिया गया। इन दिशाओं में बदलाव निस्संदेह आया है। लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण है - लगातार बढ़ते उपभोक्तावाद में घर-परिवार की आर्थिक जरूरतों का बढ़ता जाना । जबतक स्त्री/ पुरुष दोनों शिक्षित नहीं होंगे; रोजगारशुदा नहीं होगे तबतक एक परिवार के लिए सामान्य जीवन जीना भी मुश्किल होगा। इस बदलाव में हमें लैंगिक समानता की उत्कंठा कम और मजबूरी ज्यादा झलकती है। यदि ऐसा नहीं है तो उसे स्वेच्छा से कपड़े पहनने; प्रेम करने; अपनी मर्जी से शादी करने; अपने किसी पुरुष से मित्रवत बात करने के सवाल पर यह समाज क्यों बौखला उठता है; जो कथित रूप से बदल रहा है?

(रचना त्रिपाठी)

 

Saturday, November 1, 2014

मन स्वच्छ तो सब स्वच्छ

स्वच्छता अभियान तबतक नहीं सफल हो सकता जबतक कि इस देश का प्रत्येक नागरिक इस कहावत को सही नहीं साबित करता- “मन चंगा तो कठौती में गंगा”। हर प्राणी चाहता है कि वह अपना जन्मस्थल, कर्मस्थली और धर्मस्थल साफ-सुथरा रखे। अपने इस नेक इरादे को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयासरत भी है। पर वह एक स्थान भूल बैठा है- वह है ‘मनस्थल’। इस अभियान में इसका कहीं जिक्र ही नहीं है। इसकी सफाई की तरफ उसका ध्यान आकर्षित ही नहीं हो रहा। सर्वप्रथम  उसे मन के भीतर की गंदगी को साफ करना होगा जिसकी साफ-सफाई किसी उत्सर्जन क्रिया के जरिए नहीं होती।

इर्ष्या, द्वेष, कुंठा, क्रोध, भय, मोह, घमंड आदि  ऐसे रोग हैं जो मन की गंदगी से उपजते है और दीमक की भांति मनुष्य का पूरा व्यकित्व चट कर जाते है- बंजर खेत की तरह, जहाँ न तो कोई सकारात्मक विचार पनपता है और ना ही कोई अच्छी सोच विकसित होती है; क्योंकि व्यक्तित्व ही विचारों की उपजाऊ जमीन होता है।

मन की मैल कोई प्लास्टिक का कचरा नहीं है जो कभी समाप्त ही नहीं हो सकती। इसकी सफाई करना तो और भी आसान है। पर यहां हर आदमी का सिद्धान्त उलट जाता है। वह यही सोचता है कि- जग सुधरेगा, पर हम नहीं सुधरेंगे। जिससे वह अपनी जड़ स्वयं खोदता है। कभी-कभी तो इसका परिणाम बहुत भयावह हो जाता है।

जब तक व्यक्तित्व रूपी जमीन को रोग मुक्त नहीं बनाएंगे तब तक स्वस्थ, स्वच्छ और सुन्दर समाज की कल्पना करना भी बेमानी है, स्वच्छता अभियान की सफलता तो अभी दूर की बात है। लेकिन जाने क्यों मनुष्य इस मलिनता से निवृत्त होना नहीं चाहता। बल्कि एक हथियार के रूप में आपसी रंजिश में इसका इस्तेमाल भी करता है। जो इस समाज के लिए नुकसानदेह ही नहीं बहुत शर्मनाक भी है।

मनुष्य एक प्रगतिशील और विवेकशील प्राणी है। उसके पास तो इन सभी समस्याओं का समाधान करने का संसाधन भी है। बस कमी है तो एक मजबूत ‘इच्छाशक्ति’ की। इसे हासिल करना भी उसके लिए बहुत आसान है; क्योंकि वह एक वैज्ञानिक है, एक योगी है और एक चिकित्सक भी है।  उसे अपने इस हुनर का इस्तेमाल कर पहले मन को चंगा कर अपने व्यक्तित्व को चमका लेना चाहिए। फिर तो बाकी गंदगी अपने-आप साफ हो जाएगी।

(रचना त्रिपाठी)

 

Thursday, October 30, 2014

क्या औरत की भी माँ होती है?

औरत होकर ये तेवर
किसने दी तुम्हें इजाजत 
चीखने -चिल्लाने की
ये तो है मर्दों का हुनर

क्यों रुँधता है गला 
सूख जाती हैं आँखे 
खुद ही तो चुना था अपना धन 
रीति-रिवाज और सामाजिक बंधन

कहाँ है बेटी तेरी माँ 
जो पोछती तेरे आंसू 
भरते तुम्हारे भी जख़्म

मत भर झूठा दंभ कि 
तुम्हारी भी “माँ" होती है
अगर यह सच है तो बता 
क्यों चुपचाप यूं 
मझधार में अकेले ही रोती है

आगे से तू भी 
बेटी की माँ बन
उसे पराया न बना
अधिकारों की बात मत कर

पहले बन एक ‘औरत’ की माँ 
जो भरती है आत्मविश्वास 
देती है संबल 
सुख-दुख में 
देती है साथ, और
अपना कहने का हक

(रचना त्रिपाठी) 

 

Wednesday, October 1, 2014

भारत में सफाई- बड़ी मुश्किल है भाई

आज कल जिस तरह सफाई अभियान का जोश सरकार से लेकर सरकारी महकमें तक दिख रहा है। ऐसा लग रहा है कि सच में गांधी जी का सपना साकार होने जा रहा है। शरीर, मन और मस्तिष्क तीनों के विकास के लिए देश से कूड़ा- कचरा और गंदगी का उन्मूलन होना बहुत जरूरी है। जब तक इस देश का प्रत्येक नागरिक शरीर से स्वस्थ, मन से मजबूत और दिमाग से दुरुस्त नहीं होगा तब तक इस अभियान का उद्देश्य पूरा नहीं हो पायेगा। यह जिम्मेदारी सिर्फ ‘मोदी’ की नहीं है।

हमारे यहां एक कहावत कही जाती है- “कौन अभागा जे के राम न भावें” मतलब ये कि शायद ही कोई ऐसा हो जिसे ईश्वर को पाने की चाह न हो। ठीक वैसे ही साफ-सफाई को लेकर प्रत्येक नागरिक के मन में यही चाह होती है कि हमारा घर और आस-पास का वातावरण हमेशा स्वच्छ बना रहे। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए हमारी चाहत ही काफी नहीं है बल्कि सबका दायित्व भी है कि वे इसके लिए पूरे मनोयोग से यह संकल्प लें कि अपने घर के साथ- साथ अपने आस-पड़ोस, गली मुहल्ला, चौराहा, नदी-नाले से लेकर गंगा की सफाई तक का ध्यान रखना है। लेकिन यह कार्य भी उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को पाना।

जिस प्रकार ईश्वर को पाने की चाह में हम अपनी भक्ति के साथ अपनी पूरी शक्ति भी लगा डालते है ठीक उसी प्रकार अगर एक मजबूत, स्वच्छ और सुंदर भारत के निर्माण के लिए इस देश के प्रत्येक नागरिक को अपना श्रम, साधन और शक्ति का योगदान करना होगा। लेकिन यह भारत है। यहां मामला थोड़ा उल्टा पड़ जाता है।

सबको सिर्फ अपने की पड़ी रहती है। लोग अपना घर तो साफ-सुथरा रखना चाहते हैं। लेकिन अपने घर की गंदगी निकालकर पड़ोस में फेंक कर पड़ोसी धर्म निभाने का स्वांग भी रचते हैं। हद तो तब हो जाती है जब अपने घर से मुंह में पान की पीक दबाये बाहर निकलते ही पड़ोसी की दीवाल पर थूक मारते हैं। घर से निकलते ही जहां-तहां खड़े होकर पैंट की जिप खोलकर ‘पेशाब’ कर निकल लेते हैं। बिना इसकी परवाह किए कि मेरे सामने से गुजरने वाले हर एक व्यक्ति खासतौर पर स्त्रियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

ये वही लोग हैं जो अपने घर में अपनी मां-बेटी और बड़े बुजुर्गों के सामने सभ्यता की चादर ताने सभ्य होने का दिखावा करते हैं; जिन्हें सिर्फ अपने घर को साफ रखने की चिंता सताती है। अगर प्रत्येक व्यक्ति यही सोच रखने लगे तो सोचिए देश की हालत क्या होगी..? जिसका अंजाम इन्हें भी भुगतना पड़ेगा; और भुगतना पड़ता भी है। लेकिन फिर भी कोई बदलाव नहीं आता। मुझे आशंका है कि मोदी के माह अभियान के बाद भी हमें यह न कहना पड़े कि- वही ढाक के तीन पात।

(रचना त्रिपाठी)

Wednesday, September 17, 2014

मर्दानी से खुशफहमी न पालें

मर्दानी फिल्म में रानी मुखर्जी ने औरत होते हुए भी जब बड़े-बड़े मुस्टंडो को मार-मार के बेहाल कर दिया, उनके हाथ-पैर तोड़कर जमीन पर लिटा दिया तो हॉल में तालियाँ बजाने वालों की कमी नहीं थी। खुश तो हम भी हुए; लेकिन बस थोड़ी देर के लिए। बाहर निकले तो जमीनी सच्‍चाई के बारे में सोचने लगे जो बिल्कुल अलग है।

जब मैं कक्षा ग्यारह में पढ़ती थी, अपने-आप को पी.टी. ऊषा से कम नहीं समझती थी। कहने का मतलब मैं धाविका थी। स्कूल की एथलेटिक्स चैम्पियन; जिससे मुझे यह गलतफहमी हमेशा बनी रहती थी कि मैं अपने भाइयों से बहुत ज्यादा ताकतवर हूँ। बात–बात पर अपने भाइयों को चैलेंज दिया करती थी- मुझसे तेज दौड़कर दिखाओ..चलो मुझसे पंजा लड़ाओ। तब वे शायद मुझे खुश करने के लिए कह दिया करते थे - “तुम मुझसे ज्यादा तेज दौड़ती हो और ताकतवर भी हो, हमें हरा दोगी।” यह कहकर वे मुझसे रेस करने से पहले ही हार मान जाया करते थे। मैं इस मुगालते में लम्बे समय तक अकड़ी रहती थी। मुझसे मात्र डेढ़ साल का छोटा था मेरा भाई जिससे मेरे अक्सर दो-दो हाथ हो जाया करते थे।

एक दिन की बात है। उससे मेरी खूब जमकर लड़ाई हुई। मैं लगातार उसे अपने दोनो हाथों से मुक्‍के जड़ी जा रही थी। घर में पापा की सख़्त हिदायत थी कि कोई भी छोटा (भाई/ बहन) अपने से बड़े के ऊपर हाथ नहीं उठाएगा। पापा के इस निर्देश की मुझे याद दिलाते हुए वह कह रहा था पापा ने ऐसा कहा है इसलिए मैं तुम्हारे ऊपर हाथ नहीं उठा रहा हूँ; वरना...। मैं फिर भी नहीं रुकी तो उसने आखिरी चेतावनी दी, “दीदी, मै जब तुम्हें मारुंगा तो नानी याद आ जाएंगी।” मैं बहुत आश्वस्त थी कि वह मेरे ऊपर हाथ नहीं उठाएगा और अगर उठाता भी है तो मैं उसपर भारी पड़ूंगी। लेकिन मैं गलत थी। जब मेरी मार भाई के बर्दाश्त से बाहर हो गई तो उसने मेरा दाहिना हाथ कलाई से पकड़ लिया, ऐंठकर मेरी पीठ के पीछे कर दिया और धम्म से दे मारा एक ‘जोरदार मुक्का’ मेरे पीठ पर।लड़ाईबस, फिर क्या था... एक ही मुक्‍के में मेरे अंदर की सांस अंदर और बाहर की सांस बाहर ही अटक गई। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और मुझे ‘दिन में ही तारे नजर आने’ का वास्तविक अर्थ पता चल गया। मेरी हालत देखकर वह अपराधबोध से भर उठा। घबराकर वह मेरी पीठ सहलाने लगा और सफाई देते हुए बोला- “कितनी बार तुमसे कहा था कि मुझसे मत लड़ा करो.. देखो मुझे भी तुमने बहुत मारा है.. मैं तुम्हें मारता नहीं.. मुझे बहुत चोट लग रही थी.. और तुम हो कि मान ही नहीं रही थी... तो मैं क्या करता...”

मेरे बड़े भईया कुछ दूरी पर बैठे इस महाभारत का आनंद ले रहे थे। हमारी लड़ाई कब खेल-खेल से मार-पीट में बदल जाय इसका कोई ठिकाना नहीं था। ऐसे में मम्मी की भूमिका सिर्फ इतनी होती कि जब हममें वाद- विवाद होता तो वे हमको कहती- “जब तुम दोनों लड़ते-लड़ते हाथ-पैर तोड़-फोड़ लेना तब मुझे बुला लेना। आकर मैं दोनो की मलहम-पट्टी कर दूंगी। जरूरत पड़ी तो डॉक्टर के यहां भी ले जाउँगी। क्योंकि यहां तो मामला बराबरी का है। दोनो में से कोई मेरी सुनने वाला नहीं है।”

इस चोट के बाद मन ही मन मैने कसम खायी कि आज के बाद मैं अपने भाइयों के ऊपर हाथ नहीं छोड़ूंगी। गाल चाहे जितना बजा लूँ।

आज भी सोचती हूँ कि मैने उससे कम रोटियां नहीं खायी थी; और ना ही मम्मी ने मुझसे छुपाकर उसे ज्यादा दूध-दही खिलाया-पिलाया था। लेकिन मैं उससे बड़ी होते हुए भी जीत नहीं पायी। उसका एक मुक्‍का मेरे सौ मुक्‍कों पर भारी पड़ा; क्योंकि मैं उसके जैसी ताकतवर नहीं थी। यहाँ मेरी माँ ने कोई नाइंसाफी नहीं की थी। मुझे बनाने वाले ने ही मुझसे पक्षपात किया था। मैं जब भी उसके पास जाउँगी तो उससे इस बात की शिकायत जरूर करुँगी। यह बात भी सत्य है कि अगर ईश्वर ने लड़कों जैसी शारीरिक ताकत लड़कियों को भी दी होती तो इस देश का मंजर कुछ और होता। फिल्मों में एक ताकतवर स्त्री का अभिनय करना हकीकत से बिल्कुल अलग है। अगर सच में वैसा होता तो हर एक माँ अपनी बेटी को खूब खिला-पिला कर ‘‘मर्दानी” जरूर बनाती।

उस दिन को हम आजतक नहीं भुला पाए। इतने सालों बाद भी हम भाई-बहन जब मिलते हैं तो वह मुझे अपने उस एक मुक्‍के की याद जरूर दिलाता है। मैं उसे यह कहकर टाल दिया करती हूँ कि वह ऊधार है मेरे ऊपर, घबड़ाओ नहीं मौका मिलते ही चुका दुंगी। अब तो इसपर खूब ठहाके लगते हैं।मर्दानी

(रचना त्रिपाठी)