टूटी-फूटी
एक गृहिणी की डायरी...
Tuesday, May 31, 2022
बच्चों के खेल - तब और अब
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पिछले एक दशक से बच्चों के खिलौनों का आधुनिक बाज़ार देखकर लगता है कि हमारा बचपन कितना सरल और सस्ता था।फिर भी उम्दा था। उस वक्त भी कहीं कुछ मि...
Friday, February 11, 2022
नन्हकी
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दो दिन हो चुके थे उस बियाबान में रेल की पटरी पर बैठकर इंतजार करते। घुटनों में सिर डाले बैठी वह इस आस में थी कि घण्टे भर में कोई न कोई गाड़ी ...
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Wednesday, February 9, 2022
ये चुनाव और वह दर्द
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जब-जब चुनाव आता है बड़की दीदिया बिफर पड़ती है। उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर होता है। जाने वो कौन सी टीस थी जो उसके भीतर से उमड़ पड़ती है! जब...
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Saturday, October 23, 2021
खौरा-खापट हम
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पीछे पलट कर देखिए तो तीन से चार दशक बाद कितना कुछ बदल गया है। मुझे याद आती है घर की ऊँची ‘देहरी’ और नल के पास पानी के छींटे से बचाव के लिए ब...
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Monday, October 4, 2021
गीत (बलम बन बदरा)
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भरी - भरी नैना क़जरा बही जाए बलम बन बदरा उड़ी - उड़ी आए मोरे पिया की बाँकी उमरिया भई री सौतन बैरन नोकरिया दू...
Friday, October 1, 2021
दहिजरा कोरोना भाग-3 (कथा में क्षेपक)
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कई सालों से जयनरायन बाबा की साध थी , भागवत कथा सुनने की। लेकिन पहले बेटियों की शादी , और फिर अपने टूटे कुल्हे के लम्बे इलाज में इतना टू...
Saturday, January 2, 2021
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम गुज़रा ज़माना बचपन का—
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नए साल का पहला दिन। शीत लहर की वजह से पड़ती कड़ाके की ठंड। घर के पीछे वाले अहाते ( खिरकी ) में सुबह से एक बड़े से ह...
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