Saturday, May 31, 2014

यूपी सरकार का नायाब नुस्खा ‘मुहैया’

यूपी सरकार के पास तरक्की के उन नायाब नुस्खों में से एक नुस्खे का कोई जवाब नहीं है! गजब का है यह नुस्खा जिसका नाम है ‘मुहैया’। इसे यह सरकार आए दिन अपने राज्य के लोगों को उपलब्ध कराती रहती है। अखिलेश यादव ने हाईस्कूल-इण्टर पास बच्चों को टैबलेट और लैपटॉप ‘मुहैया’ कराया। बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता, किसी बिजली के खंभे से लटके हुए मनुष्य को हजार से लेकर लाख रुपए तक नगद ‘मुहैया’ कराया है।

लात्कार जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार उन लड़को को क्षमा-दान जैसा महादान तक भी ‘मुहैया’ कराने पर लगे हुए हैं। एक युवा मुख्यमंत्री से आप और क्या उम्मीद कर रहे हैं.. अभी इन्हें जुम्मा-जुम्मा ढाई साल ही तो हुए मुख्यमंत्री बने…। अभी तो ढाई साल और बचे है… देखिए अभी कितने बड़े-बड़े कारनामें ‘मुहैया’ करते हैं…।

यहां हमारी बेटियों के लिए तो नाना-प्रकार की उपलब्धियाँ ‘मुहैया’ है। एसिड अटैक में घायल लड़कियों के लिए मुफ्त इलाज और उनके घर वालों के लिए नगद रुपए; छेड़खानी और बलात्कार के बाद पीड़िता की हालत अगर नाजुक हो गई, तो यह ‘मुहैया’ पचास हजार से एक लाख तक कर दिया जाता है।

हमारी सरकार द्वारा प्रदत्त ये सारे तोहफे जो हमने ‘मुहैया’ के नमूने के तौर पर पेश किया है वह उपहार तब और कीमती हो जाता है जब यहां हमारी बेटियों के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या करके किसी नदी-नाले में बहा दिया जाय या किसी पेड़ पर टांग दिया जाय। तब ‘मुहैया’ की कीमत जानना चाहेंगे आप..? पांच लाख तक..! यहां एक माँ की कोंख और आंसू की कीमत तक ‘मुहैया’ कराया जाता है।

हम माताओं के सीने में तो सिर्फ जलन है! जिसका उपचार न तो यह सरकार मुफ्त में करा पाएगी और ना ही ‘मुहैया’ से ठंडा कर पाएगी। क्योंकि हम तो अपनी जुबान पर ताला मारे बैठे हैं कि कहीं कोई ‘यादव’ डॉक्टर या किसी ‘यादव’ सिपाही के भेंट चढ़ गये, तो बाकी बच्चियों का क्या होगा..?  सरकार का नजरिया भी हमारी बेटियों के लिए यही है कि वे तो सिर्फ हाड़-मांस की बनी भोग की वस्तुएँ है। अलबत्ता भैंसो की सुरक्षा के लिए तो यहां पुलिस और प्रशासन दोनों ही बड़े काबिल हैं..।

(रचना त्रिपाठी)

Thursday, May 22, 2014

समाज में असुरक्षित स्त्री

अपार्टमेन्ट में रात को करीब बारह बजे एक पुरुष दूसरी महिला के साथ अपने फ्लैट में घुसता है… अंदर से चीखने चिल्लाने; घर के दरवाजों की धड़-धड़ और बर्तन पटकने की आवाज आती है… कुछ देर बाद खिड़की में लगे पल्ले का शीशा टूटकर ग्राउंड फ्लोर पर गिर जाता है… आधे घंटे तक घर के अंदर शोर-शराबे के बाद अचानक सन्नाटा छा जाता है… घर का मेन दरवाजा अंदर से बंद हो जाता है… रात को एक बजे उस घर की महिला और उसका दस साल का बेटा बिल्डिंग के सामने बने पार्क में टहलते हुए नजर आते हैं… दोनो मां-बेटे देर रात तक सड़क से पार्क और फिर पार्क से सड़क पर बेचैनी की हालत में दिखाई देते है…। बिल्डिंग के लगभग सभी सदस्यों की नजर उसके फ्लैट पर रहती है…सबकी नजर इस तलाश में रहती है की वह महिला अपनी तकलीफ बताए तो  उसकी कुछ मदद की जाय… लेकिन किसी को उससे पूछने की हिम्मत नहीं होती… क्योंकि वह सबको देखकर बनावटी मुस्कान से यह जताने का प्रयास करती कि उनके साथ सबकुछ ठीक है… और वे मां-बेटे टहलते हुए स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं..।

उसकी इस बेबसी को देखकर मेरा मन उद्विग्न हो उठा। एक बार को मन में आया कि उसकी मदद के लिए आगे बढ़ूँ; शायद उसको हमारी बात से मनोबल मिले और वह अपने पति के खिलाफ आवाज उठा पाए। लेकिन पता चला कि वह किसी के पूछने पर बुरा मान जाती है और अपने परिवार के मामले में किसी दूसरे की दखलअंदाजी बिल्कुल भी पसंद नहीं करती। लेकिन इस बात पर विश्वास कैसे किया जाय…? उसके घर में तो पहले से ही दूसरी स्त्री की दखलअंदाजी हो चुकी है जिसकी वजह से  आज इतनी रात को वह अपने घर के अंदर होने के बजाय सड़क पर है। लेकिन इस बात को उसे कौन समझाए… यह उसका सिद्धान्त नहीं हो सकता… जरूर उसकी मजबूरी रही होगी…।

समाज में अपना और अपने  परिवार की इज्जत बनाए रखने के लिए वह अपने अंदर कितना दर्द लेकर जी रही है। उसके चेहरे से स्पष्ट हो रहा था कि वह अपनी हालत पर लाचार है; लेकिन उसकी इस लाचारी के बारे में लोग न जानने पाए इस प्रयास में वह अपने-आप को ही धोखा दे रही थी। यह कैसी मजबूरी है उस स्त्री कि जो उसे समाज के सामने अपने साथ हो रहे अन्याय को स्वीकार करने में भी असहज बना देती है...?

नारी को सशक्त बनाने के लिए अबतक जितनी भी योजनाएं लायी गयी हैं और कानून बनाये गये हैं उनका उपयोग करने में अभी भी हमारे समाज की अनेक स्त्रियां इसे लज्जा की बात समझती हैं। कदाचित् उनका मानना है कि अपने पति की ‘उपेक्षा’ अगर दुनिया के सामने स्वीकार कर लेंगी तो उस समाज में उन्हें सम्मान की नजर से नहीं देखा जाएगा। इस वजह से वह अपने पति के द्वारा हो रहे सभी जुल्मों को सहने के लिए तैयार रहती हैं ताकि घर की बात घर में ही रहे, बाहर न जाए; जिससे उनका और उनके परिवार का सम्मान समाज में बना रहे।

उसका यह व्यवहार हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। अगर वह अपने पति के खिलाफ कोई कदम उठाना चाहे तो उसका अंजाम क्या-क्या हो सकता है? जिसकी अपनी सम्पत्ति सिर्फ एक चारदीवारी हो, जिसकी चौकीदारी में अबतक का उसका सारा समय व्यतीत हुआ हो, जहां से बाहर निकलने में उसे पग-पग पर अपने पति के सहारे की जरूरत पड़ती रही हो; वह स्त्री आज अचानक कहां से इतनी हिम्मत जुटा पाएगी? इसमें बड़े मनोबल के साथ आर्थिक मजबूती की भी आवश्यकता होगी। ऐसे में एक स्त्री को जिसका अपना कोई आर्थिक श्रोत न हो कानूनी तौर पर कितना मजबूत बनाया जा सकता है..? फिर उसके सामने एक और सवाल खड़ा होगा – इज्जत की रोटी का।

ऐसे में यदि  स्त्री आर्थिक रूप से इतना सशक्त बने और देश का कानून उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे तो शायद आज उसके सामने इस तरह का कोई संकट न पैदा हो। एक पुरुष होने के नाते एक पिता या भाई पुरुष की मानसिकता से और अच्छी तरह से परिचित होते हैं। इसलिए घर की लड़की को शैक्षिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना उनकी जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि उनका कर्तब्य भी बनता है।

(रचना त्रिपाठी)