Monday, April 17, 2017

राईट चॉइस

      दैनिक जागरण 'साहित्यिक पुनर्नवा' में 'राइट च्वॉइस'

उत्सव की चमक-दमक के साथ इतनी छुट्टियां कैसे बीत गईं पता ही नहीं चला। पर उसके बाद का दो दिन जैसे बीता मत पूछिए! घर को नये सिरे से व्यवस्थित करने का काम छोटा नहीं है। दो दिन थकाऊ और पकाऊ काम करते हुए एक उम्मीद के साथ बीते कि दो दिन बाद सब ठीक हो जाएगा। बस आज की सुबह का इंतज़ार था। आज सुबह से नज़र बार-बार हमारे फ्लोर पर ही सामने वाले फ़्लैट के दरवाजे पर जाकर टिक जा रही थी।
किसी बड़े शो-रूम में भी मैं उतनी लगन से चप्पलों का मुआयना नहीं करती जितना कि उस पीले सोल वाली प्लास्टिक की चप्पल की खोज उस दरवाजे पर करती हूँ। खासतौर पर जब एक दो-दिन की छुट्टियां बीतने के बाद उसे देखने जाती हूँ तो वहाँ चप्पलें न हों तो दिल बैठ जाता है और मन हलकान हो जाता है।
उसकी चप्पल उसके होने की निशानी होती है। लेकिन आज वह चप्पल मुझे नहीं दिख रही थी जिससे मन उद्विग्न हो रहा था। सच वहाँ उसकी चप्पल देखकर मन को तुरन्त राहत मिल जाती है, कसम से। लेकिन आज बहुत देर तक बेचैनी बनी रही। जब बहुत देर तक मुझे उस चप्पल के दर्शन नहीं हुए तो मन निराशा के समुद्र में गोते लगाने लगा। हर दो मिनट बाद अपने दरवाजे से झांककर देखने के बजाय अब मैं बाहर ही खड़ी हो गयी। कुछ देर बाद वहाँ कुछ हरकत हुई। सामने वाले भाई साहब ने अपने घर का फाटक खोला। मेरी नजर उनके फाटक पर ही अटकी हुई थी। झट से उनसे पूछ बैठी "सविता आयी है क्या? उन्होंने कहा "हाँ, आयी है।" बस, फिर क्या था। मन की सारी बेचैनी शांत हो गयी, भीतर सुलग रहा गुस्सा काफ़ूर हो गया, अटकी हुई साँस फिर चलने लगी। बल्कि, अब जाके मेरी साँस में साँस आयी।
आप सोच रहे होंगे कि आखिर उस चप्पल में ऐसी क्या खास बात हैं जो रोज सुबह सामने वाले फ़्लैट की देहरी पर नजरें टिका लेती हूँ, दरवाजे की जांच-पड़ताल कर डालती हूँ? दर असल मेरी कामवाली पहले सामने के फ्लैट में आती है और वहाँ का काम निपटा कर मेरे घर आती है। हुआ ये कि इस दिवाली में उसने अपना चप्पल बदल लिया था और उसके बाद वह दो दिन भैया दूज की छुट्टी पर अपने गाँव चली गयी थी। लौटकर आयी तो नयी चप्पल में जो वहाँ पड़ी तो थी लेकिन मैं समझ न सकी कि यह उसी की है।
आज उसके बिना गुजरने वाला तीसरा दिन था, आज उसे आना था सो रात के कुछ बर्तन मैंने सिंक में ही छोड़ रखे थे। सुबह बच्चों का नाश्ता बनाने के बाद किचेन के काम के साथ ही कुछ और काम फैले पड़े थे जो मैं उसके नाम पर अक्सर छोड़ दिया करती थी। आज तो बस अब रोना ही आ रहा था।
अंततः मेरे धैर्य की परीक्षा समाप्त हुई। तभी से मैं कैटरीना कैफ और शाहरुख़  खान के गाने "साँस में तेरी साँस मिली तो मुझे साँस आयी"  के बारे में सोच रही हूँ। मुझे तो उसकी वो चप्पल देखकर साँस में साँस आ जाती है। इसीलिए कहा गया है कि अपनी-अपनी च्वाइस है। जिसको जिसमें सुख मिले उसी में मन रम जाता है। यही है राईट चॉइस।

(रचना त्रिपाठी)

जब जिसने जैसा चाहा

हे नारी तू तो अबला है
कहकर हमसे तुम बड़े हो गये
जब चाहा हथियार बनाया
ढाल बनाकर खड़े हो गये।

कह प्रिये, संगिनी जीवन की
प्रणयी बनकर पुचकार दिया
जब कभी भार महसूस किया
झट दोष लगा दुत्कार दिया

संतति की वाहक कहकर के
जननी का महिमा-गान किया
पर कोख भरी जो कन्या से
तो विष से क्यूँ संधान किया

गृहलक्ष्मी, घर की देवी कह
चौखट के भीतर बिठा दिया
अर्जन के अवसर दूर किये
घर में परजीवी बना दिया

अपना कहकर अपनाया जब
सुख-सेज सजाना सिखलाया
वहशी बनकर जब टूट पड़े
डर लोक-लाज का दिखलाया

नारी के अधिकारों से
लड़ने को कितने धड़े हो गये
जब चाहा हथियार बनाया
ढाल बनाकर खड़े हो गये।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, September 24, 2016

कुछ अपने मन की

बहुत हुआ अब इनकी-उनकी
रीति-रिवाज और पोथी से
अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

तुम निकलो या हम निकले
छोड़ो उन मनोविकारों को
जो आए दिन ही चरते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

छोड़ के हाथ के कंगन को
सारे मोह के बंधन को
जो डर से हमें जकड़ते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

मंदिर मस्जिद बँटवारों को
तोड़ के इन दीवारों को
निर्माण राष्ट्र का करते हैं
चलो आज निकलते हैं
कुछ अपने मन की करते हैं

(रचना त्रिपाठी)

Tuesday, September 20, 2016

ईप्सा

वर्षों पहले 
कुछ स्वप्न थे बुने
कुछ नींद में सजोये 
कुछ ,जगती आँखों में पले  I

कर्तव्य पथ पर डटी 
अथक, अनवरत  
चलती  रही 
निःशब्द, होठ  सिले I

लड़ती  दिन-रात
स्वाभाविक इच्छाओं से
हो परिवार  की धुरी
अभिलषित सब टले I

तिनके तिनके
जोड़ती-बटोरती
सहेजती-समेटती
स्वयं से बतकही 
स्वयं से ही गिले I

आह ! अचानक
एक एहसास 
 चालीस पार !
 अब चाहती है 
काश !
 निःशब्दता को  
 दे  आकार I
और तोड़ मौन 
निर्द्वन्द 
कर ले
हर सपना साकार I

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, September 17, 2016

छोटा नुस्खा बड़ा फायदा

यदि आपके हृदय में अपनी हिंदी के लिए तनिक भी प्रेम और सम्मान है तो हिंदी दिवस के प्रति सच्ची श्रद्धा दिखाते हुए अपने ग़ुस्से पर थोड़ा क़ाबू पाना सीख लीजिए! वो इसलिए कि ग़ुस्से में आदमी अक्सर अंग्रेज़ी में बोलने लगता है। ऐसा माना जाता है कि अंग्रेज़ी में ख़राब से ख़राब बात भी उतनी बुरी नहीं लगती जितनी हिंदी में कहने पर लगती है। तो इधर गुस्से पर लगाम का सीधा मतलब होगा उधर हिंदी की संभावना में तेज उछाल।

हाँ, ग़ुस्से पर क़ाबू पाने के लिए थोड़ी सी प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। किसी खास तरकीब की ज़रूरत भी पड़ सकती है। उसके लिए आप गूगल पर सर्च न मारे। मेरी बात पर थोड़ा गौर फ़रमाए। जब भी आपको महसूस हो कि अब गुस्सा आने वाला है तो उसे हलक में रोक लें, फिर मुँह में अपने ग़ुस्से को पान की तरह थोड़ी देर चबाए जैसे च्युइंग गम चबाते हैं, उसके बाद अपने बायें-दाएँ देखे बिना और पच्च की आवाज किये बिना उसे थूक डालें। इससे किसी का कुछ भी नुक़सान नहीं होने वाला। 

आप सोच रहे होंगे कि इस नुस्खे में कौन सा रॉकेट-साइंस मने बड़ा विज्ञान है जो हिंदी दिवस बीत जाने के बाद अब शक्तिवर्द्धक विज्ञापनों की तरह फ़ेसबुक पर चस्पा किया जा रहा है? तो जान लीजिए, इसमें सच में ऐसा कुछ भी नहीं है। बस आप ये समझिए कि ये बाबा रामदेव का पतंजलि नुस्ख़ा है। केमिकल और जहरीले रसायनों से दूर , एकदम प्राकृतिक गुणों से भरपूर जिसमें सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है। इसका प्रयोग यदि आपने पूरे साल बिना नागा कर लिया तो पक्का मानिए अगले हिंदी दिवस की सूरत एकदम फ़ेयर एंड लवली वाली त्वचा की तरह खिली-खिली और निखरी नज़र आयेगी।

मान लीजिए आपको देर हो रही हो और आपको जल्दबाजी में हिंदी दिवस के किसी कार्यक्रम में जाना है। रास्ते में कहीं ट्रैफिक जाम मिल जाय और आपकी गाड़ी में पीछे से कोई टक्कर मार दे। ऐसे में यदि आप गुस्सा थूकने की आदत डाल चुके होंगे तो आप उस समय हिंदी का सम्मान करने लगेंगे। आपके मुँह से ग़ुस्से वाली उल्टी-पुल्टी अंग्रेज़ी के बजाय सीधी सरल हिंदीे के बोल फूट पड़ेंगे और आपको ऐसा करते देख आसपास के लोग पहले हैरत से और बाद में सम्मान से देखने लगेंगे। संभव है आपकी महानता के दर्शन के लिए कुछ लोग दूसरी गाड़ियों से निकलने शुरू हो जाएं। 

संयोग से ऐसा भी हो सकता है कि सामने वाला भी आप पर अंग्रेजी में पलटवार करने के बजाय हिंदी को सम्मान दे बैठे। अगर उसने भी पूरे साल बिना नागा इस नुस्ख़े का प्रयोग किया होगा तो ऐसे में दोनों तरफ से हिंदी ही हिंदी शुरू हो जाएगी। फिर क्या पूछना, हिंदी-हिंदी भाई-भाई मतलब पूरा साहित्य दर्शन। 

इस नुस्ख़े को अपना कर आप कहीं भी हिंदी दिवस की शुरुआत कर सकते हैं। हिंदी में अच्छी-बुरी सारी बातें लगभग सभी के समझ में आती हैं। ऐसे में दोनों पक्ष ख़ूब ज़बरदस्त तरीके से एक-दूसरे की भावनाओं को उसकी हैसियत के हिसाब से उचित सम्मान देने लगेंगे। हिंदी में व्यक्त भावनाओं के इस मधुर आदान-प्रदान का आनंद बिना टिकट पब्लिक भी ले सकती है। ऐसे में फिर हिंदी की तो चाँदी कटने लगेगी।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, August 11, 2016

आस्था का विसर्जन

यह नज़ारा लखनऊ के मुंशीपुलिया चौराहे की पुलिस चौकी के सामने एक पीपल के नीचे के चबूतरे का है।

हिन्दू आस्था की प्रतीक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ जिन्हें लोग अपने घरों में सबसे साथ-सुथरे और पवित्र स्थान पर रखते हैं, इनकी पूजा करते हैं और अपने लिए सुख समृद्धि की कामना करते हैं; वहाँ शुद्धता और संस्कारों की रक्षा के लिए नाना प्रकार की वर्जनाएँ भी काम करती हैं; वहीं मूर्तियाँ पूजा-पाठ और अनुष्ठान की समाप्ति के बाद इस पेड़ के नीचे गाड़ियों के धुँए व शोर-गुल के बीच धूल-धूसरित क्षत-विक्षत पड़ी हुई जानवरों के मलमूत्र पर रोज़ टूटती... बिखरती... विलाप करती नज़र आ रही हैं।

ये कैसी आस्था है जो अपने इष्ट के प्रतीक का विसर्जन भी समुचित ढंग से नहीं कर पाती।नवरात्रि के बाद माँ दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन हो या गणपति महोत्सव के बाद बप्पा का; नदियों-तालाबों और दूसरे घाटों पर अगले दिन हृदय-विदारक दृश्य उपस्थित हो जाता है। क्या हमारी ऐसी लापरवाही हमारी संस्कृति को अशोभनीय और गंदे स्वरुप में नहीं प्रकट कर रही है?


(रचना त्रिपाठी)


Wednesday, June 29, 2016

बेटियों का अपराध

किसी घर की छत पर टंगे महिलाओं के अंत:वस्त्र देखकर कुछ असामाजिक तत्व छत फाँदकर उस घर की बहू-बेटियों की इज़्ज़त लूटने की कोशिश कर डालते हैं, या सड़क पर बिना दुपट्टे के निकलने वाली लड़की को देखकर उनके भीतर का शैतान जाग जाता है और मौका देखकर उसे दबोचने का दुस्साहस कर डालते हैं, रात को किसी महिला ने अगर अकेले बाहर निकलने की गलती कर दी तो उसके ऊपर हाथ साफ करने का लोभसंवरण ये लंपट नहीं कर पाते है। इसके बाद यदि ये अपराधी पकड़े जाते हैं तो ख़ुद को बेक़सूर साबित करने ले लिए सारा दोष उन लड़कियों व महिलाओं के सिर मढ़ देते हैं। इनका समर्थन कुछ व्यवहारवादी बुध्दिजीवी भी इस प्रकार करते हैं कि क्यों वे अपने अंत:वस्त्र बिना किसी लज्जा के खुले में सूखने के लिए डालकर, या अपने अंगों से दुपट्टा हटाकर, या रात के समय अकेले बाहर निकलकर पुरुष कामाग्नि को आमंत्रण देती हैं। 

 लड़कियाँ अपनी रोज़मर्रा के कार्यों में इस बात से कदाचित् अनभिज्ञ रहती हैं कि कौन सा कार्य उनके अपने लिये ही घातक साबित हो जाय और उनका ज़ख़्म ही इस समाज की नज़र में जुर्म बन जाए और तब, वहाँ की सामाजिक व्यवस्था उन्हें दोषी क़रार देने में कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो जाती है। 

रुबी राय का जुर्म भी कुछ इसी प्रकार का लगता है। उसने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उसके आसपास के दूसरे लड़के-लड़कियाँ न करना चाहती हों। बस मात्रा का फर्क हो सकता है और उपलब्ध सुविधा का, लेकिन आज उसे जेल जाना पड़ा है। वहाँ की पूरी शिक्षा प्रणाली ख़ुद को बेक़सूर साबित करने में अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती और वहाँ के क़ानून के रखवाले अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए खूब सक्रिय हो गये हैं। अब रुबी को गिरफ़्तार कर एक नयी मिसाल पेश की जा रही है। असली अपराधी अपने कृत्य को अपना नैसर्गिक धर्म क़रार देते हुए सीना ताने बड़े शान से इस समाज के विशेष वर्ग का हिस्सा बने आज भी बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। 

बोर्ड परीक्षा में नक़ल एक सामाजिक बीमारी है जिसमें विद्यार्थी सबसे छोटा अपराधी है जो एक अबोध अल्पवयस्क किशोर है। असली अपराधी तो उसके अभिभावक हैं; और परीक्षा संचालित करने वाले शिक्षक, केंद्र व्यवस्थापक तथा शैक्षिक व प्रशासनिक अधिकारी हैं जो इस नक़ल उद्योग से काली कमाई करने में लिप्त हैं। क्या कानून का हाथ इन अपराधियों की गर्दन तक पहुंचेगा? 

(रचना त्रिपाठी)