टूटी-फूटी

एक गृहिणी की डायरी...

Sunday, June 10, 2018

खुशफ़हम जिंदगी

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उन्नीस साल बाद अपने ससुराल से जिस उपाधि की मुझे प्रतीक्षा थी आख़िरकार वह मिल गयी। यह जानकर कि 'मैं बिल्कुल अपनी सास जैसी हो गयी हूँ' ...
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Monday, March 19, 2018

आत्ममुग्धो भव...!

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कुछ लोग अपने काम और नाम की बातों को प्रस्तुत करने में इतने माहिर होते हैं कि उन्हें कभी भरोसा ही नहीं होता कि उनसे बेहतर कोई दूसरा भी यह काम...
Wednesday, February 21, 2018

जादुई मसाला

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मां का दिया हुआ यह कजरौटा हर साल दीपावली में सेंके गये काजल से लोड होता है। अपना काम तो सालों-साल इससे ही चल जाता है। लेकिन बगल में खड़ी इस ढ...
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Tuesday, February 13, 2018

अवबोधन

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बसन्त ऋतु में प्रीति को अपना नया-नवेला साजन मिला था। उसके चारों ओर एक खुशबू की बयार सी बह रही थी। लेकिन जल्दी ही उसको अपने छोटे भाई की शादी ...
Wednesday, August 23, 2017

अधूरी आशा

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शायरा आज दस बजे से ही टीवी से चिपकी थी। दिन भर चैनेल बदल-बदलकर एक ही ख़बर देखती रही। सास-बहू वाले सीरियल भी आज इस ख़बर के आगे फीके थे। ठीक पाँ...
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Monday, July 24, 2017

चक दे छोरियों

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आज मैं लड़कियों को विश्व स्तर पर क्रिकेट खेलते हुए  देखकर अभिभूत हूँ। ऐसा लग रहा है मानो मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है। इन्हें देखकर स्कूल...
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Saturday, July 22, 2017

सावन के महीने में शिवकृपा

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कॉलेज़ में परीक्षा हो जाने के बाद की छुट्टियाँ थी। मैं अपनी बुआ के घर आयी हुई थी। सावन का महीना था और पहला सोमवार भी। रिमझिम बारिश हो रही थी।...
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परिचय बस इतना सा...

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रचना त्रिपाठी
माँ-बाप के दिये संस्कारों के सहारे विज्ञान वर्ग से स्नातकोत्तर तक पढ़ाई करने के बाद उन्हीं के द्वारा खोजे गये जीवन साथी के साथ दो बच्चों को पालने-पोसने में अभी तक व्यस्त रही हूँ ...और सन्तुष्ट भी। नौकरी करना है कि नहीं, इस विषय में सोचने की फुरसत अभी तक नहीं मिल पायी; और जरूरत भी नहीं महसूस हुई। लेकिन अब जब बच्चे बड़े हो जाएंगे, तो समय के अच्छे सदुपयोग के लिए कुछ नया काम ढूँढना पड़ेगा। शायद एक खिड़की इस ब्लॉग जगत की ओर भी खुलती है...।
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